भारत-पाकिस्तान के मध्य सांस्कृतिक संबंध 

भारत-पाकिस्तान के मध्य सांस्कृतिक संबंध 

भारत-पाकिस्तान के मध्य सांस्कृतिक संबंध 

भारत-पाकिस्तान संबंध न केवल भारतीय उपमहाद्वीप बल्कि समूचे अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में एक ज्वलंत व संवेदनशील विषय है। जब से भारत का विभाजन हुआ तभी से दोनों देशों के मध्य ऐतिहासिक और राजनैतिक मुद्दों की वजह से तनाव रहा है।

इन्हीं तनावों की वजह से भारत-पाकिस्तान के मध्य अब तक चार बड़े युद्ध (1948, 1965, 1971 और 1999) हो चुके हैं और सीमा पर अक्सर तनाव की स्थिति बनी रहती है। अगस्त, 2019 में भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने और जम्मू-कश्मीर को विभाजित कर ‘लद्दाख’ और ‘जम्मू-कश्मीर’ नामक दो नए केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद भारत-पाकिस्तान के मध्य राजनैतिक तनाव काफी गहरा गया है। 

विचारणीय तथ्य यह है कि दोनों देशों के बीच बढ़ती तनावपूर्ण स्थिति के बावजूद दोनों देश आज भी एक दूसरे के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, भूगोल और अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं। 

किसी भी राष्ट्र के बीच तनावपूर्ण परिस्थितियों की वजह से राजनैतिक रिश्ते कमजोर हो सकते हैं, व्यापार अवरूद्ध हो सकते हैं, भौगोलिक सीमाएं बंद की जा सकती है किंत साझा सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करना नामुमकिन है। संस्कृति किसी भी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्रता का नाम है। जो उस समाज की, सोच, विचार और कार्य में रची बसी होती है। हम कह सकते हैं कि संस्कृति जीवन की वह विधि है जिसके आधार पर हम सोचते हैं और कार्य करते हैं। 

हास्यास्पद है कि भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान समाप्त करने और लद्दाख एवं जम्मू-कश्मीर को दो नए केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ‘से नो टू इंडिया’ यानी ‘भारत को न कहें’ नाम से एक अभियान चलाया है, जो संस्कृति, सभ्यता और साझी विरासत के किसी भी मापदण्ड पर उचित नहीं है। यद्यपि पाकिस्तान अपने राजनीतिक, कूटनीतिक और सैनिक फैसले अपने स्तर से ले सकता है किंतु संस्कृति और सभ्यता के स्तर पर न तो पाकिस्तान भारत को ‘न’ कह सकता है और न ही भारत पाकिस्तान को ‘न’ कह सकता है। क्योंकि भारत और पाक की सांझी संस्कृति रही है। जो एक दूसरे में रची-बसी है। जिसका बंटवारा नहीं हो सकता। 

भारत-पाकिस्तान के मध्य संस्कृति में साझेदारी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उनसे छेड़छाड़ मुमकिन नहीं है। आज भी दोनों देशों के जनमानस में बाबा फरीद, गुरू नानक देव, मियां मीर, वारिस शाह, बुल्ले शाह, फैज अहमद फैज, सआदत हसन मंटो, कृश्न चंदर कासमी, कतील सिफाई, हबीब जालिब, अहमद फराज़, आबिदा, मेहदी हसन, गुलाम अली और बेगम अख्तर जैसी शख्सियतों की गूंज हैं। 

अगर आज भी ननकाना साहब (करतारपुर) एक बड़े तबके के लिए ‘नानक शाह फकीर’ हैं तो सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय सिख समुदाय की तुष्टि के लिए नहीं बल्कि उनमें अब भी हजारों की संख्या में मुस्लिम जनसमुदाय की भी श्रद्धा है। यद्यपि भारत भी पाकिस्तान की ओर बहने वाली सतलुज, रावी और व्यास नदियों के प्रवाह को तो रोक सकता है लेकिन वारिश अली शाह, ख्वाजा गरीब नवाज़, हाजी अली जैसे पीर-फकीरों के विचारों को प्रवाहित होने से कदापि नहीं रोक सकता है। पाकिस्तान भले ही अंतर्राष्ट्रीय सीमा भारतीयों के लिए बंद कर दे किंतु वृहत्तर भारत के इतिहास से हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला हमेशा जुड़े रहेंगे। 

हाल ही में लाहौर के साईं मियां मीर की दरगाह पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले से जितनी तकलीफ पाकिस्तान को हुई उतनी ही भारत को भी हुई। मियां मीर वो सूफी संत हैं जिन्होंने दिसंबर 1588 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। स्वर्ण मंदिर सिखों का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है। जिससे भारत और पाकिस्तान दोनों के जनसमुदाय का भावनात्मक जुड़ाव है। जहां भारत के लाखों लोग पाकिस्तान स्थित कटासराज, शादानी दरबार हिंगलाज मंदिर, बाबा लालू जसाराय मंदिर-दीयालपुर आदि स्थलों में अपनी आस्था रखते हैं तो वहीं अजमेर के ख्वाजा गरीब नवाज और दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन से लाखों पाकिस्तानियों के दिल भी जुड़े हुए हैं। जहाँ बहावलपुर और मुल्तान, डेरागाजी खान आदि पाकिस्तान की ‘सरायकी’ भाषा के मुख्य केंद्र हैं तो वहीं सरायकी भारत में लगभग डेढ़ करोड़ लोगों की मातृभाषा है। भारत में अब भी सरायकी भाषा में साहित्य रचा, पढ़ा और सुना जाता है। डॉ. राणा गन्नौर ने तो सरायकी को आधार बनाकर ‘हिंदी-मुल्तानी विश्व कोष’ का संकलन भी कर डाला, जो केवल भारत व पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि विश्व के कई अन्य देशों में भी प्रचलित है। 

संगीत की दुनिया में भी राग भैरवी, राग जयजयवंती, राग मल्हार, राग यमन कल्याण आदि समान रूप से पाकिस्तानी संगीत की जान हैं। सरगम के सातों स्वर और सुर एक जैसे हैं। यही सिलसिला कला और स्थापत्य के क्षेत्र में भी है। यदि पाकिस्तान में सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के दीवाने हैं जो भारत में भी गुलाम अली की गज़लों के शौकीन हैं। 

अब इन सांस्कृतिक रिश्तों पर न तो भारत ‘नो टु पाकिस्तान कह सकता है न ही पाकिस्तान ‘नो ट इंडिया’ कह सकता है। बालक दोनों देशों के लोगों द्वारा ऐसी अधिसूचनाओं पर अमल करना भा मुमकिन नहीं है। 

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