Dharmik sachi kahaniyan-कच-देवयानी की कथा, देवीभक्त सुदर्शन की कथा, एक भगवत भक्त राजा की कथा 

Dharmik sachi kahaniyan-कच-देवयानी की कथा

Dharmik sachi kahaniyan-कच-देवयानी की कथा

जीतकर भी मिली पराजय 

प्राचीन काल में देवता और दैत्य राज्य तथा अधिकार के लिए हमेशा युद्ध करते ही रहते थे। देवता अपने गुरु बृहस्पति से सलाह लेते थे और दैत्य अपने गुरु शुक्राचार्य से परामर्श करते रहते थे। इधर, इन दोनों के गुरुओं बृहस्पति और शुक्राचार्य में भी होड़ थी। बृहस्पति वेदज्ञ थे, शुक्राचार्य को एक अतिरिक्त विद्या ‘मृतसंजीवनी’ आती थी। 

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देवता बड़ी वीरता से युद्ध करते थे। उनके हाथों कई असुर सेनापति मारे जाते थे, पर दूसरे दिन वे फिर से जीवित होकर युद्ध के मैदान में आ जाते थे। देवताओं को यह रहस्य समझ में न आता था। 

उन्होंने गुरु बृहस्पति से कहा- “ऐसे तो हम असुर सेना का कभी संहार कर ही नहीं सकते। उनका तो हर सैनिक या सेनापति मर कर जिंदा हो जाता है। हमारा युद्ध व्यर्थ हो रहा है।” 

बृहस्पति ने कहा- “देवो! मैं इसके लिए असहाय हूं। शुक्राचार्य को ‘मृतसंजीवनी’ विद्या आती है। उसी का प्रयोग करके वे असुरों को जिन्दा कर देते हैं। मुझे यह विद्या नहीं आती।” 

Dharmik sachi kahaniyan-कच-देवयानी की कथा

इन्द्र ने कहा-“आपकी तरह शुक्राचार्य ने भी तो आपके पिता देवर्षि अंगिरा से शिक्षा प्राप्त की है। उन्हें यह विद्या कैसे मिली और आपको क्यों नहीं?” 

बृहस्पति ने कहा-“देवराज! यह ठीक है कि मेरे पिता अंगिरा के गुरुकुल में ही हम दोनों सहपाठी रहे हैं। पिता अंगिरा का मुझ पर अधिक ही स्नेह था, इसलिए वह हम दोनों को असमान भाव से शिक्षा देते थे। सात्विक गुणों वाली शिक्षा देने में उन्होंने भेदभाव नहीं किया, पर शुक्र को अपनी उपेक्षा लगती थी। एक दिन वह महर्षि गौतम से परामर्श कर तामस शिक्षा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की शरण में गए। शिव की सेवा-आराधना कर उसने उनसे संजीवनी विद्या प्राप्त कर ली। आज उसी अतिरिक्त विशेष ज्ञान का प्रयोग वे अपने यजमान असुरों के लिए कर रहे हैं।”

इन्द्र ने कहा- “गुरुदेव, अपने और पराए के भेदभाव से यही होता है। पर अब कुछ उपाय कीजिए कि इस विद्या का लाभ हमें भी मिले।” 

बृहस्पति बोले- “इसके लिए आप मेरे पुत्र कच से अपनी सहायता के लिए निवेदन कीजिए।” 

इन्द्र ने कच को बुलाकर सारी बात बताई और कहा कि आप जाकर दैत्य गुरु शुक्राचार्य की सेवा कर उन्हें प्रसन्न कर संजीवनी विद्या सीखें। 

पिता की सहमति तथा देवताओं की विनती सुनकर कच तैयार हो गए और एक दिन गुरु शुक्राचार्य के पास जाकर निवेदन किया- “मैं महर्षि अंगिरा का पौत्र, बृहस्पति का पुत्र कच हूं। मुझे पिताजी ने आपके पास भेजा है कि जाकर आपका शिष्य बनूं, सेवा करूं तथा आपसे अतिरिक्त विद्या प्राप्त करूं। आप भले ही असुरराज वृषपर्वा के राजपुरोहित हैं, पर हैं तो भार्गववंशी ब्राह्मण ही, इसलिए आपको भी देवयज्ञों में भाग लेने का अधिकार दिलाया जाएगा।” 

