देश प्रेम पर निबंध | Desh Prem Essay in Hindi

देश प्रेम पर निबंध | Desh Prem Essay in Hindi

देश प्रेम पर निबंध-Desh Prem Essay in Hindi

प्रस्तावना 

देशभक्ति पवित्र सलिला भागीरथी के समान है जिसमें स्नान करने से शरीर ही नहीं, अपितु मनुष्य का मन और अन्तरात्मा भी पवित्र हो जाती है. मातृभूमि के प्रति निष्ठा रखना मनुष्य का नैसर्गिक गुण है. जिसकी धूल में हम लोट-पोट कर पल्लवित हुए हैं. जिसने हमें रहने के लिए अपने विशाल अंक में आवास दिया, उसकी सेवा से विमुख होना कृतघ्नता है. 

देशप्रेम एक ऐसा प्रेम है जो सम्पूर्ण प्रकार के प्रेम व भक्ति से उच्च है. इसमें एक ऐसी शान्ति, मादकता व उल्लास है जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने के बाद भी युगों युगों तक प्रत्येक हृदय में जाग्रत रहकर अपनी रश्मियों से सम्पूर्ण जगत को आलोकित करता रहता है, उदाहरण के लिए माँ भारती के अमर सपूत रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, शहीदे आजम भगतसिंह व राजगुरू ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर स्वतन्त्रता की बलिवेदी को प्रज्ज्वलित कर दिया. उनके देशप्रेम को याद कर आज भी हमारे चक्षु अश्रुओं की बरसात में भीग जाते हैं. हमारे हृदय में आज भी उनके लिए श्रद्धा सुमन अर्पित हैं. ऐसी मादकता, ऐसी शान्ति, ऐसा सुख ऐसा गौरव, ऐसे प्रेम की किसे आवश्यकता नहीं होगी. देशप्रेम वह पुण्य क्षेत्र है जो अमल असीम त्याग से विलसित है. 

यह देशभक्ति का ही प्रताप था कि जो भारतीय सैनिक किसी विशेष कारणवश बर्मा (म्यांमार), जापान आदि देशों में जा बसे थे, वे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की ‘आजाद हिन्द फौज’ में शामिल हो गए. देशप्रेम वह औषधि है जो सभी औषधियों से कहीं अधिक श्रेष्ठ व अतिशीघ्र हर प्रकार के जख्मों की पीडा को चन्द क्षणों में हर लेती है. 

देशप्रेम स्वतन्त्रता पूर्व 

देशप्रेम की जो अरुणमय लालिमा स्वतन्त्रता से पूर्व थी वह आज लगभग विलुप्त हो चली है. जिस समय देश परतन्त्रतारूपी जंजीरों से बंधा था. देश पर ब्रिटिश का साम्राज्य था, उस समय लोगों के हृदय में देशप्रेम कूट-कूट कर भरा था. न जाने कितनी माताओं ने देश के लिए अपनी गोद सूनी कर दी, हजारों सुहागिनों ने अपने सिन्दूर को भारत के मस्तक पर तिलक लगाने के लिए दान कर दिए. लाखों बहनों ने देश की रक्षा के लिए राखी के पवित्र सूत्र को देश प्रेम में बाँध दिया, सिर्फ देशप्रेम के कारण वह क्रान्ति की आभा, वह उत्तेजना, वह उन्माद दिवाकर की रश्मियों में स्वर्णमय होकर उस बेला की प्रतिक्षा में सिंचित होने लगी थी. सबका रोम-रोम इस गीत की स्निग्धिता से सिहर उठा- 

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ।

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।। 

शहीदे आजम सरदार भगतसिंह, राजगुरू रामप्रसाद बिस्मिल जैसे महान देश भक्त हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए. वतन पर मर-मिटने वालों की सिर्फ यही एक तमन्ना थी कि- 

सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है । 

देखना है जोर कितना, बाजुए कातिल में है ||

स्वतन्त्रता से पूर्व देशप्रेम की लहर कण-कण से लेकर जन-जन में थी. देशप्रेम के उस रूप का बखान करने को तो आज के कवि की कलम भी तनिक सकुचाती हुई प्रतीत होती है, उस लहर का कोई छोर न था. उसका बहाव इतना तीव्र था कि भारतभूमि का एक-एक कण उसमें विलीन हो गया. न क्षुधा पूर्ति की चिन्ता, न सदन का मोह, न ममता के आँचल उस प्रेम को समेटने में समर्थ हो सके थे. उस प्रेम ने लोगों को ऐसा मदपान कराया कि पीने वालों को पात्र ही कम पड़ गए. वह ऐसा भरा हुआ कलश था कि उठाने पर देशप्रेम की बूंदें छलक पड़ती थीं. देशप्रेम रूपी आँधी में ब्रिटिश शासकों को पतझड़ का पल्लव बनाकर अपने शिकन्जे में जकड़ लिया. देश का बच्चा-बच्चा अपनी जुबाँ पर एक ही प्रेम का उच्चारण करता था. उस प्रेम का नाम था देशप्रेम. लोगों में भक्ति थी, सिर्फ एक राग याद आता था, एक ही धुन बजती थी ‘देशप्रेम’. देशप्रेम रूपी दीपक जलता था जिसके चारों ओर पतंगे नाच-नाच कर स्वयं को उस दीपक में प्रज्ज्वलित कर गौरव की स्वाँस लेते थे. ऐसा देशप्रेम का रूप था स्वतन्त्रता पूर्व. भौतिकता, सत्ता, ऐश आराम की कोई चाह न थी देशप्रेम रूपी वह उन्माद, वह मस्ती घर-घर में पूर्णमासी का चाँद था जिसकी शीतलता में स्नान कर लोग माँ भारती के आँचल में शयन करते थे. काश ऐसी बेला कभी न जाती तो कितना अच्छा होता. देशप्रेम की वह तस्वीर यदि लोगों के हृदय में यथावत् होती, तो आज पाकिस्तान, चीन और अमरीका शायद भारत के विषय में एक शब्द भी बोलने में संकोच करते. वह देशप्रेम रूपी लौ धीरे-धीरे कुछ मन्द पड़ने लगी. 

देशप्रेम स्वतन्त्रता बाद 

15 अगस्त सन् 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो न जाने किस तूफान में देशप्रेम को साम्प्रदायिकता में परिणित कर लोगों को एक-दूसरे से भिड़ने पर मजबूर कर दिया. वह देशप्रेम रूपी लौ धीरे-धीरे अंधकार के गहन में खोती जा रही थी. स्वतन्त्रता के पश्चात् कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने देशप्रेम-रूपी लौ को बुझने से रोक लिया था. 20 अक्टूबर, सन् 1962 को जब चीन ने भारत पर सहसा आक्रमण किया तो हमारे देशभक्त सैनिकों ने अपनी जान पर खेलकर अनोखे साहस और देशभक्ति का परिचय दिया था. इसके पश्चात् अभी हम इस युद्ध से उबर नहीं पाए थे कि 5 अगस्त, 1965 को पाकिस्तान ने हमारी पीठ में छुरा भोंकना चाहा, किन्तु देश के वीर सपूतों ने शत्रुओं के दाँत खट्टे कर दिए. इस प्रकार स्वतन्त्रता के बाद भी देशप्रेम लोगों के अन्दर कूट-कूट कर भरा रहा. 

स्वर्गीय श्री लालबहादुर शास्त्री ने अपने जीवनादर्श द्वारा भारत देश में देशप्रेम रूपी दीपक में त्याग रूपी घी डालकर उस ज्योति को देदीप्यमान कर दिया. माँ भारती के इस दिवाकर के अस्त होने के बाद देशप्रेम रूपी ज्योति का प्रकाश कम नहीं हुआ. लोगों ने उनकी स्मृति में इस ज्योति को जगाए रखा. इसके पश्चात माँ भारती के आँचल में किरणपूँज रूपी स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी का आगमन हुआ जिन्होंने देश को अपनी स्निग्धता से सिंचित किया. माँ भारती अपनी पुत्री के इस प्रेम से पुलकित हो उठी, किन्तु ज्योंही माँ भारती की यह किरण व्योम में विलीन हुई त्योंही भारत भूमि पर देशप्रेम रूपी लौ का आलोक कम होने लगा. लोगों में स्वार्थपरता, क्रूरता, अज्ञान जैसी भावनाएं पनपने लगीं. देशप्रेम को छोड़कर लोग अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए वतन पर मिटने वालों को भुलाकर देश की ही सम्पत्ति को मिटाने पर तुल गए. कोई साम्प्रदायिकता तो कोई जातिवाद और भाषावाद को लेकर आपस में जूझने लगे. देश की एकता और अखंडता की किसी को चिन्ता नहीं है. देश के प्रधानमन्त्री व मन्त्री आदि सत्ता के लालच में असंवैधानिक कदम उठाकर देशद्रोह करने लगे.

