भारत की सुरक्षा परिषद में दावेदारी अथवा विश्व शांति के लिए सुरक्षा परिषद का विस्तार 

भारत की सुरक्षा परिषद में दावेदारी 

भारत की सुरक्षा परिषद में दावेदारी अथवा विश्व शांति के लिए सुरक्षा परिषद का विस्तार – (यूपीपीसीएस मुख्य विशेष परीक्षा, 2004) 

मजबुत  अर्थव्यवस्था, ठोस और टिकाऊ विकास तथा यथेष्ट बजानिक, सामरिक व तकनीकी तरक्की द्वारा भारत ने विश्व मंच पर जहां एक पुख्ता पहचान बनाई है, वहीं लोकतांत्रिक सद्गुणों से भी वैश्विक स्तर पर भारत की छवि में निखार आया है। अपनी क्षमताओं और स्वच्छ छवि के द्वारा ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। इसके बावजूद बार-बार अपनी दावेदारी प्रस्तुत करने के बाद भी सुरक्षा परिषद में अभी तक उसे स्थान न मिलना, एक गंभीर और चिंतनीय विषय है। दक्षिण एशिया की नयी महाशक्ति और विश्व अर्थव्यवस्था में अपनी अहम भूमिका रखने वाला भारत यदि सुरक्षा परिषद में अपनी दावेदारी प्रस्तुत करता है, तो इसे किसी भी ओर से अनुचित नहीं कहा जा सकता। इस समय विश्व के जो देश सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य हैं, उनकी तुलना में भारत कहीं भी कमतर नहीं है और इतना ही नहीं निर्गुट आंदोलन का प्राथमिक सदस्य और विकासशील देशों में अपना प्रमुख वर्चस्व रखने वाला भारत सभी तरह से सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का पात्र है, और उसे उसका प्राप्य मिलना ही चाहिए। 

“मजबूत अर्थव्यवस्था, ठोस और टिकाऊ विकास तथा यथेष्ट वैज्ञानिक, सामरिक व तकनीकी तरक्की द्वारा भारत ने विश्व मंच पर जहां एक पुख्ता पहचान बनाई है, वहीं लोकतांत्रिक सद्गुणों से भी वैश्विक स्तर पर भारत की छवि में निखार आया है।” 

यहां पर प्रश्न उठता है कि आखिर सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए भारत इतना उतावला क्यों है? इस पर गंभीर रूप से विचार किया जाये तो लगेगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ का अस्तित्व ही । सुरक्षा परिषद पर आधारित है। उसके सारे कार्यक्रम तब तक कार्यरूप नहीं ले सकते जब तक सुरक्षा परिषद की उस पर मुहर न लग जाये। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ का बजट भी सुरक्षा परिषद के अधीन है, उसकी स्वीकृति के बिना बजट के लिये न तो धन की आपूर्ति हो सकती है और न तमाम बिखरे कार्य ही पूरे किये जा सकते हैं। 

यहां यह समझने की बात है कि विश्व का यह विशालतम संगठन विश्व की बिखरी धुरियों को जोड़ने वाला माना जाता है, जिसे त्रस्त और पीड़ित जनता का रहनुमा, बच्चों, युवकों, वृद्धों, महिलाओं को संरक्षण देने का जो दावा करता है, निराश्रितों, जातीय राष्टिकों, धार्मिक अल्पसंख्यकों की जो दुखभरी आवाज सुनता है, ऐसा राष्ट्र संघ तब तक पंगु है जब तक कि सुरक्षा परिषद उसके कार्यक्रमों को स्वीकृति नहीं प्रदान करती। ऐसी संस्था पर कुछ गिने चुने देशों का एकाधिकार बना रहे, यह न तो औचित्य है और न विश्व हित में है। अतः सुरक्षा परिषद के स्वरूप परिवर्तन की मांग एक लम्बे अरसे से चली आ रही है। भारत का भी कहना है कि सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन होना चाहिए और यदि ऐसा होता है तो नये सदस्यों में भारत प्रमुख दावेदार है। 

