चिल्ड्रन स्टोरी इन हिंदी-मां की पुकार,खुद को धोखा 

चिल्ड्रन स्टोरी इन हिंदी

चिल्ड्रन स्टोरी इन हिंदी-मां की पुकार

एक दिन आकाश में काले-काले बादल घिर आए। सभी छोटे-बड़े पशु-पक्षी अपने-अपने घरों में आ छिपे थे। रात हो चुकी थी। किन्नू गिद्ध की मां परेशान थी, किन्नू अभी तक घर नहीं लौटा था। आखिर वह घोंसले से निकली और दूर तक उसे पुकार कर ढूंढ़ती रही, मगर किन्नू का कहीं कोई पता न चला। वह दुखी मन से अपने घोंसले में लौट आई। सामने बरगद पर बैठे चंपू बाज से रहा न गया। उसने ढाढ़स बंधाया, “लौट आएगा। हिम्मत से काम लो।”

कई दिन बीत गए, किन्नू घर नहीं लौटा। इधर किन्नू की मां का रो-रोकर बुरा हाल था। आखिर वह खुद ही किन्नू की खोज में निकल पड़ी। उड़ते-उड़ते वह दूर बर्फीले पहाड़ों तक पहुंच गई।

अचानक उसकी नजर पहाड़ों के पार गई, वहां उसे किन्नू उड़ता नजर आया। खुशी में वह किन्नू का नाम लेकर पुकारने लगी। मगर यह क्या, वह आवाज ही देती रह गई। किन्नू ने जानबूझ कर अपनी मां की आवाज नहीं सुनी थी। वह अपने ताकतवर पंखों से ऊंचाई की तरफ उड़ चला।

मां वापस अपने घोंसले में आ गई। चंपू उसके पास आ बैठा। किन्नू की मां बुरी तरह टूट चुकी थी। उम्मीद पर ही तो जीवन टिका है। जब वह टूट जाए, तो जीने का मन नहीं करता।

चंपू ने पूछा, “क्या हुआ? मिला किन्नू? कैसा है वह?”

किन्नू की मां पहले तो कुछ भी बताने को तैयार नहीं थी, लेकिन बाद में बहते आंसुओं से शब्दों को भिगोते हुए चंपू को उसने सब कुछ बता दिया। चंपू क्या कहता। वह तो बस महसूस कर सकता था एक मां के दर्द को। वह अपने घोंसले में आ गया। चंपू भी रात भर सो न सका।

किन्नू अब कभी नहीं आएगा, ऐसा सब मान चुके थे। लेकिन मां को उम्मीद थी, वह जरूर आएगा।

और एक दिन वह जीत गई। किन्नू अपने घर वापिस आ गया। उसके उन साथियों ने उसे मारने की कोशिश की थी, जिनके साथ रहकर वह अपने सपनों को पूरा करना चाहता था। मुश्किल से जान बचाकर वह आ पाया था। उसे यह समझ आ गया था-घर-घर होता है और अपने-अपने।

मां ने बेटे को गले से लगा लिया। किन्नू की की आंखें नम थीं। मां की आंखों से आंखें नहीं मिला रहा था वह । उसने गलत जो किया था अपनी मां के साथ।

स्टोरी इन हिंदी फॉर चाइल्ड खुद को धोखा

एक बौना था, उसका नाम था टिंगू। वह सर्कस में काम करता था। एक दिन उसके मन में आया, ‘बेकार मैं सर्कस में काम करता हूं, दिन-रात इतनी मेहनत के बाद भी मुझे क्या मिलता है भला, सिर्फदो वक्त का खाना और रहने को पुराना-सा टेंट।’

स्टोरी इन हिंदी फॉर चाइल्ड- खुद को धोखा

यह सोचकर एक रात वह चुपके से निकल भागा और शहर पहुंच गया। काम की तलाश की, लेकिन उसका कद देखकर कोई उसे काम पर रखने को तैयार न हुआ। बल्कि सब उससे यही कहते कि ‘भाई, सर्कस में काम करो।’ लोगों की यह सलाह सुन-सुनकर वह बौखला गया। सोचता, लोगों को क्या पता कि वह सर्कस से ही भागकर आया है।