अभी हाल ही में पूर्व रक्षा मन्त्री माननीय मुलायम सिंह पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देने की बात कर रहे थे. उस पाकिस्तान को जिसने हमारे देश के एक महत्वपूर्ण हिस्से पर कब्जा कर रखा है, जिसने हमारे स्वर्ग जैसे कश्मीर को रणभूमि बना दिया है. कश्मीर के विलय से लेकर आज तक न जाने कितने सैनिक शहीद हुए हैं. उस पाकिस्तान को हम आर्थिक सहायता दें, ऐसा कदाचित सम्भव नहीं है. ऐसे में उस भूतपूर्व रक्षा मन्त्री को देशभक्त या देशप्रेमी कहें. यह भारत के लिए बड़ी लज्जा की बात है. यह ध्यान रहे कि हम आपस में चाहे जितना लड़ें, किन्तु जब कोई बाह्य संकट आए तो हमें आपस में एक हो जाना चाहिए. जिस समय भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी थे और उस समय चिरवन्दनीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष में थे, तो उन्होंने विदेश जाते समय यह बात कही थी कि विदेश में मेरे लिए श्री राजीव गांधी ही हमारे भारत है. स्वतन्त्रता की स्वर्ण जयन्ती की औपचारिकता को तो हमने बखूबी ढंग से निभा दिया,

किन्तु जहाँ तक देशप्रेम की बात आती है. तो शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो माँ भारती का सच्चा सपूत हो. ऐसे लोगों को क्या कहा जाए जो इस माटी में पलकर बड़े हुए हैं. अपने जीवन के न जाने कितने वसंत इस माटी में व्यतीत किए हैं उस पावन माटी को मिटाने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं होती है. हमारे देश के नेता भी इसमें पूरी तरह लिप्त हैं. देश की ही सम्पत्ति को अपनी क्षुधापूर्ति एवं स्वार्थपूर्ति के लिए देश के दुश्मनों को सौंपने में जरा भी लज्जा नहीं महसूस करते. लगभग 22 वर्ष की अवस्था में शहीदे आजम भगतसिंह ने देश की खातिर हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया था. उसी देश के युवा आज देश के साथ गद्दारी करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते हैं. यदि कोई माफिया कुछ लाख रुपए देने को तैयार हो, तो वे माँ भारती की पीठ में छुरा भोंकने से बाज नहीं आएंगे. खुदगर्जी की हद यह है कि जिस वंदेमातरम् को राष्ट्रीय तराना के रूप में ग्रहण करके हमारे अगणित वीर हँसते-हँसते काल के गाल में चले गए थे, उसको हम अब साम्प्रदायिक कहने लगे है. मानो अश्फाक सरीखे क्रान्तिकारी वीर और बादशाह खाँ सरीखे स्वतन्त्रता सेनानी न मुसलमान थे और न कुरान को जानने वाले थे. इन्हें क्या पता आनंदमठ में कितने भारतीयों के रक्त द्वारा वन्देमातरम् की रचना की गई थी? जिसके आँचल तले उन्होंने अपना बचपन व्यतीत किया है. वर्तमान समय में माँ भारती की गोद में पल रहे ऐसे-ऐसे भक्त है, जो माँ भारती के प्रति क्या कर्तव्य है, लगता है ऐसा सोचने की उनके पास क्षमता ही नहीं है.

उपसंहार 

आज हमें देशप्रेम रूपी ज्योति को प्रज्ज्वलित करने की नितांत आवश्यकता है. आज भारत में सुप्त भौंरे को जगाने के लिए एक खिले हुए कमल की जरूरत है. भारत के सुप्त भाग्य को जगाने के लिए देश को महान् कर्णधारों की आवश्यकता है. हमें अपने अमर शहीदों से यह प्रेरणा लेनी होगी. कि जिस प्रकार उन्होंने अपने प्राणों को न्यौछावर कर माँ भारती के अस्तित्व की रक्षा की थी. उसी प्रकार हमें भी कृत संकल्प और दृढ़ संकल्प होना चाहिए, क्योंकि- 

मिले खुश्क रोटी जो आजाद रहकर। 

वह है गुलामी के हलुवे से बेहतर ॥

कहने का तात्पर्य यह है कि स्वतन्त्रता के पूर्व देशप्रेम भावनात्मक कर्त्तव्य और दिल की आवाज था. स्वतन्त्रता के पश्चात् वह एक सुविचारित व्यवसाय और मनोहारी नारा बन कर रह गया है. 

प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि उसका हृदय देशप्रेम रूपी स्निग्धा से सिंचित होकर तन, मन एवं धन से देश की सेवा में लीन हो जाए. हमें अपनी मानसिकता को परिष्कृत और परिवर्तित करना होगा तभी हम सच्चे देशभक्त हो सकते हैं. 

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