चुनावी हिंसा पर निबंध |Electoral Violence Essay

चुनावी हिंसा पर निबंध

चुनावी हिंसा पर निबंध 

भारत में आम चुनाव हो या मध्यावधि चुनाव अथवा जिला परिषद या मुखिया का चुनाव हो-यह कल्पना नहीं की जा सकती कि चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होगा और कहीं भी किसी प्रकार की झड़प नहीं होगी। अनुमान यह लगाना है कि हिंसा गणनीय होगी अथवा अगणनीय। चुनाव में हिंसा को अनिवार्य बना दिया गया है। इसके लिए सरकार और सरकारी तंत्र दोषी है। भारत में चुनावी हिंसा इतनी अधिक बढ़ गई है कि आम आदमी अब हत्या जैसे संगीन मामले में भी संवेदनशील नहीं रह गया है। दो-चार हत्याओं से तो कोई संवेदना ही उत्पन्न नहीं होती। इसका कारण यह है कि अब जहां सामूहिक नरसंहार ही लगातार हो रहे हों, वहां फुटकर हत्याओं की क्या गिनती? 

पहले लोग राजनीति में सेवा-भाव से आते थे। जनता की सेवा करना ही उनका मूलोद्देश्य था, लेकिन आज उल्टी गंगा बह रही है। राजनीति में आते ही लोग अपनी सेवा में जुट जाते हैं। मुखिया, पार्षद, सांसद, विधायक आदि जन प्रतिनिधियों को इतनी अधिक सुविधाएं प्राप्त हैं कि वे उसी में खोए रहते हैं। उन्हें जनता की चिंता कहां है। वे हिंसा भड़काना जानते हैं। उसके परिणाम की परवाह उन्हें नहीं होती। वे किसी भी प्रकार चुनाव जीतना चाहते हैं। इसके लिए उनका सबसे बड़ा हथकंडा हिंसा है। आखिर हिंसा खत्म हो, तो कैसे? चुनावी हिंसा सुनियोजित अपराध है, जिसे राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त होता है। चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा को ‘चुनावी हिंसा’ कहते हैं। 

सामान्यतः चुनाव-प्रचार, मतदान एवं विजय-जुलूस के दौरान भी हिंसक घटनाएं घटती हैं। चुनाव प्रचार निर्वाचन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस अवस्था में सभी उम्मीदवार अपने-अपने समर्थकों के साथ चुनाव क्षेत्र में घूम-घूमकर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की चेष्टा करते हैं। इस क्रम में कभी-कभी दो विरोधी उम्मीदवारों या उनके समर्थकों के बीच झड़प हो जाती है। इन उम्मीदवारों की आस्था अपने चुनाव घोषणा पत्र में नहीं होती। इन्हें तो अपने बाहुबल पर अधिक विश्वास रहता है। ये जानते हैं कि बंदूक की गोली और बमों के विस्फोट में वह ताकत है, जो हमें विजय दिला सकती है। अतः अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए वे हिंसा का सहारा लेते हैं। 

चुनाव की सुबह से ही चारों ओर बमों और गोलियों की आवाज गूंजने लगती है। सर्वत्र भय एवं आतंक का वातावरण बन जाता है। इतना होने के बावजूद अगर कोई मतदाता हिम्मत दिखाकर मतदान हेतु घर से बाहर निकल आता है, तो विरोधी उम्मीदवार के गुंडे उसकी हत्या कर देते हैं। अब तो चुनाव के ऐन मौके पर उम्मीदवार की भी हत्या करा दी जाती है। कई बार चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार की भी हत्या हो जाती है। 

जो उम्मीदवार ज्यादा से ज्यादा हिंसा करने की क्षमता रखता है, बूथ उसके कब्जे में आ जाता है और वह सभी मतों को अपने पक्ष में डाल देता है। वह विजय हासिल करके लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदलने के लिए अधिकृत हो जाता है। ऐसे उम्मीदवारों के विजय-जुलूस में भी भद्दे-भद्दे नारे लगते रहते हैं। इससे संपूर्ण वातावरण अत्यंत दूषित हो जाता है। 

 चुनावी हिंसा रोकने के लिए सरकार द्वारा मतदान केंद्रों पर धारा 144 लागू कर दी जाती है। लेकिन चुनावी हिंसा के इस दौर में धारा 144 महत्वहीन हो जाती है-भले ही हाथी के दांत की भांति स्थायी पुलिस बल और चलंत दंडाधिकारी नियुक्त हों। सरकार के इन फूहड़ प्रयासों के बावजूद चुनावी हिंसा में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं हो सकी है। सच तो यह है कि इन हिंसाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है। चुनावी हिंसा रोकने संबंधी इन सरकारी प्रयासों को तातल सैकत वारि बिंदु ही कहा जा सकता है। इसे रोकने के लिए सरकार को कोई कठोर कदम उठाना चाहिए। 

चुनावी हिंसा लोकतंत्र के लिए एक घातक रोग के समान है। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। इसका प्रमुख कारण राजनीति का अपराधीकरण अथवा अपराधी का राजनीतिकरण है। इससे किसी दिन लोकतंत्र का मूल स्वरूप नष्ट हो सकता है। इसे पूर्णतः रोककर ही लोकतंत्र को बचाया जा सकता है। अगर इसे नहीं रोका गया, तो यह चुनावी मुखौटा बनकर रह जाएगा। हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि चुनाव मार-काट का युद्ध नहीं है, बल्कि पवित्रता और शांति का महापर्व है।

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