भारत में विसंस्थानीकरण की समस्या पर निबंध-Essay on the problem of deinstitutionalization in India

Essay on the problem of deinstitutionalization in India

भारत में विसंस्थानीकरण की समस्या (Tackling the Problem of Deinstitutionalisation in India) 

प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति जो एक स्वतंत्र, उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूलभूत तत्व होती है, इन बीते सालों में देश के करोड़ों लोग को अपना भागीदार बना चुकी है और इस भागीदार बनाने की प्रक्रिया के साथ-साथ एक विसांस्थानिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई जिसमें समस्या को बद्तर बना दिया है। 

विसांस्थानिकीकरण की समस्या पर राजनीतिक विज्ञानियों ने काफी विमर्श किया है। उनमें अतुल कोहली, रजनी कोठारी, सुदीप्तो कविराज, पार्थो चटर्जी, पॉलब्रास, रॉबर्ट स्टर्न, तथा अन्य लोग शामिल रहे हैं। इन विद्वानों ने इस पर ध्यान दिया है कि कैसे इस देश के राजनीतिक वर्ग ने तंत्र के संस्थानों पर लगातार प्रहार कर उसे खोखला बनाया है। दलीय व्यवस्था, न्यायपालिका तथा अन्य सभी संस्थाएँ जो तंत्र के सुचारू रूप से कार्य के निष्पादन में सहायक होनी चाहिए थीं और जिन्हें विकास के एजेंडे को आगे ले जाना चाहिए था, वे सब अनुत्पादक तथा निर्जीव बना दी गई। 

इन संस्थाओं को बेहतर तरीके से काम करते हुए नेतृत्व को बल प्रदान करना चाहिए था ताकि समस्याएँ सुलझें और समाज को लाभ पहुँचे। परंतु इनका कमजोर होते जाना इन समस्याओं को और विकराल बनाता गया है और हममें इनसे निबटने की ताकत नहीं बची है। चुनावों में वोटों की फसल काटने के अपने प्रयास में राजनीतिक दलों ने न केवल लोकतांत्रिक चेतना से समझौता कर लिया है जिससे हम अपने संवैधानिक ढाँचे को न समझ पाएँ बल्कि उन्होंने वोटरों को उन सभी संकीर्ण तथा आदिम आधारों पर गोलबंद कर लिया जो दबाव अत्यधिक हो जाने पर दैत्याकार रूप धारण कर लेंगे। 

लेकिन संकीर्ण पहचानों का प्रयोग समाज में राजनीति को विधेय (predicating) के लिए बेहद अनुकूल के विभिन्न स्तर तथा हिस्से विकास के अलग-अलग धरातलों पर अवस्थित है तथा भ्रष्टाचार और ऐसे अन्य कारणों जैसे तंत्र का विसंस्थानीकरण से भी नेतृत्व को असली समस्याओं से निबटना कठिन हो जाता है। यहाँ राजनीतिक तंत्र के लिए आदिम पहचानें तथा अन्यायपूर्ण विकास प्रक्रियाएँ आसान खुराक मुहैया करा देती है। नैतिक पतन आत्ममंथन की गुंजाइश भी खत्म कर देता है जो, ऐसे घटिया राजनीति के मार्ग में बाधक बन खड़ा होता। हाल के सरकारी सर्वेक्षण के मुताबिक राष्ट्रीय साक्षरता स्तर 77% है। ऐसे में ये समाज पर्याप्त रूप से साक्षर तथा जागरूक नहीं है कि बेलगाम राजनीतिज्ञों के लोकवादी प्रचार के शिकार न हो जाएँ। 

पर जैसा कि ऊपर कहा गया है, बहुत निराश होने की भी जरूरत नहीं है। हमारे जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश को राज्य-राष्ट्र से राष्ट्र-राज्य बनने की अपनी यात्रा में बहुत सी शुरुआती समस्याएं आएँगी। भारत सदा से एक राज्य से अधिक एक सभ्यता रहा है। भारत की अवधारणा भले ही अमूर्त हो, पर 1947 में भारत को एक राज्य के रूप में जाना गया और तब से लेकर आज तक इसकी अथक कोशिश रही है कि यह अपने को एक राष्ट्र-राज्य में रूपांतरित कर दे। 

