दहेज़ प्रथा पर निबंध | दहेज दानव पर निबंध Essay on Dowry System in Hindi

दहेज़ प्रथा पर निबंध

दहेज़ प्रथा पर निबंध | Essay on Dowry System in Hindi दहेज-प्रथा अथवा भारतीय समाज में विद्यमान दहेज-प्रथा की समस्या (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2005) अथवा दहेज दानव (यूपी लोअर सबार्डिनेट मुख्य परीक्षा, 1998

दहेज प्रथा, जो कि प्राचीन भारत में एक स्वस्थ सामाजिक प्रथा के रूप में प्रचलित थी, वह आज अभिशाप जैसी कुप्रथा के रूप में सामने है। दहेज प्रथा आज एक सामाजिक कलंक बन गई है, जिसके दुष्परिणाम भी समाज को भुगतने पड़ रहे है। विडंबना यह है कि अपवादों को छोड़कर प्रायः समूचा समाज इस कुप्रथा को प्रोत्साहित करने में आगे है। आज दहेज के कारण दहेज हत्याएं तो बढ़ी ही हैं, दहेज उत्पीड़न के मामले भी बेहिसाब बढ़े हैं। विवाह जिसे हमारे देश में एक पवित्र संस्कार की मान्यता मिली है, को दहेज रूपी दानव ने दूषित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इसकी रोकथाम के लिए सख्त कानून भी विद्यमान हैं, किन्तु इसके बावजूद इस कुप्रथा पर लगाम नहीं लग पा रही है। 

“दहेज से आशय यह है कि जो धन व उपहार आदि कन्या को विवाह के समय पितृपक्ष की तरफ म से प्रदान किया जाता है, वह दहेज कहलाता है।” 

दहेज से आशय यह है कि जो धन व उपहार आदि कन्या को विवाह के समय पितृपक्ष की तरफ से प्रदान किया जाता है, वह दहेज कहलाता है। समाजशास्त्रियों ने इसे अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। मसलन, मैक्स रेडन के अनुसार‘साधारणतः दहेज वह सम्पत्ति है, जिसे एक पुरुष विवाह के समय अपनी पत्नी या उसके परिवार से प्राप्त करता है।’ फेयर वाइल्ड कहते हैं—’दहेज वह धन या सम्पत्ति है, जो विवाह के अवसर पर लड़की के माता-पिता या अन्य निकट संबंधियों द्वारा दी जाती है।’ इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार ‘दहेज वह धन है, जो एक स्त्री विवाह के समय अपने साथ लाती है अथवा उसे दिया जाता है।’ 

प्राचीन भारत में दहेज प्रथा विद्यमान थी। तब इसका स्वरूप स्वस्थ था और इसमें विकृतियां नहीं आई थीं। बेटी की विदाई के समय कन्यापक्ष द्वारा दहेज यथासामर्थ्य दिया जाता था। इसके लिए तब कन्यापक्ष पर न तो कोई दबाव होता था और न ही दहेज न लाने की वजह से बहुएं जलाई या प्रताड़ित की जाती थीं। तब यह एक पवित्र प्रथा थी और इसमें वह मंगलकामना जुड़ी थी कि बेटी अपने साथ धन-धान्य ले जाए, ताकि उसका ससराल धन-धान्य से भरा पूरा रहे। वहां वह समृद्धि की सूचक बन कर जाए। इसके पीछे यह भावना भी निहित थी कि वर-वधू को एक नये गृहस्थ जीवन की शुरुआत करनी होती थी। ऐसे में उन्हें दिक्कत न आये और दहेज में दिया गया सामान गृहस्थ जीवन में प्रवेश में उनके लिए उपयोगी साबित हो यह अपेक्षा की जाती थी। 

प्राचीन भारत में दहेज के स्वस्थ स्वरूप के अनेक दृष्टांत मिलते हैं। माता पार्वती के विवाह में उनके पिताजी ने दिल खोल कर दान दहेज दिया था। श्रीरामचरितमानस के बालकांड में इसका उल्लेख इस प्रकार किया गया है 

दासी दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि वस्तु विभागा। अन्न कनक भाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाई बखाना॥ 

यानी पार्वतीजी के पिता ने इतना दाइज (दहेज) दिया, जिसका बखान कर पाना मुश्किल है। इसी प्रकार राजा जनक ने सीताजी के विवाह में जो दान-दहेज दिया था, उसका वर्णन श्रीरामचरितमानस में इस प्रकार मिलता है 

फल अनेक बर वस्तु सुहाई। हरषि भेंट हित भूप पहाई। 

विदाई के समय दिये जाने वाले दहेज का विवरण इस प्रकार मिलता है- 

दाइज अमित न सक्रिअ, कहि दीन्ह विदेह बहोरी। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि॥ 

