भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष प्रमुख चुनौतियां | भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान चुनौतियां Drishti IAS

भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान चुनौतियां Drishti IAS

भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष प्रमुख चुनौतियां | भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान चुनौतियां Drishti IAS

यह सर्वविदित है कि सामाजिक जीवन तथा सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करने वाले सर्वाधिक प्रबल कारक आर्थिक होते हैं। यही कारण है कि आर्थिक विकास पर विशेष बल दिया जाता है तथा इसके तहत उत्पादन के साधनों जैसे—कृषि, उद्योग, श्रम, पूंजी तथा व्यापार आदि के विकास पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हमारे देश में आर्थिक विकास के यथेष्ट प्रयास होते रहे, जिनसे हम लाभान्वित भी हुए। इस आर्थिक विकास के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष कुछ प्रमुख चुनौतियां भयावह रूप से उपस्थित रहीं, जिनसे हम आज तक उबर नहीं पाए हैं। 

“गरीबी, बेरोजगारी एवं मूल्य वृद्धि ये वे तीन प्रमुख चुनौतियां हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष सदैव उपस्थित रहीं और अनेक प्रयासों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था इन चुनौतियों से उबर नहीं पाई।” 

गरीबी, बेरोजगारी एवं मूल्य वृद्धि ये वे तीन प्रमुख चुनौतियां हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष सदैव उपस्थित रहीं और अनेक प्रयासों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था इन चुनौतियों से उबर नहीं पाई। खास बात यह है कि ये तीनों ही समस्याएं अत्यंत भयावह और विकराल हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इतने वर्ष बीत गए, किंतु इस अवधि में इन समस्याओं-चुनौतियों से उबर न पाना, इन्हें नियंत्रित न  कर पाना, यकीनन चिन्ता का विषय है। 

पहले हम बात गरीबी की करते हैं, जो हमारी अर्थव्यवस्था के समक्ष सर्वप्रमुख चुनौती है, तो देश के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। गरीबी से अभिप्राय उस स्थिति से है, जिसमें किसी व्यक्ति को अपने जीवनयापन के लिए भोजन, वस्त्र और मकान जैसी न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी करने में भी कठिनाई होती है। सामान्य रूप से बेरोजगार, भूमिहीन, कृषि मजदूर, अनियमित मजदूर, आदिवासी, अपंग और शारीरिक रूप से अयोग्य व्यक्ति गरीबी से ग्रस्त माने जाते हैं। भारत में गरीबी के कई कारण हैं। सर्वप्रमुख कारण यह है कि वैकल्पिक व्यवसाय न होने के कारण ग्रामीणों को खेती पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इसमें अधिकांश लोगों की आय का स्तर बहुत कम है। ग्रामीण क्षेत्र में भूमिहीनों की संख्या अच्छी-खासी है। इस क्षेत्र में मजदूरों को बराबर काम भी नहीं मिलता है। इसके अलावा हस्तशिल्प उद्योगों की दयनीय दशा, जनसंख्या वृद्धि, साक्षरता का अभाव, जाति व्यवस्था, बढ़ता मशीनीकरण, बड़े परिवार एवं रोजगार के अवसरों की कमी आदि वे कारण हैं, जिन्होंने गरीबी को बढ़ाया है। इनके अलावा गरीबी बढ़ने का एक बड़ा कारण सरकार द्वारा चलाए जाने वाले गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों का भ्रष्टाचार का शिकार हो जाना भी है। एक कारण यह भी रहा कि हम आर्थिक विकास को समावेशी स्वरूप नहीं दे पाए। 

हमारे देश में गरीबी से लड़ने के लिए जहां ‘गरीबी हटाओ’ जैसे आकर्षक नारे दिए गए, वहीं गरीबी उन्मूलन के लिए कई कार्यक्रम भी चलाए गए। इन कार्यक्रमों में प्रमुख हैं-स्वर्ण जयंती ग्राम स्वराज्य योजना, मनरेगा, जवाहर ग्राम समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना आदि। तमाम प्रयासों के बावजूद गरीबी का उन्मूलन देश में नहीं हो सका। यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार 2018 में भारत में लगभग 271 मिलियन लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जरा सोचिए, स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की कुल जनसंख्या 33 करोड़ थी, जिसके आस-पास आज देश में गरीबों की संख्या है। स्पष्ट है कि हमारी अर्थव्यवस्था गरीबी उन्मूलन के मोर्चे पर असफल रही। इस बिन्दु पर आज गंभीर मंथन की आवश्यकता है। 

भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष दूसरी प्रमुख चुनौती बेरोजगारी की है। बढ़ती गरीबी की तरह हम बढ़ती हुई बेरोजगारी को भी काबू में नहीं कर पाए हैं। जब भी किसी व्यक्ति को जीवकोपार्जन के लिए लाभप्रद काम या नौकरी नहीं मिलती है, तो वह बेरोजगार’ कहलाता है। इसी प्रकार ‘बेरोजगारी’ उस स्थिति को कहते हैं जिसमें लोग काम के योग्य तो होते हैं और काम करना भी चाहते हैं, किंतु उन्हें काम नहीं मिलता। भारत में अनेक स्वरूपों में बेरोजगारी देखने को मिलती है, यथा-ढांचागत बेरोजगारी, शिक्षित बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी, अप्रत्यक्ष बेरोजगारी आदि।

भारत में बेरोजगारी का प्रमुख कारण जनसंख्या वृद्धि को माना जाता है। अवसर कम हैं और आबादी ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो रोजगार के अवसरों का नितांत अभाव है। कौशल विकास एवं पूंजी का अभाव भी बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है। हमारे यहां उद्यमशीलता के अभाव के कारण भी बेरोजगारी बढ़ी है। हम विद्यालयों के व्यावसायिक पाठ्यक्रम को आज की श्रमशक्ति के अनुरूप नहीं बना पाए हैं, यह भी बेरोजगारी का एक कारण है। 

गरीबी दूर करने की तर्ज पर बेरोजगारी भगाने के अनेक प्रयास हमारे देश में किए गए और किए जा रहे हैं। जहां ‘मनरेगा’ के रूप में रोजगार का महा-अभियान चलाया गया, वहीं हाल ही में ‘स्टार्ट अप ‘स्टैंड अप इंडिया’ के रूप में अच्छी पहलें की गई हैं। कौशल विकास की दिशा में भी हम तत्पर हैं। ‘राष्ट्रीय शहरी आजीविका मन’ एवं ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ के जरिए भी बेरोजगारी के सफाए की कोशिश की गई। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद रोजगारी की समस्या दिन-ब-दिन विकराल और भयावह हो रही है। वर्ष 2011 में भारत में बेरोजगारों की संख्या जहां 40.17 मिलियन थी. वहीं 2012 में यह बढ़ कर 44.79 मिलयन हो गई। स्पष्ट है कि हम भारतीय अर्थव्यवस्था को रोजगारोन्मुख नहीं बना पाए। यही संख्या 2019 में लगभग 78 मिलियन हो गई है। 

बेरोजगारी से अनेक विकृतियां पैदा होती हैं। लोगों में हताशा और कुंठा बढ़ती है, तो अपराध भी बढ़ते हैं। सामाजिक असंतोष बढ़ता है, तो युवा असंतोष के दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं। हमारे देश में युवकों को बेरोजगारी भत्ता भी नहीं दिया जाता है। इस त्रासद स्थिति को देखते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को रोजगारोन्मुख बनाया जाना आवश्यक है। इसके लिए जहां जनसंख्या वृद्धि रोकने के प्रभावी और अर्थपूर्ण उपाय करने होंगे, वहीं रोजगार के अधिकाधिक अवसर सृजित करने होंगे, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में। कौशल भी व्यावसायिक स्पर्श देना होगा। इस समस्या के समाधान के लिए उद्यम संबंधी विकास भी आवश्यक है। 

मूल्य वृद्धि यानी महंगाई भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष वह तीसरी बड़ी चुनौती है, जिसे आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम काबू नहीं कर पाए हैं। मूल्य वृद्धि की समस्या कितनी भयावह है, इसका पता इसी से चलता है कि आजकल राजनीतिक दल मूल्य वृद्धि को बनावी मद्दा बनाने लगे हैं। उपभोग की वस्तुओं, विशेष रूप से आवश्यक श्रेणी की उपभोग की वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि होना मूल्य वृद्धि कहलाता है। महंगाई का बढ़ना हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही प्रश्नगत कर रहा है, क्योंकि एक अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था उसे माना जाता है, जिसमें गरीब की गुजर-बसर भी आसानी से हो जाए। 

