क्या नरेगा भ्रष्टाचार तथा रिसाव को बढ़ावा देता है?

क्या नरेगा भ्रष्टाचार तथा रिसाव को बढ़ावा देता है?

क्या नरेगा भ्रष्टाचार तथा रिसाव को बढ़ावा देता है? (Does NREGA Encourage Corruption and Leakage?) क्या मनरेगा भ्रष्टाचार तथा रिसाव को बढ़ावा देता है?

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) को कार्यान्वित हुए दस साल हो गये। नरेगा अब एक अनुभव सिद्ध योजना हो गया। यह विकास प्रशासन का चहेता कार्यक्रम बन गया है। लेकिन इसके बारे में आरोप हैं कि इसमें भयंकर भ्रष्टाचार तथा संसाधनों का रिसाव या कहें कमजोरी है जिससे योजना के उद्देश्यों को हासिल करने में असफलता हाथ लग रही है।

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यह गौरतलब है कि नरेगा में एक अंतर-रचित तरकीब/उपाय है जो सरकारी पैसे का भ्रष्टाचार तथा रिसाव को रोक सकती है। यह बेहतर निरीक्षणकारी तथा नियंत्रणकारी व्यवस्था के माध्यम से हो सकता है। इन सबके लिए आवश्यक है नियमित निरीक्षण कार्यस्थल भ्रमण, मस्टर रोल (नामावली) का आनलाइन प्रकाशन, जनता द्वारा नामावली की जाँच, ऑनलाइन एम.आई.एस. सिस्टम पर जी.आई.एस. निर्देशांक अपलोड करना (चढ़ाना), मजदूरी को ऑनलाइन भुगतान, एक सूचना द्वारा संपन्न कार्यों के विशद वर्णन का व्यापक प्रचार, तथा समाज के लाभार्थियों तथा अन्य लोगों द्वारा सामाजिक अंकेक्षण। नामावली के नाम जनता में घोषित करना ताकि भ्रष्टाचार की संभावना न हो।

लेकिन ये सब नियमित नहीं हो रहे जिससे कुछ गलत काम होने का संदेह होता है। काम की मांग तथा काम की उपलब्धता का हिसाब-किताब रखने की व्यवस्था है। यह विशेष रूप से तैयार किये गये जॉब कार्ड के जरिये हो रहा है जिस पर कर्मी तथा उसके परिजनों का फोटो चिपका रहता है। माना जाता है कि यह भी एक भ्रष्टाचार विरोधी उपाय है। शुरू में यह विश्वास था कि ये सब उपायों के कारण कार्यान्वयन से जुड़ी एजेंसियों में कार्यक्रम को व्यवस्थित तथा प्रभावकारी तरीके से लागू करने में अरूचि होगी क्योंकि सरकारी पैसों के गोलमाल का इसमें कोई रास्ता नहीं होगा जैसा की पूर्व की योजनाओं जैसे स्वर्ण जयंती ग्राम रोजगार योजना में सभव हुआ करता था। 

लेकिन जैसा कि कहा जाता है, आदमी के दिमाग का कोई अंत नहीं। निहित स्वार्थ वाले लोग जल्दी ही योजना को धराशायी करने के नये-नये उपाय खोज निकाले और उनका भ्रष्टाचार चल निकला अखबारों की रिपोर्ट से पता चला है कि निरीक्षणों को कई नकली जॉब कार्ड/रोजगार कार्ड नजर आए हैं। यह भी रिपोर्ट है कि क्रियान्वयन एजेंसियाँ या स्थानीय प्रभावी गुटों ने भारी संख्या में रोजगार कार्डो को अपने कब्जे में ले रखा है और इनके गलत इस्तेमाल द्वारा गैरकानूनी तरीके से पैसा बना रहे हैं। 