उक्त दृष्टांतों से हमारे देश में दहेज प्रथा के अस्तित्व की प्राचीनता का पता चलता है। तब यह एक पवित्र संकल्प था और वैवाहिक संस्कार से जुड़ी एक पवित्र भावना थी। तब यह एक ऐसी प्रथा थी, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता था। कालान्तर में इस प्रथा में विकृतियां आनी शुरू हो गईं, जिसका संभवतः मुख्य कारण है, अर्थ प्रधानता और भौतिकता का बढ़ता बोलबाला। 

प्राचीन समय में विवाह में कन्या रूपी रत्न को प्रधानता दी जाती थी। मसलन, कन्या कुलवंती हो, लाजवंती हो, मृदुभाषी हो, कलावंत हो, सौम्य व शिष्ट हो। यही बातें विवाह का आधार बनती थीं। अर्थ प्रधान व भौतिकवाद के प्रादुर्भाव के साथ ये बातें गौण हो गईं। विवाह में दहेज को प्रधानता दी जाने लगी। दूल्हे बिकने लगे और खरीदार उन्हें खरीदने लगे। यहीं से विकृतियां आनी शुरू हो गईं और देखते-देखते दहेज प्रथा का स्वरूप अभिशाप जैसा हो गया। 

विडंबना यह है कि हमारे समाज ने इस प्रथा का प्रतिकार करने के बजाय इसे अंगीकार कर लिया। देखते-देखते दहेज भौतिक चकाचौंध का पर्याय बन गया। आज स्थिति यह है कि यदि कोई सहृदय व्यक्ति बिना दहेज के अपने पुत्र का विवाह किसी सुकन्या से कर लेता है, तो हमारे समाज के ही लोग यह कहने लगते हैं कि अवश्य ही लड़के में कोई कमी रही होगी। यह दहेज रूपी दानव की सामाजिक मान्यता का प्रभाव है, जिसमें बिना दहेज के शादी करने वालों की पवित्र भावना को कोई तरजीह नहीं दी जाती है। 

बढ़ते बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति ने विवाह रूपी पवित्र संस्कार को भी बाजार में खड़ा करने का काम किया है। आपकी बेटी कितनी ही कलावंत और सुशिक्षित क्यों न हो, यदि आपके पास बेहिसाब दहेज देने की सामर्थ्य नहीं है, तो वह योग्य वर से वंचित रह जाएगी। उसे इसलिए सिर्फ अनुकूल वर नहीं मिल पाता, क्योंकि उसके पिता के पास मांग के अनुसार दहेज दे पाने और दहेज का सामान जुटा पाने के लिए धन नहीं होता है। अब लड़के वाले की नजर सिर्फ इस बात पर होती है कि लड़की के पिता की हैसियत क्या है और वह विवाह में कितना धन खर्च कर सकता है। यही बात विवाह में निर्णायक बनती है, बाकी पहलू नेपथ्य में चले जाते हैं। यानी विवाह संस्कार भी घोर व्यावसायिकता के दायरे में आ चुका है। विवाह संस्कार में दहेज के बढ़ते चलन ने उन अभिभावकों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है, जो गरीब हैं या जिनके दो-चार कन्याएं हैं। परेशानी उन अभिभावकों को भी हो रही है, जो अपनी बेटियों की शिक्षा-दीक्षा में तथा उन्हें लायक बनाने में अपनी मेहनत की कमाई खर्च करते हैं और दहेज के लिए पैसे नहीं जुटा पाते हैं। 

दूसरी तरफ हमारे समाज में दहेज से जुड़ी एक विद्रूप मानसिकता यह भी है कि तमाम मां-बाप अपने लड़कों को ऊंची तालीम इसलिए दिलवाते हैं कि वह बड़ा अफसर बने, ताकि उसके ऊंचे दाम लगाए जा सकें और उसके विवाह में ज्यादा-से-ज्यादा दहेज वसूला जा सके। कितनी गंदी है यह मानसिकता। हम एक अच्छा इंसान और नेक नागरिक बनाने के लिए अपने लड़के के लिए ऊंची तालीम का बंदोबस्त नहीं करते हैं, बल्कि इसलिए यह करते हैं कि उसके दहेज से घर भरा जा सके। ऐसे में दहेज रूपी विष बेल तो समाज में पनपेगी ही। दहेज से जुड़ी एक त्रासदी यह भी है कि दहेज की भूख निरंतर बढती जाती है और विवाह के बाद भी यह शांत नहीं होती है। विवाहोपरांत भी दहेज की मांग वर पक्ष से की जाती है और वधू पर यह कटाक्ष किये जाते हैं कि वह फला-फलां चीजें दहेज में नहीं लाई। विवाह के बाद भी दहेज की मांग की जाती है और यदि कन्या पक्ष इसकी पूर्ति नहीं कर पाता है, तो ससुराल में लड़की को भांति-भांति से प्रताड़ित किया जाता है और कभी-कभी तो उसकी हत्या तक कर दी जाती है। कितना घृणित और निंदनीय है यह कृत्य।

