Devi devtaon ki kahaniyan-अर्धचंद्राकार चाँद 

Devi devtaon ki kahaniyan

Devi devtaon ki kahaniyan-अर्धचंद्राकार चाँद 

ब्रह्मा जी के कई पुत्रों में एक दक्ष थे। उनकी सत्ताइस पुत्रियाँ थीं। उन सभी का विवाह चन्द्रदेव से हुआ था। चन्द्रदेव अपनी पत्नी रोहिणी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। दक्ष की शेष छब्बीस पुत्रियाँ इस बात से अप्रसन्न होकर दक्ष के पास अपना दुखड़ा लेकर गयीं। उन्होंने कहा, “पूज्य पिताजी, हमारे पति चन्द्र हम सबकी अवहेलना करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे हमें पसंद ही नहीं करते हैं। रोहिणी के साथ उन्हें विशेष प्रेम है और वे उसका ख्याल भी रखते हैं। उनके ऐसे व्यवहार के कारण रोहिणी भी हमें अनदेखा करती है। हम सब क्या करें?” 

रुष्ट दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रदेव को बुलाकर कहा, “चन्द्र, मैं यह क्या सुन रहा हूँ? मैंने तुम्हारे साथ अपनी सभी पुत्रियों का विवाह किया है पर सम्भवतः तुम्हें केवल रोहिणी से प्रेम है। शेष सभी के साथ अनुचित व्यवहार क्यों? मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी सभी पुत्रियों के साथ समान प्रेम भाव रखो।” 

चन्द्र ने दक्ष को प्रणाम कर नम्रतापूर्वक कहा, “पिताजी, ऐसा ही करूँगा।” 

समय के अंतराल में चन्द्रदेव के व्यवहार में कोई परिवर्तन न देखकर दक्ष की पुत्रियाँ पुनः पिता जी के पास अपनी शिकायत लेकर गयीं। मामला गम्भीर देखकर दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रदेव को बुलाकर श्राप देते हुए कहा, “चन्द्र, तुमने मेरी सभी पुत्रियों के साथ समान व्यवहार करने का वादा किया था… पर मुझे पता चला है तुमने अपनी बात नहीं रखी… मैंने तुमसे ऐसी आशा नहीं की थी। मैं समझता हूँ कि तुम्हें अपनी खूबसूरती का बहुत घमंड है। यदि यह सत्य है तो मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि आने वाले पंद्रह दिनों में तुम्हारी चमक चली जाएगी और तुम मलिन हो जाओगे।” 

चन्द्रदेव अवाक रह गए। उन्हें पता था कि दक्ष का श्राप कभी भी व्यर्थ नहीं जाएगा। उन्हें आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त थी। वे सोचने लगे कि किससे सहायता ली जाए? 

श्राप से रक्षा के लिए चन्द्र शिव भगवान के पास गए। पर उन्होंने मार्ग में विचारा कि गहन तप से प्रसन्न होकर शिव वर तो दे सकते हैं पर दक्ष के श्राप को कम नहीं कर सकते। यह विचारकर चन्द्र इन्द्रदेव की सलाह लेने उनके पास गए। 

इन्द्रदेव ने चन्द्रदेव से कहा, “चन्द्र! दक्ष के श्राप की उग्रता को कम करने की शक्ति मुझमें नहीं है। मात्र ब्रह्मदेव ही आपकी सहायता कर सकते हैं।” 

चन्द्रदेव ने ब्रह्मा जी को जाकर अपनी व्यथा बताई। 

ब्रह्मा जी ने कहा, “चन्द्र, अपने पुत्र दक्ष की शक्तियों को मैं भली-भांति जानता हूँ। वह अजेय है और उसकी शक्तियाँ अकाट्य हैं। इसी कारण उसे घमंड हो गया है। वह मेरी बात नहीं मानेगा अतः उससे कुछ भी कहना व्यर्थ है। मेरे विचार में आपका शिव भगवान की शरण में जाना ही श्रेयस्कर है।” 

Shiva Story in Hind

चन्द्र शिव के ध्यान में मग्न हो गए। उनकी चमक शनैः शनैः क्षीण होती जा रही थी। उनके कठोर तप से प्रसन्न होकर शिव भगवान प्रकट हुए। चन्द्र ने अपनी वेदना उन्हें बताई। शिव ने उन्हें वर देते हुए कहा, “चन्द्र, मैं दक्ष के श्राप को समाप्त नहीं कर सकता… हाँ, उसे कम अवश्य कर सकता हूँ। धीरे-धीरे बढ़ते हुए पन्द्रह दिनों में आप में पूरी चमक आ जाएगी तत्पश्चात् आप पुनः मलिन हो जाएंगे। अभी मलिन होते-होते आपका मात्र एक हिस्सा ही चमकदार है, मैं आपको आश्रय प्रदान करता हूँ।” 

ऐसा कहकर शिव भगवान ने चन्द्र को अपने सिर पर आश्रय दिया। शिव भगवान का आशीर्वाद पाकर चन्द्र अत्यंत प्रसन्न हुए। तभी से पन्द्रह दिनों के लिए चन्द्र देव की शोभा और चमक रहती है और अगले पन्द्रह दिनों में वह क्षीण होते हुए समाप्त हो जाती है।

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