साइबर सुरक्षा और भारत | Cyber ​​Security and India

साइबर सुरक्षा और भारत

साइबर सुरक्षा और भारत(current essay 2021)

दिल्ली के थिंक-टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के एक वर्चुअल कार्यक्रम में भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ जनरल बिपिन रावत ने कहा कि चीन के पास भारत के खिलाफ साइबर हमले करने की क्षमता है और वह देश की व्यवस्था में बड़ी गड़बड़ी पैदा कर सकता है.जनरल रावत ने भारत और चीन की साइबर क्षमताओं की तुलना तो की ही, साथ ही रक्षा क्षेत्र में तकनीक के महत्व पर भी बात की थी. जनरल रावत ने चीन की ओर से पेश साइबर खतरे की बात ऐसे वक्त की है, जब पिछले वर्ष अक्टबर में मम्बई में ब्लैकआउट हो गया था और हाल में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का कामकाज कई घण्टे प्रभावित रहा, इसके पीछे चीन की धरती से किए गए कथित साइबर हमले को जिम्मेदार ठहराया गया, 

12 अक्टूबर, 2020 को मुम्बई के एक बड़े हिस्से में ग्रिड फेल होने के कारण बिजली चली गई थी. इससे मुम्बई और आस-पास के महानगर क्षेत्र में जनजीवन पर गम्भीर असर पड़ा था. इसकी वजह से लोकल ट्रेनें अपने सफर के बीच में ही रुक गई थीं और कोरोना महामारी के बीच हो रही छात्रों की ऑनलाइन कक्षाएं भी बाधित हुई थीं, बिजली गुल होने के दौरान मुम्बई सेंट्रल, थाणे, जोगेश्वरी, वडाला, चेंबूर, बोरीवली, दादर, कांदीवली और मीरा रोड जैसे इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए थे.

चीन से बड़ा साइबर खतरा 

पूर्वी लद्दाख में संघर्ष और एलएसी पर लगातार घुसपैठ करने की कोशिश में जुटा चीन भारत में हजारों लोगों की जासूसी करा रहा है. इन सबके बीच एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि चीनी कम्पनी अलीबाबा भारतीय यूजर्स का डाटा चुरा रही है. इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट में इस साजिश का खुलासा करते हुए बताया है कि चीनी सरकार और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी टेक्नोलॉजी कम्पनी जेनहुआ डाटा इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, के जरिए यह जासूसी कराई जा रही थी. इस रिपोर्ट के खुलासे के बाद कहा जा रहा है कि चीन अब भारत की साइबर सिक्योरिटी के लिए खतरा बन चुका है. 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब चीनी सरकार पर किसी देश के लोगों का डाटा चुराने का आरोप लगा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन की सत्तारूढ़ पार्टी, सेना और निजी कम्पनियों ऐसे ऑपरेशन चलाती हैं, जिनमें देशों का टारगेट किया जाता है और डाटा की चोरी की जाती है. 

असल में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने साइबर क्षेत्र में खुद को मजबूत करने का फैसला 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद किया था. भारतीय सेना के एक पूर्व अधिकारी और सूचना युद्ध विशेषज्ञ और एंगेजिंग चाइनाः इंडियन इंट्रेस्ट्स इन द इंफॉर्मेशन एग के लेखकर पवित्राण राजन का कहना है, चीन के लोग समझते थे कि अमरीका की टेक्नोलॉजी उनसे बहुत आगे है. उन्होंने विश्लेषण किया कि अगर वे आईसीटी (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी) में आते हैं, तो वे कुछ पीढ़ियों की छलांग लगा सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं. इसके बाद चीन ने खुद को इलेक्ट्रॉनिक्स के कारखानों में तब्दील कर दिया. 

