दैव-दैव आलसी पुकारा पर निबंध | Dev Dev Alsi Pukara Essay in Hindi

दैव-दैव आलसी पुकारा पर निबंध

दैव-दैव आलसी पुकारा पर निबंध | Dev Dev Alsi Pukara Essay in Hindi

आपने देखा होगा ऐसे अनेक लोगों को, जिनकी आँखों में आँसुओं की मेहराब छाई रहती है, जिनके कपोलों पर अवसाद का कनात फैला रहता है, जिनके ओठों पर उदासी का सैलाव उमड़ता रहता है, उनका जीवन अभावों का, रिक्तताओं का, आवश्यकताओं का विश्वकोष-भर होता है; वे पूरे मलूकदासी संप्रदाय में दीक्षित होते हैं, हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहते हैं और कहा करते हैं कि जो भाग्य में लिखा है, प्रारब्ध में बदा है, वही होगा; कुछ करना व्यर्थ है-भाग्य ही सर्वत्र फलता है, विद्या और पौरुष नहीं, तभी तो समुद्र का मंथन होने पर विष्णु ने लक्ष्मी प्राप्त की और शंकर ने विष 

भाग्यं फलति सर्वत्र न विद्या न च पौरुषम्। 

समुद्रमथनाल्लेभे हरिर्लक्ष्मी हरो विषम्॥

इतना ही नहीं, जिनके घर वैसी गृहिणी हैं, जो अन्नदान से तीनों लोकों की रक्षा करती हैं, वे शंकरजी भी हाथ में खप्पर लेकर भिक्षा माँगते फिरते हैं, अतः भाग्य का लिखा नहीं मिटता- 

सीमन्तिनी यस्य गृहेऽन्नपूर्णा त्रिलोकरक्षां कुरुतेऽन्नदानैः।

भिक्षाचरः सोऽपि कपालपाणिर्ललाटलेखो न पुनः प्रयाति ।। 

करील-वृक्ष में यदि पत्ते नहीं हैं, तो इसमें वसंत का क्या दोष? उल्लू यदि दिन में नहीं देख पाता, तो सूर्य का क्या दोष? वर्षा का जल यदि पपीहे के मुख में नहीं पड़ता, तो मेघ का क्या दोष? विधाता ने जो पहले भाग्य में लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है? 

पत्रं नैव यदा करीलविटपे दोषो वसन्तस्य किम्।

नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्।

वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्।

यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः ।। 

-भर्तृहरि भाग्य यदि साथ नहीं दे रहा है, तो धन के लिए बहुत दौड़-धूप मचाना व्यर्थ है। भाग्य के बिना केवल दौड़धूप से ही यदि लक्ष्मीजी प्राप्त होतीं, तो बराबर दौड़ते रहनेवाला कुत्ता भी धनी हो जाता –

मा धाव मा धाव विनैव दैवं,

नो धावनं साधनमस्ति लक्ष्म्याः ।

चेद्धावनं साधनमस्ति लक्ष्याः

श्वा धावमानोऽपि लभेत लक्ष्मीम्॥ 

भाग्य की रेखा अमिट है। जो जन्मपत्र में अंकित है, आखिर उसे कौन मिटा सकता है? करम की गति टारे नहीं टर सकती है –

करम गति टारे नाहि टरी।

मुनी बसिष्ठ-से पंडित ज्ञानी सोच के लगन धरी,

सीता-हरन, मरन दसरथ को बन में बिपति परी।      -कबीर

किंतु, गोस्वामी तुलसीदास अकर्मण्यता की इस दलदल में, भाग्यवाद के इस भँवर में पड़े मानवों के बीच कर्मवाद का पांचजन्य फूंकते हैं; उनमें ऐसी शक्ति देते हैं कि वे इन अगति लानेवाली प्रवृत्तियों का पूर्णतः उच्छेद कर सकें। वे कहते हैं कायर मनुष्यों के लिए एक ही आधार है, आलसी मनुष्यों के लिए एक ही रहस्य है-कर्मठता, अर्थात् उद्योग ! कहा गया है कि उद्योगी पुरुषसिंह लक्ष्मी का उपार्जन करता है, परंतु कायर मनुष्य भाग्य के भरोसे बैठा रहता है, अतः भाग्य को ठोकर मारकर उद्योगी पुरुष अपने कार्य में दृढ़ता से निमग्न हो जाता है और यदि फिर भी उसे सफलता नहीं मिलती, तो वह उसे भाग्य का नहीं, वरन् अपनी कार्यपद्धति का दोष मानता है- 

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी

दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।

दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या 

यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोऽत्र दोषः ।    -भर्तृहरि 

जो व्यक्ति भाग्य के भरोसे बैठा रहता है, उसका भाग्य भी बैठा रहता है और, जो हिम्मत बाँधकर खड़ा हो जाता है, उसका भाग्य भी उठ खड़ा होता है। भाग्य कुछ बना-बनाया नहीं मिलता, वरन् उसके निर्माता तो हम स्वयं हैं। जैसा डिजरायली ने कहा है 

We make our fortunes and call them fate.

अकबर ने कहा है- 

वही कानूनेफितरत है, जिसे तकदीर कहते हैं। 

जिसे किस्मत समझते हैं, वो तदवीरों का हासिल है।

बरतन रखने से उतना नहीं घिसता, जितना आदमी आलस में पड़ा रहने से घिस जाता है। उसकी सारी कार्यशक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और वर्षों से पड़े निरर्थक यंत्र की तरह जंग से जाकड़ हो जाता है। 

अतः, जब तक हम आलस नहीं छोड़ेंगे, तब तक हम जीवन में सफलता के स्वर्णिम सोपान पर आरूढ़ नहीं हो सकेंगे। आलसी वाजिदअली शाह की दुर्गति से क्या हम अपरिचित हैं? आलस्य के कारण ही कोई देश पराधीन होता है, उसकी क्रियाशक्ति नष्ट होती है, उसके उत्पादन और निर्माण का कार्य रुकता है और वह अवनति के गर्त में गिर पड़ता है। संसार के आज जितने भी संपन्न एवं प्रगतिशील देश हैं, सबने अपने मानसकोष से ‘दैव’ शब्द को निकाल दिया है, उन्होंने आलस्य की वर्णमाला नष्ट कर दी है और वे विश्व के समक्ष ईर्ण्य तथा पूज्य बन रहे हैं। 

हम भी अपने आलस्य का परित्याग करें और दैव का सहारा छोड़ दें। वीर तो स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करते हैं और ईश्वर स्वयं उनसे पूछकर उनकी भाग्यलिपि लिखता है 

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर के पहले

खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।      -इकबाल 

More from my site

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

13 − 2 =