इस देश का संविधान इसी उद्देश्य से ऐसा बनाया गया था। अब तक के अनुभव से हम कह सकते हैं कि यह हमारे बड़े काम आया है अपनी अनेक कमियों के बावजूद, समय के साथ संगति बनाए रखने के लिए जिस तरह का लचीलापन तथा अनुकूलन इसने दिखाया है इससे भारत की सत्तामूलक समस्याओं से निबटने की बहुत हद तक मदद मिली है। भारत अपने जुड़वाँ भाइयों की तुलना में खुशनसीब था कि इसके पास एक स्वप्नदर्शी नेतृत्व था, जो अपेक्षाकृत अधिक समर्पित था, कि इस नवजात भारत राज्य को मजबूत आधार मिल सके। उनकी दीर्घायुता ने इस काम में मदद ही की।

हम महसूस करते हैं कि आज धीरे-धीरे पर अनवरत गति से भारतीय राज्य खुद को मजबूत बना रहा है और यह जिन समस्याओं में उलझा हुआ है वे समय के साथ खत्म हो जाएँगी। इसके संकेत भी दिखाई दे रहे हैं। लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था के सात दशकों में एक जीवंत नागरिक समाज का जन्म हो चुका है जो सूचना एवं संचार के उफान के इस युग में और तेजी से विकास कर रहा है। बढ़ती आशाओं की क्रांति कई अलग-अलग छटाएँ दिखा रही है और खुद को विविध रूपों में अभिव्यक्त कर रही है जो नागरिक समाज की बढ़ती मुखरता से संकेतित हो रहा है। इस मुखरता को जनहित याचिका जैसे उपायों से मदद मिल रही है या फिर अनेक गैर सरकारी तथा सिविल सोसायटी संस्थाओं की सक्रियताओं की भी ये संस्थाएँ जागरूक और आत्म सचेत सामाजिक नेतृत्व द्वारा निर्देशित हो रही हैं। 

नियंत्रण एवं संतुलन की समस्थिति धीरे-धीरे विकसित हुई है। इसने किसी एक प्रवृत्ति या शक्ति को इस हद तक पनपने से रोका है जिसमें कि अन्य प्रकृतियाँ उभरकर सामने न आ सकें। असमानता एवं संस्तरण वाले हमारे समाज में जब राज्य विफल होता है, तब लोगों को अपने ही संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। एक प्रतियोगी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में तब अस्मिता अथवा पहचान की राजनीति सुलभ साधन बन जाती है, एक ऐसी व्यवस्था में लोगों के पास यही साधन बचता है जो सिरों की गिनती पर सब कुछ निर्भर है।। 

हम शिद्दत से महसूस करते हैं कि पंचायती राज संस्थाएँ जो शक्ति के विकेंद्रीकरण का लक्ष्य लेकर चलती हैं वे अंततोगत्वा शक्ति का तृणमूल आधार तक प्रसार देखेंगी और लोगों को व्यवस्था में एक हिस्सेदारी दिलवाएँगी। एक बार यह हो जाए तो भारतीय राजनीतिक व्यवस्था कुछ सीमित लोगों की सनक तथा कल्पनाओं में कैद नहीं रह जाएगी, ये लोग चाहे राजनीति के हों, चाहे अफसरशाही के या अन्य कहीं के। आखिर, किसी ने सही कहा है कि आप कुछ लोगों को सब समय मूर्ख बना सकते हैं सारे लोगों को कुछ समय के लिए मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन निश्चित रूप से सभी लोगों को सारे समय मूर्ख नहीं बना सकते। असली बात ये है कि समाज में इतने सारे हित सक्रिय हैं कि कोई भी पीछे छूटा रहना नहीं चाहता। सत्ता की इस लड़ाई और बंदरबाँट में सभी सक्रिय रह कर एक तरह का संतुलन बना देते हैं। सिविल सोसायटी न्यायपालिका और मीडिया की सक्रियता उनमें से सक्रियता का बस एक उधारण हैं|

हमारे राज्य-निर्माण प्रक्रिया के कई नकारात्मक पहलू तो हैं. परंत तथ्य यह है कि हम मजबूत ही होते आए हैं। यह अपने निर्माण क्रम के विरोधाभासों को सुलझाते रहने से संभव हुआ है। एक जीवंत सक्रिय लोकतंत्र विकासमान अर्थव्यवस्था के साथ विश्व परिदृश्य पर अपना वांछित स्थान देरे-सबेर प्राप्त ही कर लेगा और इसके कई संकेत भी मौजूद हैं। 

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