शिक्षा वर्धक कहानियां-चमत्कारी शंख,राजा को मिला सबक

शिक्षा वर्धक कहानियां-

शिक्षा वर्धक कहानियां-चमत्कारी शंख

किसी समुद्र तट पर एक मछुआरा रहता था, जिसका नाम दीनू था। वह दिन भर मछलियों को पकड़ता तथा शाम को पास के शहर में जाकर बेच देता। उसी में उसकी गृहस्थी खुशी-खुशी चल रही थी। वह घर में अकेला था। उस पर किसी की जिम्मेदारी नहीं थी। कभी-कभी उसे अकेलापन परेशान करता परंतु पास पड़ोस के बच्चों के बीच रहकर वह अपना सारा दुख भूल जाता। रोज शाम को शहर से वह तरह-तरह की चीजें लाता और बच्चों में बांट देता। बच्चे उससे बहुत प्यार करते और दीनू भी उन्हीं बच्चों को अपना परिवार मानता था। 

दीनू के घर से थोड़ी दूर पर रामनाथ रहता था। उसकी एक बेटी पूजा थी। वह बहुत चंचल और नटखट थी परंतु जिद्दी ऐसी थी कि जो मांग लेती, न मिलने पर आसमान सिर पर उठा लेती थी। अगर वह किसी का कहना मानती, तो वह दीनू ही था। दीनू भी उससे स्नेह करता था। 

एक रात पूजा सो रही थी। उसने सपने में एक बहुत बड़ा शंख देखा। सुबह उठी तो उसने रट लगा दी, “मुझे सपने वाला शंख चाहिए।” रामनाथ ने पूजा को समझाया। दीनू का नाम सुनते ही पूजा चुप हो गई। वह झट दीनू के घर की ओर भागी। परेशान रामनाथ उसके पीछे-पीछे था। पूजा दीनू के घर जा पहुंची। दीनू मछली पकड़ने जाने वाला ही था। पूजा को देखते ही उसने अचरज से पूछा, “अरे! पूजा कहां से भागती आ रही हो?” दीनू ने पूजा को दुलार से गोदी में उठा लिया। 

“चाचा! मुझे सपने वाला बड़ा-सा शंख चाहिए।” पूजा ने हाथ से बड़ा-सा आकार दिखाया। 

“तू उसका क्या करेगी?” दीनू ने आश्चर्य से पूछा। तभी रामनाथ भी वहां आ पहुंचा। पूजा की जिद के बारे में उसने बताया। सुनकर दीनू हंस पड़ा।

“ठीक है। शाम को शंख लेता आऊंगा।” दीनू ने पूजा को समझाया। वह रोने लगी। बड़ी मुश्किल से उसे समझाकर दीनू ने उसे वापस भेजा। 

दीनू मछलियां पकड़ने चल पड़ा। समुद्र तट पर दूसरे मछुआरे भी साथ थे। 

दुर्भाग्य से उस दिन दीनू के जाल में एक भी मछली नहीं फंसी। दीनू परेशान हो गया। शाम हो गई परंतु उसका भाग्य नहीं बदला। थक-हारकर वह किनारे लौटा। तभी उसकी आंखें चमक उठीं। सामने रेत पर उसे एक शंख दिखाई दिया। वह बहुत बड़ा और सुंदर था। उसमें से प्रकाश निकल रहा था। दीनू खुश होकर शंख की ओर बढ़ ही रहा था कि कहीं से दौड़ता हुआ एक आदमी आया और शंख को उठाकर चलता बना। दीनू के वहां पहुंचने से पहले ही वह गायब हो गया। दीनू खड़ा-खड़ा देखता रहा, फिर उदास मन से घर लौट गया। रामनाथ दीनू के घर पर ही बैठा था। उसने दीनू को देखते ही पूछा, “भाई शंख लाए?” 

