Dhyeya ias essay in hindi-कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) | कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी इन हिंदी

Dhyeya ias essay in hindi

Dhyeya ias essay in hindi– कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) (Corporate Social Responsibility-CSR) |कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी इन हिंदी

कारपोरेट जगत में आजकल एक नई अवधारणा का अभ्युदय भी यह है—कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी सीएसआर। मआर के तहत कंपनियां अब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी सनिश्चित कर रही हैं। वे लाभ कमाने के साथ समाज के कल्याण लिए भी काम करेंगी और इस तरह समाज में अपनी भागीदारी बढाएंगी। वर्तमान संदर्भ में सामाजिक हित के लिए जिस अवधारणा को सीएसआर नाम दिया गया है, वह एकदम नई नहीं है। समाज के लिए पहले भी व्यावसायिक घराने कल्याणकारी कार्य करते थे। खासतौर पर शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में वे उल्लेखनीय योगदान देते थे। तब आज जैसी व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा नहीं थी, अतएव सीएसआर जैसे शब्द चलन में न थे। वर्तमान दौर में व्यापार का वैश्विक विस्तार हुआ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार हुआ है। भारतीय कंपनियां भी वैश्विक विस्तार में लगी हैं। उन्हें भी विदेशी ग्राहकों की दरकार है। वे अपनी ‘ब्रांड वैल्यू’ को लेकर सजग और सावधान दिख रही हैं। कारपोरेट कल्चर ने पूरे विश्व के बिजनेस सिस्टम को प्रभावित किया है। बाजारवादी मानसिकता बढ़ी है। ऐसे में कमाई की होड़ भी बढ़ी है। इन्हीं सब बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों के साथ सामाजिक सरोकारों के प्रति जिम्मेदारियों के निर्धारण को लेकर कारपोरेट जगत के बीच कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी सीएसआर का चलन बढ़ा है। यह नये दौर का एक ज्यादा परमार्जित और परिष्कृत नया नाम है, जो व्यावसायिक होड़ के बीच समाज के प्रति दायित्वों को लेकर अस्तित्व में आया है। 

कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) से जुड़ी एक सुखद बात यह भी है कि हमारी सरकार ने इसकी उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए इसे विधिक रूप से अनिवार्य भी बना दिया है। नए कंपनी अधिनियम-2013 में यह व्यवस्था दी गई है कि कंपनियों के लिए पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध मुनाफे का दो प्रतिशत सीएसआर पर खर्च करना अनिवार्य होगा। साथ ही इसमें सीएसआर के लिए विशेष गतिविधियों का उल्लेख भी किया गया है। यह भी प्रावधान है कि सीएसआर को पूरा न कर पाने वाली कंपनियों को इसका कारण भी बताना होगा। इस प्रकार भारत में अब सीएसआर कानूनी दायरे में भी आ चुका है। 

“सीएसआर के तहत कंपनियां अब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को सुनिश्चित कर रही हैं।” 

लाभ अर्जित करने के लिए कंपनियों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। कंपनियों के लिए लाभ जरूरी भी है। यदि वे लाभ नहीं अर्जित करेंगी, तो जाहिर है कि उनका अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। प्रतिस्पर्धा में बने रहने तथा वजूद को बरकरार रखने के लिए कमाई जरूरी है। कमाई की इस होड़ में सामाजिक सरोकारों तथा दायित्वों को विस्मृत कर देना भी उचित नहीं है। कंपनियां समाज के बीच रहकर ही व्यवसाय करती हैं। इन्हें श्रम शक्ति समाज से ही मिलती है। उनका उपभोक्ता वर्ग भी समाज से ही जडा होता है। जो कुछ कंपनियां उत्पादित करती हैं, उसे इसी समाज में ही खपाती हैं। इतना ही नहीं, कच्चा माल भी उन्हें समाज से ही मिलता है। वे हमारे प्राकृतिक संसाधनों का भी भरपूर दोहन करती हैं। पर्यावरण को भी प्रभावित करती हैं। कुल मिलाकर, उनकी सारी गतिविधियां समाज के इर्द-गिर्द ही सिमटी रहती हैं। ऐसे में समाज को कुछ देने की भी जिम्मेदारी बनती है। इसी परिप्रेक्ष्य में सीएसआर का चलन बढ़ा है। कंपनियों का प्रबंधन इस दिशा में ध्यान भी दे रहा है। 

