Current Essay topics 2021-कोविड-19 के आगमन पूर्व आर्थिक स्थिति 

Current Essay topics 2021-कोविड-19 के आगमन पूर्व आर्थिक स्थिति 

Current Essay topics 2021-कोविड-19 के आगमन पूर्व आर्थिक स्थिति 

भारतीय अर्थव्यवस्था, जिसमें कोविड-19 की शुरूआत (दिसम्बर 2019) से पूर्व से ही गिरावट देखी जा रही थी और वित्तीय वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही तक आते-आते यह गिरावट स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगी थी. इस बात के संकेत नेशनल स्टेटिस्टीकल ऑफिस (एनएसओ) द्वारा 29 नवम्बर, 2019 को जारी किए जीडीपी के आँकड़ों, जिसमें स्थिर मूल्य (2011-12) पर दूसरी तिमाही के लिए, वित्तीय वर्ष 2018-19 में, जीडीपी ₹34-43 लाख करोड़ की तुलना में वित्तीय वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही में ₹35.99 लाख करोड़ आंकी गई, और इस प्रकार जीडीपी में दूसरी तिमाही में यह वृद्धि दर 4.5% आकी गई, जो बीते छह वर्षों में सर्वाधिक नीची थी, बेरोजगारी की दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर दर्ज की गयी बेरोजगारी की दर में वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, औद्योगिक इकाइयों में कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी और विभिन्न क्षेत्रों की वृद्धि दर में गिरावट स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगी, वहीं कुछ सेक्टर में यह वृद्धि ऋणात्मक होने के साथ ही, कोरोना के पहले ही लगातार आठ तिमाहियों में आई आर्थिक विकास में गिरावट से इस बात की आशंकायें व्यक्त की जाने लगी थीं कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर शुरू होने जा रहा है ? इससे, सरकार के सामने इस चुनौती से निपटने और आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करने या आर्थिक वृद्धि दर को बरकरार रखने का संकट दिखाई देने लगा.

कोविड-19 का आगमन और भारतीय अर्थव्यवस्था 

सरकार इस दिशा में अपनी नीतियों और कार्य-योजनाओं को वास्तविकता के धरातल पर ठीक प्रकार से उतार पाती, उससे पूर्व ही दिसम्बर 2019 में चीन से शुरू हुए कोविड-19 के विश्वव्यापी संकमण ने न सिर्फ चीन के लिए बल्कि समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया एक तरफ जहाँ विभिन्न देशों, खासकर विकासशील और पिछड़े देशों को अपने सीमित संसाधनों को इस महामारी से निपटने पर व्यय करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इस वायरस के प्रसार को रोकने की दृष्टि से आर्थिक गतिविधियों एवं उत्पादन पर नियंत्रण लगाने और लॉकडाउन जैसे कठोर उपायों को अपनाने की बाध्यताओं के चलते आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट आने लगी, और इस सम्बन्ध में अध्ययन करने वाली अधिकांश प्रमुख वित्तीय एजेंसियों द्वारा वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट की आशंका व्यक्त की गयी, 

कोविड-19 के संक्रमण से पूर्व ही भारतीय अर्थव्यवस्था में देखी गयी गिरावट तथा कोविड-19 के चलते लागू किए गए लॉकडाउन, रोजगार के छिनने, आय में कटौती तथा नए रोजगार के अवसरों में कमी के चलते माँग में आयी तीव्र गिरावट और आपूर्ति के बाधित होने को ध्यान में रखते हुए यह बात छुपी हुई नहीं रह गई है। कि अर्थव्यवस्था के प्रमुख संकेतक न सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था के वर्तमान संकट की| ओर इशारा करते हैं बल्कि चालू वित्त वर्ष | की पहली तिमाही में 23-9 की ऋणात्मक दर तथा दूसरी तिमाही में 75 प्रतिशत की ऋणात्मक दर भी यह स्पष्ट संकेत देती है कि आगे आने वाला समय भी समूचे विश्व के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी मुश्किल भरा हुआ है,

कोविड-19 और आर्थिक संघर्ष 

अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स (Oxford Economics) की ग्लोबल रिपोर्ट में यह आकलन व्यक्त किया गया है कि कोविड-19 महामारी के प्रकोप की बजह से 2025 तक भारत की जीडीपी, कोविड से पहले की तुलना में, 12% तक नीची रहेगी. संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2020 से 2025 के बीच आर्थिक विकास दर कोविड महामारी से पहले अनुमानित 6-5% से गिरकर सिर्फ 4-5% रहने का पूर्वानुमान है. 

