डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

आज से करोड़ों वर्ष पर्व धरती पर दैत्याकार सरीसृपों का राज्य था। स्वचट विचरण करने वाले 450 से 650 क्विटल वजन वाले, 20 फुट से 120 फट तक लंबाई वाले तथा 20 फूट से लेकर 40 फुट तक के कद वाले इन अनोखे जीवों को वैज्ञानिक डायनासोर नाम से संबोधित करते हैं। धरती पर लगभग 12 करोड वर्षों तक राज्य करने वाले ये जीव लगभग 7 करोड़ वर्ष पूर्व अचानक लुप्त हो गये। आखिर कहां गये ये जीव? 

कल्पना करें कि छुट्टी मनाने के मूड में आप किसी दिन शहर के चिल्लपों से कदर जा निकलते हैं। किसी झील के किनारे अपना तंब-कनात गाड लेते हैं। शांत, सम्य वातावरण, पक्षियों का कलरव, कल मिलाकर आप रीझ उठते हैं माहौल की खुश-गवारी पर। पर तभी आपकी दृष्टि जा ठहरती है पानी में उभरती किसी चीज पर, जो करीब 20 फुट तक ऊपर उठती ही चली जाती है। अरे यह तो कोई जलीय प्राणी है! अब तो उसकी गर्दन भी दिखायी देने लगी। पानी में पायी जाने वाली घासों को मजे से चुभलाता वह आपकी ही तरफ बढ़ रहा है। कौर उठाये आपका हाथ मुंह के पास पहुंचकर ठहर जाता है और बेसाख्ता आपके मुंह से चीख निकल जाती है। सब कुछ छोड़-छाड़कर आप बेसाख्ता भागने लगते हैं। वहां से जब काफी दर पहंच जाते हैं, तब कहीं आपकी जान में जान आती है। 

डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

आप समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर माजरा क्या है, तभी वह भीमकाय जीव अचानक पानी में डुबकी लगाकर आपकी दृष्टि से ओझल हो जाता है। आनन-फानन में आप अपना सारा सामान सहेजते हैं और घर की राह लेते हैं। 

आप सोचते रह जाते हैं कि ऐसा अजीब जानवर कभी नहीं देखा। फिर आज इससे साबका कैसे पड़ गया? जानते हैं, वह 20 फट ऊंची गर्दन वाला जीव कौन था? वह था स्टिगोसार। हम भी अपने को खुशकिस्मत समझ लेते, अगर स्टिगोसार से कभी रूबरू हो पाते। पर हम सभी इस मामले में बदकिस्मत ही हैं कि कभी हमें इस विचित्र जीव के दर्शन न हो सकेंगे, क्योंकि ये जीव अब समय की पकड़ से बाहर हैं। करोड़ों वर्ष पहले स्टिगोसार और उसके भाई-बंध प्रस्तरीभूत हो चुके हैं। आज कहीं-कहीं अवशेष रूप में उनकी हड्डियां अवश्य मिलती है। 

वैज्ञानिकों ने खदाई में मिले इन्हीं अवशेषों के आधार पर ढांचे खड़े करके उनके प्रतिरूप तैयार किये, फिर तो जो रूप प्रतिरूप सामने आये, वे बडे विचित्र और आकर्षक,पर बहत ही भयानक निकले। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक समय, मानव की सृष्टि से पहले धरती पर दैत्याकार सरीसृपों का एकछत्र राज्य था। ये दैत्याकार जंत बदलती दुनिया की दौड़ में पिछड़ गये और सदा-सदा के लिए काल के गाल में समा गये। उनकी प्रस्तरीभूत अस्थियों के ही आधार पर उनके आकार आदि का पता लगता है। वैज्ञानिकों ने हजारों फट की गहराई से, चटानों के बीच से इन जंतओं के अस्थि-पंजर खोज निकाले हैं और उन्हीं के आधार पर इनके शरीर की बनावट का अनुमान लगाते हुए उनकी अनुकृतियां बनायी हैं। वैज्ञानिक इनको डायनासोर नाम से संबोधित करते हैं। धरती पर लगभग 12 करोड़ वर्षों तक इन अनोखे जीवों का राज्य रहा और आज से लगभग 7 करोड़ वर्ष पहले इनका एकदम से लोप हो गया। 

डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

आइए, अब डायनासोर के जमाने में चलें और देखें, कितना रोचक, रोमांचक और विचित्र था इन विराट सरीसृपों का संसार। इनमें से कुछ शाकाहारी थे, कछ मांसाहारी और कछ दोनों ही तरह के शौक फरमाते थे। डायनासोर के चार पैर होते थे। कंगारू के समान आगे के दो पैर छोटे तथा पीछे के पैर बहुत ही बड़े होते थे। कुछ चारों पैरों से चलते थे और कुछ अपने पिछले दो पैरों पर ही भारी-भरकम शरीर को संभालते थे। इनकी पूंछ भी बहुत लंबी और वजनी होती थी। डायनासोर अपनी पूंछ से अपने स्थूलकाय शरीर का संतुलन कर लेता था। 

डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

डायनासोरों की प्रारंभिक वंशावली के जंतु अपेक्षाकृत कम लंबे होते थे। प्रारंभिक डायनासोरों में प्लेटियोसोर करीब 20 फुट लंबा था। यह पूर्णतः शाकाहारी था अर्थात् केवल वनस्पतियों पर अपना निर्वाह करता था। समय गुजरने के साथ-साथ और भी दैत्याकार डायनासोर वजूद में आये। उस समय का वातावरण उनके अस्तित्व के लिए बहुत उपयुक्त था। उस समय समुद्र का पानी गरम था। आप आश्चर्य करेंगे कि जहां आज अमरीका महाद्वीप स्थित अलास्का में सालभर बर्फ जमी रहती है, उस समय वहां खजूर के वृक्ष उगा करते थे। भोजन के लिए वनस्पतियां भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थीं। वातावरण में काफी गर्मी थी,जो इनके लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुई। 

जिस समय डायनासोरों ने इस धरा पर जन्म लिया, वह मेसोजोइक’ युग कहलाता है। उस समय सरीसृपों का इस धरा पर साम्राज्य था। लेकिन वातावरण में एकाएक कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ कि उसे ये दैत्याकार जीव सहन नहीं कर सके और फिर सदा के लिए लुप्त हो गये। 

डायनासोरों में ऐलण्टोसोर, ब्रोण्टोसोर तथा टिरैनोसोर प्रसिद्ध हुए। एलण्टोसोर तो बड़ा भयानक जंत था। वह करीब 20 फट ऊंचा था और इसकी लबाई थी 120 फट। गर्दन काफी लंबी थी और वजन 400 क्विटल से भी अधिक था। इसके चलने से जमीन दहल उठती थी। 

बोण्टोसोर तो इससे भी अधिक भयानक था। इसके शरीर की लंबाई लगभग 70 फूट थी और वजन था लगभग 650 क्विटल। वैज्ञानिकों का अनमान है। कि धरती पर इससे अधिक वजनी किसी भी प्राणी का अस्तित्व असंभव था। यदि ब्रोण्टोसोर ही और अधिक वजनी होता तो शरीर का भार पैरों पर थाम न सकने के कारण मर जाता। यह शाकाहारी जीव था। अपने भोजन की खोज में यह पानी में, विशेषकर छिछली झीलों में विचरण किया करता था। इससे दो लाभ थे। एक तो भोजन-प्राप्ति और दूसरा यह कि थल पर चलने में इसे जो कठिनाई होती थी, उससे यह पानी में बच जाता था और मांसाहारी डायनासोरों से अपनी रक्षा भी किया करता था। 

पानी में हमेशा रहने वाले डायनासोरों में स्टिगोसोर तथा डिप्लोडोकस के नाम उल्लेखनीय हैं। स्टिगोसोर का वजन करीब 10 टन होता था और केवल घास आदि खाकर ही अपने उदर की पूर्ति करता था। डिप्लोडोकस 90 फुट लंबा था और उसका वजन था लगभग 350 क्विटल। यह झील में या उसके निकट ही रहता था और इसे भी अपनी उदरपूर्ति घास-पात से करनी पड़ती थी। 

मांसाहारी डायनासोरों में एलोसोर बहुत ही खतरनाक था। पूंछ के सिरे से लेकर जबड़े तक यह लगभग 35 फुट लंबा था। पिछली टांगें अगली टांगों की अपेक्षा ज्यादा लंबी थी। मोटी और लंबी पूंछ दौड़ते समय शरीर का संतुलन बनाये रखती थी। इसके दांत बड़े नुकीले और तेज थे, जो शाकाहारी डायनासोरों का शिकार करने में सहायक होते थे। इसके डर से शाकाहारी डायनासोर गहरी झीलों तालाबों में चले गये और वहीं रहने लगे। बहतों का साथ प्रकति ने और रूप ने दिया जैसे कि स्टिगोसोर के पेट और पीठ की हड्डियों पर कठोर आवरण का होना। 