इसके बाद 2003 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और चीन के केन्द्रीय सैन्य आयोग की केन्द्रीय समिति ने आधिकारिक तौर पर तीन वारफेयर की अवधारणा को मंजूरी दे दी, जिसमें मनोवैज्ञानिक, मीडिया और कानूनी युद्ध शामिल थे. इसके बाद हाई लेवल पर फैसला लिया गया कि पीएलए को भविष्य में सूचना के क्षेत्र में युद्ध लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए. इसके बाद जल्द ही पीएलए ने साइबर ऑपरेशंस के लिए समर्पित खुफिया इकाइयाँ स्थापित करना शुरू किया. 

साइबर युद्ध 

साइबर युद्ध में बम और बन्दूक का इस्तेमाल नहीं होता है, बल्कि इसमें दुश्मन को साइबर और मनोवैज्ञानिक दाँव-पेंच से हराया जाता है. इसके तहत् जनता की सोच को बदला जाता है. अफवाहें और फेक न्यूज के जरिए अपने मंसूबों को पूरा किया जाता है.डाटा चोरी के जरिए इसे और अधिक आसानी से अंजाम दिया जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह डाटा वॉर का जमाना है.हम जब डाटा को टुकड़ों में देखते हैं तो नहीं समझ पाते हैं कि आखिर इससे कोई क्या हासिल कर सकता है? लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी जानकारियों को एक साथ जुटाकर और उनका किसी खास उद्देश्य से हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, देश के आतंरिक मुद्दों, राष्ट्रीय नीति, सुरक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था सभी में सेंधमारी के प्रयास किए जा सकते हैं, 

साइबर अपराधियों के लिए कोरोना काल 

भारत में एक तरफ जहाँ कोरोना वायरस ने लोगों की मुसीबतें बदाई, तो दूसरी तरफ हैकर्स ने इसमें इजाफा किया. देश के लिए 2020 ऐसा वर्ष रहा जब यजर्स पर सबसे ज्यादा मैलवेयर अटैक किए गए. साइबर सिक्योरिटी फर्म सोनिकवॉल की रिपोर्ट के मुताबिक, सितम्बर और अक्टूबर के बीच में मैलवेयर अटैक का वॉल्यूम तीन गुना से भी ज्यादा रहा. 

सोनिकवॉल साइबर थेट रिपोर्ट 2021 में कहा गया कि देश में दिसम्बर 2020 में 25 मिलियन (2.5 करोड़ से अधिक मैलवेयर अटैक हुए. महामारी के दौरान सबसे ज्यादा साइबर अटैक वर्क फ्रॉम होम करने वाले यूजर्स पर किए गए, कई ऑर्गनाइजेशन अटैक से बचने के लिए पॉवरफुल क्लाउड-बेस्ड टूल और क्लाउड स्टोरेज का इस्तेमाल किया. साइबर क्राइम करने वालों के लिए 2020 सबसे बेहतर समय रहा है. पिछले वर्ष साइबर आर्स के लिए रेस लगी रही.महामारीने रिमोट वर्किंग के साथ पॉलिटिकल क्लाइमेट, क्रिप्टोकरंसी की कीमतें, स्लाउड स्टोरेज और टूल्स सभी पर साइबर अटैक को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे कोविड-10 ने ज्यादा शक्तिशाली और आक्रामक हमलों के लिए पर्याप्त अवसर हैकर्स को दिए, कोनर ने कहा कि साइबर अपराधी जब टारगेट पर अटैक करने के लिए चयन करते हैं, तो उनके लिए किसी तरह की आचार सहिंता नहीं है. निष्कर्ष से पता चला कि ग्लोबली रैंसमवेयर में 62%, की वृद्धि हुई. वहीं, उत्तरी अमरीका में सबसे ज्यादा 158% की वृद्धि हुई. 

