पर्यावरण की सुरक्षा के भारतीय प्रयास का वर्णन कीजिए

पर्यावरण की सुरक्षा के भारतीय प्रयास का वर्णन कीजिए

पर्यावरण की सुरक्षा के भारतीय प्रयास का वर्णन कीजिए

upsc प्रश्न: पर्यावरण की सुरक्षा हेतु प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यक उपलब्धता एवं उनके उपभोग में संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है। इस कथन के आलोक में भारत में सतत विकास में पर्यावरण की भूमिका का स्पष्ट कीजिए। (250 शब्द) 

पर्यावरण बचाने के लिए जन संकल्प ज़रूरी 

आर्थिक उदारवाद के भारत में घोषित तौर पर प्रवेश के बीते 29 वर्षों के दौरान हमने अपनी निजी जीवन शैली, रोजमर्रा की जरूरतों, आकांक्षाओं और आर्थिक क्षमताओं में जो कुछ बदलाव हासिल किए हैं, कार्बन के बढ़ते उपभोग व उत्सर्जन से इनका सीधा नाता है।

मौजूदा केंद्र सरकार ने अपनी घोषणाओं में कार्बन संतुलन के प्रति संकल्प जताया है। जरूरी है कि हम भी अपनी सामुदायिक, संस्थागत व व्यक्तिगत भूमिका का आकलन करें और उन्हें अपनी आदत बनायें।

इसके लिए सर्वप्रथम हम विश्व को आर्थिकी मानने की बजाय, प्रकृति माने हर अवसर, संबंध और संसाधन को आमदनी में तब्दील कर देने की बजाय, उन्हें खुशहाली के प्राकृतिक समृद्धि सूचकांक की कसौटी पर खरा उतारने की प्रवृत्ति विकसित करें। अधिकाधिक उपभोग से जीडीपी (सकल घरेलु उत्पाद दर) भले ही बढ़ती हो, किंतु जलवायु संतुलन बिगड़ जाता है।

कचरा घटाएं, पुनर्नोपयोग बढ़ाएं

ब्रांड और क्वालिटी के नाम पर आजकल हर चीज पैक की जा रही है, पानी, बीज, मिट्टी, गोबर के उपले तक दूसरी तरफ, जबसे ऑनलाइन खरीददारी का चलन बढ़ा है, पैकेजिंग उद्योग व कोरियर वालों की वृद्धि हो रही है। इस कारण भी कूड़े-कचरे की मात्रा में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

प्रत्येक भारतीय द्वारा पॉली कचरा निकालने की मात्रा का औसत आधा किलो से बढ़कर अब 11 किलो प्रति वर्ष हो गया है। यदि अपने घरों में पैदा हो रहे गीले-सूखे कचरे को ही अलग अलग रखने लग पाएं, तो उनका ठीक से निष्पादन संभव हो जाय। गीला कूडाजैविक खाद बन हमारे खेत-बागानों को उत्पादकता बढाए, रासायनिक व उर्वरकों कीटनाशकों का उपयोग स्वत: घट जाएगा आज जरूरत इसी की है। 

गांव सहेजें, नगर बचायें 

मध्य एशिया से लेकर अफ्रीका तक करीब 40 देशों के लोग अपनी जड़ों से उजड़कर, खासकर यूरोपीय देशों में जा रहे हैं।

यूरोपीय नगरों के मेयर चिन्तित हैं कि उनके नगरों का क्या होगा। कई देशों के बीच तनातनी और युद्ध की स्थिति है। इनके मूल में पानी की कमी और उसके लिए दूसरे के संसाधनों पर कब्जे की घटनायें है। नगरीय विस्तार को हम नहीं रोक सकते। लेकिन लोग उचित नियोजन तो कर सकते हैं। 

कार्बन फुटप्रिंट ने कमी

ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती के तापमान में असामान्य वृद्धि और मानवजनित गैसों का उत्सर्जन बेतहाशा बढ़ने से लोगों की आजीविका पर बहुत बुरा असर रहा है।