“नहीं, आज न तो मछलियां ही मिलीं और न ही शंख।” दीनू उदास मन से बोला। 

“पूजा को अब कैसे समझाऊं? सुबह से शंख की रट लगाए बैठी है। बड़ी मुश्किल से सोई है। न जाने क्यों, उसे बुखार भी हो गया है।” रामनाथ परेशान स्वर में बोला। 

“भगवान पर भरोसा रखो। सब ठीक हो जाएगा। कल चाहे जैसे भी होगा, मैं जरूर शंख ले आऊंगा।” दीनू यह कहते हुए घर के अंदर चला गया। दीनू रात भर सो न सका। उसकी आंखों के सामने बार-बार पूजा का रोता हुआ चेहरा घूम आता था। दीनू ने मन ही मन प्रण किया कि कल मैं किसी भी कीमत पर शंख जरूर ले आऊंगा। सुबह पौ फटने से पहले ही दीनू समुद्र में उतर गया। मछलियों का ढेर लग गया परंतु शंख एक भी न मिला। तभी उसने एक व्यापारी को देखा, जो चिल्ला-चिल्ला कर लोगों से कह रहा था, “मेरे पास एक अद्भुत शंख है, इस सदियों पुराने शंख को जो खरीदेगा, उसके घर में लक्ष्मी आएगी। जो सबसे अधिक कीमत देगा, यह शंख उसी का हो जाएगा।” कहते हुए उसने झोले से एक शंख निकाला। अद्भुत और चमकीला। 

उस शंख को देखकर दीनू हैरान था, क्योंकि वह वही शंख था, जो उसने समुद्र के किनारे देखा था। दीनू से रहा नहीं गया। उसने जोर से चिल्लाते हुए कहा, “भाइयो, यह सदियों पुराना शंख नहीं है। इसे इसने कल ही समुद्र के किनारे से उठाया है। इसे मैं उठाने ही जा रहा था कि यह उठाकर भाग गया।” 

वहां खड़े लोग, जो शंख को खरीदना चाह रहे थे, भला-बुरा कहते हुए चले गए। वहां केवल वह शंख बेचने वाला ही खड़ा रह गया। उस ठग ने अपने साथियों के साथ मिलकर दीनू को खूब पीटा और उसके पैसे छीनकर भाग खडे हुए। दीनू को अपनी चोटों की परवाह नहीं थी, उसे केवल दुख इस बात का था कि अब वह पूजा के लिए शंख कैसे ले जाएगा, क्योंकि उसके सारे पैसों को ठग छीनकर ले गए थे। दीनू रात भर दुख से समुद्र किनारे ही बैठा रहा। सुबह होते ही 

दीनू भारी मन से घर की ओर चला। चोट लगने के कारण वह चल भी नहीं पा रहा था। रास्ते में ही उसे रामनाथ मिल गया। दीनू उससे कुछ कह पाता, उससे पहले ही रामनाथ बोल पड़ा, “दीनू तुम रात भर कहां थे? हम तुम्हें ढूंढ़ रहे थे। रात को ही तुम्हारा भेजा हुआ शंख पूजा को मिल गया। उसकी तबीयत अब ठीक है। वह उसी शंख के साथ खेल रही है और तुम्हें याद कर रही है। तुम जल्दी चलो।” 

दीनू आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि उसने तो किसी की मार्फत शंख नहीं भेजा था। घर पहुंचकर उसने देखा कि पूजा शंख के साथ खेलती हुई बहुत खुश है। यह शंख ठीक वैसा ही था, जिस प्रकार का उस ठग के पास था। दीनू की समझ में नहीं आया कि यह चमत्कार कैसे हो गया? उसी समय शंख से आवाज आई, “दीनू आश्चर्य मत करो। मैं चमत्कारी शंख हूं। इस बच्ची की खुशी के लिए तुमने पिटाई खाई और अपने सारे पैसों को गंवाया। बच्चों में देवता का निवास होता है, जो बच्चों को हरदम खुश देखना चाहता है, उसकी देवता भी सहायता करते हैं। मैं स्वयं ही यहां आया हूं।” शंख की बात सुनकर सब आश्चर्यचकित रह गए। 

शिक्षाप्रद कहानियाँ- राजा को मिला सबक

एक बार विराट नगर के राजा चंद्रभान ने राज्य के लोगों में भूमि का वितरण किया। उसने किसानों और मजदूरों, कारीगरों को भूमि कम दी और ब्राह्मणों को काफी अधिक भूमि दी। इस पर लोगों ने सवाल उठाया कि ऐसा क्यों? तो राजा ने स्पष्ट किया, “ब्राह्मण अन्य लोगों से अधिक बुद्धिमान और ज्ञानी होते हैं। इसलिए उन्हें अधिक भूमि देना ठीक है। वस्तुतः यह उनकी योग्यता का सम्मान है।” 

शिक्षाप्रद कहानियाँ- राजा को मिला सबक

इस बात पर अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में खड़े लुहार और भिश्ती (पानी पिलाने वाला) चिढ़ गए। दोनों मित्र थे। उन्होंने आपस में सलाह कर राजा को सबक सिखाने की सोची। जब लुहार का नंबर आया तो राजा ने उससे पूछा, “तुम्हारा काम कितनी भूमि से चल जाएगा?” 