ईरान में नतांज़ परमाणु केन्द्र में हुआ साइबर हमला 

हाल में ही ईरान में नताज़ परमाणु केन्द्र में हुए ब्लैक आउट की पूरी दुनिया में चर्चा है. यह हादसा था या साजिश का नतीजा और इसके पीछे किसका हाथ है? इसको लेकर अलग अलग रिपोर्ट आ रही हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस हमले में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का हाथ हो सकता है,ईरान ने इस ब्लैकआउट के पीछे साइबर अटैक को वजह बताते हुए इसे आतंकी हमला करार दिया है. साथ ही कहा है कि ये हमले किसी षड़यंत्र के तहत किए गए, ईरान के सरकारी अधिकारियों ने ये नहीं बताया कि परमाणु केन्द्र को नुकसान पहुंचाने के लिए कौन जिम्मेदार है, लेकिन उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से ‘परमाणु आतंकवाद’ से मुकाबला करने की अपील की है. इस हादसे में किसी की मौत या रेडियोएक्टिव तत्वों के फैलने की खबर नहीं है, लेकिन बिजली सप्लाई में बाधा आई है. 

क्यों अहम् है ये परमाणु केन्द्र? 

ईरानी परमाणु केन्द्र को ऐसे वक्त में निशाना बनाया गया है, जब अमरीका के बाइडन प्रशासन की ओर से 2015 के परमाण समझौते को बहाल करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं. ईरानी अधिकारियों ने इस घटना की जाँच की, जबकि कई इजरायली मीडिया घरानों ने अटकलें लगाई कि नातान्ज परमाणु संयंत्र में हुई यह घटना किसी साइबर हमले के चलते हो सकती है, अगर इजरायल इसके लिए जिम्मेदार है, तो इससे दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में तनाव और बद सकता है. 

एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और कैशलेस इकोनॉमी की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ डिजिटल प्राइवेसी और डाटा की सुरक्षा के लिए हमारा कानूनी ढाँचा बहुत ही प्रारम्भिक स्तर का है, हमारा पड़ोसी देश चीन, साइबर सुरक्षा और जासूसी के खतरों को कम करने के लिए खुद के कम्प्यूटर चिप और विशाल सर्वर बनाने में जुटा हुआ है, लेकिन हमारे यहाँ आलम यह है कि हम आज भी इसके लिए विदेशी चिप और विदेश में स्थित सर्वरों पर निर्भर हैं, 

हमें तो विशेषज्ञों का ऐसा सक्षम तंत्र चाहिए, जो साइबर संसार पर निगरानी रखे और किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका देखते ही सबको सतर्क कर दे, इसके लिए मैनपॉवर के अलावा तकनीकी सुधार की भी जरूरत है, देश में भारी संख्या में आउटडेटेड कम्प्यूटर सिस्टम चल रहे हैं, जो साइबर ठगों के सबसे आसान टारगेट हैं, यही हाल मोबाइल फोन्स का भी है, जिनकी सुरक्षा व्यवस्था एकदम लचर है, देश के सरकारी रक्षा, विज्ञान और शोध संस्थान और राजनयिक दूतावास पर साइबर जासूसी का आतंक मँडरा रहा है, जैसे-जैसे इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ रही है वैसे वैसे साइबर सुरक्षा के समक्ष खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं. ये खतरे सारी दुनिया में बढ़ रहे हैं और इसका एक बड़ा कारण यह है कि साइबर सेंधमारी करने वाले तत्वों की पहचान भी मुश्किल है और उन तक पहुँच भी. इंटरनेट वायरस अथवा हैकिंग के जरिए सेंधमारी वह अपराध है जिसमें आमतौर पर अपराधी घटनास्थल से दूर होता है, कई बार तो वह किसी दूसरे देश में होता है और ज्यादातर मामलों में उसकी पहचान छिपी ही रहती है. 

ऑनलाइन फिरौती 

आज के इस आधुनिक समय में जहाँ अधिकतम चीजें इंटरनेट पर निर्भर हो गई हैं, अपराध का तरीका भी बदल गया है. साइबर संसार में पिस्तौल कनपटी पर लगाकर या अपहरण करके फिरौती नहीं मांगी जाती, बल्कि सीधे-सीधे आपका सिस्टम हैक करके फिरौती मांगी जाती है. पिछले दिनों दुनिया भर में रैनसमवेयर वायरस अटैक हुआ था, जिससे डाटा लॉक हो जाता है. उसे अनलॉक करने के लिए फिरौती के तौर पर हैकर्स बिटकॉइस या 

