Current essay topics for upsc in Hindi-दान और उद्योग जगत अथवा पारम्परिक भारतीय परोपकारिता से गेट्स-बफेट मॉडल तक- एक सहज प्रगमन या  कि एक रूपावली अंतरण (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2010) 

Current essay topics for upsc in Hindi

Current essay topics for upsc in Hindi-दान और उद्योग जगत (Philantrophy & Corporate World) अथवा पारम्परिक भारतीय परोपकारिता से गेट्स-बफेट मॉडल तक- एक सहज प्रगमन या कि एक रूपावली अंतरण (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2010) अथवा भारत की दान परम्परा और हमारा उद्योग जगत 

भारतीय जीवन दर्शन में दान और परोपकार की परंपरा सदैव शिखर पर रही। वस्तुतः दान की इस अवधारणा का संबंध पुरुषार्थ से है। पुरुषार्थ को सार्थक जीवन शक्ति का द्योतक माना गया है। यह भोग और धर्म के पालन के बीच समन्वय स्थापित करता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, ये चार स्तंभ परुषार्थ के बताए गए हैं। दान और परमार्थ की भावना धर्म में सदा निहित रही है। अर्थ और काम में व्यक्ति डूब न जाए इस कारण धर्म के बंधनों से उसे कुछ इस तरह बांधा गया है कि वह धर्मानुकूल आचरण कर जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करे। 

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं- ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई।’ यानी दूसरे के हित से बड़ा दूजा धर्म कोई नहीं है। यहां भी दान, परोपकार और जनकल्याण की भावना निहित है। हमारे धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि धन का संचय और उपभोग जनहित और लोक कल्याण में करना श्रेयस्कर होता है। इसीलिए पंचमहायज्ञों को संपन्न कराने की व्यवस्था धर्मशास्त्रों में दी गई। इस व्यवस्था के पीछे धारणा यह थी कि जब धन का व्यय धर्मानुसार होगा, तो जनहित व लोककल्याण के कार्य स्वतः संपादित होंगे। 

“दान की महत्ता हर कालखंड में रही है। यही कारण है कि वर्तमान परिदृश्य में उद्योग जगत के सामाजिक दायित्व बोध को दान और परमार्थ से जोड़कर देखा जा रहा है। न सिर्फ राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हुई है कि उद्योग जगत अपने सामाजिक दायित्व बोध को समझे और अपने लाभांश में से कुछ प्रतिशत समाज के निर्माण और जनकल्याण में लगाए।” 

हमारे कई ऐसे पौराणिक व ऐतिहासिक चरित्र हैं, जिनको आज भी उनकी दानवीरता के लिए याद किया जाता है। इनमें सूर्यपुत्र कर्ण और सम्राट हर्षवर्धन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कर्ण का जन्म जिन दिव्य और अमोष कुण्डत और कवच के साथ हुआ था, उसने उन तक का दान कर दिया था। यह जानते हुए कि यह दान एक प्रवंचना का हिस्सा है, कर्ण ने अपने दिव्य कुण्डल और कवच इंद्र का दान दे दिये थे। कन्नौज और थानेश्वर के सम्राट हर्षवर्धन ने जन कल्याण की दिशा में व्यापक कार्य किए। मुसाफिरों, दीन-हीनों तथा रागियों आदि की सुख-सुविधा के लिए उसने जगह-जगह धर्मशालाओं, कुञ्ज तथा चिकित्सालय आदि का प्रबंध कर रखा था। उसने दान की परपरा को समृद्ध बनाया। वह दिल खोलकर दान देता था तथा पांच वर्ष में जो धन राजकोष में एकत्र होता था, उसे प्रयाग में संगम तट पर दान कर देता था। दानशीलों के ऐसे अनेक चरित्र हमें दान के महत्व व जनकल्याण की सीख देते रहे हैं। 

दान की महत्ता हर कालखंड में रही है। यही कारण है कि वर्तमान परिदृश्य में उद्योग जगत के सामाजिक दायित्व बोध को दान और परमार्थ से जोड़कर देखा जा रहा है। न सिर्फ राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वह बहस तेज हुई है कि उद्योग जगत अपने सामाजिक दायित्व बोध को समझे और अपने लाभांश में से कुछ प्रतिशत समाज के निर्माण और जनकल्याण में लगाए। इस अवधारणा को एक नया नाम भी दिया गया है—’कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी’। निःसंदेह समाज के निर्माण, उसके कल्याण और जनहित का एक बड़ा दायित्व उद्योग जगत पर भी बनता है। उद्योग जगत इस दायित्व बोध से विमुख नहीं हो सकता है। 

