भारतीय राजनीति की रूपरेखा का निर्धारण पर निबंध

भारतीय राजनीति की रूपरेखा का निर्धारण पर निबंध

भारतीय राजनीति की रूपरेखा का निर्धारण-Delineating the Contours of Indian Polity

ठीक उसी समय, जबकि लगता है कि देश में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, कोई-न-कोई ऐसी नकारात्मक घटना घटित होती है जो सब कुछ को गड़बड़ कर देती है। हाल में जो वस्तु एवं सेवा कर कानून (Goods and Services Act) पारित हुआ और एक खुशनुमा माहौल बना, वो अब हवा हो गया है क्योंकि अर्थतंत्र से ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं। फिर से विनाश की भविष्यवाणी करने वाले शोर मचाने लगे हैं, तंत्र में घुन लग जाने का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि सारे नकारात्मक राजनीतिक-आर्थिक घटनाक्रम देश पर छाए संकट के चिह्न  हैं|

भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, सांप्रदायिकता, भाषायी उन्माद (अतिवाद), आतंकवाद, उग्र राष्ट्रवाद, अलगाववाद और इसी तरह की बाकी सभी सजात समस्याएँ दर्शाती हैं कि यदि जल्द-से-जल्द कछ न किया गया तो देश का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा, लेकिन रुकिये और जरा सोचिये। क्या हमारे बुद्धिजीवी वर्ग तथा विशेषज्ञ मंडली को इतनी निराशाजनक तस्वीर पेश करनी चाहिए? वाल्तेयर की क्लासिक कृषि कैंडिडो में अति आशावादी चरित्र डॉ पैन्गलोस के ही समान मैं भी इस निराशावाद को स्वीकार नहीं करता। बेशक, इस बढ़ते सड़ांध को रोकने के लिए कदम उठाये जाने चाहिए, लेकिन पूरे परिदृश्य में ऐसा कुछ भी अशोभनीय, अवास्तविक या अस्वाभाविक नहीं है जो इस देश के अस्तित्व पर ही काली छाया बन जाए।

 जब 1947 में भारत ने राज्य-राष्ट्र के रूप में अपनी महायात्रा प्रारंभ की थी, तो उस समय भी कई शंकालु लोग थे जो मानते थे कि देर-सवेर विशालकाय तथा विविधाओं से भरपूर ग्रस्त भारत देश बिखर जाएगा। इन शंकालुओं के सरगना सेलिग हैरिसन थे जिन्होंने भविष्यवाणी की थी कि भारत का बाल्कनीकरण हो जाएगा, लेकिन भारत लड़खड़ाते हुए भी कई संकटों को पार करता गया जिसमें आक्रामक पड़ोसी देशों के भारत भूमि पर आक्रामक मंसूबे तथा 26 जून, 1975 को लगी इमरजेंसी में प्रतिबिंबित अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ थीं। लेकिन राष्ट्र इन संकटों से लोहा लेता हुआ वापस पटरी पर आ गया। सभी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उसके अंदर पुनरुज्जीवित होने की इच्छा थी। 

इससे देश की संसदीय लोकतंत्र पर जो लोग छींटाकशी करने में लगातार लगे थे वे बैकफुट पर आ गए। ये महानुभाव सोचते थे कि एक अशिक्षित विपन्न, दैत्याकार भारत को ‘बच्चों के दस्ताने वाले’ लोकतंत्र नहीं बल्कि लौहवत शासन से प्रभावकारी ढंग से शासित किया जा सकता था, लेकिन वे निश्चित रूप से स्मृतिलोप के शिकार थे क्योंकि उनका स्वच्छंदतापूर्वक अपने निर्जन मंचों पर होना भी लोकतंत्र के मौजूद होने के कारण ही था। एक बार जब उनसे ये अधिकार छीन लिए गए तो उन्हें लोकतंत्र का महत्व समझ में आया और वे फिर से उसकी बहाली की माँग करने लगे। 

वास्तव में देश के विकास तथा सुरक्षा जैसे अहम बातों की जाँच करते समय उसकी क्षमताओं, मजबूरियों जिम्मेवारियों शक्तियों, तथा संसाधनों को भी आंकलन में लेना होगा, साथ ही कुत्सित तुलना करने से बचना होगा। इस तरह राज्य-राष्ट्र से लेकर राष्ट्र-राज्य तक की भारत की विकास यात्रा की बात करते हुए इसकी तुलना संयुक्त राष्ट्र अमेरिका तथा ब्रिटेन जैसे ही प्रथम पंक्ति के विकसित देशों से नहीं करनी चाहिए। हालांकि उन्हें अपना आदर्श कम-से-कम कुछ अर्थों में सदा मानना चाहिए। ।