डॉलर्स में रकम माँगते हैं. असल में रैनसमवेयर एक तरह का सॉफ्टवेयर वायरस है जिसके कम्प्यूटर में आते ही आप अपनी कोई भी फाइल का इस्तेमाल नहीं कर सकते, अगर आप दोबारा फाइल खोलना चाहेंगे तो आपको हैकर्स को बिटकॉइन चुकाने होंगे. पैसा तय वक्त में ही देना होगा नहीं, तो वायरस ईमेल के जरिए और फैल जाएगा.यह एक नए किस्म का अपराधिक फिरौती है जिसमें अपराधी को पकड़ना आसान नहीं होता, जिस तरह रुपए, डॉलर और यूरो खरीदे जाते हैं, उसी तरह बिटकॉइन की भी खरीद बिक्री होती है. ऑनलाइन पेमेंट के अलावा इसको ट्रेडिशनल करेंसी में भी बदला जाता है. बिटकॉइन की खरीद-बिक्री के लिए एक्सचेंज भी हैं, लेकिन उसका कोई ऑफिशियल शेप नहीं है. बिटकॉइन एक नई इनोवेटिव डिजिटल टेक्नोलॉजी या वर्चुअल करेंसी है. बिटकॉइन ब्लैकमनी, हवाला और टेररिस्ट एक्टिविटीज में ज्यादा इस्तेमाल किए जाने की वजह से खतरनाक है. भारत में आरबीआई समेत सभी देशों के रेग्युलेटरों ने इसे लीगल वैलिडिटी नहीं दी है. 

पूरी दुनिया में एक साथ हुए इस साइबर अटैक के पीछे लगे दिमाग ने यह अच्छी तरह दिखा दिया कि कम्प्यूटर और साइबर तकनीक की मदद से किसी अपराध को भी बड़ी अच्छी तरह से और काफी बड़े पैमाने पर अंजाम दिया जा सकता है. इसका गणित बहुत सीधा सा है, अगर आधे शिकार भी फिरौती दे दें, तो उनके हाथ में बैठे-बैठे कई हजार करोड़ की रकम पहुँच जाएगी. सच्चाई यह भी है कि अभी तक जो ऐसे मामले हए है. उनसे कहा जा सकता है कि हमें कभी पता नहीं चलेगा कि ये फिरौती वसूलने वाले कौन थे? उन्होंने इस रकम का क्या किया? और सबसे बड़ी बात है कि उनका अगला हमला कब होगा? कैसा होगा? सच यही है कि ज्यादातर हैकर कानून की पकड़ से बच निकलते हैं, कितने प्रतिशत पकड़े जाते हैं, इसके प्रामाणिक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं. 

इंटरनेट और नई तकनीक के इस्तेमाल में अपराध नियंत्रण करने वाली एजेंसियाँ फिलहाल साइबर अपराधियों से बहुत पीछे हैं. ये साइबर अपराधी दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर किसी भी देश में साइबर अटैक कर सकते हैं, जबकि ऐसी एजेंसी किसी दूसरे देश में बैठे अपराधी पर हाथ नहीं डाल सकती. इस मामले में न तो बहुत ज्यादा अन्तर्राष्ट्रीय सहमतियाँ हैं और न ही बहुत ज्यादा अन्तर्राष्ट्रीय कानून, एजेंसियों में आपसी तालमेल के, जो चैनल मौजूद भी हैं, वे इतने सुस्त और धीमे हैं कि जब तक कोई । बात शुरू हो, अपराधी अपने वारे-न्यारे करके | गायब भी हो चुके होते हैं, 

