चाणक्य नीति हिंदी स्टेटस | चाणक्य नीति चौथा अध्याय

चाणक्य नीति

चाणक्य नीति हिंदी स्टेटस | चाणक्य नीति चौथा अध्याय 

व्यक्ति को चाहिए कि वह ऐसे धर्म का त्याग कर दे, जिसमें दया और ममता आदि का अभाव हो। इसी प्रकार विद्या से हीन, सदा क्रोध करने वाली स्त्री और जिन बंधु-बांधवों में प्रेम का अभाव हो, उनका भी त्याग कर देना चाहिए। उनसे भी दूर रहना चाहिए। 

आयुः कर्म च वित्तं च विद्या

निधनमेव च। 

पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते 

गर्भस्थस्यैव देहिनः।।

जीव जब मां के गर्भ में आता है तभी उसकी आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु-यह पांचों बातें निश्चित हो जाती हैं। ।।1।। 

चाणक्य का विश्वास है कि मनुष्य के जीवन की प्रायः सभी बातें पहले से ही निश्चित हो जाती हैं जैसे कि वह कितने वर्षों तक जीवित रहेगा, किस प्रकार के कर्म करेगा, उसे धन आदि की प्राप्ति कैसे होगी तथा वह कितनी विद्या प्राप्त कर सकेगा।

साथ ही उन्होंने कर्म अर्थात् पुरुषार्थ को कहीं नकारा भी नहीं है। कारण स्पष्ट है-इन सबके मूल में कर्म ही तो है, जिसे प्रारब्ध कहते हैं। माना जाता है कि उसी के अनुसार जीव को शरीर की प्राप्ति होती है, वह भी हमारे कर्मों का ही परिणाम है। शास्त्रों में कहा गया है कि व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य कर्म करना है, अतः वह अपनी विद्या और बुद्धि के अनुरूप श्रेष्ठ कर्म करता रहे। देखने में आता है कि संकल्पपूर्वक किए गए कर्म से इन सबमें भी परिवर्तन किया जा सकता है। 

साधुभ्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रा

मित्राणि बान्धवाः। 

ये च तैः सह 

गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्।।

पुत्र, मित्र और बन्धु-बान्धव साधु लोगों से विमुख हो जाते हैं क्योंकि उन्हें ऐसे लोगों का आचरण मूर्खतापूर्ण लगता है, परंतु जो लोग साधुओं के अनुसार अपना जीवन बिताते हैं, उनका संग करते हैं, उनके अनुकूल आचरण करते हैं, उनके इस कार्य से जो पुण्य प्राप्त होता है, उससे सारा वंश-परिवार कृतकृत्य हो जाता है। ।।2।। 

दर्शनध्यानसंस्पर्शर्मत्सी कूर्मी च 

पक्षिणी।

शिशुं पालयते नित्यं तथा 

सज्जनसंगतिः।।

जैसे मछली अपने बच्चों को देखकर, मादा कछुआ ध्यान (देखभाल) से और मादा पक्षी स्पर्श से अपने बच्चों का लालन-पालन करते हैं, उसी प्रकार सज्जनों की संगति भी दर्शन, ध्यान और स्पर्श द्वारा संसर्ग में आए व्यक्ति का पालन करती है।।3।। 

आचार्य ने इस श्लोक द्वारा सज्जनों के अत्यंत सूक्ष्म प्रभाव की ओर संकेत किया है। मान्यता है कि मछली अपनी दृष्टि से, मादा कछुआ ध्यान से तथा पक्षी स्पर्श से अपनी संतान का लालन-पालन करते हैं। सज्जन भी दर्शन, ध्यान और स्पर्श से अपने आश्रितों को सुरक्षा प्रदान करते हैं और विकास में सहयोगी होते हैं। सज्जनों के दर्शन से आत्मबल में वृद्धि होती है और संकल्प दृढ़ होता है। यदि उनका ध्यान किया जाए और यदि उनके चरणों का स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाए, तो सफलता, उन्नति और विकास सहज हो जाता है। 

