Current Essay topics 2022 in Hindi-मीडिया में स्व-नियमन

Current Essay topics 2022 in Hindi-

Current Essay topics 2022 in Hindi-मीडिया में स्व-नियमन(Self Regulation) 

मानव सभ्यता के विकास का सार-संकलन कर मनुष्य ने एक सूत्र निकाला है: ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है। वह आवश्यकतानुसार वस्तु-विचार-व्यवहार का आविष्कार करता रहा है। सभ्यता के प्रारंभ में स्वतः स्फूर्तता और नैसर्गिकता का जोर था। फिर जब यह उजागर हुआ कि एक की स्वतः स्फूर्तता दूसरे से टकरा सकती है तो कुछ नियमन जरूरी हुआ। हम अपने-अपने घरों में सांप की तरह भी चल सकते हैं पर सड़क पर अगर सब सर्पिल गति से चलें तो आपस में टकरा सकते हैं। तब नियम बने होंगे कि एक दिशा में जाने वाले सड़क की एक तरफ से किसी देश में बाएं तो किसी देश में दाहिने, चलें ताकि टकराहट से बचा जा सके। इसी तरह आवश्यकतानसार नियम-कानून-नैतिकताएं-मर्यादाएं विकसित हुईं। कुछ को मनुष्य की सदिच्छा पर छोड़ दिया गया तो कुछ को राज्य संचालित करने लगा। उन्हें कानून कहा जाने लगा। उनके उल्लंघन पर राज्य सजा दे सकता है। 

परंतु राज्य को सरकारें चलाती हैं, जिनके अपने निहित हित होते हैं। इसीलिए राज्य द्वारा निर्धारित नियम कानून की व्याख्या करने के लिए जनतंत्र में न्यायपालिका का विधान बनाया गया है। कभी-कभी जब न्यायपालिका की व्याख्या को भी न्यायोचित नहीं माना जाता तो उनका विरोध होता है और कभी-कभी तो आन्दोलन और क्रांतियां तक होती हैं। __कानून भी एक तरह का अनुशासन है। और हर अनुशासन की तरह ऊपर से आरोपित किया जाता है। इसीलिए उसके प्रतिकार की प्रवत्ति पैदा होती है। नैतिक और दार्शनिक स्तर पर यह भी कहा जाता है कि वास्तव में स्वानुशासन ही सर्वोत्तम होता है। पर वह स्वेच्छाचारी तो नहीं हो सकता। इसी तरह व्यक्ति-व्यक्ति के, व्यक्ति और संस्था के, संस्था-संस्था के और नागरिक तथा राज्य के हित टकरा सकते हैं। ऐसे में स्वानुशासन तो पर्याप्त नहीं होगा। तब किस सिद्धांत और व्यवहार द्वारा समन्वय किया जाय? यानी नियमन कैसे हो? कौन करे? किस हद तक करे? जैसे प्रश्न उठते ही रहते हैं। यह प्रश्न आज भी मीडिया के संदर्भ में उठाया गया है। ” 

इस प्रश्न को परिप्रेक्ष्य देने के लिए संक्षेप में मीडिया का मूल्यांकन जरूरी है। 

मीडिया आज संस्कृति का सबसे प्रभावी वाहक है। वैसे तो मीडिया आधुनिक काल की देन है, जब से लोक भाषाएं राष्ट्र भाषा बनने लगी और तकनीकी प्रगति ने उन्हें विस्तार और संवाद का प्रभावी और व्यापक माध्यम बना दिया। परन्तु हमें याद रखना चाहिए कि व्यक्ति और संस्थाएं अपनी बात को जन तक पहचाने के लिए तरह-तरह के माध्यम अपनाती रही हैं। अशोक के शिलालेखों को क्या उस समय की मीडिया नहीं कहा जा सकता? 

“मीडिया आज संस्कृति का सबसे प्रभावी वाहक है। 

बहरहाल, सत्रहवीं शताब्दी में तो पश्चिमी यूरोप के देशों में प्रिटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगे थे। यहां तक कि अट्ठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड के विचारक एडमंड बर्क ने समाचार पत्रों को फोर्थ एस्टेट’ यानी समाज का चौथा स्तंभ करार दिया था और आज भी उसे यही समझा जाता है। भारत में भी ईस्ट इंडिया के शुरुआती शासन काल में ही अखबार निकलने लगे थे, यहां तक कि जल्दी ही खड़ी बोली हिन्दी में भी कलकत्ते से ‘उदन्त मार्तन्ड नाम से अखबार प्रकाशित होने लगा था। ये अखबार शासकों की ही नहीं जनता की भी आवाज बनने लगे थे। इसीलिए लार्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस यानी देशी भाषाओं के अखबारों पर नियंत्रण लगाने के लिए एक कानून बना दिया था। 

बीसवीं सदी में पहले रेडियो फिर टेलीविजन आया जिसे सरकार ने पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखा। पर ज्यों-ज्यों राष्ट्रीय आंदोलन तेज होता गया पत्र-पत्रिकाएं भारत के जागरण का प्रवक्ता बनने लगीं। भारत के विख्यात नेता सफल पत्रकार भी थे। लोकमान्य तिलक ने ‘केसरी’ सी.वाइ, चिन्तामणि ने ‘लीडर’ और जवाहर लाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड’ नामक पत्र निकाले थे। गांधी जी तो देश के सबसे बड़े पत्रकार थे। उन्होंने ‘नव जीवन’ और ‘हरिजन’ के माध्यम से जनता को आजादी की लड़ाई से जोड़ा। बीसवीं सदी में सारी दुनिया में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन का मख्य प्रवक्ता पत्र-पत्रिकाएं ही रहीं। 