साइबर सुरक्षा के गम्भीर प्रयास जरूरी 

साइबर स्पेस सिक्योरिटी इस दौर की बड़ी जरूरत बन गई है, क्योंकि कम्पनियाँ बड़ी तेजी से डिजिटल बिजनेस मॉडल को अपना रही हैं, बोर्ड रूम मीटिंग्स में साइबर स्पेस सिक्योरिटी एक आम चिंता का विषय है. चीन के साइबर अटैक से इंडियन स्टॉक एक्सचेंज और मुम्बई में इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई प्रभावित होने के आरोप के बाद देश की साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केन्द्र सरकार नई राष्ट्रीय रणनीति तैयार कर रही है, यह प्लान गृह मंत्रालय, डिफेंस, सूचना मंत्रालय, नेशनल क्रिटिकल इन्फॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रचर प्रोटेक्शन सेंटर के साथ मिलकर तैयार किया जा रहा है, जिसमें ऐसे किसी भी अटैक की आशंका के लिए रणनीति होगी. 

यह सवाल उठना बहुत लाजिमी हो गया है कि साइबर हमलों से निपटने के लिए हमारा देश कितना तैयार है ? क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामला है जिस पर विचार करना बेहद जरूरी है. हम सब की इंटरनेट पर बहुत ज्यादा निर्भरता बढ़ने की वजह से आज के इस आधुनिक माहौल में साइबर सुरक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो चली है. साइबर विशेषज्ञों के अनुसार भारत में जितने बड़े सर्वर मौजूद हैं, वे हैकिंग प्रूफ नहीं हैं. हमारे यहाँ भी तभी हम जागते हैं, जब कोई बड़ा साइबर अटैक हो, हैकर्स के नए तरीकों का सॉल्यूशन ढूँढ़ने में महीनों लग जाते हैं. ।

 कुछ तरीके अपना कर हम साइबर । हमलों से बच सकते हैं। 

जब एक साइबर हमला होता है, तो सेवाओं/इंफ्रास्ट्रक्चर पर काफी बड़ा असर * पड़ता है, बड़ा व्यवधान आता है, देश की अहम । इमारतों, निर्माण के लिए एक स्पष्ट देशव्यापी । लॉकडाउन की नीति होनी चाहिए. हम बात कर रहे हैं, न्यूक्लियर ग्रिड्स, पॉवर ग्रिड्स, वित्तीय संस्थाओं, सैटेलाइट कम्युनिकेशन आदि की.जब एक देशव्यापी साइबर हमला होता है, तो उसे पूरी तैयारी के साथ सोच-समझकर – वर्षों नहीं तो महीनों के लिए तो प्लान किया ही जाता है. ऐसे मामलों में गलत इरादे वालों को पता होता है कि पहला हमला किस कम्पनी पर करना है. इसीलिए ये बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि एक देशव्यापी लॉकडाउन पॉलिसी हो ताकि ऐसे समय में नाजुक और अहम् इंफ्रास्ट्रक्चर । का बचाव किया जा सके और नुकसान पर नियंत्रण पाया जा सके, एसओएस पॉलिसी को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे दुश्मन को सूचना मिल सकती है. लॉकडाउन पॉलिसी में जरूरत होगी कि हर नाजुक सेक्टर में साइबर सिक्योरिटी स्पेशलिस्ट्स को या तो नियुक्त किया जाए या फिर उन्हें प्रशिक्षित किया जाए. 

