भारत में बाल अधिकार संरक्षण की पहले पर निबंध | भारत में बाल अधिकार पर निबंध Essay on Child Rights in India

भारत में बाल अधिकार संरक्षण की पहले पर निबंध

भारत में बाल अधिकार संरक्षण की पहले पर निबंध | भारत में बाल अधिकार पर निबंध Essay on Child Rights in India (Hindi)

कोई भी देश विकास एवं प्रगति की ऊंचाइयों को तभी छू सकता है, जब उस देश में बच्चों की स्थिति अच्छी हो, क्योंकि बच्चे ही राष्ट्र के भावी कर्णधार होते हैं और बड़े होकर राष्ट्र और समाज के निर्माण में यथेष्ट योगदान देते हैं। यह बात भारत पर भी लागू होती है। एक सशक्त एवं विकसित भारत के लिए यह आवश्यक है कि देश में बच्चों का बहुमुखी विकास हो और वे बड़े होकर भारत के निर्माण एवं उन्नयन में भागीदार बनें। इस बात को ध्यान में रखकर जहां भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण के समुचित प्रावधान किए गए हैं, वहीं वैश्विक स्तर पर भी इस दिशा में अच्छी पहले हुई हैं। 

देश के विकास के लिए बालकों का विकास आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखकर समय-समय पर सरकार द्वारा बाल विकास की पहले की जाती रही हैं। विषय के संदर्भ में इन्हें समग्र रूप से जान लेना समीचीन रहेगा। महिलाओं एवं बच्चों के विकास को गति प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा 30 जनवरी, 2006 को एक पृथक मंत्रालय के रूप में ‘महिला एवं बाल विकास मंत्रालय’ की स्थापना की गई जो कि महिलाओं एवं बच्चों से जुड़े सरोकारों से प्रतिबद्ध रहकर बच्चों पर केंद्रित कानूनों एवं नीतियों को प्रोत्साहित करता है, उनके लिए सुरक्षित वातावरण के विकास के उपाय सुनिश्चित करता है, ताकि इन्हें बढ़ने के उचित अवसर मिलें और वे कुपोषण के शिकार न हों तथा बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाता है। इस मंत्रालय के द्वारा संस्थागत एवं विधायी समर्थन प्रदान कर बालकों के विकास हेतु उपाय सुनिश्चित किए जाते हैं। 

“एक सशक्त एवं विकसित भारत के लिए यह आवश्यक है कि देश में बच्चों का बहुमुखी विकास हो और वे बड़े होकर भारत के निर्माण एवं उन्नयन में भागीदार बनें।” 

बाल अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने तथा बालकों के हित संवर्धन के निमित्त हमारे देश में ‘बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005′ के तहत ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ (NCPCR) की स्थापना की जा चुकी है, जो कि बच्चों से संबंधित कार्यक्रमों और कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन एवं बाल अधिकारों को लागू करने की दिशा में तत्पर है। यह निकाय बाल अधिकारों से संबद्ध संयुक्त राष्ट्र संधि (CRC) में प्रतिष्ठापित बाल अधिकारों का रत में पैरोकार भी है। यह राज्यों में भी बाल आयोगों की स्थापना का प्रावधान करता है। 

बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए सरकार द्वारा 26 अप्रैल, 2013 ‘राष्ट्रीय बाल नीति’ (NCP) की घोषणा की जा चुकी है। इस नीति की खास बात यह है कि इसमें 18 वर्ष से नीचे की वय वालों को बच्चों की श्रेणी में रखा गया है। यह नीति मुख्य रूप से प्रत्येक बच्चे को जीवन, विकास, शिक्षा, सुरक्षा एवं सहभागिता के अधिकार, बिना भेदभाव के बच्चों को समान अधिकार, बच्चों से संबंधित सभी कार्यों और निर्णयों में बच्चों के हितों की प्राथमिकता तथा बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए अनुकूल पारिवारिक वातावरण के निर्माण आदि बिंदुओं पर केंद्रित है। यह नीति बच्चों के सर्वांगीण विकास एवं उनकी सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक, टिकाऊ, बहुपक्षीय समेकित एवं समावेशी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है तथा इसमें बच्चों के अधिकारों के संरक्षण को प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है।