एक दिन वह फिर काम ढूंढ़ने के लिए जब बाहर निकला तो, रास्ते में उसे एक जादूगर मिला। जादूगर को उसने अपना दुख बताया तो जादूगर बोला, “मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें ऐसे जादू के खेल सिखाऊंगा, जिन्हें लोगों को दिखाकर तुम जल्दी ही अमीर बन जाओगे।” बौना खुश हो गया। जादूगर ने आगे कहा, “मगर मेरी एक शर्त है?” बौने ने पूछा, “क्या?” जादूगर बोला, “राजमहल में एक ऐसा लैंप है, जिसकी रोशनी से जादू सीखने में तुम्हें बड़ी आसानी होगी। अगर तुम किसी तरह उस लैंप को हासिल कर लो, तो समझ लो कि तुम हो गए अमीर।” बौना मान गया कि वह जादूगर की मदद करेगा, लैंप को ले आएगा।

आधी रात के वक्त वह बौना चुपके से महल में घुसा और लैंप लेकर वापस लौट आया। उसके कद की वजह से किसी पहरेदार की नजर भी उस पर न पड़ी।

लैंप हाथ में आते ही जादूगर ठहाका मार कर हंसा और बोला, “धन्यवाद, तूने मेरा काम कितनी आसानी से कर दिया,” यह कहकर जादूगर जब लैंप लेकर चलने लगा, तो बौना बोला, “…और तुमने जो वादा किया था, तुम मुझे जादू के खेल सिखाओगे?” जादूगर बोला, “वाह रे मूर्ख! कभी किसी ने अपना हुनर किसी दूसरे को सिखाया है?” इस पर बौना रोते हुए बोला, “तुमने मुझसे धोखाकरके अच्छा नहीं किया।”

लेकिन जादूगर को उस जादुई लैंप के मिल जाने की खुशी थी। वह बौने की ओर बिना देखे वहां से चल पड़ा। अभी वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा होगा कि उसे एक आवाज सुनाई दी, यह लैंप झूठे और बेईमान व्यक्ति के लिए बेकार है। जो जादू के खेल तुम जानते हो, उन्हें भी तुम भूल जाओगे।’

जादूगर को अपने किए का फल मिल गया। कोई दूसरे को धोखा नहीं देता, ऐसा करना असल में खुद को धोखा देना है।

जंगल में चोरी

पहाड़ी के दूसरी ओर एक घना जंगल था। सुबह से ही वहां शोर मचा था। पता चला कि कई दिनों से जंगल के सभी पशु-पक्षियों के घर चोरी हो रही है। आज मिंकू चूहे के घर चोरी हुई थी। क्या किया जाए? चोर को कैसे पकड़ा जाए? इस बारे में जंगल के राजा शेर ने एक सभा बुलाई। सभी छोटे बड़े जानवर-परिंदे उसमें आए। मगर टिंकू भालू नहीं आया। शेर ने रुनझुन बया को भेजा टिंकू भालू को बुलवाने। टिंकू अकड़कर बोला, “मैं क्यों आऊं, मुझे कोई जरूरत नहीं है यह जानने की कि चोर कौन है, वैसे भी मैं दूसरे जंगल में रहने जा रहा हूं। वहां मैंने एक सुंदर-सा घर खरीद लिया है।” टिंकू सभा में नहीं आया। सबने उसका बहिष्कार कर दिया। कुछ दिनों बाद टिंकू उस जंगल से चला भी गया।

जंगल में चोरी

एक दिन रूनझुन बया जब उसके घर पहुंची, तो क्या देखती है कि वहां उसका और जंगल के दूसरे जानवरों का सामान भरा पड़ा है। वह समझ गई कि यही है वह असली चोर। उसने उसी वक्त टिंकू भालू से कहा “चोरी के धन से अमीर होने से बेहतर है गरीब होना और मेहनत-मजदूरी से जीवन-यापन करना। देखना, यह संपत्ति तुम्हें फलेगी नहीं।”

सुना है उसके बाद जंगल में आग लगी और टिंकू का घर और उसका सारा सामान जलकर राख हो गया। रुनझुन की बात सच हो गई थी। चोरी के धन से भला कोई अमीर हुआ है?