शुक्र ने अपने सहपाठी बृहस्पति के पुत्र एवं आचार्य अंगिरा के पौत्र कच को बड़े आदर से अपना शिष्य बनाया। कच भी अपने आचरण, सेवा तथा व्यवहार से शुक्राचार्य तथा उनकी बेटी देवयानी का बड़ा प्रिय हो गया। 

कुछ दिन बीतने के बाद दानवों को जब पता चला कि देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच हमारे गुरु के आश्रम में रह रहा है तो उन्हें शंका हुई कि कुछ भेद की बात अवश्य है। बृहस्पति ने अपने पुत्र को अवश्य ही कोई भेद लेने भेजा है। इसलिए इस कंटक को हटाना चाहिए। 

एक दिन कच जब गौ चराने गया तो असुरों ने कच को वहीं मार डाला। शाम को गाएं जब आश्रम में आईं और कच नहीं आया तो देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा-“गाएं तो कब की गोधूलि वेला में आश्रम में लौट आई हैं, पर कच अभी तक नहीं आया। लगता है, असुरों ने उसे देवगुरु का पुत्र होने के कारण मार डाला है।” 

शुक्र ने कहा-“बेटी चिन्ता मत करो। कच हमारे यहां बृहस्पति की धरोहर है। मैं असुरों का यह दुष्कर्म सफल नहीं होने दूंगा।” ऐसा कहकर उन्होंने अपनी संजीवनी विद्या का प्रयोग कर कच! कच!! कच!!’ तीन बार पुकारा तो थोड़ी देर में कच गोचर से दौड़ता हुआ आ गया। 

कच ने शुक्राचार्य को सारी बात बताई कि किस प्रकार असुरों ने उसे गोचर में ही मार डाला था। कच को पुनः जीवित देखकर एक दिन तो असुरों ने हद कर दी। कच को मार कर उसे जला डाला और उसकी अस्थियों की राख को वारुणी में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया। असुरों ने सोचा, अब छुट्टी मिली। वह हमारे गरु के ही पेट में चला गया। सदा-सदा के लिए अन्त हो गया उसका। 

देवयानी ने जब फिर कच को नहीं देखा तो पिता से पूछा। पिता ने कहा “बेटी, लगता है असुरों ने फिर उसके साथ घात किया है। बृहस्पति को चाहिए था कि वह अपने पुत्र को असुर शिविर में नहीं भेजते। अब मैं क्या करूं। वे मारते रहें और मैं जिलाता रहूं, ऐसा कब तक चलेगा?” 

देवयानी ने कहा-“पिताजी! मैं कच के बिना नहीं रह सकती। वह मुझे बहुत प्रिय है। आपको उसे फिर से जीवित करना पड़ेगा।”

शुक्राचार्य अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे। उसकी बात टाल न सके। उन्होंने फिर संजीवनी मंत्र का प्रयोग कर कच को पुकारा तो शुक्राचार्य के पेट से ही आवाज आई-“गुरुदेव मैं यहां हूं। इस बार तो असुरों ने मुझे मारने के उपरान्त जलाकर मेरी अस्थियों की राख वारुणी में मिलाकर आपको पिला दी। मझे यहां से निकालिए।” 

शुक्राचार्य आश्चर्यचकित हो गए। असुर इस हद तक जा सकते हैं, उन्हें विश्वास न हुआ, पर उनका दुष्कर्म तो प्रत्यक्ष दिख रहा था। उन्होंने कहा-“वत्स तुम मेरे पेट में रह चुके हो, अत: सुयोग्य पुत्र के समान व्यवहार करना। मैं तुम्हें संजीवनी विद्या का ज्ञान देता हूं। इससे तुम शरीरधारी होकर जीवित हो जाओगे। मेरा पेट फाड़कर निकल आना। मेरे मर जाने पर उसी विद्या का प्रयोग कर तुम मुझे फिर से जीवित कर देना।” 

कच ने कहा-“गुरुदेव, मैं आपका शिष्य हूं, अब उदर-पुत्र भी बनूंगा, मैं आपका कृतज्ञ रहूंगा।” 

शुक्राचार्य ने उसे संजीवनी विद्या का ज्ञान दिया। तत्पश्चात कच जीवित होकर शक्राचार्य का पेट फाड़कर बाहर आया। शुक्राचार्य निष्प्राण हो गए तो उन्हीं से सीखी विद्या का उसने शुक्राचार्य पर प्रयोग किया। शुक्राचार्य जीवित हो गए। 