यावत्स्वस्थो ह्ययं देहो

यावन्मृत्युश्च दूरतः।

तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते 

किं करिष्यति।।

जब तक यह शरीर स्वस्थ तथा नीरोग है और जब तक मृत्यु नहीं आती तब तक व्यक्ति को अपने कल्याण के लिए धर्मयुक्त आचरण- अर्थात पुण्य कर्म करने चाहिए क्योंकि करने-कराने का संबंध तो जीवन के साथ ही है। जब मृत्यु हो जाएगी, उस समय वह कुछ भी करने में असमर्थ हो जाएगा अर्थात कुछ भी नहीं कर सकेगा।।। 4।। 

किसी को इस बात का ज्ञान नहीं कि मनुष्य का शरीर कब रोगों से घिर जाएगा। उसे यह भी मालूम नहीं कि मृत्यु कब होने वाली है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि जब तक वह जीवित है, अधिक-से-अधिक पुण्य कर्म करे, क्योंकि करने-कराने का संबंध तो जीवन से है। जब मृत्यु हो जाती है, तब सारे विधि-निषेध निरर्थक हो जाते हैं। 

कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले

फलदायिनी।

प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं 

धनं स्मृतम्।।

विद्या में कामधेनु के गुण होते हैं। उससे असमय में ही फलों की प्राप्ति होती है। विदेश में विद्या ही माता के समान रक्षा और कल्याण करती है, इसलिए विद्या को गुप्तधन कहा गया है। ।।5।। 

गुप्तधन वह होता है जिससे मनुष्य संकट के समय लाभ उठा सके। इसलिए चाणक्य ने विद्या को गुप्तधन बताया है और उसकी उपमा कामधेनु से की है। कामधेनु उसे कहा जाता है, जिससे मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। उससे उस समय भी फलों की प्राप्ति होती है, जब देशकाल के अनुसार फल प्राप्ति संभव न हो। विद्या के कारण ही विदेश में व्यक्ति का सम्मान होता है। माता जिस प्रकार बच्चे की रक्षा करती है, उसी प्रकार विदेश में विद्या से व्यक्ति की हर प्रकार से रक्षा होती है और सुख प्राप्त होते हैं। नीति वाक्य भी है–विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। 

वरमेको गुणी पुत्रो निर्ग्रणैश्च

शतैरपि।

एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः 

सहस्त्रशः।।

सैकड़ों गुणरहित और मूर्ख पुत्रों के बजाय एक गुणवान और विद्वान पुत्र का होना अच्छा है, क्योंकि हजारों तारों की अपेक्षा एक चंद्रमा से ही रात्रि प्रकाशित होती है। ।।6।। 

सैकड़ों मूर्ख पुत्रों की अपेक्षा एक विद्वान और गुणों से युक्त पुत्र से ही पूरे परिवार का कल्याण होता है। रात्रि के समय जिस प्रकार आकाश में हजारों तारागण दिखाई देते हैं, परंतु उनसे रात्रि का अंधकार दूर होने में सहायता नहीं मिलती। उसे तो चंद्रमा ही दूर कर पाता है। 

आचार्य की दृष्टि में संख्या नहीं गुण महत्वपूर्ण हैं। 

मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि

तस्माज्जातमृतो वरः।

मृतः स चाऽल्पदुःखाय 

यावज्जीवं जडो दहेत्।।

दीर्घ आयु वाले मूर्ख पुत्र की अपेक्षा पैदा होते ही मर जाने वाला पुत्र अधिक श्रेष्ठ होता है, क्योंकि पैदा होते ही मर जाने वाला पुत्र थोड़े समय के लिए ही दुख का कारण होता है, जबकि लंबी आयु वाला मूर्ख पुत्र मृत्युपर्यन्त दुख देता रहता है। ।।7।। 

संतान से माता-पिता की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। जब जन्मते ही संतान की मृत्यु हो जाती है, तो माता-पिता निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं। भविष्य में इस मृत संतान को लेकर कोई सुख-दुख की उम्मीद नहीं रहती है। जबकि मूर्ख जीवित पुत्र नित्य-प्रति अपने माता-पिता की आशा के टुकड़े-टुकड़े करता रहता है। इस दुख से पहला दुख ज्यादा ठीक है। 

कुग्रामवासः कुलहीनसेवा

कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या।

पुत्रश्च मूों विधवा च कन्या

विनाऽग्निना षट् प्रदहन्ति 

कायम्।।

अशिक्षित तथा अनुपयुक्त स्थान या ग्राम में रहना, नीच व्यक्ति की सेवा, अरुचिकर और पौष्टिकता से रहित भोजन करना, झगड़ालू स्त्री, मूर्ख पुत्र और विधवा कन्या, ये छह बातें ऐसी हैं जो बिना अग्नि के ही शरीर को जलाती रहती हैं। ।।8।। 

कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनसे व्यक्ति जीवनभर दुखी रहता है। उनमें सबसे प्रमुख वह स्थान है, जहां उसे लगातार रहना होता है। यदि वह स्थान ठीक न हो और वहां के निवासियों का आचार-व्यवहार सही न हो तो व्यक्ति सदैव दुखी रहता है। इसी प्रकार यदि किसी को नीच व्यक्ति की नौकरी करनी पड़े, गंदा, बासी और पौष्टिकता से रहित 

भोजन करना पड़े तो वह भी दुखदायी ही है। यदि स्त्री झगड़ालू हो, छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती हो तो गृहस्थ का सुख कैसे प्राप्त हो सकता है? पुत्र यदि मूर्ख हो और लड़की विधवा हो तो यह आयुभर का असहनीय क्लेश हो जाता है। ऐसी स्थितियों से बच पाना यदि संभव न हो, तो मानसिक रूप से इससे निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

किं तया क्रियते धेन्वा या न

दोग्ध्री न गर्भिणी।

कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न 

विद्वान् भक्तिमान्।।

जिस तरह दूध न देने वाली और गर्भ न धारण करने वाली गाय से कोई लाभ नहीं, उसी प्रकार यदि पुत्र भी विद्वान और माता-पिता की सेवा करने वाला न हो तो उससे किसी प्रकार का लाभ नहीं हो सकता। ।।9।। 

कोई भी व्यक्ति ऐसी गाय को पालना पसंद नहीं करेगा, जो न तो दूध देती हो और न ही गर्भ-धारण करने के योग्य हो, इसी प्रकार ऐसे पुत्र से भी कोई लाभ नहीं, जो न तो पढ़ा-लिखा हो और न ही माता-पिता की सेवा करता हो। 

संसार तापदग्धानां त्रयो

विश्रान्तिहेतवः। 

अपत्यं च कलत्रं च सतां

संगतिरेव च।। 

इस संसार में दुखी लोगों को तीन बातों से ही शान्ति प्राप्त हो सकती है अच्छी संतान, पतिव्रता स्त्री और सज्जनों का संग।।10।। 

अपने कार्यों अथवा व्यापार में लगे हुए व्यक्तियों के लिए घर में आने पर शान्ति मिलनी चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है जब उसके पुत्र और पुत्रियां गुणी हों, स्त्री पतिव्रता और नम्र स्वभाव वाली हो तथा व्यक्ति के मित्र भले और सज्जन हों। 

सकृज्जल्पन्ति राजानः

सकृज्जल्पन्ति पण्डिताः।

सकृत् कन्याः प्रदीयन्ते 

त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्।।

राजा एक ही बार आज्ञा देते हैं, पण्डित लोग भी एक ही बार बोलते हैं। कन्या भी एक ही बार विवाह के समय दान में दी जाती है। ।।11।। 

सरकार एक ही बार आज्ञा देती है। उसका आदेश कानून का रूप ले लेता है। प्रजा को उस पर चलना ही होता है। इसी प्रकार पण्डित लोग भी किसी आयोजन में श्लोकादि एक ही बार बोलते हैं। ठीक इसी प्रकार कन्या का विवाह भी एक ही बार होता है। माता-पिता अथवा अन्य संबंध रखने वाले कोई वचन देते हैं, तो उसे निभाने का पूरा प्रयत्न किया जाता है। 

चाणक्य का कहना है कि ये कार्य ऐसे हैं, जो केवल एक-एक बार ही होते हैं, इन्हें बार-बार नहीं दोहराया जाता। इनके संबंध में बार-बार निश्चय बदलने से बात हल्की पड़ जाती है और उसका प्रभाव कम हो जाता है। हानि और समाज में अपयश दोनों प्राप्त होते हैं। 

एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं

गायनं त्रिभिः।

चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं 

पञ्चभिर्बहुभिर्रणः।।

तप अथवा किसी प्रकार की साधना का कार्य एक अकेला व्यक्ति ही अच्छा करता है, यदि दो छात्र मिलकर पढ़ें तो अध्ययन अच्छा होता है और गाने के लिए यदि तीन व्यक्ति मिलकर अभ्यास करते हैं, तो अच्छा रहता है। इसी प्रकार यदि यात्रा आदि पर जाना हो तो कम-से-कम चार व्यक्तिों को जाना चाहिए। खेती आदि कार्य ठीक प्रकार से चलाने के लिए पांच व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जबकि युद्ध में यह संख्या जितनी हो उतना अच्छा है। ।। 12।। 

चाणक्य कहते हैं कि तप अथवा साधना व्यक्ति को अकेले ही करनी चाहिए, एक से अधिक होंगे तो उसमें विघ्न पड़ेगा। अध्ययन दो व्यक्तियों के बीच ठीक रहता है, क्योंकि दोनों एक-दूसरे को कोई बात समझा सकते हैं। गाने के अभ्यास के लिए तीन लोगों का होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि उनमें से एक जब अभ्यास करता है, तो दोनों सुनने वाले अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर सकते हैं। कहीं यात्रा पर जाने के समय चार व्यक्ति और खेती आदि के कार्य के लिए पांच व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। 

युद्ध ऐसा कार्य है जिसमें जितने भी अधिक लोग हों, उनसे सहायता मिलती है। 

सा भार्या या शुचिर्दक्षा सा

भार्या या पतिव्रता। 

सा भार्या या पतिप्रीता सा 

भार्या सत्यवादिनी।।

पति के लिए वही पत्नी उपयुक्त होती है, जो मन, वचन और कर्म से एक जैसी हो और अपने कार्यों में निपुण हो, इसके साथ ही वह अपने पति से प्रेम रखने वाली तथा सत्य बोलने वाली होनी चाहिए। ऐसी स्त्री को ही श्रेष्ठ पत्नी माना जा सकता है। ।।13।। 

आचार्य चाणक्य ने आदर्श पत्नी के गुणों की चर्चा करते हए यह भी संकेत किया है कि पति को कैसा होना चाहिए। हम यह तो चाहते हैं कि पत्नी पति से कुछ न छिपाए, लेकिन पत्नी से रहस्यों को छिपाना अपना अधिकार मानते हैं। घर को संभालने का कार्य पत्नी कुशलता से करे और पति? पत्नी पति से प्रेम करती है और पति? आज बदलते परिवेश में आचार्य के कथन को व्यावहारिक रूप से देखने-परखने की आवश्यकता है। ये बातें दोनों के लिए एक समान हैं। 

अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः

शून्यास्त्वबान्धवाः।

मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या

दरिद्रता।। 

जिस घर में बेटा नहीं होता, वह घर शून्य माना जाता है, जिसके कोई बन्धु-बान्धव नहीं होते उसके लिए सारी दिशाएं, सारा संसार ही शून्य होता है। मूर्ख व्यक्ति का हृदय शून्य होता है और दरिद्र व्यक्ति के लिए तो सभी कुछ शून्य है। ।।14।। 

प्रत्येक माता-पिता यह चाहते हैं कि उनकी एक संतान बेटा हो, बेटे के बिना घर सूना मालूम होता है। क्योंकि आज सोच बदली है। कायदे-कानून बदले हैं। जो व्यक्ति इस संसार में अकेला है, जिसके कोई रिश्तेदार अथवा बन्धु-बान्धव नहीं, उसके लिए चारों दिशाएं अथवा सारा संसार ही सूना होता है। वह किसी से अपने मन का दुख प्रकट करने में असमर्थ रहता है। मूर्ख व्यक्ति करुणा, दया और ममता से रहित होता है, इसलिए कहा गया है कि इसका हृदय सूना होता है। दरिद्र अथवा निर्धन व्यक्ति के लिए तो सभी कुछ सूना है क्योंकि कोई भी उसका साथ देने को तैयार नहीं होता। उससे सब कन्नी काटते हैं। 

अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीणे

भोजनं विषम्।

दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य 

तरुणी विषम्।।

अभ्यास के बिना शास्त्र विष होता है, अजीर्ण अर्थात भोजन के ठीक प्रकार से पचे बिना फिर भोजन करना विष के समान होता है, निर्धन और दरिद्र व्यक्ति के लिए समाज में रहना विष के समान होता है और बूढ़े पुरुष के लिए युवती विष के समान होती है। ।।15।। 