जार की मछली

तेज हवा ने रोहित के घर के दरवाजों को खोल दिया था। दरवाजों की खटपट से रोहित की नींद खुल गई थी। हां, उसकी प्यारी बिल्ली डर के मारे दौड़ कर रोहित के बिस्तर में जरूर जा छिपी थी। हवा ने कमरे में रखे मछली के जार को भी अपनी ठंडी-ठंडी अंगुलियों से सहलाया था। खिड़की और दरवाजों से झांकते खुले आकाश और उसमें टिमटिमाते तारों को देखकर रानी मछली की आंखों के सामने बीते दिन एक-एक करके घूम गए थे। उसने लंबी सांस ली। हवा के झोंके ने रानी के मन में उमड़ती बातों को मानो पढ़ लिया था।

जार की मछली

उसने रानी से कहा, “बोलो, मुझसे कहो अपने दिल की बात।” पहले तो रानी झिझकी, लेकिन फिर यह सोचकर कि मन पर बोझ नहीं रखना चाहिए, कहने लगी, “सखी, बहुत दिनों बाद खुले

आसमान में खिलते सितारों और मुस्कुराते चांद को देखा है।”

हवा के झोंके ने पूछा, “मैं तुम्हारी बात नहीं समझी!”

रानी की आंखों में आंसू आ गए। वह बोली, “ठीक कहती हो, मैं साफ जल की लहरों पर थिरकने वाली मछली हूं। लेकिन नदियों का पानी साफ कहां है? आदमी ने अपना सारा कचरा इसमें मिला दिया है। कहां है कोई ऐसी नदी, जो साफ हो?”

रानी की बात सुनकर हवा का झोंका सोच में पड़ गया। उसने रानी से कहा, “ठीक कहती हो तुम। आदमी की करतूतों से तो हमारा सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। चारों तरफ सीमेंट के जंगल बन रहे हैं। लोगों के हित की बात करने वाला आदमी जब खुद मौत की दाढ़ों में फंसेगा, तब इसे समझ आएगा कि इसने कैसे अपने लिए खुद कब्र खोदी है।”

हवा रानी की बातों को गौर से सुन रही थी। रानी ने आगे कहा, “कभी-कभी तो मुझे समझ नहीं आता कि आदमी है क्या चीज! गंगा-यमुना को मां कहकर पुकारता है, उनकी पूजा-आरती करता है और फिर उसे ही मैला करता है।”

रोहित ने इन दोनों की बातों को सुन लिया था। उसने जल प्रदूषण के खिलाफ लोगों को समझाने का व्रत ले लिया। उसने रानी से वादा किया कि वह उसे जल्द ही उस नदी की लहरों पर अठखेलियां खेलने के लिए छोड़कर आएगा, जहां से वह उसे लेकर आया था।

रानी इंतजार कर रही है आज भी। वह सोचती है, ‘नदियों के माहात्म्य को, उन्हें साफ रखने के संदर्भ में, मनुष्य कब समझेगा?’

जीना की मां

एक मुर्गी थी, जिसका नाम जीना था। जीना जिस घर में रहती थी, उस घर के थोड़ी ही दूरी पर एक पेड़ था। उसके तने में एक बिल था, जिसमें एक चुहिया रहती थी, जिसका नाम था नूनू। जीना दरबे में पड़ी-पड़ी बोर हो जाती।

जीना की मां

एक दिन नूनू उधर से गुजर रही थी, तो जीना ने उसे रोककर कहा, “तुम कभी-कभी मेरे पास भी आ जाया करो, मेरा अकेले दिल नहीं लगता।” नूनू बोली, “अरे, कैसी बातें करती हो, कहां गए तुम्हारे संगी-साथी? अभी कुछ दिनों पहले तो मैंने देखा था और भी कई मुर्गियों को इस दड़बे में।” नूनू की बात सुनकर, जीना ने दुख भरे लहजे में कहा, “हां, कल तक बहुत सारे थे मेरे संगी-साथी, मगर अब कोई नहीं हैं।”

“यह सब कैसे हुआ?” नूनू ने पूछा। जीना की आंखें नम हो गईं, “कोई बात नहीं, रहने दो। तुम्हें दुख पहुंचा, उसके लिए मैं क्षमा मांगती हूं।” जीना ने खुद को संभाला, “मुझे लगता है, तुम्हें अपने मन का दुख बता कर मैं हल्की हो जाऊंगी।” नूनू गंभीर हो गई।

जीना ने बताया, “मेरी बात सभी मानते थे। जो भी खाना होता, पहले मैं उसको जांचती-परखती, फिर सबको खाने को कहती। इससे कई बार मेरे साथियों का बचाव हुआ था। लेकिन एक बार मेरे मना करने पर कुछ नादान और जवान साथियों ने मेरी बात मानने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि सब अपनी मर्जी के मालिक हैं। मैंने बहुत समझाया कि इस खाने में रोग के जीवाणु हैं, लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं मानी। और वही हुआ, जिसका मुझे डर था। बीमारी इतनी तेजी से फैली कि उसने किसी को संभलने नहीं दिया। देखते-देखते सब मौत के मुंह में चले गए।” अपनी व्यथा-कथा सुनाती हुई जीना हिचकियां लेने लगी थी। लेकिन फिर कुछ समय में सब सामान्य हो गया।