एक दिन उन्होंने कच से कहा-“वत्स! तुम्हारा जीवन यहां सुरक्षित नहीं है। तुम अपने देव-लोक को लौट जाओ।” 

कच जिस उद्देश्य से आया था, वह पूरा हो चुका था। उसे संजीवनी विद्या आ गई थी। उसने भी जाने का निश्चय किया। 

एक दिन जब वह जाने लगा तो देवयानी ने कहा-“कच, तुमने इतने दिन यहां रहकर, अपने आचरण, सेवा, विनय तथा जितेन्द्रियता से जो व्यवहार किया है, उससे मुझे तुमसे प्रेम हो गया है। तुम मेरा विधिपूर्वक पाणिग्रहण करो। मैं तुम्हारी पत्नी बनकर तुम्हारे साथ चलूंगी।” 

ऐसा प्रस्ताव सुनकर कच ने कहा- “बहन! ऐसी अमर्यादित अधर्म की बात तुम्हारे मन में कैसे आई? मैं एक प्रकार से तुम्हारे पिता के शरीर से पैदा हुआ हूं, इस नाते तुम मेरी बहन हो। गुरु शुक्राचार्य तुम्हारे पिता हैं, तो इस नाते वह मेरे भी पिता हैं। ऐसी अनर्थ की बात सोचो ही मत। मैंने इस आश्रम में ब्रह्मचारी का सदाचारी जीवन बिताया है। ऐसा करना आश्रम, देव, धर्म, विधान आदि सब का उल्लंघन होगा। इसलिए क्षमा कर दो। मैं ऐसा काम नहीं कर सकता।” 

अपने प्रेम और प्रस्ताव के ठुकराए जाने से देवयानी आहत हुई। क्रोध में भरकर वह बोली-“यदि मेरी याचना नहीं स्वीकार कर रहे हो तो मैं शाप देती हूं कि यहां से प्राप्त ज्ञान तथा सिद्धि तुम्हारे किसी काम नहीं आएगी।” 

कच ने हंसकर कहा-“बहन! तुमने यह शाप काम के वशीभूत होकर दिया है। यह धर्मानुसार नहीं है, मुझसे यह विद्या सिद्ध नहीं होगी, पर जिसे मैं सिखाऊंगा, उसे अवश्य सिद्ध होगी। विद्या कभी नष्ट नहीं होती। अब मेरी ओर से इस शाप का प्रतिदान भी लो-“भविष्य में कोई भी ब्राह्मण कुमार तुमसे विवाह नहीं करेगा। ब्राह्मणेतर जाति के किसी युवक से ही तुम विवाह करोगी।” 

एक प्रकार से दोनों ही शापग्रस्त हो गए। कच कभी संजीवनी विद्या का प्रयोग देवों के लिए नहीं कर सका और देवयानी को भी क्षत्रिय राजा ययाति की रानी बनना पड़ा। 

 Dharmik sachi kahani-एक भगवत भक्त राजा की कथा 

नरक से मिली मुक्ति 

बहुत पहले किसी स्थान में एक बड़ा ही धर्मात्मा राजा राज्य करता था। धर्मपूर्वक राज्य करने पर यथाकाल उसकी मृत्यु हो गई। पुण्यात्मा होने पर भी किसी एक पाप का फल भुगतने के लिए यमदूत उसे सम्मानपूर्वक नरकमार्ग से ले गए। नरक का दृश्य देखकर राजा का हृदय दहल गया। वहां के पीड़ित प्राणियों का चीत्कार उससे सुना नहीं जाता था। 

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वहां का दृश्य देखकर ज्यों ही वह यमसेवकों के साथ नरक द्वार से दूर जाने लगा, त्यों ही नरक की असह्य पीड़ा भोगने वाले सभी नरकवासी बड़े जोरों से चिल्ला उठे और करुणाविलाप करते हुए राजा को सम्बोधित कर बोले, “हे 

राजन! आप प्रसन्न होइए। घड़ी भर आप यहां ठहर जाइए। आपके अंग से स्पर्श करके आने वाली हवा से हमें बड़ा ही सुख मिल रहा है, इस सुख-शीतल वायु के स्पर्श मात्र से हमारी सारी पीड़ा और जलन एकदम जाती रही है और हम पर मानो आनन्द की वर्षा हो रही है, दया कीजिए!” 

