Essay in hindi for ias exam-भारत में सामुदायिक रेडियो 

Essay in hindi for ias exam

Essay in hindi for ias exam-भारत में सामुदायिक रेडियो 

हमारी बहु-सामाजिकता और विविधता को सही अर्थों में अभिव्यक्ति देने के उपयोगी माध्यम के रूप में भारत में सामुदायिक रेडियो ने अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवाई है। भले ही इसने अभी व्यापकता के अभीष्ट आयामों को नहीं छुआ है, तथापि यह स्पष्ट है कि इस विशाल और बडी जनसंख्या वाले देश में इसकी संभावनाएं उज्ज्वल हैं। यहां की सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक विविधता 

और वैराट्य भी इसकी अच्छी संभावनाओं को संबल प्रदान करते हैं। सामुदायिक रेडियो से आशय उस रेडियो से है, जिसमें न सिर्फ समुदायों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, बल्कि सामुदायिक हितों को भी सर्वोपरि रखा जाता है। इसमें विकसात्मक मुद्दों, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, सामजिक कल्याण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामदायिक विकास की बातों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इसके विकास की प्रक्रिया में कुछ सिद्धांतों और मूल्यों का विशेष योगदान रहता है। भारत में इसलिए भी सामुदायिक रेडियो के विकास की असीम संभावनाएं हैं, क्योंकि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है और एक खुला माहौल है। गौरतलब है कि सामुदायिक रेडियो सार्वजनिक हितों से जुड़ा है और लोकतंत्र में सार्वजनिक हितों को सर्वोपरि रखने की समृद्ध परंपरा रही है। भारत की न्यायपालिका भी इसके पक्ष में है। विदित हो कि वर्ष 1995 में एक प्रकरण का निस्तारण करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी यह व्यवस्था दे चुका है कि वायु तरंगें जनता की सम्पत्ति हैं और सार्वजनिक हित के कार्यों में इसका इस्तेमाल अवश्य किया जाना चाहिए। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सामुदायिक रेडियो की अवधारणा को भारत में बल मिला था। 

“सामुदायिक रेडियो से आशय उस रेडियो से है, जिसमें न सिर्फ समुदायों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, बल्कि सामुदायिक हितों को भी सर्वोपरि रखा जाता है।” 

भारत में सामुदायिक रेडियो की शुरुआत बहुत पुरानी नहीं है। वर्ष 2003-04 में सर्वप्रथम सरकार द्वारा सामुदायिक रेडियो से जुड़े दिशा-निर्देश तैयार किये गये और इन्हें जारी किया गया। इन दिशा निर्देशों में सामुदायिक रेडियो की पात्रता के दायरे में शैक्षिणक संस्थाओं को लाया गया और यह तय किया गया कि सामुदायिक रेडियो के संचालन का लाइसेंस शैक्षणिक संस्थानों को दिया जाए। इसकी शुरुआत की गई थी चेन्नई के अन्ना विश्वविद्यालय से। शुरुआत के दो वर्षों यानी वर्ष 2004 से 2006 के दौरान लगभग 104 शैक्षणिक संस्थानों को सामुदायिक रेडियो के लाइसेंस निर्गत किये गये। वर्ष 2006 में ही इसके दायरे को और बढ़ाया गया तथा यह तय किया गया कि कृषि विज्ञान केंद्रों और उन संगठनों को भी इसके दायरे में लाया जाए, जो अलाभकारी हैं, यानी मुनाफा नहीं कमाते हैं। इन पहलों के बावजूद भारत में सामुदायिक रेडियो की शुरुआत फीकी ही रही और न तो इसका समुचित विस्तार ही हुआ और न ही इसके प्रति जनचेतना ही बढ़ी। 

धीरे-धीरे जनहित को प्रोत्साहित करने वाले इस संचार माध्यम के प्रति चेतना बढ़ी तथापि अभी भी वर्तमान स्थिति बहुत संतोषप्रद नहीं है। फिलवक्त देश में 150 सामुदायिक रेडियो ही प्रचलित हैं, जिनमें जहां 100 का स्वामित्व शैक्षणिक संस्थानों और कषि विज्ञान केंद्रों के हाथों में है, वहीं 50 का प्रचालन उन संगठनों द्वारा किया जा रहा है, जो मुनाफा कमाने की श्रेणी में नहीं आते हैं। आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में इनकी संख्या नगण्य है। अभी तक इनका दायरा मात्र मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु व कर्नाटक तक ही फैल पाया है। 