आईओटी सेवाओं के लिए सिक्योरिटी फ्रेमवर्क 

5जी जैसे-जैसे अपने पैर पसारेगी, आईओटी उपकरणों का उदय अवश्यम्भावी है. इसका मतलब होगा कि इंटरनेट से और एक-दूसरे से पहले से ज्यादा डिवाइसेज जुड़ेंगी. इसका मतलब यह भी है कि जो कुछ भी हम सोच सकते हैं, उसमें स्मार्ट उपकरणों को जोड़ा जा रहा है, बाजार में आने वाले सभी 5 जी उपकरणों को परिभाषित करने के लिए एक सुरक्षा मानक तैयार करने की जरूरत है. बेहतर तरीका ये होगा कि सरकार सिक्योरिटी कम्पनियों की मदद लेकर इन नई इंटरनेट कनेक्टेड डिवाइसेज के लिए सुरक्षा मानक परिभाषित करें, आई ओटी डिवाइसेज के लिए स्पष्ट रूप से परिभाषित किया हुआ सर्टिफिकेशन या ‘स्टैंडर्ड’ तैयार करने की जरूरत है. सरकारी या सरकार अधिकृत विभागों/कम्पनियों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि ये नई आने वाली आईओटी डिवाइसेज निजता की जरूरतों और सुरक्षा मानकों पर खरी उतरें, ये तय करना होगा कि इनसे नागरिकों के निजी डाटा पर कोई खतरा न हो, ये वे डिवाइसेज हैं, जो हमारे घर में रखी जानी हैं, हमारी कार में, हमारे बेडरूम में रखी जानी हैं, निजता का खतरा कल्पना से परे है, कोई भी इस खतरे को मोल नहीं लेना चाहेगा. सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वो 60 करोड़ की आबादी को इंटरनेट सेफ्टी के दायरे में लाएं ये भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इंटरनेट पर पहले से ही मौजूद आबादी (70 करोड़ से ज्यादा) सिक्योरिटी के प्रति जागरूक हो, 

देश में साइबर सुरक्षा में मैनपॉवर की बहुत कमी है. साइबर सुरक्षा के आँकड़ों के अनुसार चीन और अमरीका के मुकाबले देश में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की भारी कमी है. देश में साइबर सुरक्षा को लेकर सजगता तो बदी है, लेकिन अभी भी वह पर्याप्त नहीं है, फिलहाल स्थिति बहुत ज्यादा चिंताजनक है जिस पर तत्काल एक्शन की जरूरत है.यह सही है कि साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई संस्थाएं बनाई गई हैं, लेकिन उनके बीच अपेक्षित तालमेल का अभाव अभी भी दिखता है, 

कुल मिलाकर अब भारत को इस तरह के साइबर हमलों के लिए सचेत और सतर्क होना होगा और केन्द्र सरकार को डिजिटल इंडिया की तर्ज पर साइबर सुरक्षा के लिए 

विशेष रणनीति और असाधारण प्रयास करने होंगे, क्योकि जब सब कुछ इंटरनेट के भरोसे हो जाएगा तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता में होना चाहिए. 

साइबर अटैक और वायरस से बचने के लिए फिलहाल हम अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं? 

संदिग्ध ई-मेल्स, वेबसाइट्स और ऐप्स से सावधान –साइबर हैकिंग और वायरस से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि संदिग्ध ई-मेल्स, वेबसाइट्स और ऐप्स से सावधान रहें, फर्जी ई-मेल्स, वेबसाइट्स पर दिखने वाले संदिग्ध ऐड्स और अनवेरिफाइड ऐप्स का इस्तेमाल करके ही इन सॉफ्टवेयर्स को सिस्टम में इंस्टॉल किया जाता है. ऐसे में हमेशा सावधान रहें और गैर-जरूरी ई-मेल्स और वेबसाइट्स को खोलने से बचें, ऐसे ऐप को कभी इंस्टॉल न करें जिन्हें ऑफिशल स्टोर द्वारा वेरिफाई न किया गया हो. साथ ही कोई भी प्रोग्राम इंस्टॉल करने के पहले उसका रिव्यू जरूर पढ़ें 

एण्टीवायरस का इस्तेमाल करें 

किसी भी एण्टीवायरस का इस्तेमाल करके अपने सिस्टम में रैंसमवेयर या किसी वायरस को डाउनलोड होने से रोका जा सकता है, ज्यादातर एण्टीवायरस प्रोग्राम्स ऐसे फाइलों को स्कैन कर लेते हैं, जिनमें रैंसमवेयर होने की आशंका रहती है.इसके अलावा सीक्रिट इंस्टॉलेशन्स को भी एण्टीवायरस रोक पाने में सक्षम होते हैं.

 हमेशा अपडेट्स इंस्टॉल करें 

अपने सॉफ्टवेयर को हमेशा अपडेट रखें, कम्पनियाँ अकसर कमजोर कड़ियों को दुरुस्त करने के लिए अपडेट्स प्रोवाइड करती रहती हैं, ऐसे में आपके लिए यह जरूरी है कि सॉफ्टवेयर का सबसे लेटेस्ट वर्जन आपके सिस्टम में मौजूद रहे.