मनुष्यों को निरंतर अभ्यास द्वारा शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यदि वह शास्त्र ज्ञान के लिए निरंतर अभ्यास नहीं करता तो वह अधकचरा ज्ञानी बनता है, ऐसा ज्ञान विष के समान दुखदायी होता है। इसी प्रकार पेट में अपच की स्थिति में यदि बढ़िया-से-बढ़िया भोजन किया जाएगा तो वह भी विष के समान कष्ट देगा। दरिद्र यदि किसी सभा, सोसायटी अथवा समाज में जाता है तो वहां उसकी पूछ न होने के कारण उसे विष का घूटं भी पीना पड़ता है। 

बूढ़ा आदमी यदि तरुणी के साथ विवाह रचाता है तो उसका जीवन अत्यन्त कष्टमय हो जाता है, क्योंकि विचारों में आयुगत असमानता सदैव क्लेश का कारण बनती है और शारीरिक रूप से निर्बल होने के कारण वह नवयौवना को यौन संतुष्टि भी प्रदान नहीं कर सकता। ऐसी पत्नी पथभ्रष्ट हो सकती है, जो कि सम्मानित व्यक्ति के लिए अत्यंत कष्टदायी स्थिति होती है। 

त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं 

गुरुं त्यजेत्।

त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्यां 

निःस्नेहान् बान्धवांस्त्यजेत्।।

व्यक्ति को चाहिए कि वह ऐसे धर्म का त्याग कर दे जिसमें दया और ममता आदि का अभाव हो, इसी प्रकार विद्या से हीन गुरु का भी त्याग कर देना चाहिए। सदा क्रोध करने वाली स्त्री का त्याग भी श्रेयस्कर है और जिन बन्धु बान्धवों में प्रेम अथवा स्नेह का अभाव हो, उनका भी त्याग कर देना चाहिए।।।16।। 

प्रत्येक धर्म से आशा की जा सकती है कि वह दया, अहिंसा और प्रेम का संदेश देगा। यदि उसमें ये बातें नहीं हैं तो ऐसे धर्म को छोड़ देना चाहिए। गुरु का कर्तव्य ज्ञान देना है, यदि वह अनपढ़ और मूर्ख है तो उसे गुरु बनाने से कोई लाभ नहीं। स्त्री पति को सुख देने वाली होती है, परंतु यदि वह हर समय गुस्से में भरी रहे और क्रोध करती रहे तो ऐसी पत्नी का भी त्याग कर देना चाहिए। रिश्तेदार, भाई बन्धु व्यक्ति के दुख में काम आते हैं, परंतु यदि उनमें स्नेह और प्रेम का अभाव है तो ऐसे भाई-बंधुओं का कोई लाभ नहीं। उन्हें त्यागना ही हितकर है। 

त्याग भी तभी संभव है, जब उसकी सही दिशा-दशा का ज्ञान हो। 

अधवा जरा मनुष्याणां वाजिनां

बन्धनं जरा।

अमैथुनं जरा स्त्रीणां 

वस्त्राणामातपो जरा।।

जो मनुष्य अधिक पैदल चलता अथवा यात्रा में रहता है, वह जल्दी बूढ़ा हो जाता है। यदि घोड़ों को हर समय बांधकर रखा जाएगा तो वे भी जल्दी बूढ़े हो जाते हैं। स्त्रियों से यदि संभोग न किया जाए तो वे जल्दी बूढ़ी हो जाती हैं। इसी प्रकार मनुष्य के कपड़े धूप के कारण जल्दी फट जाते हैं अर्थात धूप उन्हें जल्दी बूढ़ा कर देती है। ।। 17।। 

जो लोग हमेशा यात्रा में रहते हैं, वे नियमित न रहने के कारण जल्दी बुढ़ापे का शिकार हो जाते हैं। यात्रा की थकान और खान-पान की गड़बड़ी का तन-मन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जिस घोड़े को हर समय बांधकर रखा जाता है वह भी जल्दी बूढ़ा हो जाता है। ऐसा करना उसकी शारीरिक प्रकृति के प्रतिकूल है।