नूनू ने सांत्वना दी, “तुम कैसे कहती हो खुद को अकेली, हरेक के साथ ईश्वर होता है।””हां, तुमने सही कहा,” जीना ने खुद को थामते हुए कहा। उसके बाद नूनू ने एक छोटा-सा केक का टुकड़ा जीना की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “चलो अब मुंह मीठा करो, आज से मेरी तुम्हारी दोस्ती पक्की।”

एक रात जीना दरबे के बाहर बैठी तारों भरे आसमान को देखकर कुछ बड़बड़ा रही थी। अचानक नून की मां उसके पास आकर बोली, “ क्या बातें कर रही हो खुद से? मुझे बताओ अपनी तकलीफ। जैसे नूनू मेरी बेटी, वैसी ही आज से तुम भी मेरी बेटी हो।” जीना का मन भर आया। उसे अपनी मां की याद आ गई। महसूस हुआ-काश! मां की कीमत हम पहले जान पाते।मानते उनकी बातों को।

हनी का दुख

एक दिन की बात है कि एक पालतू बिल्ली, जिसका नाम हनी था, रास्ता भटक गई और वह अपने घर ही न पहुंच पाई। रात हुई, उसकी मालकिन डेजी को बड़ी चिंता हुई कि हनी अभी तक क्यों नहीं लौटी। उसने उसे सब जगह ढूंढ़ा लेकिन हनी का कहीं कोई पता न चला। हनी के खो जाने से डेजी बहुत दुखी थी। उस दिन उसने खाना भी नहीं खाया। मन ही मन वह ईश्वर से प्रार्थना करती रही कि ‘हे ईश्वर! हनी की रक्षा करना।’

इस तरह कई दिन बीत गए। एक दिन डेजी की पड़ोसन ने सुझाव दिया कि ‘तुम हनी के खोने की खबर अखबार में छपवा दो।’ डेजी ने ऐसा ही किया।

अगले दिन हनी की खबर तसवीर के साथ अखबार में छपी। उसी शाम एक आदमी डेजी के घर पहुंचा और उससे बोला, “आपकी हनी अब मेरे घर रहती है।” मालकिन ने पूछा, “तुम्हारे घर कैसे पहुंची हनी?” हंसते हुए वह आदमी बोला, “उस दिन जब मैं बाजार से मछली खरीद कर लौट रहा था, तो मैंने देखा आपके गेट में से जो बिल्ली निकली, वह सीधी मेरे पीछे-पीछे चल दी। घर पहुंचा तो देखा, वह मेरे साथ खड़ी थी। मैं समझ गया कि मछली की खुशबू इसे यहां तक खींच लाई है। मैंने मछली उसे खाने को दे दी। तब से वह मेरे पास ही है। मगर जब अखबार में खबर पढ़ी, तो मैं आपको बताने चला आया।”

बस, यह सुनना था कि मालकिन दौड़ी-दौड़ी हनी के पास पहुंची, पहले तो उसे देखकर रोने लगी, फिर चिल्लाने लगी। उसने हनी पर गिला-शिकवों की बौछार कर दी। जो मन में आया, वह सब कह दिया। वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी कि साथ खड़ा वह व्यक्ति, जिसके पास हनी थी, हनी की मालकिन को शांत करता हुआ बोला, “अपने किए को बार-बार दोहराकर, क्यों हनी को दुखी कर रही हैं आप और स्वयं भी हैरान-परेशान हो रही हैं। जो हुआ, उसे भूल जाओ और हनी को पहले की तरह अपना लो। बहन, असल में बार-बार दूसरों पर एहसान लादकर ही हम उन्हें खुद से दूर करते हैं।”

डेजी को यह बात अच्छी तरह समझ आ गई थी कि क्यों हनी ने उसके घर से जाने के बाद वापस आने की कोशिश नहीं की थी।

किसी के लिए कुछ करने के बाद उसे बार-बार सुनाना एक-दूसरे से दूरी ही बढ़ाता है। प्रेम में ऐसा नहीं हुआ करता।

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