कोविड-19 की इस वैश्विक महामारी से शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र अथवा राष्ट्र रहा होगा जिसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस महामारी ने प्रभावित न किया हो. इसके प्रकोप से विश्व के अत्यंत विकसित एवं संपन्न संपन्न समझे जाने वाले देश भी अपने आपको सुरक्षित नहीं कर सके और सर्वाधिक शक्तिशाली समझे जाने वाले राष्ट्र अमेरिका और उसके राष्ट्राध्यक्ष तक भी अछूते नहीं रहे और इन देशों की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ा तब पिछड़े एवं विकासशील देश, जिनके पास इस महामारी से निपटने का सीमित बुनियादी ढाँचा एवं संसाधन मौजूद थे, की अर्थव्यवस्थाओं पर इसका गंभीर दुष्प्रभाव पड़ना अवश्यसंभावी ही था, भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर भी इस महामारी के प्रकोप का अत्यंत गहरा असर पड़ा, जिसका फलिवार्य आज भी उठाना पड़ रहा है और आगे भी इसके दुष्प्रभावों का कब तक सामना करना होगा, इसके बारे में भी कोई स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है,

कोविड-19 का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 

कोविड-19 ने भारतीय अर्थव्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित किया है ? इसे हम निम्नलिखित के द्वारा समझ सकते हैं 

भारत उन दशों में शामिल रहा, जिन्होंने कोविड-19 के चपेट में आने के शुरूआती दौर में ही लॉकडाउन जैसे सख्त कदम उठाकर कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने का प्रयास किया. इसका परिणाम यह हुआ कि अमेरिका, ब्राजील और इटली जैसे दशों में जब कोरोना वायरस का तेजी से प्रसार हो रहा था, तब भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले विकासशील देश में इस वायरस के प्रसार की दर अपेक्षाकृत धीमी रही लेकिन इसके कारण छोटे कामगारों, निर्धन और श्रमिक वर्ग और विशेषकर अप्रवासी श्रमिक, जो रोजी रोटी की तलाश में अपने घर तथा गाँव को छोड़कर महानगरों का रुख करता है अथवा असंगठित क्षेत्र में श्रम बेचकर या महानगरों में जाकर छोटे-मोटे स्वरोजगार के जरिये अपना जीवन यापन करता है, उसे जिस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उन दृश्यों को देखकर कठोर-से-कठोर हृदय भी द्ववित हो सकता है.

कोविड-19 रोजगार एवं श्रमिक 

निर्माण श्रमिकों और उनके परिवार की जरूरतों को पूरा करने में आने वाली मुश्किलों को देखते हुए, केन्द्र द्वारा राज्यों को निर्माण श्रमिको के लिए₹31,000 करोड़ के कल्याण कोष का उपयोग करने का निर्देश दिया गया 

विश्व बैंक के मुताबिक महामारी के कारण 150 मिलियन लोगों के साल 2021 तक अत्यंत गरीबी से जुड़ने की संभावना है, रिपोर्ट के मुताबिक मध्य आय वाले देशों में 82 फीसदी लोगों को घर चलाने में समस्या आ सकती है, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट वर्ल्ड इकोनामिक आउटलुक के अनुसार चालू वित्त वर्ष के दौरान भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 10.3 गिरकर 1877 डॉलर रह जाएगी जो कि आईएमएफ की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी के अनुमान 1888 डॉलर से भी 4 प्रतिशत कम है. 