यहां यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2003 में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान ने राष्ट्रसंघ को एक नया तेवर और कलेवर देने के लिये विशेषज्ञ पैनेल गठित किया था जिसने – अपनी 95 पृष्ठों की एक रिपोर्ट दी थी। इसमें राष्ट्रसंघ को नया रूप देने के लिये महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये गये थे और साथ ही सुरक्षा परिषद के विस्तार हेतु कई विकल्प भी प्रस्तुत किये गये थे। यदि सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है तो इन सभी विकल्पों के आधार पर भारत की दावेदारी बनती है, क्योंकि प्रथम विकल्प में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन के अलावा जिन 6 नये सदस्यों को सुरक्षा परिषद में शामिल करने का संकेत है, उनमें भारत का विशेष उल्लेख है। 

सुरक्षा परिषद का विस्तार अब आवश्यक हो चुका है, क्योंकि जिस समय यह संस्था अस्तित्व में आई थी, तब इसके सदस्य 50 से भी कम थे। अब सदस्य संख्या बढ़कर 193 हो चुकी है। ऐसे में विस्तार तो जरूरी है ही। हां, ऐसी स्थिति में यह देखना जरूरी है कि इस संस्था का सदस्य होने के लिये भारत की अर्हता कितनी है परन्तु आज की परिस्थिति में अर्हता के आधार क्या हो सकते हैं, यह देखना जरूरी है और उनमें से किन-किन कसौटियों पर भारत खरा उतरता है। यह भी समझना आवश्यक है। प्रमख रूप से सात आधार देखे जा सकते हैं-(i) लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण, परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र होना, (ii) विशाल जनसंख्या और विश्व के समग्र रूप में व्यापक प्रतिनिधित्व, (iii) प्राकृतिक संसाधनों के भंडार और समृद्धि के स्रोत, (iv) विश्व अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान होना और विश्व की समृद्धि में साझेदारी, (v) कानून सम्मत शासन और समता, स्वतंत्रता तथा मानवाधिकार संरक्षण में अग्रणी हाना, (vi) संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति प्रयासों में व्यापक सहयोग और (vii) प्राचीन संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहर का देश होने के साथ आत्मनिर्भर, शक्ति सम्पन्न और अपनी एकता, अखंडता, सार्वभौमिकता की रक्षा करने में सक्षम देश होना। 

“कुल मिलाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यदि अगली बार सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है तो भारत की स्थाई सदस्यता की दावेदारी सबसे प्रमख होगी और यह आशा की जानी चाहिए कि सुरक्षा परिषद के सभी स्थाई सदस्य चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका भारतीय दावेदारी का समर्थन करेंगे।” 

यदि गंभीरतापूर्वक देखा जाये तो भारत ये सारी अर्हताएं पूरी करता है। भारत एक संयमित अणशक्ति सम्पन्न देश है। उसकी स्थल, जल और नभ सेनायें संपूर्ण रूप से छा जाने की क्षमता रखती हैं। यह क्षमता उसे अन्य महाशक्तियों की समकक्षता का आधार देती है। भारत के 15-16 लाख सैनिक विश्व के किसी भी क्षेत्र में बड़ी चुनौतियों का सामना करने की क्षमता रखते हैं। अनेक तरह की रुकावटों के बावजूद भारत का प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम एक बड़ी उपलब्धि की ओर बढ़ रहा है। ‘अग्नि-5′ का सफल प्रक्षेपण कर हमने समूचे विश्व को अपनी सामरिक शक्ति का एहसास करवा दिया है। नौसेना के क्षेत्र में भी भारत परमाणु क्लब में शामिल हो चुका है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी भारत ने ऊंची छलांग लगाई है और सारे विश्व को चमत्कृत करते हुए उसने अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह तक अपनी पहुंच बनाई। इसके अतिरिक्त भारत द्वारा मिशन शक्ति तथा चंद्रयान-2 के प्रयास ने संपूर्ण विश्व को आश्चर्य में डाल दिया है। जहां तक विश्व शांति की बात है भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना काल से इसमें सहयोग किया है और आज भी करता आ रहा है। उसकी भूमिका का निरंतर यशोगान हुआ है। 

