कम्प्यूटर वायरस का आविष्कार किसने किया था |Computer Virus Ka Avishkar Kisne Kiya tha

कम्प्यूटर वायरस का आविष्कार किसने किया था

कम्प्यूटर वायरस का आविष्कार किसने किया था |Computer Virus Ka Avishkar Kisne Kiya tha

कम्प्यूटर वॉर्म और आजकल प्रचलित कम्प्यूटर वायरस काफी मिलते-जुलते होने पर भी, अपने कार्य के आधार पर एक-दूसरे से कुछ भिन्न हैं। कम्प्यूटर वॉर्म एक प्रकार का कम्प्यूटर प्रोग्राम है जबकि कम्प्यूटर वायरस एक बार कम्प्यूटर सिस्टम में प्रवेश करने के बाद उसकी सभी प्रक्रियाओं को खराब कर डालता है। 

कम्प्यूटर वायरस की श्रृंखला में कितनी कड़िया हैं, यह गणना कर पाना बहुत कठिन है। अधिकांश वायरस एक फ्लॉपी डिस्क से दूसरी फ्लॉपी डिस्क अथवा हार्ड डिस्क में फैल जाते हैं। वायरस को प्रायः दो भागों में बांटा जा सकता है (1) फाइल संक्रामक, (2) डिस्क संचालन कोड संक्रामक। 

कम्प्यूटर वायरस का आविष्कार किसने किया था

जबकि कम्प्यूटर वॉर्म एक अत्यधिक उन्नत कम्प्यूटर प्रोग्राम है। वॉर्म को वायरस की तरह फ्लॉपी डिस्क द्वारा कम्प्यूटर में प्रवेश नहीं करना पड़ता, बल्कि कम्प्यूटर Virus वार्म कम्प्यूटर में इंटरनेट हाइवे के मार्ग से Detected प्रवेश करता है। एक बार यदि वार्म इंटरनेट में प्रविष्ट हो जाए, तो यह इंटरनेट पर मौजूद विभिन्न ठिकानों और कम्प्यूटरों को खुद-ब-खुद तलाश कर उनमें जाने लगता है। ऐसी परिस्थिति में कम्प्यूटर प्रयोग करने वाले कुछ नहीं कर सकते। मगर वायरस कम्प्यूटर चलाने वाले द्वारा सावधानी बरते जाने पर सक्रिय नहीं हो सकता। अगर केवल सुरक्षित फाइलें ही प्रयोग की जाएं, तो वायरस फैलने की सम्भावना नगण्य हो जाती है। वायरस से छुटकारा भी पाया जा सकता है, वायरस से छुटकारा दिलाने वाले प्रोग्राम को एण्टी वायरस कहा जाता है।

सबसे पहले सन् 1949 ई. में ‘सेल्फ एप्लीकेटिंग प्रोग्राम’ अर्थात् अपनी अनुकृति खुद तैयार करने वाले प्रोग्राम का विकास हुआ। सन् 1981 ई. में एप्पल वायरस-एप्पल-1, एप्पल-2, एप्पल-3 का विकास किया गया। ये प्रथम कम्प्यूटर वायरस थे। ये वायरस ऑपरेटिंग सिस्टम में मौजूद थे। इन वायरस का फैलाव पाइरेटेड (pirated) कम्प्यूटर के माध्यम से टैक्सास ‘ए एण्ड एम’ के द्वारा होता था। 

सन् 1983 ई. में ‘बसीत’ और ‘अमजद’ नामक दो वायरस प्रकाश में आए, जिन्होंने भीषण तबाही मचाई। बाद में पता चला कि उन खतरनाक वायरसों का 

आविष्कार पाकिस्तान के दो युवाओं ने किया थे। वे दोनों भाई थे। इसके पांच वर्ष बाद अर्थात् सन् 1988 ई. को ‘जेरूशलम’ नामक वायरस का प्रकोप हुआ, वह वायरस शुक्रवार की 13 तारीख को अपना कार्य शुरू करता था और इस तारीख में किए गए सारे प्रोग्राम को समाप्त कर डालता था। 

सन् 1991 ई. में पहले पॉलिमार्फिक वायरस ‘टेक्विला’ का प्रभाव छाने लगा। यह वायरस स्कैनर द्वारा पकड़ा नहीं जा सकता था, क्योंकि ये अपने स्वरूप में निरन्तर परिवर्तन करता रहता था। अगले वर्ष, सन् 1992 ई. में माइकेल एंजेलो नामक वायरस तबाही मचाने लगा। इस वायरस ने करीब बीस से पच्चीस हजार कम्प्यूटरों को अपने प्रभाव में ले लिया था। 

तत्पश्चात् सबसे अधिक तेजी से फैलने वाला कम्प्यूटर वायरस ‘वर्ड कॉन्सेप्ट’ सन् 1995 ई. में प्रकाश में आया। सन् 1998 ई. में चेरनोबिल वायरस ‘स्ट्रेंजबू’ जावा फाइल को संक्रमित करने वाला पहला वायरस बना। इस वायरस के प्रयोग से न केवल फाइल नष्ट हो जाती थी बल्कि कम्प्यूटर चिप भी नष्ट हो जाती थी। यह वायरस बेहद विनाशक था।