यह तो मनुष्य ने उसे पालतू बना लिया, असल में तो यह स्वच्छंद विचरण करने वाला प्राणी है। स्त्रियों के बारे में आचार्य ने यहां जो कहा, वह पढ़ने में अटपटा लगेगा, लेकिन है सत्य। शारीरिक रचना की दृष्टि से देखें, तो ‘संभोग’ स्त्री के शरीर की जैविक आवश्यकता ज्यादा है, मनोवैज्ञानिक कम-जब तक वह मासिक चक्र में है। और फिर ऐसा होना उसके अपने पति से संबंधों के ठीक न होने की ओर भी संकेत करते हैं। इस बात को प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति स्वीकार करता है कि यदि मन के स्तर पर असंतोष होगा तो बुढ़ापा आएगा ही। कपड़े ज्यादा देर तक धूप में पड़े रहने पर जल्दी फट जाते हैं क्योंकि मिट्टी और सूर्य की तपिश कपड़े के बारीक तंतुओं को जला देती है। 

कः कालः कानि मित्राणि को

देशः कौ व्ययाऽऽगमौ। 

कश्चाऽहं का च मे शक्तिरिति 

चिन्त्यं मुहुर्मुहुः।।

समझदार व्यक्ति को चाहिए कि इन बातों के संबंध में सदैव सोचता रहे जैसे कि मेरा समय कैसा है? मेरे मित्र कितने हैं? मैं जिस स्थान पर रहता हूं, वह कैसा है? मेरी आय और व्यय कितना है? मैं कौन हूं? मेरी शक्ति क्या है अर्थात मैं क्या करने में समर्थ हूं? ||18।। 

जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां

प्रयच्छति। 

अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते 

पितरः स्मृताः।।

जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत कराने वाला गुरु, विद्या दान देने वाला अध्यापक, अन्न देने वाला और भय से मुक्त रखने वाला, यह पांच व्यक्ति पितर माने गए हैं। ।।19।। 

चाणक्य का मत है कि इन पांचों को सदैव संतुष्ट रखना चाहिए, तथा इनका पिता की तरह सम्मान करना चाहिए। 

राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी

तथैव च। 

पत्नीमाता स्वमाता च पञ्चैता 

मातरः स्मृताः।

राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता अर्थात सास और जन्म देने वाली अपनी माता, ये पांच माताएं मानी गई हैं, अर्थात् इनका सम्मान माता के समान करना चाहिए। न्याय करते समय भी इन संबंधों को ‘मां’ की परिभाषा में ही स्वीकार किया जाता है। ।।20।। 

अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां

हृदि दैवतम्।

प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र 

समदर्शिनः।।

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को द्विजाति कहा गया है, इनका देवता यज्ञ है। मुनियों का देवता उनके हृदय में निवास करता है। मंद बुद्धि वालों के लिए मूर्ति ही देवता होती है। जो व्यक्ति समदर्शी हैं, जिनकी समान दृष्टि है, वे परमेश्वर को सर्वत्र विद्यमान मानते हैं। ।।21।। 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विजाति इसलिए माना जाता है कि जन्म के बाद गुरु उनका उपनयन संस्कार करता है। उनके लिए यज्ञ ही उनका देवता है। मुनियों के हृदय में देवताओं का निवास होता है क्योंकि वह सदैव उनका मनन-चिंतन करते रहते हैं। मूर्ति पूजा को यहां साधना के प्रारंभिक चरण के लिए आवश्यक माना गया है जैसे वर्णमाला के माध्यम से फल-फूल आदि का ज्ञान विद्यार्थी को कराया जाता है। जो संसार का रहस्य जानते हैं, उनके लिए ईश्वर सर्वव्यापक है। वे संसार के कण-कण में उसे देखते हैं। 

चाणक्य नीति अध्याय का सार 

चाणक्य का कहना है कि जीव जब गर्भ में होता है, तभी उसकी आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु आदि बातें निश्चित हो जाती हैं अर्थात मनुष्य जन्म के साथ ही निश्चित कर्मों के बन्धनों में बंध जाता है। इस संसार में आने के बाद सज्जनों के संसर्ग के फलस्वरूप व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त होता है। अच्छे लोगों का साथ हर तरह से मनुष्य की रक्षा के लिए ही होता है। 

आचार्य के अनुसार, मनुष्य जब तक जीवित है, तब तक उसे पुण्य कार्य करने चाहिए, क्योंकि इसी से उसका कल्याण होता है और जब मनुष्य देह त्याग देता है तो वह कुछ भी नहीं कर सकता।