आज हम अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं। देश में समस्याओं की कमी नहीं है। समस्याओं के निराकरण में सरकारें भी कुछ खास नहीं कर पा रही हैं। सामाजिक हित की दृष्टि से भी उनका दायरा कम हुआ है। ऐसे में अगर सीएसआर के जरिए कंपनियां समाज कल्याण के क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं तो जन कल्याण के क्षेत्र में निजी पूंजी के इस निवेश का स्वागत करना चाहिए। भविष्य में यह पहल दूरगामी प्रभाव दिखाएगी, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता। अतएव सरकार और जनसाधारण को भी ऐसे प्रयासों को न सिर्फ प्रोत्साहित करना चाहिए, बल्कि सहयोग भी करना चाहिए। 

किसी भी सकारात्मक पहल का पर्याप्त प्रभाव तुरंत नहीं दिखने लगता है। इसमें पर्याप्त समय लगता है। सीएसआर के जरिए आने वाले दिनों में समाज की तस्वीर बदलेगी, हमें यह मानकर चलना होगा। धीरे-धीरे इसका चलन तो बढ़ेगा ही और जो कंपनियां अभी तक पिछड़ी हैं, वे भी आगे आकर लोक-कल्याणकारी भावना से समाज के लिए काम करेंगी। इस तरह देखा जाए तो सीएसआर हमें एक नई सुबह के प्रति आशान्वित कर रहा है। 

हर पहल के दो पहलू हमेशा से रहे हैं। एक सफेद होता है तो दूसरा स्याह। कुछ बातें फायदेमंद होती हैं, तो कुछ नुकसानदायक। सीएसआर भी इससे अछूता नहीं है। जानकार इसकी जमकर आलोचना भी कर रहे हैं। उन्हें सही अर्थों में इसमें समाज का हित नहीं दिख रहा है। वे परोपकार की इस भावना को उस व्यापारिक रणनीति से प्रेरित मानते हैं, जिसके मूल में एक सुरक्षित और लाभकारी माहौल बनाने की मंशा निहित है। सीएसआर से भी हित साधने की मंशा कंपनियों की मानी जा रही है। तो क्या सीएसआर एक दिखावा है छलावा है. स्वांग या ढोंग है, ये सवाल भी साथ-साथ सिर उठाने लगे हैं।

आलोचक बड़ी शिद्दत से यह सवाल भी उठा रहे हैं कि आखिर समाज में वे स्थितियां पैदा ही क्यों होती हैं, जिनकी वजह से लोक उपकार की आवश्यकता पड़ती है। असमानता और विषमता की खाई दिनों-दिन क्यों चौड़ी होती जा रही है। जाहिर है, कहीं-न-कहीं आर्थिक न्याय का गला घोंटा जा रहा है, जिसकी वजह से समाज कल्याण और परोपकार की जरूरत बढ़ रही है। जाहिर है, कहीं-न-कहीं समाज को आर्थिक अन्याय का शिकार होना पड़ रहा है। बडी स्पष्ट सी बात है कि लोकतांत्रिक पंजीवाद की गिरफ्त समाज पर बढ़ी है, जिसके चलते शोषण और उत्पीड़न भी बढ़ा है। दिखावे के तौर पर सीएसआर के जरिए आंसू पोछने और छद्म राहत देने की पेशकश की जा रही है। जरूरत तो इस बात की है कि जिस आर्थिक अन्याय का शिकार समाज बराबर बनता आ रहा है, उसे दूर किया जाए। असमानता की खाई को पाटा जाय, मगर लाभ की होड़ और गलाकाट प्रतिस्पर्धा में यह सब संभव नहीं है। 

‘यकीनन, सीएसआर के तहत जन कल्याणकारी कार्यों को भारतीय कंपनियों को किसी अनुष्ठान और यज्ञ की तरह संकल्पित होकर पूरे पवित्र भाव से करना चाहिए। उन्हें इन्हें दोयम दर्जे में न रखकर सीधे-सीधे कारोबार से जोड़ना चाहिए। जिन गंभीर प्रयासों की जरूरत है, उन्हें करने में कोताही नहीं बरतनी चाहिए।” 

सीएसआर के तहत एक आडम्बरी प्रवृत्ति ने भी अंगद की दर पैर जमा लिए हैं। होता यह है कि इस मद में खर्च तो मात्र एक कप ही किया जाता है, मगर हल्ला सौ रुपये का मचाया जाता है। जागि है, कहीं-न-कहीं मंशा में खोट है। नैतिकता और शुचिता का अभाव है। सामाजिक कार्यों का ढिंढोरा ज्यादा पीटा जाता है, इन्हें किया कम जाता है। थोड़े से काम को अधिक से अधिक प्रचारित कर फायदे की मुहिम तेज कर दी जाती है। 