अगले वर्ष, सन् 1999 ई. में कम्प्यूटर नेटवर्क में W-97M, ‘मेलिसा’ नामक वायरस का आविष्कार किया गया। ई-मेल द्वारा इस वायरस का प्रयोग करके कम्प्यूटर का समस्त हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर तबाह कर दिया गया था। अब तक ईजाद हुए वायरसों की अपेक्षा यह वायरस काफी तेजी से फैलता था। इसके परिणाम बेहद विध्वंसक थे। इसने करीब दस लाख कम्प्यूटरों को ध्वस्त किया। 

फिर सन् 2000 ई. में ‘लव बग’ नामक वायरस का आविष्कार हुआ। यह वायरस ‘आई लव यू’ नामक वायरस के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इस वायरस ने ई-मेल के माध्यम से बड़ी-बड़ी कम्पनियों के कम्प्यूटर सर्वर निष्क्रिय कर डाले, यही नहीं, इसने पेंटागन और ब्रिटिश संसद में भी घुसपैठ की। इस वायरस के आगमन से सम्पूर्ण विश्व को करीब पांच अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा। इसी वर्ष एक और विध्वंसक वायरस का आविष्कार हुआ, जिसका नाम ‘किलर रिज्यूम’ था। 

सन् 2001 ई. में ई-मेल वायरस का आविष्कार हुआ, जिसे रूसी टेनिस स्टार ‘अन्ना कुर्निकोवा’ के नाम से जाना गया। इस वायरस ने भी भारी मात्रा में हानि कारित की। इसी वर्ष विश्व के सबसे पहले, बेहद खतरनाक और शक्तिशाली वायरस का आविष्कार हुआ, जिसका नाम ‘डब्ल्यू 32 डॉट काम विनक्स’ था। यह वायरस सीधे पर्सनल कम्प्यूटर अथवा उसके मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम पर आक्रमण करता था। 

सन् 2002 ई. में कोड रैड नामक वायरस प्रकाश में आया। इस वायरस ने अमेरिका के लाखों कम्प्यूटर ध्वस्त कर डाले। 

सन् 2005 ई. में नए और पुराने दोनों तरह के वायरसों ने इंटरनेट की दुनिया में तबाही का ऐसा मंजर खींचा कि सभी दंग रह गए। पुराने वायरस तेजी से अधिक-से-अधिक कम्प्यूटरों को बर्बाद करते हैं, मगर नए वायरसों का प्रयोग किसी को आर्थिक हानि पहुंचाने के लिए किया जाता है। इस वर्ष ऑनलाइन व्यापार करने वाली कम्पनियों में पेपल को इन नए वायरसों के कारण सबसे तेज झटका लगा। उसे अनेक आर्थिक घोटाले झेलने पड़े।

इंटरनेट पर समस्या पैदा करने वाले सबसे ज्यादा वायरस अमेरिका, द. कोरिया और चीन में छोड़े गए। इन वायरसों के जरिए एफ.बी.आई. या सी.आई.ए. के नोटिस और कुछ विवादास्पद अभिनेत्रियों की फोटो के सहारे कम्प्यूटरों तथा नेटवर्क पर आक्रमण होता है। इन वायरसों में सोबर परिवार का ‘सोबर जेड’ नामक वायरस बेहद खतरनाक है। 

सन् 2005 ई. के अन्त तक के आंकड़ों के अनुसार इंटरनेट पर वायरसों से अड़तालीस प्रतिशत खतरा बढ़ गया था। इस वर्ष तक सोलह हजार, पांच सौ नए वायरस ऑनलाइन आ चुके थे। 

उपरोक्त वायरसों के अलावा इबे, ऑमेजन, बिन लादेन, जफीडी, नेटस्कीपी, साइबर जेड आदि-आदि अनेक वायरस हजारों की तादाद में आये, जिनका आविष्कार खुराफाती लोगों ने किया, जिनका समय-समय पर कम्प्यूटरों पर हमला होता रहा है और होता रहेगा। 

एण्टी वायरस प्रोग्राम-विभिन्न प्रकार के कम्प्यूटर वायरसों से निजात पाने के लिए विश्वस्तरीय वैज्ञानिकों ने एण्टी-वायरस प्रोग्राम विकसित किए हैं। सर्वप्रथम ‘सिमेन्टिक’ ने ‘नार्टक’ नामक एण्टी वायरस प्रोग्राम बनाकर पहले एण्टी वायरस प्रोग्राम का विकास किया। यद्यपि आज विश्व के पास एण्टी वायरस प्रोग्राम प्रदान करने वाली ‘क्लियर स्विफ्ट’ और सिक्योर जैसी वायरस सुरक्षा प्रदान करने वाली कम्पनियां हैं, किन्तु फिर भी कभी भी घातक वायरस एण्टी-वायरस प्रोग्रामों को धोखा देकर कम्प्यूटर प्रणाली को ठप्प कर सकते हैं।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

15 − 10 =