विद्या को चाणक्य ने कामधेनु के समान बताया है। जिस तरह कामधेनु से सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, उसी प्रकार विद्या से मनुष्य अपनी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकता है। विद्या को बुद्धिमानों ने गुप्त धन भी कहा है।

चाणक्य कहते हैं कि अनेक मूर्ख पुत्रों की अपेक्षा एक गुणी पुत्र अधिक हितकर होता है। उनका कहना है कि मूर्ख पुत्र यदि दीर्घ आयु वाला होता है तो वह आयुभर कष्ट देता रहता है, इससे तो अच्छा है कि वह जन्म के समय ही मर जाए, क्योंकि ऐसे पुत्र की मृत्यु से दुख थोड़ी देर के लिए होगा। 

उनका कहना है कि इस संसार में दुखी लोगों को अच्छे पत्र, पतिव्रता स्त्री और सज्जनों से ही शांति प्राप्त होती है। सांसारिक नियमों के अनुसार चाणक्य बताते हैं कि राजा एक ही बात को बार-बार नहीं कहते, पण्डित लोग भी (मंत्रों को) बातें बार-बार नहीं दोहराते और कन्या का भी एक ही बार दान किया जाता है। इसलिए इन कर्मों को करते हुए सावधानी बरतनी चाहिए।

व्यक्ति को तपस्या अकेले करनी चाहिए। विद्यार्थी मिलकर पढ़ें तो उन्हें लाभ होता है। इसी प्रकार संगीत, खेती आदि में भी सहायकों की आवश्यकता होती है। युद्ध के लिए तो जितने अधिक सहायक हों उतने ही अच्छे रहते हैं|

चाणक्य कहते हैं कि उसी पत्नी का भरण-पोषण करना चाहिए जो पतिपरायणा हो। जिस मनुष्य के घर में कोई संतान नहीं, वह घर सूना होता है। जिसके कोई रिश्तेदार और बन्धु-बान्धव नहीं, उसके लिए यह संसार ही सूना है। दरिद्र अथवा निर्धन के लिए तो सब कुछ सूना है। विद्या की प्राप्ति के लिए अभ्यास करना पड़ता है, बिना अभ्यास के विद्या विष के समान होती है। जिस प्रकार अपच के समय ग्रहण किया हुआ भोजन विषतुल्य होता है और निर्धन व्यक्ति के लिए सज्जनों की सभा में बैठना मुश्किल होता है, उसी प्रकार बूढ़े व्यक्ति के लिए स्त्री संसर्ग विष के समान होता है। 

धर्म उसे कहते हैं, जिसमें दया आदि गुण हों। गुरु उसे कहते हैं जो विद्वान हो। पत्नी वह होती है, जो मधुरभाषिणी हो, बन्धु-बान्धव वह होते हैं, जो प्रेम करें, परंतु यदि इनमें यह बातें न हों अर्थात धर्म दया से हीन हो, गुरु मूर्ख हो, पत्नी क्रोधी स्वभाव की हो और रिश्तेदार बंधु- बांधव प्रेमरहित हों, तो उन्हें त्याग देना चाहिए। अधिक यात्राएं करने से मनुष्य जल्दी बूढ़ा होता है। स्त्रियों की कामतुष्टि न हो तो वे जल्दी बूढ़ी हो जाती हैं और कपड़े यदि अधिक देर तक धूप में पड़े रहें तो जल्दी फट जाते हैं। 

चाणक्य बताते हैं कि मनुष्य को अपनी उन्नति के लिए चिंतन करते रहना चाहिए कि समय किस प्रकार का चल रहा है? मित्र कौन हैं और कितने हैं? कितनी शक्ति है? बारबार किया गया ऐसा चिंतन मनुष्य को उन्नति के मार्ग पर ले जाता है। इस अध्याय के अंत में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि का देवता अग्नि अर्थात अग्निहोत्र है। ऋषि-मुनियों का देवता उनके हृदय में रहता है, अल्पबुद्धि लोग मूर्ति को अपना देवता मानते हैं और जो सारे संसार के प्राणियों को एक जैसा मानते हैं उनका देवता सर्वव्यापक और सर्वरुप ईश्वर है। 

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