बाल शोषण की रोकथाम की दृष्टि से सरकार द्वारा लागू किए गए ‘बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012′ को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। बालक एवं बालिकाओं को एक समान संरक्षण देने वाले इस कानून में 18 वर्ष से कम वय वालों को बालक के रूप में परिभाषित किया गया है। बालकों के विरुद्ध हुए अपराध की गंभीरता को देखते हुए इसमें जहां कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है, वहीं यदि अपराध सुरक्षा बल के सदस्य, पुलिस अधिकारी या सरकारी कर्मचारी द्वारा किया जाता है, तो इसे ज्यादा गंभीर अपराध माना गया है। न्याय की प्रक्रिया में हर अवस्था में बच्चों के हितों की रक्षा को ध्यान में रखकर इस कानून के तहत विशेष अदालतों के गठन का भी प्रावधान है। इस कानून के दायरे में मीडिया को भी लाते हुए यह व्यवस्था दी गई है कि यौन उत्पीड़न के गंभीर मामले में विशेष अदालत की अनुमति के बगैर मीडिया पीड़ित बच्चे की पहचान को उजागर नहीं कर सकेगा। इसका उल्लंघन किए जाने की दशा में सजा का प्रावधान बनाया गया है। एक अच्छी बात यह भी है कि इस कानून के क्रियान्वयन पर निगरानी हेतु ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ एवं राज्य स्तरीय बाल अधिकार आयोगों को अधिकृत किया गया है। इसी क्रम में मुसीबत में फंसे बच्चों की मदद के उद्देश्य से देश के प्रमुख शहरों में चाइल्डलाइन सेवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। यह सेवा अहर्निश 1098 नंबर पर उपलब्ध रहती है। इस सेवा का उपयोग मुसीबत में फंसा बच्चा या उनकी तरफ से कोई भी वयस्क कर सकता है। 

बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु शिक्षा की अहमीयत को ध्यान में रखकर सरकार द्वारा वर्ष 2001 में ‘सर्व शिक्षा अभियान’ का सूत्रपात किया गया। इसके समग्र लक्ष्यों में सम्मिलित हैं—शिक्षा में सार्वभौमिक पहुंच को प्रोत्साहित करना, लैंगिक एवं सामाजिक श्रेणी के अंतरों को पाटना तथा बच्चों के अध्ययन स्तर में महत्त्वपूर्ण वृद्धि करना। इस अभियान में देश के सभी राज्यों एवं संघ शासित क्षेत्रों को शामिल किया गया। उल्लेखनीय है कि समाज के समग्र सशक्तीकरण एवं विकास को ध्यान में रखकर हमारे संविधान में भी व्यवस्था दी गई है। हमारे संविधान में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था दी गई है तथा इसे संविधान के अनुच्छेद 45 के तहत राज्य के नाति निदेशक सिद्धांतों में सम्मिलित किया गया है। 

“यह सुखद है कि हमारे देश में बचपन को बचाने की सुचिंतित एवं व्यापक पहलें हो रहीं हैं। इनसे आशा जागी है। बचपन न सिर्फ बचेगा, बल्कि बड़ा होकर इस राष्ट्र को गढ़ेगा भी।” 