दहेज जैसी कुप्रथा के अनेक सामाजिक दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। इनसे सामाजिक असंतुलन की स्थिति पैदा हो रही है। योग्य कन्याओं को सिर्फ इसलिए अनुकूल वर नहीं मिल पाते, क्योंकि उनके माता-पिता मुंहमांगा दहेज चुकता नहीं कर पाते। समकक्ष व योग्य वर न मिल पाने की स्थिति में योग्य कन्याओं का जीवन कुंठित हो जाता है। उन्हें ऐसे वर के साथ जीवनभर के लिए समझौता करना पड़ता है, जो कि न तो उनके योग्य होता है और न ही उनके समकक्ष। ये बेमेल जोड़े कभी भी हर्षोल्लास से जीवन यापन नहीं कर पाते। जीवन में हीन ग्रंथियां बनी रहती हैं। 

“दहेज रूपी सामाजिक अभिशाप को मिटाने के लिए पहली आवश्यकता तो यह है कि हमारी युवा पीढ़ी ही इसके लिए आगे आए और दहेज के नाम पर मां-बाप द्वारा बेचे जाने पर राजी न हो। 

दहेज दे पाने में असमर्थ मां-बाप की अपनी अलग पीड़ाएं होती हैं। दहेज के कारण उसकी रातों की नींद हराम हो जाती है। वह खुद को असहाय व बेबस समझ कर खिन्नता से घिर उठता है। अवसादग्रस्त हो जाता है और कभी-कभी अवसाद बढ़ने पर आत्महत्या की ओर उन्मुख होकर मौत को गले लगा लेता है। इस स्थिति में पूरा परिवार तबाह हो जाता है। 

समाज में बढ़ती भ्रूण हत्याओं एवं बढ़ते हुए लैंगिक भेदभाव के पीछे भी एक बड़ा कारण दहेज ही है। हमारे समाज में अव्वल तो भविष्य में दहेज जैसे संकट से बचने के लिए कन्याओं का कोख में ही। कत्ल कर दिया जाता है, यदि ऐसा नहीं हुआ तो समाज की तो बात छोड़िए बाबुल के घर तक में उनके साथ भेदभाव किया जाता है। कितनी दुखद और त्रासद है यह स्थिति दहेज के कारण घर-परिवार टूट जाते हैं। विवाहिताएं मान-सम्मान से जी नहीं पातीं। यदि दहेज के कारण विवाहिता की हत्या कर दी गई, तो उसके बाल-बच्चे अनाथों सा जीवन गुजारते हैं। सामाजिक असुरक्षा की भावना उनमें घर कर जाती है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि दहेज प्रथा के दुष्परिणाम कितने व्यापक व घातक हैं। 

दहेज उत्पीड़न की रोकथाम के लिए हमारे देश में वर्ष 1961 में कानून बना, जो कि ‘डाउरी प्रॉहिबिशन एक्ट-1961′ के नाम से जाना गया। कानून तो बन गया, किंतु दहेज उत्पीड़न की घटनाओं में कोई विशेष कमी नहीं आई। देश में महिलाओं के हितों को ध्यान में रखकर वर्ष 1992 में राष्ट्रीय महिला आयोग की भी स्थापना की गई. किन्त इसकी पहले भी दहेज उत्पीड़न में कुछ खास कारगर नहीं सिद्ध हुईं। वस्तुतः दहेज कुप्रथा एक ऐसी कुप्रथा है, जिसे कानूनी स्तर से मिटा पाना संभव नहीं है। इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा। 

दहेज रूपी सामाजिक अभिशाप को मिटाने के लिए पहली आवश्यकता तो यह है कि हमारी युवा पीढ़ी ही इसके लिए आगे आए और दहेज के नाम पर मां-बाप द्वारा बेचे जाने पर राजी न हो। युवा इसका प्रबल विरोध करें और यह संकल्प लें कि उन्हें दहेज नहा लेना है। दहेज से बचाव के लिए हमें लड़कियों को भी स्वावलंबी बनाना होगा। जब वे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी, तो विवाह में दहेज जैसे कारण आड़े न आएंगे तथा वे अपना जीवन यापन करने में भी सक्षम होंगी। दहेज रूपी दानव को परास्त करने के लिए यह भी जरूरी है कि समाज में उन लोगों को सम्मानित व प्रोत्साहित किया जाए, जो बिना दहेज के शादी करते हैं। प्रबुद्ध वर्ग, धर्माचायों तथा गैरसरकारी संगठनों को भी दहेज के विरोध में आगे आना होगा, ताकि एक प्रेरक व स्वस्थ माहौल बन सके। 

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