इस दौरान यह स्थापित हो गया कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जनतंत्र की मुख्य लाक्षणिकता है। इसीलिए औपनिवेशिक शक्तियों ने इस स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना जरूरी समझा। इसी से यह विडम्बना उजागर हुई कि ये शक्तियां अपने देश में जनतंत्र लागू करती थीं पर उपनिवेशों में वही कानून नहीं लागू होने देती थीं। उदाहरण के लिए ब्रिटेन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी पर भारत में नहीं। 

आजादी के बाद उपनिवेशों की सरकारों ने मीडिया पर नियंत्रण जारी रखा। उदाहरण के लिए भारत में रेडियो और दूरदर्शन सरकारी नियंत्रण में रहे। पत्र-पत्रिकाओं को छूट रही पर उन पर भी नियंत्रण करने का बीच-बीच में डर दिखाया जाता रहा। अन्त में जब आपातकाल लागू किया गया तो जनतंत्र ध्वस्त हो गया और मीडिया को सरकार का भोंपू यानी ‘हिज मास्टर्स वायस’ बना दिया गया। 

आपातकाल के बाद कोशिश होती रही है कि वैसी स्थिति की पुनरावृत्ति न होने पाए। 

“मीडिया आत्मनियमन करे पर उस पर भी कोई सर्व-स्वीकार्य दक्ष लोगों का अंकुधा हो?” 

आज की स्थिति यह है कि पत्र-पत्रिकाएं तो सामान्यतः नियंत्रित नहीं की जातीं, जब तक सरकार को ऐसा न लगे कि वे देशद्रोह फैला रही हैं। पर यह सरकार की मर्जी पर है। वह किसी को भी वामपंथी या दक्षिणपंथी और अतिवादी करार देकर अंकुश लगाती रहती है। सामान्य मीडिया यानी उदारवाद के घेरे में आने वाली अभिव्यक्तियों को वह छूट देती है, उसे बढ़ाती भी गई है। जैसे सिनेमा और टी.वी. में अब खुलेआम अश्लीलता, हिंसा और अंधविश्वास को बढ़ावा मिल रहा है, वह भी सरकारी ‘सेंसर बोर्ड के बावजूद। ऐसे में सरकार बार-बार धमकी देती है कि कोई न कोई अंकुश लगाना जरूरी है। भारत में अब संपादक का अवमूल्यन हो गया है और मालिक ही अखबारों को पूरी तरह नियंत्रित करता है। अब तो ‘पेड न्यूज’ का चलन है। मीडिया तरह-तरह के स्टिंग आपरेशन’ करती है। दुनिया के सबसे बड़े मीडिया महाजन’ रूपर्ट मरडॉक के अखबार ने ऐसा कत्य किया कि उसे अपना एक लोकप्रिय’ अखबार जन-दबाव में बंद करना पड़ा। ऐसी स्थिति में मीडिया पर अंकुश की बात जोर पकड़ती जा रही है। अब यह अंकुश कौन लगाए? सरकारें इतनी बदनाम हो चुकी हैं कि उनके द्वारा लगाया जाने वाला अंकुश किसी को भी स्वीकार्य नहीं है। हालांकि अभी हमारा मीडिया पूरी तरह ‘Rouge’ यानी बदमाश नहीं हुआ है पर उस पर किसी तरह का अंकुश तो जरूरी लगता है। अगर सरकार अंकुश न लगाए तो फिर तो मीडिया को आत्म-नियमन करना चाहिए। मीडिया के स्व-नियमन की बेहतर पहल मीडिया-जगत की ओर से ही हो सकती है। इसके लिए मीडिया जगत को आत्मनिरीक्षण करना होगा। ऐसा करते हुए मीडिया को यह समझना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी नहीं है। यदि मीडिया जगत ने स्वतंत्रता को सही अर्थों में लिया होता तो इसमें ‘पेड न्यूज’ और ‘फर्जी स्टिंग ऑपरेशन’ जैसी विकृतियां देखने को नहीं मिलतीं। मीडिया जगत से जुड़ी यह एक विडंबना है। कि स्वतंत्रता के साथ जिस बड़ी जिम्मेदारी का एहसास इसे करना चाहिए, वह नहीं किया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रता के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी हम पर आती है, जिसका पूरी पारदर्शिता के साथ हमें निर्वाह करना चाहिए। इस बड़ी जिम्मेदारी का पूरी तटस्थता के साथ निर्वाह कर के ही हम स्व-नियमन की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

आज मीडिया की स्थिति यह है कि आजादी के दिनों के आदर्शवाद का नामोनिशान तक नहीं बचा। मीडिया में कुछ आदर्शवादी पत्रकार अभी भी हैं पर स्वामित्व तो प्रायः पूंजीपतियों और व्यवसायियों के हाथ में है। ऐसे में उन्हें तो बस ‘मुनाफा चाहिए। जो बिकता है उसे वे बेचेंगे ही-जहर भी। और क्या बिके यह भी वे ही प्रचारित करते हैं। इसलिए उन्हीं पर पूरी तरह छोड़ देना भी उचित नहीं। वैसे ‘द हिन्दू’ ने पाठकों की रुचि और हित का ध्यान रखने के लिए रीडर्स एडीटर’ की नियुक्ति की है। पर सभी चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती। कोई विचारधारात्मक अंकुश ता स्वीकार्य नहीं होगा-अब तो अश्लीलता के बारे में भी मतभद है। पर क्या कोई ऐसा मापदंड नहीं बन सकता कि खुलआम जन विरोधी बातों को मीडिया में प्रश्रय न मिले? मीडिया आत्मनियमन करे पर उस पर भी कोई सर्व-स्वीकार्य छ लोगों का अंकुश हो? आत्मनियमन को भी तो नियमित कर पड़ेगा ही। 

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