एकता पर निबंध-Essay on Unity

राष्ट्रीय एकता पर निबंध

एकता पर निबंध –Ekta par nibandh 

एकता पर निबंध – एक होने का भाव ‘एकता’ कहलाता है। यदि मानव परस्पर पृथक् होकर कार्य तथा विचार करे, तो मानवसमाज की प्रगति संभव नहीं। इसलिए, मनुष्य का मन, वचन और कर्म से यथासंभव एक होना आवश्यक है। यदि हम एकजुट होकर काम करते हैं, तो हमारी उन्नति निश्चित है, यदि हम बँटकर, बिखरकर काम करते हैं, तो हमारी अवनति होकर रहेगी।

जॉन डिकिन्सन की उक्ति ठीक है, United we stand, divided we tall’ (हम संगठित रहें, तो टिकेंगे; असंगठित हए, तो गिरेंगे) । भारतीय नीतिकार भी कहते “सह, सङ्घ शक्तिः कलौयुगे।’ अर्थात् कलियुग में संघटन या एकता में ही बल है। कहा गया है, “एकता ही बल है’-Union is strength ! अकेला चना भाड़ नहीं ता। एक मामूली तिनके की क्या बिसात ! किंत, जब वही संगठित हो जाता है. एक सस बना रस्सी द्वारा बड़े-बड़े उन्मत गजराज भी बाँध दिए जाते हैं। 

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एक नन्हीं-मुन्नी बूंद की क्या हस्ती! किंतु, उन्हीं बूंदों का समुदाय जब महान नद बन जाता है, तब उसके सामने बड़े-बड़े भंधर भी काँपने लगते हैं। एक छोटी-सी इट ता किसी ठोकर या चोट से फोडी जा सकती है, किंतु जब वही मिलकर दीवार बनता है, तब बड़े-बड़े वीरों के पथ अवरुद्ध हो जाते हैं। जो चींटी छोटी और दुबली मालूम पड़ती है, वही जब एक साथ हो जाती है, तब विषधर भुजंगों को भी चट कर जाती है।

शेख सादी का कहना है-यदि चिड़ियाँ एकता कर लें, तो शेर की खाल खींच सकती हैं। इन दर के दष्टांतों तक जाने की आवश्यकता नहीं । याद हम अपने शरीर की भोर ही देखें, तो एकता का महत्त्व स्पष्ट हो जाएगा। आचार्य विनोबा ने लिखा है- “सबको हाथ की पाँच उँगलियों की तरह रहना चाहिए।” हाथ की पाँचों उँगलियाँ समान थोडे ही हैं? कोई छोटी है, कोई बड़ी, लेकिन हाथ से किसी चीज को उठाना होता है, तब पाँचों इकट्ठा होकर उठाती हैं। हैं तो पाँच, लेकिन काम हजारों का कर लेती हैं, क्योंकि उनमें एकता है। 

इतिहास के पृष्ठ साक्षी हैं कि एकता के अभाव का दुष्परिणाम कितना भयानक होता है। कौरव और पांडव की आपसी फूट के कारण इतना बड़ा महाभारत हुआ जिसे सारा संसार जानता है। अनाचारी रावण भी शायद ही पराजित होता, यदि अपने छोटे भाई विभीषण को लात मारकर वह अपने से विलग नहीं करता। पृथ्वीराज और जयचंद की फूट ने हमें विदेशी आक्रमणकारियों का गुलाम बनाया तथा मीरजाफर का हमसे छिटक जाना अँगरेजों की दासता का कारण बना ।

जब हम हिंदू-मुसलमान एक रहे, तो हमने अँगरेज जैसे राजनीतिक धुरंधरों के छक्के छुड़ाए और जब आपस में लड़ने लगे, तब हमने भारतमाता की छाती के दो टुकड़े कर दिए। मुट्ठी-भर जापानियों और जर्मनों के सामने बड़ी-बड़ी शक्तियाँ साक्षात् दंडवत करती रहीं-इसका एकमात्र कारण है, उन देशों के लोगों में दृढ़ एकता । 

अतः, आवश्यक है कि हम यदि परिवार में सुख, शांति, समृद्धि की त्रिवेणी लहराती हुई देखना चाहते हैं, तो परिवार के सदस्यों को एकता के दिव्यमंत्र से दीक्षित करें। यदि घर फूटेगा तो गँवार लूटेगा–इसमें कोई संदेह नहीं। यदि समाज में फूट हो, तो समाज कभी नहीं फूले-फलेगा।

इसी प्रकार, देशवासियों में एकता खंडित हुई, तो देश पराजित एवं पदमर्दित होगा। हम भाषा, संप्रदाय, जाति, धर्म इत्यादि के नाम पर लडते हैं, अपनी शक्ति का विनाश करते हैं-यह राष्ट्र को अगति के गर्त में गिरा डालेगा। अब तो आवश्यक हो गया है कि हम समग्र संसार में एकता का शंख फूंकें और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना में बँध जाएँ।

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