औद्योगिक युग से पहले कार्बन डाइआक्साइड का उत्सर्जन 280 पीपीएम था जो आज 400 पीपीएम के स्तर पर पहुंच गया है। परिणामस्वरूप जलवायु में बदलाव आया है,पारिस्थितिकीय प्रणाली की उत्पादकता में कमी और पानी का आधार घट गया है। 

मानवजनित गतिविधियों जैसे बिजली क उत्पादन कर उद्योग आदि में जीवाश्म ईंधन जलाने, पानी के स्रोतों का होने और शहरी गतिविधियों से धरती के वायुमंडल में हाउस गैसों की मात्रा बहुत अधिक बढ़ गयी है और हर कार्बन डाइ आक्साइड का हिस्सा 72 प्रतिशत के बराबर है। पारिस्थितिकीय प्रणाली की गतिविधियों को बरकरार रखने लिए वायुमंडल से कार्बन डाइ आक्साइड का अवशोषण कर ग्रीन हाउस गैसों की उपस्थिति को संतुलित करना जरूरी हो गया है।

कार्बन को अवशोषित करने में वनों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है और वे करीब 45 प्रतिशत कार्बन को अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम करने में मदद करते हैं। 

पश्चिमी घाट जैव विविधता के 36 वैश्विक केन्द्रों में से एक हैं और इस क्षेत्र के वन वायुमंडलीय कार्बन का अवशोषण करते हैं जिससे दुनिया की जलवायु को सामान्य बनाए रखने में मदद मिलती है। इस क्षेत्र में 4,600 प्रजातियों के फलवाले पौधे पाये जाते हैं (38 प्रतिशत स्थानिक), 330 प्रकार की तितलियां (प्प प्रतिशत स्थानिक), 156 सरीसृप (62 प्रतिशत स्थानिक), 508 पक्षी (4 प्रतिशत स्थानिक), 120 स्तनपायी (12 प्रतिशत स्थानिक), 289 मछलियां (41 प्रतिशत स्थानिक) और 135 उभयचर (75 प्रतिशत स्थानिक) पायी जाती हैं। 

यह क्षेत्र 1,60,000 वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है और इसे भारत का वाटर टावर माना जाता है क्योंकि अनेक धाराएं यहां से निकलती हैं और लाखों हेक्टेयर भूमि से जल की निकासी करती हैं। 

वनों की पारिस्थितिकीय प्रणाली 

पश्चिमी घाट की नदियां प्रायद्वीपीय भारत के राज्यों के 24.5 करोड़ लोगों को पानी और भोजन की सुरक्षा उपलब्ध कराती हैं। इस क्षेत्र में ऊष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों के साथ-साथ आर्द्र पर्णपाती वन, झाड़ीदार वन, वनखंड और सामान्य व अत्यधिक वर्षा वाले सवाना वन हैं जिसमें से 10 प्रतिशत वन क्षेत्र ही कानूनी संरक्षण के अंतर्गत है।

वनों की पारिस्थितिकीय प्रणाली की कार्बन अवशोषित करने की क्षमता का आकलन

1. मानक बायोमास परीक्षणों पर आधारित लिखित साहित्य;

2. कर्नाटक के पश्चिमी घाट वाले इलाके के वनों से ट्रांसेक्ट आधारित क्वाडेंट सैम्पलिंग तकनीक से एकत्र किये गये क्षेत्र आधारित मापनों से किया गया। इस क्षेत्र में 1985 में 16.21 प्रतिशत क्षेत्र में सदाबहार वन थे जो 2018 में 11.3 प्रतिशत क्षेत्र में ही सिमट कर रह गये। यहां क्रमशः 17.92 प्रतिशत, 37.53 प्रतिशत, 4.88 प्रतिशत क्षेत्र बागान, कृषि, खनन और निर्मित इलाके के अंतर्गत है।

3.पश्चिमी घाट के पूर्वी केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में कृषि और निर्मित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बदलावों को देखा जा सकता है। अनुमान है कि पश्चिमी घाट में 2031 तक सदाबहार वन क्षेत्र सिमट कर 10 प्रतिशत ही रह जाएगा जिससे पानी और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो जाएगा।