आज के उदारीकरण और भमंडलीकरण के दौर में जनकल्याणकारी कार्यों को लेकर सरकार की भूमिका भी सिकुड़ गई है। सरकार ने आम आदमी को उसके हाल पर छोड़ दिया है। सामाजिक समस्याओं से निपटने और उनके निराकरण में अब सरकार की दिलचस्पी कम से कमतर हो गई है। सरकार का चरित्र भी पेशेवर हो गया है। वह जनहित से विमुख होकर, मुनाफे की तरफ उन्मुख हो गई है। ऐसे में सामाजिक समस्याओं के निवारण, समाज के उत्थान और सामाजिक सरोकारों के प्रति निजी क्षेत्र की जिम्मेदारी बढ़ी है। जनमानस की अपेक्षाएं भी उससे बढ़ी हैं, कि वह आगे आकर लोक कल्याण में अपनी महती भूमिका सुनिश्चित करे। निजी क्षेत्र को इस जिम्मेदारी को जिस शिद्दत से महसूस कर लोक कल्याण की पहल करनी चाहिए, वह भारत में तो अपने जीवंत रूप में नहीं दिख रही है। 

यह दुःखभरी हैरानी का ही विषय है कि दान, परोपकार और लोककल्याण की जो समृद्ध परंपरा भारतीय जीवन दर्शन से अभिन्न रूप से जुड़ी रही, उससे आज का उद्योग जगत नहीं जुड़ पा रहा है। वह व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में आगे तो रहना चाहता है, मगर उस समाज के लिए कुछ भी नहीं करना चाहता, जिससे वह सिर्फ लेता ही है। पिछले कुछ वर्षों में एक नई आर्थिक चेतना का सूत्रपात भारत में भी हुआ है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के पांव पसारने के साथ वाणिज्यिक व्यापारिक गतिविधियों में भी तेजी आई। उद्योगों का संजाल देश में बढ़ने के साथ धनिकों की संख्या भी बढ़ी है। विश्व मंच पर भारतीय पूंजीपतियों का उदय हो चुका है। इसके बावजूद चंद औद्योगिक घराने ही ऐसे हैं, जो सामाजिक दायित्व बोध के प्रति जागरूक हैं और जनहित के लिए प्रयासरत दिख रहे हैं। जिस देश में यह धर्मसम्मत व्यवस्था रही हो कि व्यक्ति अपनी आय का दशांश दान और जन कल्याण पर खर्च करे, उस देश के उद्योग जगत का जन सरोकारों से मुंह फेरना स्तब्ध कर देता है। 

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।

पंछी को छाया नहीं, फल लागत अति दूर। 

कबीरदास की उक्त पंक्तियां उन औद्योगिक घरानों को आइना दिखाती हैं, जो मुनाफे की होड़ में तो आगे हैं, मगर राष्ट्र और समाज के निर्माण के लिए न उनके पास इच्छाशक्ति है और न ही धन। सिर्फ मुनाफा कमाना ही उनका एक मात्र उद्देश्य है। आत्मा को प्रसन्न कर देने वाली परोपकार की भावना से हमारा उद्योग जगत मुंह फेरे हुए है। यही कारण है कि देश में कुपोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, भुखमरी, और कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं निरंतर बढ़ रही हैं। नक्सलवाद और आतंकवाद के पनपने के पीछे भी एक सीमा तक ‘आर्थिक अन्याय’ मुख्य कारण रहा है। आर्थिक न्याय और परमार्थ की भावना धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। दान और लोककल्याण की परंपरा बजाय विस्तार पाने के सिकुड़ रही है। यह भी कह सकते हैं कि व्यावसायिक हितों को सर्वोपरि समझने वाले ‘कॉरपोरेट कल्चर’ के बढ़ते प्रभाव के आगे दान व जनकल्याण की पवित्र परंपराएं दम तोड़ चुकी हैं। 

समाज का वाण तो सभी पर होता है, औद्यागिक घरानों पर तो यह और अधिक होता है। उद्योगों को गढ़ने वाले हाथ और मेधा यही समाज देता है। संसाधन इसी से मिलते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन ये घराने जमकर करते हैं। प्रदूषण जनित नकारात्मक प्रभाव, जो आज के उद्योगों की प्रमुख देन हैं, उसे भी समाज सहता है। जो कुछ उत्पादित किया जाता है, उसकी खपत भी इसी समाज में होती है। यानी सारे व्यवहार और अन्तःसंबंधों का मूल समाज ही होता है. तथापि समाज की ही सर्वाधिक उपेक्षा उद्योग जगत द्वारा की जाती है। सच तो यह है कि समाज के ऋण को न चुका कर उद्योग जगत समाज को आहत करने का कार्य कर रहा है। 