राजा ने यह सुनकर यमदूतों से पूछा- “मेरे यहां रहने से इन लोगों को सुख मिलने का क्या कारण है ? मैंने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है जिसके कारण इन पर आनन्द की वर्षा हो रही है?” 

यमदूत ने कहा-“महाराज! आपने पितृ, देवता, अतिथि और आश्रितों का भरण-पोषण किया है तथा श्रीहरि का स्मरण किया है, इसीलिए आपके शरीर से स्पर्श की हुई हवा से पापियों की पीड़ा नष्ट हो रही है। आपके तेज से और आपके दर्शन से पापियों को पीड़ा पहुंचाने वाले यमराज के अस्त्र-शस्त्र, तीक्ष्ण चोंच वाले पक्षी, नरकाग्रि आदि सभी तेजरहित होकर मृदु हो गए हैं, इसीलिए नरकवासी पापियों को इतना सुख मिल रहा है।” 

यह सुनकर राजा ने कहा- “इनके सुख से मुझे बड़ा सुख मिल रहा है, मेरी ऐसी मान्यता है कि आर्त प्राणियों की रक्षा करने में जो सुख होता है, स्वर्ग या ब्रह्मलोक में भी वैसा सुख नहीं होता। यदि मेरे यहां रहने से इनकी पीड़ा दूर होती है तो हे दूतो! मैं तो पत्थर की तरह अचल होकर यहीं रहूंगा।” 

राजा की यह बात सुनकर यमदूतों ने कहा-“आप कृपा कर यहां से चलिए, यह तो पापियों के नरक भोग की जगह है। आप यहां क्यों रहेंगे? आप अपने पुण्यों का फल भोगिए।” 

यह सुनकर राजा ने कहा-“जब तक इनको दुखों से छुटकारा नहीं मिलेगा, तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा। क्योंकि मेरे यहां रहने से इन्हें सुख मिल रहा है। आर्त और आतुर होकर शरण चाहने वाले शत्रु पर भी जो मनुष्य अनुग्रह नहीं करता उसके जीवन को धिक्कार है ! दुखियों के दुख दूर करने में जिसका मन नहीं है उसका यज्ञ, दान, तप आदि कुछ भी इस लोक और परलोक में सुख के कारण नहीं होते। बालक, आतुर, दुखी और वृद्धों के प्रति जिसका चित्त कठोर है, मेरी समझ में वह मनुष्य नहीं, राक्षस है। इन लोगों के पास रहने से मुझे नारकीय अग्नि के ताप से अथवा भूख-प्यास के कारण बेसुध कर देने वाला महान दुख क्यों न भोगना पड़े, इनको सुखी करने से मिले हुए उस दुख को मैं अपने लिए स्वर्गसुख से भी बढ़कर समझंगा। मुझ एक के दुख पाने से यदि इतने आर्त जीवों को सुख होता है तो इससे बढ़कर मुझे और क्या लाभ होगा?” 

यमदूतों ने कहा-“महाराज ! देखिए-ये साक्षात् धर्म और इन्द्र आपको ले जाने के लिए यहां आए हैं, अब आपको जाना ही पड़ेगा, अतएव पधारिए।” 

धर्म ने कहा-“राजन! आपने सम्यक प्रकार से मेरी उपासना की है, इसलिए मैं स्वयं आपको स्वर्ग में ले जाऊंगा, आप देर न करें, विमान पर जल्दी सवार हो जाएं।” 

राजा ने कहा- “हे धर्म! हजारों जीव नरक के दुख पा रहे हैं और मेरे यहां रहने से इनका दुख दूर होता है, ऐसी हालत में मैं यहां से नहीं जा सकता।” 

इन्द्र बोले-“राजन! अपने-अपने कर्मफल से ये पापी लोग नरक भोग रहे हैं। आपको भी अपने कर्मों का फल भोगने के लिए स्वर्ग में चलना चाहिए। इन नरकवासियों पर दया दिखाने से आपका पुण्य लाखों गुना और भी बढ़ गया है। अतएव इस पुण्यफल के भोग के लिए आप स्वर्ग चलिए!” 