महामारी के दौरान लागू किए गए। सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंधों से बेरोजगारी में गंभीर वृद्धि हुई है जिससे नौकरी प्रदाताओं द्वारा नए श्रमिकों को काम , पर न रखने और पुराने श्रमिकों को नौकरी से बाहर निकाला जाना है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labor Organi zation & ILO) के अनुसार कोविड-19 महामारी के कारण 2020 की पहली तीन । तिमाहियों में वैश्विक स्तर पर अमिकों की । आय में 10-7 प्रतिशत या 3,500 अरब डॉलर की जबर्दस्त गिरावट आई है, आईएलओ के संशोधित अनुमान के अनुसार, चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में 2019 की चौथी तिमाही की तुलना में वैश्विक स्तर पर 17.3 प्रतिशत कार्य घंटों का नुकसान । रहा, जो 49.5 करोड़ पूर्णकालिक समतुल्य (एफटीई) रोजगार के बराबर है. 2020 की तीसरी तिमाही में कार्य घंटों का नुकसान उच्च स्तर 12.1 प्रतिशत या 34.5 करोड़ एफटीई रोजगार के बराबर रहने का अनुमान है. आईएलओ ने कहा कि 2020 की चौथी तिमाही में कार्य घंटों का नुकसान पिछले साल की समान तिमाही की तुलना में 8-6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो 24.5 करोड़ एफटीई रोजगार के बराबर है. इतना ही नहीं आईएलओ द्वारा वित्तीय वर्ष 2020 की अतिम तिमाही में भी 160 मिलियन से 515 मिलियन लोगों की नौकरी खोने का अनुमान व्यक्त किया गया है, 

कोविड-19 और बैंकिंग 

बैंक, जो कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, पर कोविड-19 के प्रभाव के सम्बन्ध में वैश्विक कंसल्टेंसी फर्म मैकिंजी ने अनुमान व्यक्त किया है कि कोविड-19 महामारी की वजह से भारतीय बैंकों को कॉरपोरेट्स, एमएसएमई, उपभोक्ता उधारी पर बढ़ती जोखिम लागत, उपभोक्ता और थोक उधारी की कम मांग की वजह से बिक्री पर दबाव तथा मार्जिन पर दबाव की वजह से वर्ष 2024 तकर 12 लाख करोड़ के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, कम्पनी का मानना है कि भारतीय बैंकों को कोविड-19 से पहले जैसी मुनाफे और निवेश पर प्रतिशत की दर (आरओई) की स्थिति में लौटने के लिए उत्पादकता में 25 से 30% की वृद्धि करने की आवश्यकता होगी.

कोविड-19 और रीयल्टी सेक्टर 

रीयल्टी सेक्टर जो कि कोविड-19 से पूर्व ही संकट के दौर से गुजर रहा था, कोविड-19 के कारण रोजगार के अवसरों और आय में कटौती आदि के कारण और भी खराब दौर से गुजर सकता है. क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार चालू वित्त वर्ष में 10 शीर्ष शहरों में रीयल्टी सेक्टर की प्राइमरी सेल में 50 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान लगया गया है,

कोविड-19 और ओटोमोबाइल सेक्टर 

कोरोना वायरस के शुरुआती दौर में लॉकडाउन अवधि में नए वाहनों की बिक्री में 78 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली. वाहन निर्माताओं के संगठन सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चर्स (सियाम) के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 की पहली छमाही में यात्री वाहनों का निर्यात 57-55 प्रतिशत घट गया. इसी प्रकार यूटिलिटी वाहनों का निर्यात 29-67 प्रतिशत घट गया. वाहन उद्योग ऐसा क्षेत्र है, जो बड़ी मात्रा में लोगों को रोजगार प्रदान करता है, ऐसे में स्पष्ट है कि वाहन उद्योग में गिरावट आने से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ेगा. 