यह अत्यंत सुखद है कि हमारे देश में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया जा चुका है। 12 दिसंबर, 2002 को संविधान में 86वां संशोधन किया गया तथा इसके अनुच्छेद 21 ए को संशोधित करके शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया गया। बच्चों को अधिकाधिक शिक्षा के दायरे में लाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा 1 अप्रैल, 2010 से ‘बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम’ को पूर्ण रूप से प्रभावी बनाया गया। इस अधिनियम के तहत जहां छह वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को पूरे तौर पर मुफ्त एवं अनिवार्य बनाया गया है, वहीं केंद्र एवं राज्यों के लिए इस कानून का स्वरूप बाध्यकारी है। इसी क्रम में माध्यमिक शिक्षा तक बच्चों की पहुंच को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जहां वर्ष 2009 में ‘राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान’ का सूत्रपात किया गया, वहीं विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने, बच्चों को स्कूल छोड़ने से रोकने एवं उनकी उपस्थिति बढ़ाने एवं उनके पोषण स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य से ‘मध्याह्न भोजन योजना’ का सूत्रपात किया गया तथा स्कूली बच्चों को इसके दायरे में लाया गया। 

बाल विकास को ध्यान में रखकर हमारे देश में वर्ष 1975 में ‘एकीकृत बाल विकास सेवा योजना शुरू की गई, जिसके प्रमुख उद्देश्य हैं-छह वर्ष से कम वय के बच्चों के लिए पौष्टिक आहार की व्यवस्था सुनिश्चित करना, बच्चों के समुचित शारीरिक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक विकास की बुनियाद रखना, बाल मृत्युदर, कुपोषण तथा स्कूली शिक्षा अधूरी छोड़ने वाले बच्चों की दर में कमी लाना तथा स्वास्थ्य एवं पोषाहार की समुचित व्यवस्था करना आदि। इसी क्रम में ‘एकीकृत बाल सुरक्षा योजना’ के रूप में एक अच्छी पहल सरकार की तरफ से की गई, जिसमें मुसीबत में फंसे बच्चों के कल्याण में योगदान एवं बच्चों के उत्पीड़न, तिरस्कार एवं शोषण को रोकने जैसे पुनीत उद्देश्यों को सम्मिलित किया गया। बच्चों के पैदा होने से पहले, बाद में और बढ़ते हुए पूर्ण शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास के लिए समुचित सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार द्वारा वर्ष 1974 में ‘राष्ट्रीय बाल कार्य योजना’ का सूत्रपात किया गया था। 

बाल विकास में अनेक प्रकार से बाल विवाह बाधक सिद्ध होते हैं तथा हमारे देश में बाल विवाहों का प्रचलन अभी भी बना हुआ है। बाल विवाहों के प्रतिषेध हेतु हमारे देश में पहले से ‘बाल विवाह प्रतिरोधक अधिनियम, 1929′ विद्यमान था, जो कि प्रभावशाली सिद्ध नहीं हो रहा था। नई पहल के रूप में इसे वापस लेकर ज्यादा प्रभावशाली एवं कड़े कानून ‘बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम, 2006′ को प्रभावी बनाया गया। इस कानून में जहां दोषी को सजा का प्रावधान है, वहीं बाल विवाहों को रोकने के लिए राज्यों में प्रतिबंध अधिकारियों को भी नियुक्त किए जाने का प्रावधान है।

भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन के उपलक्ष्य में भारत में प्रतिवर्ष 14 नवंबर को बाल दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन बच्चों के हितों पर मंथन किया जाता है तथा बाल अधिकारों के संरक्षण के मार्ग की बाधाओं को दूर किए जाने का संकल्प लिया जाता है। शिक्षा, कला, संस्कृति एवं खेलों में अच्छा प्रदर्शन करने वाले 4 से 15 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों को प्रोत्साहन प्रदान करने के उद्देश्य से हमारे देश में वर्ष 1996 से ‘राष्ट्रीय बाल पुरस्कारों’ की शुरुआत की गई। बच्चों की उपलब्धियों के लिए उन्हें स्वर्ण एवं रजत पदक देकर प्रोत्साहित किया जाता है। वीर बालकों को प्रोत्साहन देने के लिए वीरता पुरस्कारों की व्यवस्था है, जो कि प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर वीर एवं निर्भीक बालकों को प्रदान किए जाते हैं। इसी क्रम में वर्ष 1979 में बाल कल्याण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना की गई, जो कि बाल कल्याण के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करनेवाली संस्थाओं एवं व्यक्तियों को दिया जाता है। बाल विकास, बाल कल्याण एवं बाल संरक्षण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वर्ष 1994 से ‘राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार’ की शुरुआत की गई। 