लुहार बोला, “महाराज, हथौड़े और कान के बीच में जितना अंतर है बस उतनी भूमि ही काफी होगी।” 

बात राजा की समझ में आई यद्यपि उसने सोचा इसे अपना काम करने के लिए 2-4 गज जमीन पर्याप्त होगी। फिर भिश्ती से पूछा, “तुम कितनी भूमि लोगे?” 

भिश्ती ने बताया, “महाराज, एक मशक (मशक-चमड़े का बना पानी का पात्र) भर पानी जितनी जगह में आसानी से समा जाए, बस उतनी ही भूमि मेरे लिए पर्याप्त होगी।” 

राजा ने सोचा इसे भी 4-6 गज जमीन ही चाहिए। राजा ने दो कारिंदे उन दोनों के साथ भेजे, कहा, “इन्हें जमीन नाप दो।” 

जब कारिंदे जमीन नापने लगे तो लुहार और भिश्ती की बात जानकर दंग रह गए। लुहार बोला, “एक हथौड़े की आवाज जहां तक कान आसानी से सुन सके वहां तक जमीन चाहिए।” चकराए कारिंदे दोनों को साथ लेकर राजा के सम्मुख पहुंचे। उन्हें बताया, “महाराज, यह तो बहुत भूमि मांग रहे हैं। आप इन्हें समझाएं।” 

राजा बोला, “क्यों भई, तुम तो बहुत कम भूमि चाहते थे। अब कारिंदों को क्यों परेशान कर रहे हो? इसकी सजा जानते हो?” 

“जी महाराज!” दोनों ने एक साथ कहा। 

फिर लुहार बोला, “महाराज, मैंने तो उतनी ही भूमि मांगी है जैसी कि आपको बताया कि हथौड़े और कान के मध्य जितनी दूरी है। कारिंदे समझ ही नहीं रहे। आप ही बताएं मेरी मांग क्या अनुचित है?” 

राजा इस पर खुद ही चकरा गए। फिर भिश्ती बोला, “मैंने तो आपसे बोला ही था कि मशक भर पानी जितनी भूमि में आसानी से समा जाए बस उतनी ही भूमि चाहिए। मैं भूमि पर पानी छिड़कने लगा तो कारिंदे बोले-एक जगह मशक उडेल देने पर पानी आसानी से भूमि में समाएगा?” 

राजा लुहार और भिश्ती की बुद्धिमानी पर हैरान रह गया। उसे दोनों को मजबूरन उनकी मरजी की भूमि नाप देने का आदेश अपने कारिंदों को देना पड़ा। साथ ही कहा, “मैं इनकी बुद्धिमानी से चकित हूं। इन्होंने बुद्धिमानी में ब्राह्मणों को भी मात दे दी। इन्हें दस-दस स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार में दी जाएं।” 

पर दोनों मित्र बोले, “क्षमा करें महाराज, हमें न तो भूमि चाहिए न इनाम। हम तो आपके पक्षपात से क्षुब्ध थे और आपको उसका बोध कराना चाहते थे। आपने उन ब्राह्मणों को अधिक भूमि दी जो स्वयं कृषि नहीं कर सकते और दूसरों के दान पर जिन्हें जीवन बिताने की आदत है और हाड़तोड़ मेहनत कर राज्य को जो खुशहाल बनाए रखते हैं, उन मजदूरों, किसानों कारीगरों को कम भूमि दी।” 

राजा सुनकर चकरा गया। बोला, “ओह, मैं तो सिर्फ ब्राह्मणों को ही बुद्धिमान मानता था। तुमने मुझे यह बोध करा दिया कि बुद्धिमानी किसी वर्ग विशेष की बपौती नहीं है। मुझे क्षमा करना। मैं वचन देता हूं कि आज के बाद मैं किसी से किसी तरह का पक्षपात नहीं करूंगा और हां, राज-काज संचालन में मैं आगे से तुम लोगों से भी विचार-विमर्श किया करूंगा।” 

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