कोरोना महामारी ने जिन उद्योगों को बुरी तरह से प्रभावित किया है, उनमें से एविएशन उद्योग भी एक है, क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, इस संक्रमण के चलते इस साल इन कम्पनियों का रेवेन्यू ₹24,000-25,000 करोड़ तक घट सकता है.क्रिसिल के अनुसार, इस साल एयरलाइंस का रेवेन्यू ₹ 17,000 करोड़ एयरपोर्ट्स का रेवेन्यू ₹ 5,500 करोड़ और एयरपोर्ट रिटेलर्स का रेवेन्यू ₹ 1,800 करोड़ तक घट सकता है 

कोविड-19 और उद्योग जगत् 

देश के जीडीपी में कुल 30 प्रतिशत की भागीदारी वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) क्षेत्र भी कोरोना महामारी से अछूता नहीं रहा है, देश के कुल निर्यात में एमएसएमई क्षेत्र की 48 प्रतिशत हिस्सेदारी है तथा 11 करोड़ रोजगार भी सजित करता है. क्रिसिल रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस संकट से जहाँ उद्योग जगत के रेवेन्यू में 15 फीसदी और मार्जिन में 25 फीसदी की गिरावट आ सकती है, वहीं छोटे उद्योगों को यह तबाह कर सकता है. 

कोविड-19 महामारी के असर को देखते हुए देश-विदेश की विभिन्न वित्तीय एजेंसियों द्वारा अर्थव्यवस्था में गिरावट का अनुमान लगाया गया है. आईएमएफ ने इस साल देश की अर्थव्यवस्था में 4.5 फीसदी कमी आने का अनुमान लगाया था जबकि विश्व बैंक ने जीडीपी में 3-2 फीसदी तथा एडीबी द्वारा 4 फीसदी कमी आने का अनुमान लगाया गया. नोमुरा के अनुसार भारत की जीडीपी 5-2 फीसदी घट जाएगी. इक्रा ने चालू वित्त वर्ष में जीडीपी में 9.5 फीसदी कमी का अनुमान जताया है.

कोविड-19 का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 

पहली और दूसरी तिमाही के जीडीपी नतीजों ने गिरावट की आशंकाओं को सही साबित किया है. चालू वित्त वर्ष 2020-2021 की पहली तिमाही में देश की जीडीपी में 23.9 फीसदी कमी आई है. पहली तिमाही में माइनिंग में 23-3 फीसदी कमी आई वहीं मैन्युपफैक्चरिंग में 39.3 फीसदी की गिरावट आई. ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन में यह गिरावट 47 फीसदी, माइनिंग आउटपुट में गिरावट 23-3 फीसदी, कंस्ट्रक्शन में गिरावट 50-3 फीसदी, इलेक्ट्रिसिटी और गैस में 7% गिरावट रही. तीसरी तिमाही के नतीजों में सिर्फ कृषि क्षेत्र ही ऐसा था जिसकी वृद्धि दर 3-4 फीसदी धनात्मक रही. 

दूसरी तिमाही की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में 7.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. दूसरी तिमाही में उद्योग क्षेत्र में 2.1, खनन क्षेत्र में 9.1 और विनिर्माण के क्षेत्र में 86 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है जबकि कृषि क्षेत्र और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है. कृषि क्षेत्र में जहाँ यह वृद्धि 3-4 फीसदी रही है वहीं मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 0-6 फीसदी की वृद्धि हुई है, ब्रोकरेज हाउस नोमुरा ने अनुमान व्यत्त किया था कि भारत का राजकोषीय घाटा, जिसका बजट में वित्त वर्ष 2021 में 3-5% का लक्ष्य रखा गया था, बढ़कर 8.6% के करीब पहुँच सकता है. 

अप्रैल से नवम्बर 2020 के दौरान भारत का व्यापार घाटा 42 अरब डॉलर रहा है जो पिछले वित्तीय वर्ष की समान अवधि में 113-42 अरब डॉलर था. व्यापार घाटे में यह कमी फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में 15 प्रतिशत निर्यात वृद्धि, चावल निर्यात में 39 प्रतिशत वृद्धि, लौह अयस्क के निर्यात में 62 फीसदी वृद्धि के कारण हुई है.

अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत 

यह सही है कि कोरोना वायरस ने अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और दुनिया में सात करोड़ से अधिक लोग अभी भी कोरोना से संक्रमित हैं तथा भारत में अभी भी प्रतिदिन लगभग 20 से 25 हजार कोरोना संक्रमित नए मरीज सामने आ रहे हैं तब अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर 

लौटने में कितना वक्त लग सकता है, इसका सटीक आंकलन संभव नहीं है, चालू वित्तीय वर्ष की जीडीपी में ऐतिहासिक गिरावट वाली पहली तिमाही के नतीजे के बाद दूसरी तिमाही के नतीजे इस बात का संकेत अवश्य देते हैं कि सुधार की गति धीमी भले ही हो, लेकिन अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर से बाहर निकल रही है. विदेशी अनुसंधान एवं ब्रोकरेज हाउस नोमुरा द्वारा व्यक्त किए गए पूर्वानुमानों के अनुसार वर्ष 2021 में भारतीय अर्थव्यवस्था 9.9% की दर से बदेगी. कुछ इसी प्रकार की उम्मीद फिच रेटिंग्स द्वारा भी व्यक्त की गई है. फिच रेटिंग्स के अनुसार चालू वित्त वर्ष के दौरान जीडीपी में 9-4% का संकुचन होगा, जो फिच द्वारा पहले व्यक्त किये गए 10-5% संकुचन के अनुमान से लगभग 1% अंक कम है. एशियाई विकास बैंक ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए अपने पूर्व के 9 प्रतिशत संकुचन के अनुमान को संशोधित करते हुए 8% कर दिया है, एशियाई विकास परिदृश्य (एडीओ) की अनुपूरक रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था सामान्य स्थिति की ओर लौट रही है और दूसरी तिमाही में संकुचन 7.5 रहा है जो उम्मीद से बेहतर है.वर्ष 2008 की विश्वव्यापी मंदी के समय भी, जब विभिन्न एजेंसियों द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के विश्वव्यापी मंदी की चपेट में आने की आशंकाएं व्यक्त की जा रही थी, तब भी भारत ने न सिर्फ मंदी की तत्कालीन स्थिति का सफलतापूर्वक सामना किया था बल्कि विश्व की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ भी मंदी से बाहर निकलने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था से होकर रास्ता खोज रही थीं, 

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आँकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल-जून तिमाही में औद्योगिक उत्पावन सूचकांक में बीते वर्ष इसी अवधि की तुलना में 35.9 प्रतिशत की गिरावट हुई, जबकि वर्ष 2019 की अप्रैल-जून तिमाही में | इसमें 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी- आँकड़े बताते हैं कि इस वर्ष अप्रैल जून तिमाही में उपभोत्ता टिकाऊ वस्तुओं में (67-6 प्रतिशत), पूंजीगत वस्तुओं में (64-3| प्रतिशत) और विनिर्माण में (40-7 प्रतिशत) की गिरावट देखी गयी. 

कोविड-19 और वर्तमान आर्थिक समीक्षा 

भारत का विशाल बाजार मंदी की स्थिति से बाहर निकलने में सक्षम है. सरकार द्वारा घोषित किये गए प्रोत्साहन/आर्थिक पैकेज पूर्ति पक्ष को राहत प्रदान करने की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आवश्यकता इस बात की भी है कि कोरोना संकट के कारण लोगों का रोजगार छिनने, रोजगार के नए अवसरों में वृद्धि न होने तथा आय में कटौती होने के कारण उपभोग माँग में जो कमी आयी है, उसे देखते हुए योजनाएँ बनाते समय तथा प्रोत्साहन/आर्थिक पैकेज प्रदान करते समय, चपभोग माँग बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए. वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण का भी मानना है कि अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में सुधार दिख रहा है और इसमें आगे और तेजी आएगी. सरकार द्वार घोषित आर्थिक पैकेज एवं उठाये गए सुधारवादी कदमों से उम्मीद की जानी चाहिए कि कोविड-19 के कारण अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक बुरा वक्त पीछे छूट चुका है और अर्थव्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया शीघ्र ही रफ्तार पकड़ेगी. 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

1 × 1 =