सिनेमा(चलचित्र) पर निबंध- Essay on the Cinema in Hindi

सिनेमा(चलचित्र) पर निबंध

सिनेमा(चलचित्र) पर निबंध | Essay on the Cinema in Hindi

सिनेमा(चलचित्र) पर निबंध –नगर का एक कोना, जहाँ विशाल भवन खड़ा है, जिसपर बड़े-बड़े पोस्टर टंगे हैं, अनेक दिशाओं से आती सवारियाँ जिधर हाँफती चली जा रही हैं, पैदल चलनेवाले जहाँ भीड़ को चीरते हुए बेतहाशा दौड़े जा रहे हैं, जहाँ नुक्कड़ों पर कुछ कानाफूसी हो रही है, जहाँ खिड़की पर लंबी लाइन है और लाइन को तोड़ डालने के लिए जहाँ हुल्लड़ मचा है, आदमियों के माथे पर आदमी रेंगता हआ कबड्डी की पाली छूने की तरह जहाँ जोर मार रहा है, समझिए वहाँ कोई-न-कोई चलचित्र-भवन-सिनेमाघर है। वहीं आप बिना कैलैंडर देखे अनुमान कर सकते हैं कि आज शुक्रवार है, कोई नई फिल्म अवश्य आई है, जिसके लिए इतनी बेचैनी छाई है। 

जैसे मादक द्रव्यों का नशा होता है, वैसे ही कुछ लोगों को सिनेमा का नशा होता है। चाहे जैसी भी फिल्म क्यों न हो, पहले दिन पहला शो अवश्य देखेंगे; भले इसके लिए उन्हें सर फोड़वाना पड़े, भूखा रहना पड़े, झूठ बोलना पड़े, जेब कतरनी पड़े, किंतु वे सिनेमा देखने से बाज नहीं आएँगे। जितनी भद्दी अश्लील फिल्म रहेगी, उसके दर्शकों की संख्या उतनी ही अधिक होगी। 

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महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के छात्रों की बात कौन कहे, विद्यालयों के छात्र किताबें बेचकर सिनेमा का ब्लैक टिकट खरीदते हैं। उन्हें ‘रामचरितमानस की चार चौपाइयाँ याद नहीं हैं, किंतु सिनेमा के सैकड़ों गीत कंठस्थ हैं। इसीलिए तो ‘बेढब बनारसी’ ने कहा है 

स्कूल की पढ़ाई में क्या धरा है ‘बेढब’, 

शिक्षा तो मिल रही है सिनेमा के हर भवन में। 

रिक्शावाले ठीक से खाना नहीं खाते, कपड़े नहीं पहनते और अपने स्वेद से अर्जित पैसे को सिनेमा में स्वाहा करते हैं। इतना ही नहीं, सिनेमा के ये दीवाने अस्पतालों में अपना खून तक बेचते हैं। उनके रिक्शे में दुर्गा, काली, शंकर, गाँधी के फोटो नहीं रहते, वरन् सिने-तारिकाओं के चित्र चिपके हुए रहते हैं। चलचित्र ने रुचि को इतना गर्हित और स्खलित कर दिया है कि इससे त्राण का कोई-न-कोई उपाय निकालना ही पड़ेगा। 

चलचित्रों ने हमारे मानसिक, नैतिक एवं चारित्रिक स्तर को तो गिराया ही है, साथ-ही-साथ हमारे नाटक, नृत्य, रामलीला, यात्रा, शास्त्रीय गायन आदि वास्तविक कलाओं पर कल्पनातीत आघात भी किया है। नाटक आदि कलाओं और उनके कलाकारों की क्षति, उनके प्रति जनरुचि घटने का प्रमुख कारण राष्ट्रीय नीति का अभाव भी है। चलचित्र पर जो मनोरंजन-कर है, वही नाटक आदि के प्रदर्शनों पर है। चलचित्र केवल मशीन के द्वारा नाटक की मुद्रित छवि दिखाता है, जबकि नाटक के लिए सार पात्रों को सशरीर रंगभूमि में आना पड़ता है। ऐसी हालत में हर शो या प्रदर्शन के बाद चलचित्र-जैसा ही कर दे देने पर कलाकारों के भरण-पोषण-योग्य आजीविका नाटक नहीं जुटा पाता। योग्य कलाकारों के लिए तो यह अलाभकर वृत्ति ही है। अतः, आवश्यक है कि नाटक को ऐसे करों से मुक्त किया जाए। 

यह तो हुआ चलचित्र का कृष्णपक्ष, किंतु इसका शुक्लपक्ष भी है। चलचित्र मनोरंजन के सबसे सस्ते और सुलभ साधन हैं। दैनंदिन कार्य से स्रस्त-त्रस्त मानव की शिराओं में इतनी स्फूर्ति नहीं रहती कि वह पुनः अपने कार्य में जुट जाए। श्रांत-क्लांत मन गंभीर पुस्तकों के पारायण में भी नहीं रम पाता। अतः, चलचित्रों द्वारा ऐसा मनोरंजन होता है कि हमारे शरीर में चेतना की नई लहर दौड़ जाती है, हमारे मन की मुरझाई क्यारी फिर से हरी-भरी हो जाती है। चलचित्र आधुनिक यांत्रिक जीवन की एकरसता को खंडित कर उसमें इंद्रधनुषी वैविध्य ला देता है, हमारे जीवन की मरुभूमि में रसवृष्टि कर देता है।

सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक चलचित्रों से जनमानस का परिष्कार एवं प्रोन्नयन भी होता है। इनके द्वारा सामाजिक कुरीतियों पर घनाघात किया जाता है, रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों पर वज्रप्रहार किया जाता है, चारित्रिक दुर्बलताओं का भंडाफोड़ भी किया जाता है। इनके द्वारा अतीत और वर्तमान की बुराइयों का निदर्शन कर भविष्य के लिए नवीन मार्ग भी दिखाया जाता है।

‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’, ‘छत्रपति शिवाजी’, झाँसी की रानी’, ‘अमर शहीद’ जैसी फिल्में यदि हममें देशप्रेम भरती हैं, तो ‘दहेज’, ‘खिलौना’ आदि फिल्में दहेज-प्रथा, वेश्या-प्रथा आदि बुराइयाँ दूर करने का पथप्रदर्शन भी करती हैं; ‘हीरामोती’, ‘मदर इंडिया’, ‘दो बीघा जमीन’ जैसी फिल्में सामंती शोषण के विरोध में जहर उगलती हैं, तो ‘जागृति’ जैसी फिल्में छात्रों के मनोबल को उठाने में सहायक बनती हैं। ‘जिद देश में गंगा बहती है’ तथा ‘दो आँखें बारह हाथ’ जैसी फिल्में डाकुओं और अपराधी बंदियों के चरित्रसुधार जैसा समाधान प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार, यदि अच्छी फिल्में बनें, तो देश की बहुत-सारी समस्याओं के समाधान के लिए उनके दर्शकों की मनोभूमि निर्मित की जा सकती है। इस दृष्टि से आधुनिक कला-फिल्में-‘अंकुर’, ‘दामुल’ ‘पार’, ‘आधारशिला’ आदि अधिक लोकप्रिय हो रही हैं। 

चलचित्र द्वारा शिक्षा का प्रसार और ज्ञान का संवर्धन हो सकता है। अपने देश के इतिहास, भूगोल एवं महान चरित्रों की झाँकी इसके द्वारा प्रस्तुत की जा सकती है। महाभारत और रामायण को पढ़ने और समझने में बहुत अधिक समय और धैर्य की आवश्यकता है, किंतु, ‘संपूर्ण महाभारत’ तथा ‘संपूर्ण रामायण’ जैसे चित्रों से हम महज तीन घंटे में ही अपनी परंपरा का ज्ञान उपलब्ध कर सकते हैं। अपने सभी धामों की परिक्रमा में बहुत व्यय और समय की जरूरत है, किंतु ‘संपूर्ण तीर्थयात्रा’ जैसी फिल्म से बहुत आसानी से हम उनके दर्शन कर सकते हैं। ऐसे ही, यदि विश्व के विभिन्न देशों पर चित्र बनें, तो घर बैठे विश्व का ज्ञान, विश्वदर्शन तथा विश्वभ्रमण का आनंद हम प्राप्त कर सकते हैं। 

हम वृत्तचित्रों या पूरी लंबाईवाले चित्रों के द्वारा विश्व के रंगमंच पर घटनेवाली घटनाओं का प्रत्यक्ष दृश्य रजतपट पर दिखा सकते हैं। घर बैठे आस्ट्रेलिया में होनेवाले टेस्ट मैच, अमेरिका के चुनाव, वियतनाम के युद्ध, ताशकंदवार्ता, कश्मीर या स्विट्जरलैंड के दृश्य, न्याग्रा-जलप्रपात, ध्रुवों के हिमप्रदेश आदि के दृश्य देख सकते हैं और आनंद प्राप्त कर सकते हैं। कारीगरी, यांत्रिकी, शल्य-चिकित्सा, साहसिक यात्रा, अनुसंधान आदि की उच्चतम शिक्षा भी चलचित्र द्वारा सरलता से दी जा सकती है। अब तो चलचित्र में और भी सुधार हुआ है। सिनेमास्कोप तथा तीन आयामवाले (थ्री-डी) चलचित्र भी दिखाए जाने लगे हैं।

अतः, चलचित्र भी हमारे विधाता की सृष्टि की तरह ‘जड़-चेतन गुण-दोषमय’ है। इसका श्यामपक्ष भी है, श्वेतपक्ष भी; यह प्रगाढ़ अंधकार भी फैला सकता है, तो स्वर्गिक ज्योति भी छिटका सकता है; यह पीयूषवृष्टि भी कर सकता है और विषवमन भी: यह स्वर्ग का सोपान भी दिखा सकता है और नरक का द्वार भी। अब हमपर, हमारे चलचित्रनिर्माता पूँजीपतियों पर, हमारी सरकार पर निर्भर है कि इसका कौन-सा पक्ष स्वीकार किया जाए। यदि इसका सदुपयोग किया जाए, तो इसके द्वारा हमारी शैक्षणिक प्रगति, सांस्कृतिक पुनर्निर्माण, सामाजिक पुनर्गठन, चारित्रिक विकास एवं विश्वव्यापी उदात्त दृष्टिकोण का प्रसार संभव हो सकता है इसमें संदेह नहीं। 

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