सीएसआर को लेकर जो प्रतिबद्धता कंपनियों में दिखनी चाहिए, वह नहीं दिख रही है। इसे लेकर पारदर्शिता का भी अभाव है। जो थोड़ी बहुत चेतना दिख रही है, उसके पीछे कोई पवित्र संकल्प नहीं है, न ही आदर्श या नैतिकता का भाव है। वे इसका भी इस्तेमाल परोक्ष रूप से फायदे के लिए कर रही हैं। उनका मकसद अपने लिए एक माकूल और सुरक्षित माहौल तैयार करना है और इस लिहाज से सीएसआर उनके लिए किसी ‘ट्रंप कार्ड’ से कम नहीं है।

जानकारों और आलोचकों की इस बात में दम है कि सीएसआर को कंपनियां नैतिक दायित्व के तौर पर नहीं ले रही हैं। जिस तरह से उन्हें सीएसआर से जुड़ी सामाजिक जिम्मदारियों पर केन्द्रित रहना चाहिए, वह जज्बा दूर-दूर तक नहीं दिखता है। उनका अंदाज रस्मी है और रस्म अदायगी के लिए इनकी खानापूर्ति की जाती है। यही कारण है कि सीएसआर को कामयाबी की जिस शक्ल में दिखना चाहिए, वह नहीं दिख रही है। इसका जो प्रभाव समाज पर दिखना चाहिए, वह नहीं दिख रहा है। 

वस्तुतः भारत में बिजनेस तंत्र के बीच सीएसआर और अवधारणा का अभ्युदय ही न होता, अगर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तेजी से दस्तक न दी होती। भारतीय कंपनियां यह जान चुकी हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कार्य क्षेत्र में सीएसआर को खास . तवज्जो दे रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सीएसआर से जुडी गतिविधियों पर परिवार के सदस्यों का नियंत्रण नहीं रहता, बल्कि वे इसे बिल्कुल पेशेवर अंदाज में लेती हैं। कई पेशेवर मिलकर सामाजिक हित और दायित्वों से जुड़े कार्यों को अंजाम देते हैं। इनकी सोच दूरगामी होती है तथा काम में स्थायित्व होता है। अन्य कामों की तरह सीएसआर से जुड़े कामों की निगहबानी भी इन कंपनियों की मैनेजमेंट कमेटी करती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबार का एक हिस्सा सीएसआर भी है। 

बहराष्ट्रीय कंपनियों के डर से भारतीय कंपनियों ने सीएसआर का ढिंढोरा तो पीटना शुरू कर दिया है, मगर उनकी तरह वे इसे कारोबार का हिस्सा नहीं बना पाई हैं। ब्रांड वैल्यू बढ़ाने तथा कारोबारी लाभ के लिए वे इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने लगी हैं, जो कि सीएसआर की आत्मा से छेड़-छाड़ जैसा है। 

भारतीय परिवेश में जरूरत इस बात की है कि सीएसआर के तहत हो रही पहल सिर्फ इसके प्रतीकात्मक स्वरूप तक ही सीमित न रहे। यहां भी सीएसआर का स्वरूप वैसा ही हो, जैसा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के यहां है। इसे धंधा चमकाने और सुरक्षित माहौल निर्मित करने के हथकंडे के रूप में इस्तेमाल न करें। वास्तव में जो स्वरूप सीएसआर का होना चाहिए, उससे छेड़छाड़ न की जाए। सीएसआर की आत्मा को संरक्षित करने का जब तक प्रयास नहीं होगा, तब तक सही अर्थों में हम इन परिणामों को नहीं प्राप्त कर सकेंगे, जो सीएसआर का मुख्य मकसद है। 

यकीनन, सीएसआर के तहत जन-कल्याणकारी कार्यों को भारतीय कंपनियों को किसी अनुष्ठान और यज्ञ की तरह संकल्पित होकर पूरे पवित्र भाव से करना चाहिए। उन्हें इन्हें दोयम दर्जे में न रखकर सीधे-सीधे कारोबार से जोड़ना चाहिए। जिन गंभीर प्रयासों की जरूरत है, उन्हें करने में कोताही नहीं बरतनी चाहिए। यदि पवित्र भाव से पहल होगी, तो परिणाम भी बेहतर आएंगे। आलोचना की गुंजाइश भी नहीं रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सीएसआर में निहित भाव अच्छे हैं। जरूरत इस बात की है कि इनसे छेड़-छाड़ किए बिना दायित्वों का सच्चे मन से निर्वहन किया जाए। यदि ऐसा होता है तो अच्छे और दूरगामी परिणाम अवश्य मिलेंगे। संदेह का कुहासा दूर होगा। 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

2 + eighteen =