बाल हितों, बाल विकास एवं बाल अधिकारों के संरक्षण को लेकर भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिबद्ध एवं वचनबद्ध है। भारत 11 दिसंबर 1992 को बच्चों के अधिकार संबंधी संयक्त राष्ट संधि का भी अनुमोदन कर चुका है, जिसका उद्देश्य बच्चे को स्वस्थ और अनुकूल माहौल में जीने और बढ़ने का अधिकार देना है। इसके अलावा भारत वर्ष 2004 में दो वैकल्पिक संधियों पर भी हस्ताक्षर कर चुका है, जिनमें पहली का संबंध सशस्त्र संघर्ष में बच्चों की भागीदारी से है तथा दूसरी का संबंध बच्चों की खरीद-फरोख्त, बाल वेश्यावृत्ति एवं बाल अश्लील साहित्य से है। बाल हितों के लिए काम करने वाले संयुक्त राष्ट्र के निकाय ‘यूनिसेफ’ के कार्यक्रमों में भी भारत एक सहयोगी की भूमिका निभाता है तथा समय-समय पर इसके साथ मिलकर कार्यक्रमों का संचालन करता है। 

उक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि हमारे देश में बाल अधिकारों के संरक्षण की पहले कमतर नहीं हैं। इनके अच्छे परिणाम भी दिख रहे हैं। और अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि बाल विकास एवं बाल अधिकारों के संरक्षण के निमित्त नागरिक समाज भी आगे आए और सामाजिक स्तर पर अच्छा वातावरण निर्मित किया जाए। इस संदर्भ में स्वैच्छिक संगठनों को भी अपनी भूमिका को प्रभावी बनाना होगा। हमारे देश में बाल अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले स्वैच्छिक संगठनों की तो भरमार है, किंतु इनमें से उन संगठनों की संख्या अत्यंत कम है, जो अच्छा काम कर रहे हैं। कैलाश सत्यार्थी जैसे जीवट लोगों की संख्या बहुत कम है, जिन्होंने बाल अधिकारों की लड़ाई लड़ते हए नोबेल पुरस्कार हासिल किया। स्वैच्छिक संगठनों के संचालकों को कैलाश सत्यार्थी के व्यक्तित्व स प्रेरणा लेकर बाल विकास एवं बाल अधिकारों के संरक्षण की दिशा में उत्कृष्ट पहले करनी चाहिए। 

आज हमारे देश में बचपन अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। यथा—कुपोषण की समस्या, शिशु मृत्यु दर बढ़ने की समस्या, अशिक्षा की समस्या, शिशुओं के स्वास्थ्य संबंधी समस्या, बाल विवाह की समस्या, बाल हिंसा की समस्या, बाल श्रम की समस्या, बाल अपराध की समस्या एवं बाल वेश्यावृत्ति आदि। ये समस्याएं भारत के विकास एवं उन्नति में बाधक हैं, क्योंकि बच्चे ही भविष्य के कर्णधार होते हैं। जब बचपन ही समस्याओं से घिरा रहेगा, तो देश का भविष्य उज्ज्वल कैसे बनेगा। यह सुखद है कि हमारे देश में बचपन को बचाने की सुचिंतित एवं व्यापक पहलें हो रहीं हैं। इनसे आशा जागी है। बचपन न सिर्फ बचेगा, बल्कि बड़ा होकर इस राष्ट्र को गढ़ेगा भी।

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