देशभक्ति पर निबंध-Essay On Patriotism In Hindi

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देशभक्ति पर निबंध-Essay On Patriotism In Hindi

देशभक्ति पर निबंध- जिस देश की धरती प्रतीक्षा के . पलक-पाँवड़े बिछाए हुए मातृकुक्षि से अवतरण के पश्चात हमारे स्वागत-संभार के लिए आकुल-व्याकुल रहती है, अपनी स्वच्छ जलवायु से हममें नवजीवन का संचार करती है, अपने रजकणों का उबटन लगाकर हमारी पेशियों को सबल-सशक्त बनती है तथा अन्न-फल-दुग्ध आदि प्रदान कर हमारा पोषण-वर्द्धन करती है, वह हमारी जन्मदात्री माता से कम महत्त्व की. अधिकारिणी हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। माँ यदि जन्मदात्री है, तो देश की धरित्री जीवनदात्री ।

अतः, हमारे मन-प्राणों में उनके प्रति आदर के फूल न खिलें, पूजा के दीप न जलें, तो यही अस्वाभाविक है। यही कारण है कि हमारे तपःपूत वैदिक ऋषियों ने अथर्ववेद में मंत्रोच्चारण किया था—’माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’-पृथ्वी हमारी माता है और इसके निवासी हम पुत्र । 

ऐसी स्थिति में पृथ्वी केवल मिट्टी का ढेला नहीं रह जाती है, वरन वह एक महामहिमामयी पूजनीय देवी बन जाती है। उसके भूगोल की सारी तफसीलें इबादत से भर जाती हैं। नदी, जंगल, पहाड़, ऋतु, वनस्पति, सभी में उसके अनुराग की गंध मालूम पड़ने लगती है, मन में हर वक्त ऐसा भाव बना रहता है कि देश और हममें अविनाभावसंबंध है, हमारा जीवन और मरण देश के हित-अनहित पर आश्रित है। 

विदेशी आक्रमणों से अपने देश को बचाने में सदा हमारे वीरों ने बलिदान किया है। मुगल-शासन की नींव हिला देने के लिए महाराणा प्रताप ने घास की रोटियाँ खाईं, चेतक की पीठ को बिछावन बनाया, शिवाजी और छत्रसाल वन-वन की खाक छानते रहे और गुरु गोविंदसिंह ने स्वयं अपने बच्चों का बलिदान किया। अँगरेज-शासन के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, वीर कुँअरसिंह, सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गाँधी ने जो कष्ट सहे हैं, क्या उनसे हम अपरिचित हैं? जलियाँवाला-बाग के जालिम डायर को मौत के घाट उतारनेवाले महान वीर ऊधमसिंह जैसों से ही मातृभूमि की कोख जुड़ाती है। 

सच्चा देशभक्त अपना सर्वस्व अपनी मातृभूमि के पावन चरणों पर न्योछावर कर देता है। उसे अपनी मातृभूमि की रक्षा के बीच न तो वनिता की ममता सताती है, न सुत-स्नेह की जंजीर ही उसके पाँवों में उलझन बनती है। चाहे हिमालय की शिलीभत कर देनेवाली चोटियाँ हों या हिंद महासागर की तूफानी लहरें-वह निर्लोभ भाव से अपनी जान हथेली पर लेकर मातृभूमि पर पहरा देता रहता है। उसे न राजभवन का सुख लुभाता है, न काँटों की चुभन सताती है। उसे न तो उपाधियों की मगतष्णा 

मोहती है, न प्राणदंड का हलाहल ही भयभीत करता है। देशरक्षा के दीवाने तापा के मुख पर पाँव रखे हुए, न मालूम कितने वेशों में कितने देशों की परिक्रमा किया करते हैं। स्वदेश को गलामी की बेडियों से मक्त करने के लिए महान देशभक्त सुभाषचद्र बोस की अंगारों पर लिखी जीवन-कहानी को जो जानते हैं, वे ही इस कथन का सत्यता पर विश्वास कर सकते हैं। 

ऐसे देशभक्त मातृभूमि का अनादर कभी बर्दास्त नहीं कर सकते। यदि देश स्वाधीन हो, यदि देश में खुशहाली हो, तो उनके ओठों पर सौ-सौ वसंत मुस्कराते हैं; कितु याद उसका और किसी की वक्रदृष्टि हुई, तो उनके प्राणों में तूफान मचलने लगता है, आखों में अंगार दहकने लगता है।  

ऐसे ही देशभक्तों से किसी देश का गौरव अक्षुण्ण रहता है। हमारे देश की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाने में जिन वीरों ने अपनी आहुतियाँ दीं, उनमें सरदार भगतसिंह, खुदीराम बोस, भूपेंद्रनाथ सान्याल, गणेशशंकर विद्यार्थी, बाघा यतीन, अशफाकउल्ला खाँ इत्यादि के नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। ऐसे वीरों का शोणित स्वतंत्रता-वृक्ष के बीज का काम करता रहा है। 

वस्तुतः, जब-जब देश पर संकट का इंद्रकोप होता है, तब-तब देशभक्त ही अपनी छिगुनी पर गोवर्धन धारण कर उसकी रक्षा करते हैं। जब अनाचारों का हलाहल बहने लगता है, तब वे नीलकंठ की भाँति हँसते-हँसते उनका पान कर जाते हैं। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ को चरितार्थ करनेवाले देशभक्तों की उत्कट गंध तो मलयगिरिचंदन की ऐसी गंध है, जो पार्श्ववर्ती निर्गंध-निस्सार वेणुविटपों को भी गंधमय कर देती है। इतिहास में जहाँ-कहीं दपदप चाँदनी है, वस्तुतः इन्हीं देशभक्तों के बलिदानी चरित्रों से फूटनेवाली चाँदनी है। 

ऐसे ही देशभक्तों के चरणरज से कारागार अपने को सुरलोक समझ लेता है, देवता उनपर नंदनकानन से सुमन-वृष्टि कर अपने को धन्य मानते हैं, कलकल-छलछल करती सुरसरिता तथा तांडवनृत्य में रत रुद्र उनका जयजयकार करते हैं। 

सचमुच, जो व्यक्ति देश के लिए अपने को सूली के तख्ते पर चढ़ा देता है, उसे देश भगवान की तरह पूजता है, उसकी आरती उतारता है, उसकी गाथाओं का पाठ करता है तथा उसकी स्मृति को ताजा रखने के लिए उत्सव मनाता है 

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