कार्बन अवशोषण 

पश्चिमी घाट की कार्बन अवशोषण क्षमता का मात्रात्मक आकलन कर लिया गया है जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि इस क्षेत्र के वन बायोमास के अनोखे भंडार हैं।

यह आकलन वायुमंडलीय कार्बन (मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न) और ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम करने में वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करता है।

पश्चिमी घाट के दक्षिणी और मध्यवर्ती भागों में घने स्थानीय वन हैं और यहां की भूमि कार्बन से समृद्ध है (0.42 एमजीजी)। २ अगर उत्पादकता के जरिए होने वाली कार्बन क्षति को छोड़ दिया जाए तो कुल वृद्धिशील कार्बन की मात्रा 37507.3 जीजी बैठती है। पश्चिमी घाट में कार्बन अवशोषण क्षमता में होने वाले बदलाव का आकलन भूमि उपयोग-

1 संरक्षण परिदृश्य और

2 रोजमर्रा की गतिविधियों के परिदृश्य में भूमि संभावित उपयोग के आंकड़ों के आधार पर किया जाता है। 

कार्बन फुटप्रिंट

भारत में जहां कार्बन डाइ आक्साइड उत्सर्जन 3.1 एमजीजी (2017) और प्रति व्यक्ति कार्बन डाइ आक्साइड उत्सर्जन 2.56 मीट्रिक टन के बराबर है और यहां के कार्बन फुटप्रिंट में ऊर्जा क्षेत्र (68 प्रतिशत), कृषि क्षेत्र (19.6 प्रतिशत), औद्योगिक प्रक्रियाओं (6 प्रतिशत) और भूमि के उपयोग में बदलाव (3.8 प्रतिशत) से होने वाले उत्सर्जन तथा वानिकी (1.9 प्रतिशत) का योगदान है।

भारत ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता वार्ता में 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 33-35 प्रतिशत कमी करने की वचनबद्धता व्यक्त की थी। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि कार्बन कैप्चर पर तत्काल अमल किया जाए।

इसके अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा और चिरस्थाई ऊर्जा विकल्पों पर बड़े पैमाने पर अमल करके कार्बन मुक्ति का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिए

1 पारिस्थितिकी की दृष्टि से नाजुक क्षेत्रों की हिफाजत की जानी चाहिए:

2 प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे के सिद्धांत के अनुसार लगातार ज्यादा उत्सर्जन करने वालों को हतोत्साहित किया जाए। 

3 क्लस्टर आधारित विकेन्द्रित विकास दृष्टिकोण लागू किया जाए; और 

4 उत्सर्जन में कमी के लिए प्रोत्साहन दिये जाएं।

कार्बन ट्रेडिंग की अवधारणा ने कार्बन को अवशोषित करने की भारतीय वनों की क्षमता के महत्व को मौद्रिक रूप में साबित कर दिया है।

पश्चिमी घाट के वनों की पारिस्थितिकीय प्रणाली 30 डालर प्रति टन की दर से 100 अरब रुपये मूल्य (1.4 अरब डालर) की है।

कार्बन क्रेडिट प्रणाली और सहभागियों की भागीदारी को सुचारु बनाने से वनों का दुरुपयोग काफी हद तक कम हो जाएगा और किसानों को पेड़ लगाने तथा दूसरे बेहतरीन उपयोग के लिए जमीन का इस्तेमाल करने की प्रेरणा मिलेगी।

कृषि में नवाचार-

विकसित और विकासशील दोनों देशों के अनुभव बताते हैं कि कारखाने के श्रमिकों और कर्मचारियों जैसे प्रौद्योगिकी के उपयोगकर्ताओं के नवाचारों ने प्रौद्योगिकी और उत्पादकता में सुधार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

नवाचार की परिभाषा के अनुसार ऐसे नए उत्पादों तथा सेवाओं का विकास करना है जिन्हें क्षेत्र विशेष में अब तक नहीं अपनाया गया है। अन्य पुरस्कार विजेताओं ने भी फसलों को उगाने में नवीनतम विधियों का इस्तेमाल शुरू किया। 

 

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