राजा ने कहा-“जब मेरे पुण्य से इनको सुख मिलता है तो मैं अपना सब पूण्य इनको देता हूं। इस पुण्य से ये सारे यातनाभोगी पापी नरक से छूट जाएं।” 

इन्द्र ने कहा- “इससे आपका पुण्य और भी बढ़ गया। आपकी और भी उच्च गति हो गई! यह देखिए, सारे पापी नरक से छूटकर जा रहे हैं।” 

राजा का ऐसा कथन सुनकर देवगण राजा पर पुष्पवृष्टि करने लगे। इन्द्र उन्हें विमान पर चढाकर स्वर्ग में ले गए। नरक के सभी प्राणी राजा के पुण्य प्रभाव से  सद्र्गति को प्राप्त हो गए। 

Dharmik kahani-देवी भक्त सुदर्शन की कथा 

अयोध्या में भगवान राम से 15वीं पीढ़ी बाद ध्रुव-संधि नाम के राजा हुए। उनके दो स्त्रियां थीं। पटरानी थी कलिंगराज वीरसेन की पुत्री मनोरमा और छोटी रानी थी उज्जयिनी नरेश युधाजित की पुत्री लीलावती। दोनों रानियों से राजा को एक-एक सन्तान प्राप्त हुई। वे दोनों पुत्र थे। पटरानी से उत्पन्न पुत्र का नाम सुदर्शन था और छोटी रानी के पुत्र का नाम था शत्रुजित । महाराज की दोनों पर ही समान दृष्टि थी। दोनों राजपुत्रों का समान रूप से लालन-पालन होने लगा। 

Dharmik kahani-देवी भक्त सुदर्शन की कथा 

इधर, महाराज को आखेट का व्यसन कुछ अधिक ही था। एक दिन वे जंगल में एक सिंह के साथ भिड़ गए, अंत में सिंह के साथ स्वयं भी स्वर्गगामी हो गए। मन्त्रियों ने उनकी पारलौकिक क्रिया करके सुदर्शन को राजा बनाना चाहा। 

इधर, शत्रुजित के नाना युधाजित को इस बात की खबर लगी तो वे एक बडी सेना लेकर इसका विरोध करने के लिए अयोध्या में आ डटे। 

उधर, कलिंग नरेश वीरसेन भी सुदर्शन के पक्ष में आ गए। दोनों में युद्ध छिड़ गया। कलिंगाधिपति मारे गए। अब रानी मनोरमा डर गईं। वह सुदर्शन को लेकर एक धाय तथा महामन्त्री विदल्ल के साथ भागकर प्रयाग स्थित महर्षि भारद्वाज के आश्रम में पहुंच गईं। युधाजित ने अयोध्या के सिंहासन पर शत्रुजित को अभिषिक्त किया और सुदर्शन को मारने के लिए भारद्वाज के आश्रम पर पहुंचे। पर मुनि के भय से वहां से उन्हें भागना पड़ा। 

एक दिन भारद्वाज के शिष्यगण महामन्त्री के सम्बन्ध में कुछ बातें कर रहे थे। कुछ ने कहा कि विदल्ल क्लीव (नपुंसक) है। 

दूसरों ने कहा-‘यह सर्वथा क्लीव है।’ 

सुदर्शन अभी बालक ही था। उसने बार-बार जो उनके मुंह से क्लीव-क्लीव सुना तो स्वयं भी ‘क्लीं-क्लीं’ करने लगा। यह महाकाली का बीज मंत्र है। अब वह सोते, जागते, खाते, पीते, ‘क्लीं, क्लीं’ रटने लगा। 

इधर, महर्षि ने उसके क्षत्रियोचित संस्कारादि कर दिए और थोड़े ही दिनों में वह भगवती तथा ऋषि की कृपा से शस्र-शास्त्रादि सभी विद्याओं में अत्यन्त निपुण हो गया। 

एक दिन वन में खेलते समय उसे देवी की दया से अक्षय तूणीर और दिव्य धनुष पड़ा मिल गया। अब सुदर्शन भगवती की कृपा से पूर्ण शक्ति सम्पन्न हो गया था। 