आर्थिक क्षेत्र में भारत का आज विश्व में डंका बज रहा है। 2008-09 की वैश्विक मंदी की स्थिति में जहां अमेरिका जैसे देश दीवालिया होने की कगार पर पहुंच गये थे। वहां की तमाम कंपनियां और स्वयंभू बैंक बंद हो गये। मंदी ने देश में व्यापक बेरोजगारी बढ़ा दी। कुछ देशों की विकास दर घटकर 2 से 3 प्रतिशत रह गयी वहीं चीन के बाद केवल भारत ही ऐसा देश रहा जिसकी विकास दर 6.50 से आठ प्रतिशत के बीच रही।

ऐसी बात नहीं कि भारत एक मसला-कुचला देश है। जब विश्व में दो सैनिक गुट (नाटो और वारसा संधि गुट) थे उस समय भारत ने नेतृत्व करके निर्गुट आंदोलन की स्थापना की थी। उसके ही प्रयास से संयुक्त अरब संघ के राष्ट्रपति अबुल गमेल नासिर इंडोनेशिया | के राष्ट्रपति डा. सुकर्ण, श्रीलंका की राष्ट्रपति सिरिमावो भंडारनायके और तत्कालीन युगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो ने संस्थापक | सदस्यों की भूमिका निभायी थी। इस संगठन का उद्देश्य मानवाधिकार | संरक्षण, निरस्त्रीकरण विश्व शांति और सदस्य देशों की आर्थिक | समृद्धि से सम्बद्ध रहा था। मानवाधिकार के मामले में भी भारत की | अपनी एक पृथक रीति-नीति है। यहां राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर | पर मानवाधिकार आयोगों का गठन किया गया है। महिलाओं, बच्चों, वृद्धों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों के रक्षण में इसने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। 

अन्य क्षेत्रों में जैसे- कला-संस्कृति, सिनेमा, इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकी आदि में भारत की अपनी विशेषता है। इस तरह यह सिद्ध होता है कि वर्तमान संदर्भ में राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में भारतीय दावेदारी का नितांत औचित्य बनता है। जापान, जर्मनी अपनी आर्थिक और तकनीकी समद्धि के जो भी दावे करें उनके पास बहआयामी क्षमतायें नहीं हैं।

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद की भारतीय दावेदारी का समर्थन विश्व के अनेक देशों ने किया है। इनमें न केवल एशिया, अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका और यूरोपीय देश हैं, बल्कि फ्रांस और ब्रिटेन तो पहले से भारतीय दावेदारी के समर्थक रहे हैं। अब अमेरिका भी सहमत होता दिखाई देता है। जहां तक रूस की बात है वह तो एक लम्बे अरसे से चाहता है कि भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य हो जाये। भारतीय नेताओं और रूसी नेताओं की बातचीत में यह बात बराबर आती रहती है। 

कुल मिलाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यदि अगली बार सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है तो भारत की स्थाई सदस्यता की दावेदारी सबसे प्रमुख होगी और यह आशा की जानी चाहिए कि सुरक्षा परिषद के सभी स्थाई सदस्य चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका भारतीय दावेदारी का समर्थन करेंगे। सुरक्षा परिषद के विस्तार से जहां इसको नया कलेवर मिलेगा, वहीं भारत जैसे उज्ज्वल छवि के देश को स्थाई सदस्यता मिलने से सुरक्षा परिषद की भी गरिमा बढ़ेगी और वैश्विक स्तर पर अमन, चैन, शांति, समृद्धि व मानवीय सरोकारों के प्रति भारत कहीं अधिक प्रभावी व अधिकारपूर्ण ढंग से काम कर सकेगा। भारत के लिए विश्व को संवारने का यह एक स्वर्णिम अवसर होगा। यह अवसर हमें जल्द से जल्द मिलेगा, इसे लेकर न सिर्फ हम आशान्वित हैं, बल्कि हमारे नेता भी इस दिशा में प्रयासरत हैं। वैश्विक स्तर पर भारत के सहृदय मित्र राष्ट्र भी उसके साथ हैं। ऐसे में भारत की दावेदारी को नजरंदाज कर पाना संभव नहीं है। इसी तरह स भारत विश्व गुरु की अपनी पुरानी भूमिका में लौटेगा। 

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