भारत में मूल्य वृद्धि की समस्या को बढ़ाने वाले अनेक कारक विद्यमान हैं। इनमें प्रमुख हैं—मांग और पूर्ति के बीच का असंतुलन, कच्चे माल की कीमतें बढ़ना, जमाखोरी, कालाबाजारी, कृषि क्षेत्र की उपेक्षा, प्राकृतिक कोप एवं कृषि की प्रकृति पर निर्भरता, ऊर्जा की कमी और इसकी अधिक कीमतें, जनसंख्या की तीव्र वृद्धि से मांग का बढ़ना, आयातित वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि, वेतनों-मजदूरी में वृद्धि, उपभोग वस्तुओं के निर्यात का बढ़ना तथा अर्थव्यवस्था में व्याप्त कालेधन से परिचलन मुद्रा में वृद्धि आदि। चूंकि मूल्य वृद्धि अनेक कारणों का परिणाम होती है, अतएव इसकी प्रकृति एकलरेखीय न होकर बहुआयामी होती है। इसका सबसे व्यापक दुष्परिणाम यह होता है कि यह स्थिर आय वाले निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों की कमर तोड़ देती है। 

ऐसा नहीं है कि सरकार द्वारा मूल्य वृद्धि की समस्या को नियंत्रित करने के प्रयास न किए गए हों। विविध स्तरों पर प्रयास किए जाते रहे हैं। मूल्यों के निर्धारण के लिए हमारे देश में ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955′ कानून बनाया गया। जो व्यापारी सरकार द्वारा निर्धारित मूल्यों पर अपना माल नहीं बेचते, उन्हें इस कानून के तहत दंडित किया जाता है। मूल्य वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए ही हमारे देश में ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली’ की शुरुआत की गई। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के  अंतर्गत खाद्यान्न, चीनी, खाद्य तेलों एव करोसिन आयल आदि के वितरण का दायित्व केंद्र सरकार का है, जिसे राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों के सहयोग से पूरा किया जाता है। राशन की दुकानों पर मिलने वाले सामान की कीमतें खुले बाजार की तुलना में कम होती हैं। कीमत के अंतर को सरकार वहन करती है। 

“अर्थव्यवस्था का तात्पर्य किसी देश की आवश्यकताओं की संतुष्टि से होता है, जिस देश में आवश्यकताओं की संतुष्टि जितनी अधिक होती है, वहां की अर्थव्यवस्था भी उतनी ही अधिक मजबूत मानी जाती है। इस कसौटी पर भारतीय अर्थव्यवस्था को भी खरा उतरना होगा।” 

मूल्य वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक भी प्रयत्नशील रहता है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मूल्य स्तर में वृद्धि को रोकने या कम करने के लिए साख नियंत्रण उपायों (बैंक दर/रेपो दर, नकद आरक्षित अनुपात और सांविधिक तरलता अनुपात में वृद्धि तथा खुले बाजार की क्रियाओं द्वारा) का प्रयोग किया जाता है। सरकार द्वारा मूल्य वृद्धि से निपटने के लिए राजकोषीय उपाय भी किए जाते हैं। इसके तहत जब सरकार मुद्रा के प्रचलन को कम करने का निर्णय लेती है, तब वह अधिक आय वाले वर्ग तथा उपभोक्ता द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं पर कर बढ़ा देती है। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य धन में कमी लाना होता है। स्वाभाविक है कि जब लोगों के पास धन कम होगा, तो वस्तुओं का उपभोग कम होने से कीमतों में कमी आएगी। इसी क्रम में जहां कृषि एवं उद्योगों के उत्पादन में वृद्धि की जाती है, वहीं तात्कालिक उपायों के तहत जहां निर्यात को रोका जाता है, वहीं आवश्यकता अनुसार आयात बढ़ा दिया जाता है। 

यह विडंबना है कि मूल्य वृद्धि के मोर्चे पर हमारी अर्थव्यवस्था उसी तरह विफल हुई है, जिस तरह गरीबी और बेरोजगारी के मोर्चे पर। मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए ठोस पहलों की आवश्यकता है। इसके लिए जहां पूंजी के बहिर्गमन को रोका जाना आवश्यक है, वहीं बचत को प्रोत्साहन दिया जाना भी आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि देश से जमाखारी और कालाबाजारी का सफाया किया जाए। आपदा प्रबंधन के ठोस उपाय कर एवं प्रकृति पर कृषि की निर्भरता को कम करके भी महंगाई पर काबू पाया जा सकता है।

स्मरण रहे कि अर्थव्यवस्था का तात्पर्य किसी देश की आवश्यकताओं की संतुष्टि से होता है, जिस देश में आवश्यकताओं की संतुष्टि जितनी अधिक होती है, वहां की अर्थव्यवस्था भी उतनी ही अधिक मजबूत मानी जाती है। इस कसौटी पर भारतीय अर्थव्यवस्था को भी खरा उतरना होगा। यह तभी संभव होगा, जब भारतीय अर्थव्यवस्था अपने समक्ष उपस्थित तीन प्रमुख चुनौतियों-गरीबी, बेरोजगारी एवं मूल्य वृद्धि से उबर कर दिखा देगी। 

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