भारत में सामुदायिक रेडियो के विस्तार में कुछ बातें अवरोधक की भूमिका निभा रही हैं। सामुदायिक रेडियो के लिए जहां स्वयंसेवी संगठनों को वरीयता देनी चाहिए, वहीं वरीयता के केंद्र में शैक्षणिक संस्थानों को रखा जाता है। लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में अक्सर सुरक्षा संबंधी व आर्थिक कारण भी आड़े आते हैं। यह भी एक असंगति है कि जहां देश के कुछ प्रांतों में सामुदायिक रेडियो स्टेशन हैं, वहीं कुछ में इनका नितांत अभाव है। सामुदायिक रेडियो के विस्तार हेतु इन बातों से उबरना आवश्यक है ताकि बेहतर तालमेल बने। 

भारतीय परिप्रेक्ष्य में हमें सामुदायिक रेडियो को एक लोकतांत्रिक आंदोलन जैसी धार देनी होगी, क्योंकि यह जनहित से जुड़ा महा है और इसके लाभ भी कम नहीं हैं। जानकारों के अनुसार सूचना, समाचारों व स्वस्थ मनोरंजन के संबंध में यह मुख्यधारा के मीडिया का एक विश्वसनीय और व्यावहारिक विकल्प है। इसमें जहां सामुदायिक हित निहित हैं, वहीं सांस्कृतिक सजीवता भी है। यह शासन में पारदर्शिता लाने में तो सक्षम है ही, शिक्षा के प्रसार में भी अहम भमिका निभाता है। इससे सामाजिक न्याय की पहुंच तो बढ़ती ही है, यह सामाजिक समरसता का भी सूत्रपात करता है। इससे भाषाई वैविध्य को तो प्रोत्साहन मिलता ही है, साम्प्रदायिक सौहार्दी स्थापित होता है। सामुदायिक रेडियो की विषय-वस्तु जनहित को प्रोत्साहित करने तथा सार्वजनिक लाभों को हिस्सेदारी देने की है। फलतः इसमें ग्रामीण क्षेत्रों व दूर-दराज के इलाकों को भी प्रतिनिधित्व मिलता है। कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए भी अभिव्यक्ति की दृष्टि से यह एक प्रभावी मंच साबित होता है। सामुदायिक रेडियो से जुड़े इन समस्त सकारात्मक पहलुओं को देश के विकास से भी जोड़कर देखा जा सकता है। स्थानीयकृत होने के कारण जहां इसके अपने अलग लाभ हैं, वहीं कृषि जगत के लिए भी यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाने, कौशल विकास, प्रबंधन व क्षमता विकास आदि संदर्भो में भी इसकी उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता, साथ ही यह रोजगार के नये अवसर भी सृजित करता है। सामुदायिक रेडियो से जुड़ा यह प्रावधान भी लाभप्रद है कि यह रेडियो क्षेत्र कैबिनेट द्वारा अनुमोदित दिशा-निर्देशों द्वारा संचालित होता है और इसके लिए संसदीय अनुमोदन की जरूरत नहीं पड़ती। 

भारत में सामदायिक रेडियो की जो सीमाएं इसकी विस्तार यात्रा में बाधक की भूमिका निभा रही हैं, उनकी तरफ ध्यान दिया जाना अत्यंत आवश्यक है। 

