Drishti essay in Hindi -हिमालय पर्वत माला पर उमड़ते खतरे के बादल (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2010) 

Drishti essay in Hindi

Drishti essay in Hindi-हिमालय पर्वत माला पर उमड़ते खतरे के बादल (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2010) अथवा हिमालय का बिगड़ता मिजाज 

पर्यावरणीय कारणों से हिमालय पीड़ित है और उसका मिजाज बिगड़ रहा है। यह हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि भारत के लिए हिमालय का विशेष महत्त्व एवं उपयोगिता है। खतरे के बादलों ने हिमालय को घेर रखा है। जहां हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं वहीं भूकम्प और भूस्खलन बढ़े हैं। दहला देने वाली बाढ़ों की आवृत्ति भी बढ़ी है। हिमालय पर अतिक्रमण और प्रदूषण बढ़ने से स्थितियां निरंतर बिगड़ रही हैं, तो उपभोक्तावादी, अविवेकपूर्ण | विकासवादी दृष्टिकोण के चलते भी हिमालय की सेहत बिगड़ी है। | हिमालय अपनी पीड़ाओं से कराह रहा है। 

हिमालय की बिगड़ती सेहत और मिजाज के हमें क्या दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, इस पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले यह जान लेना उचित रहेगा कि हिमालय की हमारे लिए क्या उपादेयता है। हिमालय जल और ऑक्सीजन का वह नैसर्गिक भण्डार है, जो यहां से उद्गमित नदियों और ग्लेशियरों को जीवित रखता है। हमारी जीवन रेखाएं कही जाने वाली नदियों को हिमालय के ग्लेशियर ही मीठा जल प्रदान करते हैं। ये ग्लेशियर हिमालय के नैसर्गिक सौंदर्य का हिस्सा हैं, तो जीवनदायिनी नदियों के पोषक भी हैं। ध्यातव्य है कि सिंधु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र जैसी तीन विशाल नदियों, जिनसे अनेक छोटी नदियों का अस्तित्व जुड़ा है, को हिमालय के ग्लेशियर ही पोषित करते हैं। प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख घन मीटर पानी हिमालय की नदियों से बहता है, जो पूरे देश में 45% जलापूर्ति करता है। यही कारण है कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 16.3% क्षेत्र में फैले हिमालयी क्षेत्र को समृद्ध वाटर टैंक के रूप में जाना जाता है। 

“हिमालय जल और ऑक्सीजन का वह नैसर्गिक भण्डार है, जो यहां से उद्गमित नदियों और ग्लेशियरों को जीवित रखता है। हमारी जीवन रेखाएं कही जाने वाली नदियों को हिमालय के ग्लेशियर ही मीठा जल प्रदान करते हैं।” 

जलवाय नियंत्रण में भी हिमालय का महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिमालय न सिर्फ भारत, बल्कि उन सभी देशों की जलवाय तय करता है, जिनकी सीमाएं इस महान पर्वत माला को स्पर्श करती हैं। इतना ही नहीं, पूरी दुनिया में उत्सर्जित होने वाले कार्बनप को कम करने में हिमालय की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। हिमालय औषधीय महत्त्व की वनस्पतियों एवं जड़ी-बूटियों का भण्डार है, तो इसकी दिव्यदर्शिता समूचे विश्व को आकर्षित करती है। यह पर्वत हमारी सरहदों को सुरक्षित रख कर भी हम पर उपकार करता है। 

जिस हिमालय के हम पर इतने उपकार हों, उसकी सेहत संवारने और उसे संरक्षित करने का नैतिक दायित्व हमारा था, किंतु हम ऐसा नहीं कर सके। हिमालय की सेहत को संवारने के बजाय हमने अपनी अगंभीर और पर्यावरण की दृष्टि से अहितैषी गतिविधियों के जरिए हिमालय की सेहत को बिगाड़ना शुरू कर दिया। हिमालय से निकलने वाली नदियों पर बड़े-बड़े बांध बनाकर उन्हें अवरुद्ध कर दिया। जगह-जगह पनबिजली योजनाएं शुरू कर दीं। वनों को उजाड़ा गया, तो पर्यटन के नाम पर हद दर्जे की छेड़छाड़ की गई, जिससे अतिक्रमण और प्रदूषण बढ़ा। यह जानते हुए कि हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भ में सर्वाधिक हलचल रहती है, जिससे भूकंप की संभावना बनी रहती है, इस क्षेत्र में उपभोक्तावादी, अविवेकपूर्ण विकास को प्रोत्साहन दिया गया। इन तमाम तरह के दबावों से हिमालय आहत है और जानकारों के अनुसार आगामी 50 वर्षों में हिमालयी राज्य तबाह हो सकते हैं। 