इधर, काशी में उस समय राजा सुबाहु राज्य करते थे। उनकी कन्या शशिकला बंडी विदुषी तथा देवीभक्त थी। भगवती ने उसे स्वप्न में आज्ञा दी कि ‘तू सुदर्शन को अपने पतिरूप में वरण कर ले। वह तेरी समस्त कामनाओं को पूर्ण करेगा।’ 

शशिकला ने उसी समय मन ही मन में सुदर्शन को पति के रूप में स्वीकार कर लिया। प्रात:काल उसने अपना निश्चय माता-पिता को सुनाया। यह सुनकर पिता ने अपनी पुत्री को डांटा और एक असहाय वनवासी के साथ सम्बन्ध जोड़ने में अपना अपमान समझा। 

उन्होंने अपनी कन्या के स्वयंवर की तैयारी आरम्भ की। उन्होंने उस स्वयंवर में सुदर्शन को आमन्त्रित भी नहीं किया। पर शशिकला भी अपने मार्ग पर दृढ़ थी। उसने सुदर्शन को एक ब्राह्मण द्वारा देवी का संदेश भेज दिया। सभी राजाओं के साथ वह भी काशी आ गया। 

इधर, शत्रुजित को लेकर उसके नाना अवन्ति नरेश युधाजित भी आ धमके थे। काफी प्रयत्न के बावजूद भी शशिकला द्वारा सुदर्शन के मन-ही-मन वरण किए जाने की बात सर्वत्र फैल गई। इसे भला, युधाजित कैसे सहन कर सकते थे। उन्होंने सुबाहु को बुलाकर जवाब-तलब किया। सुबाहु ने इसमें अपने को दोषरहित बतलाया। तथापि युधाजित ने कहा- “मैं सुबाहु सहित सुदर्शन को मारकर बलात् कन्या का अपहरण करूंगा।” 

राजाओं को बालक सुदर्शन पर कुछ दया आ गई। उन्होंने सुदर्शन को बुलाकर सारी स्थिति समझाई और भाग जाने की सलाह दी। 

सुदर्शन ने कहा-“यद्यपि न मेरा कोई सहायक है और न मेरी कोई सेना ही है, तथापि मैं भगवती के स्वप्नगत आदेशानुसार ही यहां स्वयंवर देखने आया हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है, वे मेरी रक्षा करेंगी। मेरी न तो किसी से शत्रुता है और न मैं किसी का बुरा ही चाहता हूं।” 

जब प्रात:काल स्वयंवर-प्रांगण में राजा लोग सज-धजकर आ बैठे तो सुबाह ने शशिकला से स्वयंवर में जाने के लिए कहा। पर उसने राजाओं के सामने जाना सर्वथा अस्वीकार कर दिया। 

सुबाहु ने राजाओं के अपमान तथा उनके द्वारा उपस्थित होने वाले भय की बात कही। शशिकला बोली- “यदि तुम सर्वथा कायर ही हो तो तुम मुझे सुदर्शन के हवाले करके नगर से बाहर छोड़ आओ।” 

कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था, इसलिए सुबाहु ने राजाओं से तो कह दिया कि “आप लोग कल स्वयंवर में आएं, आज शशिकला नहीं आएगी।” 

इधर, रात में ही उसने संक्षिप्त विधि व गुप्त रीति से सुदर्शन से शशिकला का विवाह कर दिया और सवेरा होते ही उन्हें पहुंचाने जाने की तैयारी कर ली। 

युधाजित को भी यह बात किसी प्रकार मालूम हो गई। वह रास्ते में अपनी सेना लेकर सुदर्शन को मार डालने के विचार से जा खड़ा हुआ। सुदर्शन भी भगवती को स्मरण करता हुआ वहां पहुंचा। दोनों में युद्ध छिड़ने ही वाला था कि भगवती साक्षात् प्रकट हो गईं। युधाजित की सेना भाग खड़ी हुई। युधाजित अपने नाती शत्रुजित के साथ मारा गया। पराम्बा जगत्जननी ने सुदर्शन को वर मांगने के लिए प्रेरित किया। सुदर्शन ने केवल देवी के चरणों में अविरल, निश्चल अनुराग की याचना की। साथ ही काशीपुरी की रक्षा की भी प्रार्थना की। 

सुदर्शन के वरदान स्वरूप ही दुर्गा कुण्ड में स्थित हुई पराम्बा दुर्गा वाराणसी पुरी की आज भी रक्षा कर रही हैं। 

 

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