ऐसी भी रिपोर्ट है कि बिना काम संपन्न करवाये एक झूठी नामावली तैयार कर ली गई। इसके अलावा पैसे मारने के और भी कई तरीके अपनाये गये हैं। इतना ही नहीं कार्डधारियों का काम हक के नाम पर नहीं बल्कि कृपा के नाम पर दिया जा रहा है। यह भी आरोप है कि कार्यस्थल का चयन राजनीति प्रेरित है। सामान्यतः वैसे कार्यस्थल चुने जा रहे हैं जो स्थानीय दबंग गुटों के प्रभाव क्षेत्र के हैं। उन इलाकों का चयन कार्यस्थल के रूप में नहीं हो रहा है जो इन गुटों के विरोधियों वाले क्षेत्र के हैं। आरोप यह भी है कि स्थानीय तौर पर प्रभावी दल इस योजना के तहत अपने समर्थकों को काम दिलवा रहे हैं। इसमें इनके विरोधी दलों के समर्थकों को लाभ नहीं मिल पा रहा।

आरोप यह भी है कि दैनिक उपस्थिति पत्र तथा नामावली में गलत प्रविष्टियाँ करके निहित स्वार्थी तत्व जाली रोजगार कार्ड के जरिये सरकारी राशि उड़ा ले जा रहे हैं। रोजगार कार्ड उन सभी लोगों को नहीं मिला है जिन्होंने आवेदन किया है। बल्कि ऐसे कई लोगों को मिल गया है जो स्थानीय दबंग गुट के समर्थक हैं और उन्हें घूस दे सकते हैं। इस बात का भी पता चला है कि स्थानीय बैंक अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके मजदूरों की मजदूरी से कमीशन लिया गया है। ऐसी रिपोर्ट अखबारों में भी आयी है। लेकिन नियमित निरीक्षण तथा सामाजिक अंकेक्षण के जरिये ऐसी गड़बड़ियों को काफी हद तक काबू में कर लिया गया है।

योजना में यह प्रावधान है कि प्रत्येक मजदूर को उसके द्वारा किये गए काम की मात्रा के हिसाब से मजदूरी दी जाएगी। लेकिन वास्तविकता में काम की गुणवत्ता को नजरअंदाज करते हुए एक समान निर्धारित भुगतान किया जा रहा है, या काम की मात्रा को भी मानक के हिसाब से नहीं देखा जा रहा। नतीजतन, खरहा और कछुआ को बराबर इनाम दिया जा रहा है। ये योजना के उद्देश्य का उल्लंघन है। प्रारंभिक अवधारणा यह थी कि परिश्रमी मजदूर जो अधिक उत्पादक है उसे उच्चतर दर से भुगतान होगा। कई स्थलों पर अधिकारियों ने दिखाया है कि एक समान भुगतान की प्रथा के साथ व्यावहारिक दिक्कतें हैं, क्योंकि इससे मजदूरों में नाराजगी है। 

मजदूर कई बहाने बनाकर कुछ घंटों से अधिक काम करने से इनकार कर देते हैं, पहले से तय मजदूरी पर काम करने से मना कर देते। ये दोनों बातें अनुचित हैं। यह केवल इसलिए है कि नरेगा सरकारी योजना है। इसमें वे कड़ी मेहनत नहीं करना चाहते। वे बिना पूरा काम किया पूरी मजदूरी मांगते हैं। कई जगहों से कार्यान्वयन एजेंसियों से यही रिपोर्ट मिली है। नरेगा पर आरोप है कि यह एक ऐसा कार्यक्रम बन गया है जिसने शून्य काम या कम काम के बदले आसान मजदूरी प्राप्त हो जाती है यह एक प्रकार का आय पुर्नवितरण योजना बनकर रह गई है। लेकिन अच्छी बात यह है कि ये गलत बातें बहुत बड़े स्तर पर नहीं हो रहीं जिससे कि यह योजना बदनाम हो जाए जो कि मेहनतकश जनता में अभी भी मशहूर योजना है। 