हिमालय की बिगड़ती सेहत के दुष्परिणाम भी दिखने लगे हैं। सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जलवायु परिवर्तन के रूप में दिख रहा है, क्योंकि जो हिमालय मौसमी चक्र का नियामक था, खुद उसका मौसम हद दर्जे तक बिगड़ चुका है। हिमालय का तापमान भी बढ़ रहा है। तापमान बढ़ने से हिमालय के ग्लेशियरों और ‘आइस कवर’ का पिघलाव एक बड़ी तबाही का संकेत है। सिर्फ ग्लेशिययर पिघल ही नहीं रहे हैं, बल्कि बढ़ती दरारों के कारण टूट भी रहे हैं। 

हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना, सिकुड़ना एवं टूटना खतरे की घंटी है। जो हिमालय ग्लेशियरों के मामले में सर्वाधिक संपन्न माना जाता रहा है, वह इनके पिघलने के कारण विपन्नता की स्थिति में पहुंच सकता है। विडंबना यह है कि लगभग 33,000 किमी. का क्षेत्र आच्छादित करने वाले हिमालय के ग्लेशियर दनिया के दूसरे ग्लेशियरों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। हिमालय के प्रायः सभी ग्लेशियर फिर चाहे वह गंगोत्री हो अथवा सियाचिन, पिघलाव के शिकार हैं। जानकारों के अनुसार गंगोत्री हिमनद के पिघलने की गति सालाना 30 मीटर है, जो कि एक खतरनाक संकेत है, क्योंकि यही हिमनद गंगा को सदानीरा बनाए रखता है। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसे-जैसे हिमालय की सेहत और मिजाज बिगड़ेगा, वैसे-वैसे हम भी तबाही की ओर बढ़ेंगे। किस तरह, आइये जानें। जलवायु परिवर्तन से कृषि क्षेत्र के खतरे और जोखिम बढेंगे, जिससे कषि क्षेत्र प्रभावित होगा और इससे भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था चौपट हो सकती है। ग्लेशियरों के पिघलाव के कारण देश की नदियों का जल-तंत्र बिगड़ जाएगा। हिमनदों के पिघलाव से इनके द्वारा पोषित नदियों में पहले तो बाढ़ आएगी, फिर ये सदा के लिए सूख जाएंगी। जरा सोचिए, कितनी भयावह होगी यह स्थिति। सर्वाधिक खतरा तो पहले से ही प्रदूषण की मार झेल रही गंगा को है, क्योंकि गंगा को जलापूर्ति करने वाला गंगोत्री हिमनद बहुत तेजी से पिघल और सिकुड़ रहा है। जब ग्लेशियरों द्वारा पोषित बड़ी नदियां सूखेंगी, तो इनसे जुड़ी अन्य छोटी नदियों का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा। यानी पूरा नदी-तत्र ही ध्वस्त हो जाएगा। इससे जल की उपलब्धता कम हो जाएगी। जल संकट बढ़ेगा, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव कृषि पर भी पड़ेगा। इससे विकास भी बाधित होगा, क्योंकि विकास और जल का करीबी रिश्ता है। अंततः ये सभी बातें हमारी अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेंगी। हिमालय पर उथल-पुथल बढ़ने से प्राकृतिक आपदाएं बढ़ेगी, जिनसे सर्वाधिक प्रभावित हिमालयी राज्य होंगे। इससे हिमालयी राज्यों से लोगों का पलायन बढ़ेगा और हमारे सामने एक नई समस्या आएगी। 