अत: जब 15 अगस्त, 1947 को भारत ने स्वतंत्रता हासिल की तो उसने अपने औपनिवेश शासकों से न केवल एक जर्जर अर्थव्यवस्था विरासत में पाई थी, बल्कि सामाजिक ताना-बाना भी जर्जर हो चला था। उस समय औद्योगिक आधार बेहद कमजोर था, आबादी विशाल थी जिसके पास बेहद खराब सामाजिक तथा भौतिक संरचना थी, देश पूर्णत: कृषि आधारित था और अपनी पहचान बनाने वाली सीमा रेखाओं को तैयार ही कर रहा था। पर भारत इसमें अकेला नहीं था। यूरोप, अमरीका, अफ्रीका तथा एशिया में ऐसे अनेकों देश जो औपनिवेशिक गुलामी से अभी-अभी मुक्त हुए थे और भारत के ही विकास स्तर के थे। जब इन देशों से भारत की तुलना करते हैं तो भारत इनमें सबसे आगे लगता है। 

विकास की अंधी दौड़ जैसे ये देश कुलाँचे भरते हुए आगे भाग रहे थे, तो कई पथभ्रष्ट हो गए अपने स्वतंत्रता-संघर्ष के जो आदर्श एवं मूल्य इन्होंने बनाए थे उन्हीं के खिलाफ चले गए नतीजा था कि कई देशों में सैनिक तख्ता पलट शाखा तथा अधिनायकवाद आम बात हो गई। परंतु भारत लोकतंत्र की आशा का दीप बना रहा, भले ही कितना भी अशांत रहा। वह कभी-कभार की चिनगारियों से खुद को सफलतापूर्वक बचाता रहा और फलता-फूलता रहा। इसने आपातकाल रूपी दैत्य का भी सामना कर लिया। इसने आर्थिक विकास के हिंदू दर को भी पार कर लिया शीतयुद्ध काल के बुरे दिनों में एक स्वतंत्र आर्थिक विकास का रास्ता पकड़ लिया।

 कोई तर्क दे सकता है कि इन संसाधनों के रहते हुए भी भारत अभी भी भुखमरी से जूझ रहा है। अगर तस्वीर तो आतंकवाद अलगाववाद, सांप्रदायिकता, धर्मान्धता किस बात का संकेत कर रहे हैं? भारतीय राज्य व्यवस्था को इन खतरों से जो चुनौतियाँ मिल रही है उससे इनकार नहीं किया जा सकता। पर ये खतरे इतने विशाल नहीं है कि व्यवस्था को ही खंडित कर दें। इन संकटों से सफलतापूर्वक निबटने की असफलता पर चोट करने से बेहतर होगा कि हम इनके कारणों का पता लगाएँ और इनके समाधान प्रस्तुत करें। 

सन् 1947 के पूर्व भारत एक राज्य लगभग नहीं था, राष्ट्र-राज्य तो बिल्कुल ही नहीं। भारत की एक अवधारणा सदैव रही। परंतु वह एक स्वतंत्र, सार्वभौम देश (राज्य) के तामझाम से युक्त एक वास्तविकता नहीं थी। एक अवधारणा के रूप में भारत सदैव था। नेहरू को इसे गढ़ना नहीं था उन्हें बस उसकी खोज करनी थी जो कि उनकी पुस्तक के शीर्षक ‘भारत एक खोज’ से ही स्पष्ट है। भारत की औपनिवेशिक सरकार ने उसका जितना विकास किया उससे अधिक विनाश किया। ऐसे में अपने मामूली संसाधनों तथा अनेकानेक समस्याओं/बंधनों के बावजूद भारत पिछले पाँच दशकों से अखंड रहा है, यही अपने आपमें एक उपलब्धि है। 

जो समस्याएँ इतनी गंभीर लगती हैं वे बस इस कारण कि भारत इतने वर्षों में एक लोकतांत्रिक राज्य के रूप में मौजूद रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के परिचालन ने अलोकतांत्रिक शक्तियों को खुला छोड़ा है जो बेलगाम हो गई हैं। इतनी कि व्यवस्था का तंत्र ही खतरे में लग रहा है। लेकिन यह तो लोकतंत्र के स्वभाव में ही है। 

कल तक जो स्याह इलाका जैसा लगता था। उसे भिखारियों का देश, सपेरों का देश कहकर अपमानित किया जाता था। कहा जाता था कि यह देश ताश के पत्ते हैं जो कभी भी बिखर जाएँगे। पर भारत अपने को समेट कर रखे हुए है और इसके आलोचकों के मुँह पर कालिख पुत गई है।

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