योजना के दिशा निर्देशों के अनुरूप जो मूल कार्यस्थल सुविधाएँ हैं वे प्रायः वहाँ उपलब्ध नहीं है। कार्यरत महिलाओं के बच्चों के लिए क्रेच, प्राथमिक उपचार का बक्सा तथा पेयजल आदि मान्य सुविधाएँ आज भी कई कार्यस्थलों पर नहीं दिखाई देता। तर्क यह दिया जाता है कि इन कार्यों के जरिये सृजित रोजगार अवसर में मजदूरी पाने के लिए कड़ी-मेहनत नहीं करनी पड़ती। 

उपरोक्त सुविधाएँ यदि कहीं-कहीं उपलब्ध होती है तो वे सही भावना के तहत न होकर महज दिशा निर्देशों के अनुपालन के उद्देश्य से होती हैं। वे यह महसूस करना भूल जाते हैं कि ये काम केवल अपंग लोगों को दायरे में नहीं लाता बल्कि यदि अपंग लोग नहीं हो तो लाभार्थियों के बीच ये काम बारी-बारी से आयेगा। 

कई कार्यस्थलों पर हो रहे काम या संपन्न हो चुके काम को सूचित करने वाली सूचनापट्टी ही गायब रहती है। रहती भी है तो उसमें जानकारियाँ अत्यल्प होती है। सूचनापट्टियों का नहीं होना कार्यान्वयन एजेंसियों के इरादों का भी खुलासा करता है। मंशा यह रहती है कि काम की गुणवत्ता तथा मात्रा के बारे में लोग कुछ नया सवाल न उठा पाएँ। लेकिन सूचना के आधिकार के इस जमाने में यह तर्क नहीं जंचता क्योंकि इसके जरिये कोई भी तथा सभी सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। 

आश्चर्य है कि देश भर में कहीं भी दिया जाने वाला रोजगारी भत्ता कुल व्यय का नगण्य भाग है। इसके लिए तर्क यह दिया जाता है कि नियमतः 15 दिनों के रोजगार देने का वादा तो है ही पर ऐसा है नहीं। वास्तव में कई कार्यान्वयक एजेंसी बेरोजगारी भत्ता देने से इनकार करने की कला में माहिर हो गई है। वे रोजगार की मांग करने वाले आवेदनों की हस्ताक्षरयुक्त प्राप्ति पत्र नहीं देती हैं। रोजगार भत्ता की अदायगी न केवल स्थानीय सरकार पर एक बोझ है बल्कि कार्यान्वयक एजेंसी की 15 दिनों के भीतर रोजगार मुहैया कराने में विफलता का भी प्रमाण है। 

इस तरह की असफलता की स्थिति में संबद्ध अधिकारी तथा कर्मचारी को जिम्मेदारी सुनिश्चित होने पर दंड का प्रावधान है। इसलिए बेरोजगारी भत्ता न देने की प्रवृत्ति है। रिपोर्ट है कि कई कार्यकारी एजेंसियाँ पंद्रह दिन के भीतर काम मुहैया की मांग को पूरा करने में नियमित रूप से असफल रह रही हैं। इससे नरेगा का लक्ष्य ही अपूर्ण रह जाता है। इतना ही नहीं, अब तक कोई भी सरकारी अधिकारी कार्यक्रम के इस लक्ष्य को पूरा करने में असफल रहने के लिए दंडित किया गया है। 

हालांकि नरेगा में भ्रष्टाचार तथा रिसाव के मामले निश्चित रूप से होते रहे हैं, लेकिन ये महज विकार हैं। तथ्य यही है कि नरेगा आज भी रोजगार गारंटी की सर्वोत्तम योजना है लेकिन इसके कार्यान्वयन के स्तर पर रिसाव या भ्रष्टाचार को रोकने के लिए समय-समय पर सार्थक कार्यान्वयन पद्धति को संशोधित तथा परिवर्तित करते रहना चाहिये।

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