 फिरौती कभी न दें 

रैंसमवेयर का शिकार होने वाले लोगों को किसी भी सूरत में फिरौती न देने की सलाह दी जाती है. ऐसा करने से साइबर अपराधियों का दुस्साहस बढ़ता है और यह भी हो सकता है कि वे पैसा लेने के बाद भी आपकी फाइलें न लौटाएं कुछ ऐसे प्रोग्राम्स भी आते हैं, जो आपकी खराब हो चुकी फाइलों को ठीक करने में आपकी मदद कर सकते हैं. इसके अलावा अगर आपने बैकअप ले रखा है तो आप फिर से अपनी फाइलों को सिस्टम में अपलोड कर सकते हैं. 

कब-कब हुए बड़े साइबर अटैक? 

कब-कब हुए बड़े साइबर अटैक? 

1.याहू (2013)-ये अब तक का सबसे बड़ा डाटा चोरी का मामला था. इस साइबर अटैक में करीब 1 अरब अकाउंट्स से डाटा चोरी किया गया. 

2.ईवे (2014)-14.50 करोड़ यूजर्स को पासवर्ड चेंज करने को कहा गया था. साइबर अटैक में हैकर्स ने यजर्स का पासवर्ड,नाम और डेट ऑफ बर्थ जैसा डाटा चोरी कर लिया था. 

3.सोनी (2014)-सोनी पिक्चर एंटरटेनमेंट पर हुए साइबर अटैक में 47 हजार इम्प्लॉई और एक्टर्स की प्राइवेट डिटेल्स लीक हो गई थी. 

4.यूएस सेंट्रल कमांड (2015)-हैकर्स ने दावा किया कि सेंट्रल कमांड के यूट्यूब और ट्विटर के लिंक उन्होंने हैक कर लिए हैं. दावे को सच साबित करने के लिए कमांड का लोगो चेज कर उसकी जगह एक नकाबपोश का चेहरा लगा दिया गया था, 

5.एश्ले मेडिसन (2015) एडल्ट डेटिंग वेबसाइट को हैक करने के बाद हैकर्स ने इसके 3-7 करोड़ यूजर्स के नाम जाहिर करने की धमकी दी थी.

6.टॉक-टॉक (2015)-करीब 157 हजार कस्टमर्स की पर्सनल डिटेल हैकर्स ने हासिल कर ली. 

15,656 अकाउंट्स नम्बर, सॉर्ट कोड और क्रेडिट कार्ड डिटेल चोरी कर ली. 

7.माय स्पेस (2016)—माना जाता है कि 36 करोड़ पासवर्ड और ई-मेल कुछ वर्ष पहले चोरी कर लिए गए इन्हें छिपे हुए इंटरनेट मार्केटप्लेस में प्लेस किया गया, 

8.समवेयर वायरस अटैक (2017) -पूरी दुनिया के लगभग 100 देशों में एक साथ साइबर अटैक जिसमें लगभग 2.00,000 सिस्टम प्रभावित हुए, अब तक का सबसे बड़ा साइबर हमला. 

9.साइबर सिक्योरिटी रिसर्च की वर्ष 2019 की एनुअल शूट रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018 में पूरी दुनिया में करीब 20 लाख साइबर हमले हुए और इस वजह से ₹3,222 अरब का नुकसान हुआ है. 

10.12 अक्टूबर, 2020 को मुम्बई में ब्लैकआउट हआ था मुम्बई के एक बड़े हिस्से में ग्रिड फेल होने के कारण बिजली चली गई थी. इससे मुम्बई और आस-पास के महानगर क्षेत्र में जनजीवन पर गम्भीर असर पड़ा था. इसकी वजह से लोकल ट्रेनें अपने सफर के बीच में ही रुक गई थीं. 11 अप्रैल 2021 में ईरान के नताज़ परमाणु केन्द्र में हुआ साइबर हमला…. 

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