साइकिल का आविष्कार किसने किया था ?

साइकिल का आविष्कार किसने किया

साइकिल का आविष्कार किसने किया था |Cycle ka Avishkar kisne kiya tha,

आज से करीब तीन सौ वर्ष पूर्व कोई साइकिल के नाम से भी परिचित नहीं था। पहली बार उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में फ्रांस के रहने वाले एक नागरिक ने लकड़ी की एक साइकिल बनाई थी। लकड़ी के दो पहियों को मजबूत पतले और गोल लट्टे से कसकर उसने वह साइकिल बनाई थी। वह उस लट्टे पर बैठ जाता था और अगले पहिए को पैर से घुमाने लगता था, इससे वह साइकिल चलने लगती थी। मगर उसे चलाए रखने के लिए पहिए को लगातार पैर से घुमाना पड़ता था। 

कछ लोगों का मानना है, वैसी ही लकड़ी की साइकिल एक डाक ने भी बनाई थी। वह अपनी साइकिल पर चढ़कर पहाड़ों को पार कर, प्रायः डकैतियां डालने जाया करता था, मगर इस आविष्कार से अभी तक जनता अनभिज्ञ थी। उन्हीं दिनों ब्रिटेन में भी एक ब्रिटिश नागरिक ने भी एक साइकिल बनाई थी। उस साइकिल में लकड़ी के डण्डे के दोनों ओर लकड़ी के दो पहिए लगे होते थे। उन पहियों के आगे वाले भाग पर शेर, हिरन, घोड़े आदि जानवरों के चेहरे लगे होते थे। उसे चलाने के लिए जमीन से पैर टेककर धक्का दिया जाता था। उसे चलाने में सवार को बहुत परेशानी होती थी। ब्रिटेन के लोग उस सवारी को ‘हॉबी हॉर्स’ कहते थे। हॉबी हॉर्स का मतलब होता है, शौक का घोड़ा।

साइकिल का आविष्कार किसने किया था

सन् 1818 ई. में जर्मनी के एक इंजीनियर बैटन ट्राइस ने उस हॉबी हॉर्स में बहुत सुधार किए। बैटन ट्राइस ने स्त्री-पुरुष की सुविधाओं का अलग-अलग ध्यान रखा। ट्राइस ने स्त्री-पुरुषों के लिए अलग-अलग साइकिलें तैयार कीं। उन साइकिलों में ‘पैडिल’ नहीं होते थे। लेकिन साइकिलों में हैण्डिल’ की व्यवस्था थी। उस साइकिल का नाम ‘ड्राइसिने’ रखा गया। 

कदाचित उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में ही फ्रांस के मेगुरी नामक व्यक्ति ने काफी चेष्टाओं के बाद साइकिल बनाकर तैयार की। उसकी साइकिल में भी लकड़ी के ही कल पुर्जे लगे हुए थे। उसकी साइकिल भी पहली साइकिलों जैसी ही दिखती थी, उस साइकिल का अगला पहिया पैरों से घुमाना पड़ता था। वह साइकिल मात्र मनोरंजन का साधन थी। 

कुछ दिन बाद एक अन्य फ्रांसीसी ने एक और साइकिल बनाई। उसने अपनी साइकिल में पहिए को घुमाने के लिए एक तरह के चक्र का प्रयोग किया। इससे साइकिल में कुछ उन्नति हुई। 

साइकिल का पहिया दाएं-बाएं घूमने लगा था। चक्र के कारण साइकिल की कुछ उपयोगिता बढ़ी। मगर इस साइकिल को चलाने वाले लोग बहुत जल्द थक जाते थे, क्योंकि पैरों को बार-बार घुमाना पड़ता था। इससे लोगों के पैरों में एक तरह का रोग भी उत्पन्न होने लगा। 

पहले साइकिल के दोनों पहिए एक-समान होते थे। यद्यपि पहिए लकड़ी के बने होते थे, किन्तु उनमें लोहे की हालें लगी होती थीं, जिस कारण साइकिल ज्यादा तेज नहीं दौड़ पाती थी। 

कुछ दिनों बाद साइकिल का अगला पहिया बड़ा व पिछला पहिया कुछ छोटा कर दिया गया, किन्तु साइकिल की चाल में कोई सुधार नहीं हुआ। 

कुछ समय बाद फ्रांस के ही पीरी नामक इंजीनियर ने साइकिल को तेज चलाने के लिए एक अन्य युक्ति निकाली। उसने साइकिल में पैडिल लगाने का चलन आरम्भ किया, किन्तु केवल पैडिल के प्रयोग ने भी साइकिल को अधिक चाल प्रदान नहीं की। 

इन्हीं दिनों विश्व के सामने एक नया आविष्कार आया-रबड़। वैसे विश्व के सभ्य समाज को रबड़ का उन्नीसवीं शताब्दी में पता चला, किन्तु दक्षिणी अमेरिका की जंगली जातियां पिछली कई शताब्दियों से रबड़ का प्रयोग करती चली आ रहीं थीं। 

सन् 1890 ई. में भारत में पहली साइकिल बनी। सन् 1938 ई. में भारत में साइकिल बनाने का कारखाना आरम्भ हो गया। 

समय के बीतने के साथ साइकिलों के निर्माण में भी काफी सुधार होता रहा है और आज तो कई तरह की रंग-बिरंगी साइकिलें बाजार में नजर आती हैं। – 

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