इस मामले में भारत की तुलना में दूसरे देश कहीं अधिक उदारता दिखा रहे हैं। बिल गेट्स और उनकी पत्नी मिलिंडा गेट्स तथा वारेन बफेट की पहल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बिल गेट्स और वारेन बफेट ने अमरीकी अरबपतियों को न सिर्फ दान और परमार्थ के लिए प्रेरित किया है, बल्कि यह आह्वान भी किया है कि वे अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा जरूरतमंदों की मदद के लिए समर्पित करें। गार्डन एंड बीटी मूर फाउंडेशन, बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन तथा वारेन बफेट ने जिस तरह अपनी अथाह सम्पत्ति को सामाजिक हितों में लगाने की घोषणा की है, उससे हिन्दुस्तानी दौलतमंदों को प्रेरणा लेनी चाहिए। बिल गेट्स और वारेन बफेट की पहल प्रशंसनीय है और इसके बहुत सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। बिल और वारेन द्वारा चलाए जा रहे ‘गिविंग प्लेज’ अभियान में बराबर अरबपतियों की संख्या बढ़ने से यह ध्वनित होता है कि यह पहल कितनी प्रेरक है। बिल गेट्स, उनकी पत्नी मिलिड गेट्स तथा वारेन बफेट ने अमरीकी अरबपतियों को प्रेरित किया है कि वे अपनी संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा अपने जीवनकाल में या मत्यु के बाद परमार्थ के कार्यो के लिए दान दें। इस कार्य को नैतिक दायित्व समझकर किया जाए। इस पहल में ‘फेसबुक’ के 

संथापक मार्क जुकरबर्ग के शामिल हो जाने से माहौल और अधिक प्रेरणाप्रद हो गया है। मार्क जुकरबर्ग ने न सिर्फ अपनी अकूत संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा परमार्थ के कार्यों में लगाने की घोषणा की है, बल्कि इस संदर्भ में बहुत ही सकारात्मक विचार वक्त करते हुए कहा है कि दान के लिए बुढ़ापे की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। इस काम को जल्द से जल्द शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि इस क्षेत्र में करने के लिए बहुत कुछ है। मार्क के इस कथन में आर्थिक न्याय की पारदर्शी भावना अंतरनिहित है। 

“जिस गति से भारतीय औद्योगिक घराने मुनाफा कमाने में जुटे हैं, वह गति परमार्थ के कार्यों की शुरुआत में कहीं दूर-दूर तक नहीं दिख रही है।” 

ऐसा नहीं है कि भारतीय उद्योगपतियों ने दान और लोककल्याण की दिशा में पहल न की हो। महात्मा गांधी के प्रयासों तथा ट्रस्टीशिप के उनके सिद्धांतों से प्रेरित होकर बिड़ला और टाटा जैसे औद्योगिक घरानों में इस दिशा में अच्छी पहल की, जो आज भी जारी है। ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को बापू ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर प्रतिपादित किया था। ट्रस्टीशिप का मूल आधार यह है कि किसी व्यक्ति का निजी संपत्ति पर गैरजिम्मेदाराना, अनियंत्रित और पूरा अधिकार नहीं है। किसी भी धनी व्यक्ति का संपत्ति पर तभी तक अधिकार है, जब तक उसे समाज का विश्वास मिला हुआ है। लेकिन तब भी वह पूरी संपत्ति को किसी भोग के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता। वह उतनी ही संपत्ति के निजी भोग का अधिकारी है, जितनी देश के दूसरे लोगों को प्राप्त है। बाकी सम्पत्ति का उपयोग उसे दूसरों के लिए करना होगा। 

आज देश अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी, भुखमरी, आतंकवाद, नक्सलवाद आदि समस्याएं विकराल हो रही हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ी हैं। महंगा इलाज होने के कारण गरीब आदमी इलाज से वंचित रह जाता है। जनसमस्याएं भी कम नहीं हैं। पानी, बिजली, सड़क की समस्याएं विकट हैं। ऐसे में उद्योग जगत का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह आगे आकर राष्ट्र और समाज निर्माण में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले। उस उदारता का परिचय दे, जिसके लिए भारतीय संस्कृति जानी पहचानी जाती है। 

भारतीय उद्योगपतियों को अपना सामाजिक दायित्व समझना होगा तथा जनता को जनार्दन मान कर उसकी सेवा के लिए उद्यत होना होगा। चूंकि मानव को ईश्वर की श्रेष्ठतम रचना माना गया है, अतः इस दृष्टि से सामाजिक कार्य भी ईश्वरीय कार्य के ही समतुल्य हैं। ख्याति अर्जित करने की चाह या स्वार्थ सिद्धि के ध्येय से बचते हुए यदि पवित्र और पारदर्शी भाव से समाज कल्याण की पहल की जाए तो इससे संतुष्टि और शांति दोनों मिलती है। सेवा सदन में मुंशी प्रेमचंद कहते हैं- “अगर समाज को विश्वास हो जाए कि आप उसके सच्चे सेवक हैं, आप उसका उद्धार करना चाहते हैं, आप निःस्वार्थी हैं, तो वह आपके पीछे चलने को तैयार हो जाता है।” सेवा के इन पवित्र भावों को अपना कर भारतीय धनिक समाज की सहानुभूति प्राप्त कर सकते हैं और सामाजिक ऋण से उऋण भी हो सकते हैं। 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

twenty − 16 =