ब्रक्योसोर शायद उस युग का सबसे विशाल जलीय प्राणी था। इसकी लंबाई 70 फुट थी, जिसमें गर्दन ही करीब 30 फुट लंबी थी। पानी में डबा रहने पर भी यह अपनी गर्दन बाहर निकाले रह सकता था। 

डायनासोर के परिवार में जलीय और थलीय प्राणियों के अतिरिक्त कछ ऐसे प्राणी भी थे, जो हवा में पक्षियों की भांति उड़ सकते थे। टीरोसोर उड़ने वाले सरीसप थे। इनकी दोनों अगली टांगें डैनों में बदल गयी थीं। इनमें टिरैनोडान सबसे बड़ा था। इसकी पूंछ छोटी होती थी, दांतों का अभाव था और डैने काफी लंबे लगभग 20-25 फुट तक के होते थे। 

लेकिन इन भीमकाय प्राणियों का साम्राज्य और अधिक दिनों तक नहीं चलने वाला था। धीरे-धीरे वे सब लुप्त हो गये। आज पृथ्वी में चट्टानों के बीच दबे पड़े उनके अवशेष मात्र रह गये हैं, जिनके आधार पर हम पृथ्वी की आदिकालीन यह गाथा आपको सना रहे हैं। आखिर लगभग 12 करोड़ वर्षों तक जल, थल और वाय पर एकछत्र राज्य करने वाले ये प्राणी एकाएक क्यों गायब हो गये! 

इसका हल ढंढ़ने में वैज्ञानिकों ने काफी माथापच्ची की। कई वैज्ञानिकों ने अपने मत प्रस्तुत किये हैं। फिर भी हम किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहंच सके हैं। बहुत से वैज्ञानिकों का विचार है कि डायनासोर के लुप्त होने में जलवायु का सबसे बड़ा हाथ था। मेसोजोइक युग के अंत में पृथ्वी के अधिकांश भू-भागों में एकाएक बड़ा परिवर्तन आया। अलास्का जैसे देश, जहां खजूर के वृक्ष उगा करते थे. बर्फ से ढंक गये। चंकि डायनासोर ठंडे रक्त वाले जंत थे, जिनके शरीर का ताप वातावरण के ताप के अनकल बदलता रहता था, अतः अधिक ठड न सहन कर सकन के कारण वे नष्ट हो गये। ऐसी परिस्थिति में ये दैत्याकार जीव अपने को छिपाने की जगह न पा सके। अतः छोटे सरीसप ही बच रहे, जो अपने को छिपाने में समर्थ थे। दरअसल डायनासोर सिर छपाने की जगह खोज भी भला कैसे सकते थे? क्योंकि डायनासोर महामर्ख जंत थे। उनका मस्तिष्क उनके शरीर की तुलना में बहुत छोटा और कमजोर था। डायनासोर का शरीर उसके मस्तिष्क से लगभग 25,000 गुना भारी था। 

कुछ वैज्ञानिकों का यह भी विचार है कि उस समय जिन स्तनपायी जीवों का आविर्भाव हुआ, वे इनके अंडो को खाने लगे। फलतः डायनासोर लुप्त हो गये। 

इन महाजीवों की सामहिक विनाश की पहेली हल करने वाले विज्ञानी खाद्याभाव, जलवाय-परिवर्तन, शक्तिशाली और हिंस्र जीवों का उद्भव तथा ज्वालामुखीय विस्फोटों आदि को कारण मानते हैं। लगभग उसी काल खंड में डायनासोर विलुप्त हुए, जब भारत भूमि में ज्वालामुखीय विस्फोट हुए। इस बात की पुष्टि ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तौर पर हो चुकी है। पर प्रश्न यह उठता है कि न सिर्फ भारत भूमि के डायनासोर उसी कालखंड में विलप्त हए, बल्कि अफ्रीका, अमरीका. रूस और फ्रांस सभी भू-भागों से एकाएक क्यों लप्त हो गये? 

डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

उल्काओं के टटने और डायनासोर की विलुप्ति का तालमेल कछ वैज्ञानिक भिडाते हैं। उल्का पिडों पर कार्य कर रहे वैज्ञानिक प्रोफेसर भंडारी का इस बारे में कहना है: 

“डायनासोर की विलप्ति के संदर्भ में हमें अंतरिक्षीय या ब्रह्मांडीय घटनाओं में इस गढ़ पहेली का हल ढूंढ़ना होगा। जैसा कि सर्वविदित है, धरती पर प्रायः धमकेत और उल्काएं उत्पात मचाते रहते हैं। ऐसा संभव है कि लगभग 100 किलोमीटर व्यास का विशाल उल्का पिंड, जो हर 10 करोड़ साल में एक बार धरती पर वज्र की तरह गिरता है, उस समय गिरा हो, जब डायनासोर धरती पर विचरण करते रहे हों। उल्कापात के प्रभावों में वातावरण में क्रांतिकारी परिवर्तन, अचानक जलवायु परिवर्तन, सूर्य के प्रकाश का उल्कापात द्वारा उत्पन्न धल के बादलों से रोका जाना,पृथ्वी के ताप में असाधारण वृद्धि आदि सम्मिलित हैं। बहुत संभव है कि डायनासोर के इस महाप्रयाण’ के लिए यह उल्कापात ही जिम्मेदार रहा हो।” 

बर्कले (अमरीका) विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लई अल्वारेज के नेतृत्व में एक शोध-दल ने इरीडियम नामक एक विरल तत्त्व की उपस्थिति को डायनासोर की विलुप्ति के लिए महत्त्वपूर्ण माना है। वास्तव में यह तत्त्व धरती की सतह पर उपस्थित शैलों में नहीं पाया जाता। यह चंद्र तल, धमकेत तथा उल्काओं पर अवश्य पाया जाता है और यहां तक कि धरती के गर्भ में भी। 6-7 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म (जो डायनासोर यग की समाप्ति के गवाह हैं) यह जरूर इंगित करते हैं कि उनमें इरीडियम अधिक मात्रा में मौजूद था। इसी नाते धूमकेतओं, उल्का पिडों, धरती के गर्भ में मौजूद इरीडियम तथा डायनासोर की विलुप्ति के बीच एक समीकरण अवश्य बनता है। 

कुछ ऐसे ही विचार हैं शिकागो विश्वविद्यालय के डेविड रौफ और जॉन सेकास्की के। धरती के धूमकेतुओं से भिड़त को ही वे वैज्ञानिक द्वय डायनासोर के लप्त होने का कारण मानते हैं। इनका यह दावा है कि “डायनासोरों का सामहिक विनाश लगभग हर ढाई करोड़ वर्ष बाद होता रहा था। इस तरह के नियमित अंतराल पर घटनेवाली परिघटना पृथ्वी से बाहर सदर अंतरिक्षीय व्यवधान के बिना असंभव है।” इनका यह भी कहना है : ‘कई धमकेत, जो सौर परिवार के सदस्य हैं, पर सूर्य से काफी दर हैं, चक्कर काटते-काटते पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। ऐसा होने पर उनकी धरती से टक्कर अथवा मुठभेड़ अवश्यंभावी होती है। 2.6 करोड वर्ष का अंतराल धमकेत और पृथ्वी की भिड़त का भी है और डायनासोर के नियतकालिक विलोप का भी। 

डायनासोर क्यों लुप्त हो गए

सच तो यह है कि अभी तक हम यह पहेली सलझा नहीं सके हैं। कदाचित डायनासोर विशेषज्ञ डॉ. कोलवर्ट ठीक ही कहते हैं। अपनी पुस्तक ‘दि एज ऑफ रपटाइल्स’ यानी ‘सरीसपों का यग’ में वह लिखते हैं: “एक ही समय में विश्व के सभी भागों में पाये जाने वाले सभी प्रकार के बड़े और छोटे डायनासोर विलुप्त होगये। यह एक जटिल और पृथ्वी के इतिहास में बड़ी गंभीर दुर्घटना थी। अब तक इस दुर्घटना के सही कारणों का पता नहीं चल सका है।’ 

फिर भी इनके विलुप्त होने का सर्वमान्य कारण वातावरण का परिवर्तन ही है। जो जीवधारी अपने को वातावरण के अनुकल ढालने में समर्थ नहीं होते, वे जीवित नहीं रह सकते। केवल वे ही जीवधारी रह सकते हैं, जो पर्यावरण की प्रतिकल परिस्थितियों का मुकाबला आसानी से कर सकते हैं। शेष जीवधारी नष्ट हो जाते हैं। 

उस यग के बाद तमाम प्राणी अस्तित्व में आये, जिनका शरीर वातावरण के अनकल था। मानव उनमें सबसे अधिक योग्य और विकसित प्राणी है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है-मानवीय मस्तिष्क का बड़ा एवं सविकसित होना। डायनासोर के लप्त होने का एक और कारण था कि वह महामर्ख जंत था, तभी तो यह बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपने को न ढाल सका और काल-कवलित हुआ।

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