दुखद यह है कि हमने शुरू से हिमालय की अनदेखी की है। अभी भी हम चेते नहीं हैं। पर्यावरण हितैषियों की जबरदस्त मांग के | बावजूद न तो हिमालय के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया गया है और न ही सुचिंतित हिमालय नीति तैयार की गई है। एक ऐसी सर्वमान्य नीति का भी अभाव है, जो हिमालय से जुड़े सभी देशों यथा-चीन, नेपाल आदि को भी आच्छादित करती हो। कुछ समय पहले हिमालयी क्षेत्रों में जल और वन संरक्षण तथा भूमि प्रबंधन के उद्देश्य से ‘हिमालय ईको मिशन’ की शुरुआत की गई थी, किंतु शिथिलता और सुस्ती के शिकार इस मिशन की प्रगति संतोषजनक न रही। लगभग यही हश्र भारत सरकार की ‘हिल एरिया डेवलपमेंट योजना का है। विडंबनीय तो यह है कि गंगा को बचाने के लिए हमन अनेक योजनाओं को शुरू किया, किंतु यह भूल गए कि गंगा तमा बचेंगी, जब हिमालय बचेगा। 

“हिमालय को लेकर हालात अभी इतने नहीं बिगड़े हैं कि उनसे उबरा न जा सके। आवश्यकता समन्वित प्रयासों की है। हिमालय को बचाकर जहां हम संभावित अनेकानेक दुश्वारियों और तबाहियों से बच सकेंगे, वहीं प्रकृति और पहाड़ों की नैसर्गिक सुषमा को भी अक्षुण्ण रख सकते हैं।” 

हिमालय को बचाने के लिए जिन समग्र और सधी हुई पहलों की जरूरत है, वे होती दिख नहीं रही है। यह एक बड़ा काम है, जिसके लिए सरकार, नागरिक समाज और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मिलकर कदम आगे बढ़ाने होंगे। सबसे पहली जरूरत तो यह है कि समूचे हिमालय क्षेत्र को सूरंग और बांधों से मुक्त बनाया जाए। आयातित योजनाओं-परियोजनाओं के नाम पर किए जाने वाले उस विकास के रोका जाए, जो हिमालय क्षेत्र के लिए विनाश का पर्याय सिद्ध हो रहा है। हिमालयी क्षेत्रों में अधिकाधिक वृक्ष लगाने होंगे, तो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को रोकना होगा। हिमालयी क्षेत्रों में हमें ‘ईको टूरिज्म’ को प्रोत्साहित करना होगा तथा पर्यटन को नियंत्रित भी करना होगा, ताकि पर्यटन से होने वाली पर्यावरणीय क्षति को रोका जा सके। अतिक्रमण और प्रदूषण से हिमालय क्षेत्र की रक्षा करनी 

योजनाओं-परियोजनाओं तथा विकास से जुडी हर गतिविधि समुदायों की भागीदारी को बढाना होगा। यह भी आवश्यक है की  चरण सरक्षण से संबंधित सभी काननों को हिमालयी क्षेत्रों  में सख्ती से लागू किया जाए तथा आवश्यकतानुसार नए कानूनों का सृजन कर उन्हें प्रभावी बनाया जाए। 

हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की मुख्य वजह है ग्लोबल वार्मिंग। इस वैश्विक ताप वृद्धि में दुनिया के सभी देशों का योगदान है। भारत का है, तो चीन व अमेरिका का भी है। विकास और सुखभोग के नाम पर दुनिया के देशों ने पर्यावरण की तनिक भी परवाह न करते हुए वायुमण्डल को कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, क्लोरोफ्लोरो, सल्फरहेक्सा, फ्लोराइड तथा ट्राइफ्लोरो मिथाइल सल्फर पेन्टाफ्लोराइड जैसी जहरीली एवं ताप वृद्धिकारी गैसों से भर डाला। अब यह दुनिया के देशों की जिम्मेदारी बनती है कि वे ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए इन गैसों के उत्सर्जन में कमी लाएं। हिमालय को बचाने के लिए भी यह जरूरी है। आवश्यकता इस बात की भी है कि क्षेत्रीय आधार पर सभी हिमालयी देश एकजुट होकर हिमालय को संरक्षण प्रदान करने की पहले करें। 

हिमालय को लेकर हालात अभी इतने नहीं बिगड़े हैं कि उनसे उबरा न जा सके। आवश्यकता समन्वित प्रयासों की है। हिमालय को बचाकर जहां हम संभावित अनेकानेक दुश्वारियों और तबाहियों से बच सकेंगे, वहीं प्रकृति और पहाड़ों की नैसर्गिक सुषमा को भी अक्षुण्ण रख सकते हैं। इस पुनीत कार्य को करने में अब ज्यादा देर नहीं करनी चाहिए। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

two × three =