Dharmik katha hindi me-उपगुप्त और वासवदत्ता की कहानी

Dharmik katha hindi m

Dharmik katha hindi me- उपागुप्त और वासवदत्ता

बहुत पहले मथुरा शहर में वासवदत्ता नामक एक सुन्दर नर्तकी रहती थी। एक दिन उसने अपनी खिड़की से एक सन्यासी को जाते हुए देखा। तुरंत उसने अपनी सेविका को उस सन्यासी को महल में बुलाकर लाने के लिए भेजा। सेविका दौड़कर सन्यासी के पास गई और बोली, “प्रभु, मेरी मालकिन आपसे मिलना चाहती हैं। कृपया भीतर चलिए।” 

सन्यासी ने कहा, “अभी उचित समय नहीं है। सही समय आने पर मैं आपकी मालकिन से मिलने अवश्य आऊँगा।” सन्यासी के द्धारा निमंत्रण अस्वीकार किए जाने से वासवदत्ता अत्यंत दुखी हो गई। यह संयासी भगवान बुद्ध का अनुयायी उपागुप्त था। दुःखी वासवदत्ता ने नृत्य का भी परित्याग कर दिया। लोगों ने नृत्य करने का बहुत अनुरोध किया पर वह कर न सकी और अपना समय चुपचाप कमरे में बैठे रहकर व्यतीत करने लगी। 

एक दिन एक नवयुवक मूर्तिकार अपनी कृतियाँ लेकर वासवदत्ता के पास आया। वासवदत्ता को एक मूर्ति पसंद आयी। उसने पूछा, “क्या तुम इसे बेचोगे?” मूर्तिकार ने उत्तर दिया, “इसका मूल्य सम्भवतः आपके लिए बहुत अधिक है।” 

वासवदत्ता मन ही मन क्रुद्ध होती हुई बोली, “इस मूर्ति के लिए मैं कोई भी मूल्य देने को तैयार हूँ।” मूर्तिकार ने कहा, “आपको पुनः नृत्य प्रारम्भ करना होगा। इस मूर्ति का वही मल्य है।” वासवदत्ता ने उसे पुनः नत्य प्रारम्भ करने का वचन दिया। 

कई दिन व्यतीत हो गए। धीरे-धीरे वासवदत्ता को उस मूर्तिकार से प्रेम हो गया। इससे शहर में रहने वाले अन्य मूर्तिकार एवं कलाकार ईत्र्यालु हो गए। एक दिन उन लोगों ने उस मूर्तिकार को मारकर उसका पार्थिव शरीर वासवदत्ता के महल में छिपा दिया। 

वासवदत्ता इन बातों से अनभिज्ञ थी। महल से मूर्तिकार का पार्थिव शरीर मिलने पर सबने वासवदत्ता पर ही शंका करी। उसे घसीटकर सड़क पर लाया गया। लोगों ने उसपर पत्थर बरसाए। किसी तरह एक सेविका वासवदत्ता को क्रुद्ध भीड़ से बचाकर कब्रिस्तान में ले गई। कई दिनों तक दोनों वहाँ छिपी रहीं। वासवदत्ता घायल थी और उसका बचना कठिन था। 

एक दिन उन्होंने सन्यासी उपागुप्त को अपने पास आता देखा। वासवदत्ता ने पूछा, “श्रीमान्! अब आप मेरे पास क्यों आए हैं? मैं अपना सर्वस्व खो चुकी हूँ… महल, सुख सुविधएँ, मेरा प्रेमी, मेरा सौन्दर्य आपको देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है।’ 

उपगुप्त और वासवदत्ता की कहानी

उपागुप्त ने कहा, “पहले तुम्हारे पास सब कुछ था इसलिए तुम्हें मेरी आवश्यकता नहीं थी। अब तुम्हें मेरी आवश्यकता है। बुद्ध के मठ में मेरे साथ चलो। वह तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे।” 

उपागुप्त वासवदत्ता को भगवान् बुद्ध के विहार ले गया। वहाँ इलाज के कारण उसके घाव भर गए। उसने अपना शेष जीवन भगवान् बुद्ध की शरण में रहकर व्यतीत किया।

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