धर्मांतरण पर निबंध

धर्मांतरण पर निबंध

धर्मांतरण पर निबंध

विश्व के सभी धर्मों में हिंदू धर्म को सर्वाधिक उदारवादी एवं समन्वयवादी माना जाता है। अहिंसा, शांति एवं परस्पर सद्भाव इस धर्म का मूल आधार है। इसीलिए प्राचीन काल से लेकर आज तक जिस किसी भी धर्म अथवा जाति के अनुयायी भारत में आए, उनका भारतीयों द्वारा आतिथ्यपूर्ण स्वागत किया गया और उन्हें अपने घर में पर्याप्त सम्मान दिया गया। परंतु भारतीयों की इस उदारता का गलत लाभ समय-समय पर अन्य धर्मों के प्रचारकों अथवा शासकों द्वारा उठाया गया। यहां के हिंदुओं को कभी मुसलमानों द्वारा और कभी ईसाइयों द्वारा प्रलोभन अथवा भय-प्रदर्शन से धर्मांतरण के लिए बाध्य किया गया। 

 धर्मांतरण एक पद है, जिसका निर्माण ‘धर्म’ और ‘अंतरण’ शब्द की संधि से हुआ है। अंतरण का अर्थ परिवर्तन होता है। इस दृष्टि से धर्मांतरण का अर्थ हुआ-धर्म परिवर्तन। आधुनिक संदर्भ में धर्मांतरण का उपयोग अंग्रेजी के ‘कन्वर्सन’ शब्द के हिंदी रूपांतरण में होता है। धर्म के संदर्भ में कन्वर्सन एक धर्म से दूसरे धर्म में आस्था परिवर्तन को कहते हैं। वस्तुतः धर्मांतरण एक प्रक्रिया है, जिससे एक धर्म से दूसरे धर्म में आस्था परिवर्तन होता है अथवा परिवर्तन कराया जाता है। 

भारतीय संविधान में धर्मांतरण के संबंध में कोई उल्लेख नहीं है। संविधान में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत का कोई भी व्यक्ति अंतःकरण की स्वतंत्रता का अधिकार रखता है। उसे किसी भी धर्म को वैध रूप से मानने तथा उसका आचरण और प्रचार करने का स्वतंत्र अधिकार प्राप्त है। 

हमारा संविधान बलात् धर्मांतरण का तो विरोध करता है, परंतु नैतिक या आत्मिक धर्मांतरण का विरोध नहीं करता। संविधान में भारत को पंथ-निरपेक्ष घोषित किया गया है, जिसके अनुसार किसी भी धर्म को राजकीय संरक्षण नहीं मिला और सभी धर्मों को समान रूप से संरक्षण दिए जाने की व्यवस्था है। धर्मांतरण के दो रूप होते हैं- पहला, नैतिक और दूसरा, बलात्। 

भय दिखाकर अथवा धन और पद आदि का लोभ देकर धर्मांतरण करवाना ‘बलात् धर्मांतरण’ कहलाता है। मध्यकाल के आरंभ में महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी तथा उनके उत्तराधिकारियों ने भारत में बलात् धर्मांतरण का ही सहारा लिया था। धर्मांतरण के मुख्य कारण हैं-गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन, शोषण, बेरोजगारी, छुआछूत, सामाजिक संकीर्णता तथा वर्ण भेद आदि। 

अब धर्मांतरण के क्षेत्रीय और भौगोलिक स्वरूप की चर्चा भी अपेक्षित है। जिन क्षेत्रों में विदेशी आक्रमणकारियों या विदेशी व्यापारियों का आगमन हुआ, उन क्षेत्रों में काफी कठोर नीतियां भी धर्मांतरण के लिए जिम्मेदार थीं। मुगल शासन काल में ‘जजिया कर’ द्वारा गरीब जनता पर बड़ा बोझ लाद दिया गया, जिससे वह धर्मांतरण के लिए मजबूर हो गई। 

समसामयिक परिस्थितियों में धर्मांतरण को लेकर राष्ट्रवादी विचार-विमर्श की आवश्यकता निश्चित रूप से है। ऐसा इसलिए नहीं कि विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक आदि दक्षिण पंथी शक्तियों द्वारा इसके लिए आवाज उठाई जा रही है, बल्कि इसलिए कि भारत में पहली बार हिंदू कट्टरवादिता की ओर अग्रसर हैं और उनका निशाना अनावश्यक रूप से अल्पसंख्यकों को बनना पड़ रहा है। धर्मांतरण का औचित्य राष्ट्रीय बहस से ही हो सकता है। 

धर्मांतरण भारत की ज्वलंत समस्या है। इसके लिए अधिकार और नैतिकता की व्याख्या आवश्यक है। स्वैच्छिक धर्मांतरण को रोकना और बलात् धर्मांतरण को प्रोत्साहित करना-दोनों हमारी संस्कृति के लिए घातक हैं। बलात् धर्मांतरण के विरोध में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णय भी दिए गए हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि यदि बलात् धर्मांतरण को प्रतिबंधित नहीं किया गया, तो लोक अव्यवस्था के उत्पन्न होने का खतरा है। धर्म के बिना मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः धर्म छोड़ने हेतु किसी पर दबाव नहीं डालना चाहिए। 

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