सामुदायिक रेडियो के ढेर सारे लाभ तो हैं, किंतु भारत में इसकी अपनी कुछ सीमाएं भी हैं। पहली सीमा तो सामुदायिक रेडियो के लाइसेंस से संबंधित है। हमारे देश में संचार प्रणाली पर पूर्णतः केंद्र का नियंत्रण है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय मिलकर इस काम को देखते हैं। इसलिए लाइसेंस के लिए दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है, जो कि असुविधाजनक है। लाइसेंस प्रक्रिया पूर्णतः नौकरशाही की गिरफ्त में होने के कारण न सिर्फ इसमें काफी समय लगता है, बल्कि लाइसस की प्रक्रिया केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के बीच से होकर गुजरती है, अतएव कागजी खानापूर्ति में काफी समय लग जाता है। इतना ही नहीं, सुरक्षा और विधिक कारणों से गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और विधि मंत्रालय की भागीदारी लाइसेंस के अनुमोदन में रहती है, जिससे लाइसेंस सहजता से प्राप्त कर पाना एक टेढ़ी खीर साबित होता है। अक्सर प्रसारण की सामग्री को लेकर भी स्पष्ट राय नहीं बन पाती है। इसके अलावा सामुदायिक रेडियो के लिए फ्रीक्वेंसियों के आरक्षण में पारदर्शिता न बरती जाने के कारण भी लाइसेंस के इच्छुक संगठनों को असुविधा होती है। 

भारत में सामुदायिक रेडियो की जो सीमाएं इसकी विस्तार यात्रा | में बाधक की भूमिका निभा रही हैं, उनकी तरफ ध्यान दिया जाना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए जरूरत इस बात की है कि उन दिशा-निर्देशों की पुनः समीक्षा की जाए, जो कैबिनेट द्वारा सामुदायिक रेडियो के संचालन के लिए तैयार किये गये हैं। बाधक प्रक्रियाओं का ध्यान में रखकर अब संशोधित व नये उन दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है, जो इस क्षेत्र में अपेक्षित सुधार ला सकें। जहां पात्रता के लिए संतुलित, सटीक और पारदर्शी दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है, वहीं तकनीकी पहलओं पर भी विशेष रूप से ध्यान दिय जा जरूरत है, ताकि तकनीकी महे आडे न आएं। विदित हो कि भारत में ‘कम्युनिटी रेडियो एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ तथा ‘कम्युनिटी रेडियो फोरम ऑफ इंडिया’ ने सामुदायिक रेडियो को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी स्व-नियमन एजेंसियों को केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा प्रोत्साहन प्रदान किया जाए, ताकि सामुदायिक रेडियो का अपेक्षित विस्तार हो सके। 

भारत में सामुदायिक रेडियो की उपादेयता और खूबियां कम नहीं हैं, किंतु इसे विकृतियों से बचाने के लिए कुछ एहतियात भी आवश्यक हैं। चूंकि रेडियो का यह क्षेत्र स्थानीयकृत होता है और इसमें स्थानीयता को विशेष तवज्जो दी जाती है, अतएव यह एहतियात बरतना आवश्यक है कि स्थानीय स्तर पर इसका राजनीतिकरण न हान पाए। स्थानीय नेता ऐसा करने का प्रयास कर सकते हैं, अतएव इन्ह उनके प्रभाव से बचाया जाए। इसके अलावा ऐसी व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी कि सामुदायिक रेडियो से जुड़ी योजनाओं स्थाजनाओं का राजनीतिकरण न हो सके। हमें इसे एक स्वस्थ स्वरूप प्रदान करने के प्रयास सुनिश्चित करने होंगे। साथ ही सुरक्षा के पहलुओं को भी नजरंदाज नहीं करना होगा। 

भारत में सामुदायिक रेडियो एक संभावनाओं से भरा क्षेत्र है, जिसकी उपादेयता सामुदायिक विकास के क्षेत्र में अग्रणी है। भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए यह विशेष रूप से प्रेरणाप्रद और रचनात्मक है। अतएव हमें इसे अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों में सम्मिलित करना चाहिए। ऐसा करके ही हम इसकी अपार संभावनाओं का भरपूर दोहन भी कर सकते हैं। यह संचार का वह माध्यम है, जो हमारी गंगा-जमुनी तहजीब, बहु-सामाजिकता तथा विविधता में तो निखार ला ही सकता है, विकास से जुड़े मद्दों, कृषि जगत, शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, सामुदायिक विकास, सामाजिक कल्याण जैसे विषयों को भी धार दे सकता है। तो क्यों न हम सार्वजनिक हित के इस माध्यम को विस्तार देने की प्रक्रिया को गति प्रदान करें, जो कि हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के हित में होगा। 

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