काले धन पर निबंध | Black Money Essay In Hindi | काले धन की समस्या पर निबंध

काले धन पर निबंध

काले धन पर निबंध | Black Money Essay In Hindi | काले धन की समस्या पर निबंध | काला धन अथवा बढ़ता काला धन : विकट समस्या (यूपी पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2012) अथवा काले धन की समस्या (यूपी लोअर सबॉर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2008) 

भारत की सर्वाधिक भयावह एवं विकराल समस्याओं में से काले धन की समस्या भी एक है। काला धन सिर्फ एक आर्थिक समस्या ही नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक समस्या भी है, क्योंकि यह समस्या सामाजिक असमानता एवं सामाजिक वंचना से भी जुड़ी हई है। भारत में काले धन की जड़ें बहत गहरी हैं। आजादी के बाद सर्वप्रथम वर्ष 1955-56 में ब्रिटेन के प्रोफेसर कैल्डर ने इस दिशा में हमारा ध्यान आकृष्ट करवाया था। एक आकलन में बाद उन्होंने तत्कालीन भारत के काले धन को देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 4 से 5 प्रतिशत बताया था। धीरे-धीरे यह समस्या बढ़ती गई और आज भयावह रूप में सामने है। ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी (GFI) के आकलन के अनुसार भारत में करीब 29 लाख करोड़ रुपये (लगभग 640 अरब डॉलर) काला धन है, जो कि हमारे देश के सकल घरेलू उत्पादन के लगभग 50 फीसदी के बराबर है। इसमें से 21 लाख करोड़ रुपये विदेशी बैंकों में जमा है। इस आंकड़े से पता चलता है कि समस्या कितनी विकट है। 

“काले धन को परिभाषित करते हुए यह कहा गया है कि कर-अपवंचन के परिणामस्वरूप जमा पंजी काला धन कहलाती है। इसे भ्रष्टाचार का परिणाम माना जाता है।” 

काले धन को परिभाषित करते हुए यह कहा गया है कि कर अपवंचन के परिणामस्वरूप जमा पूंजी काला धन कहलाती है। इसे भ्रष्टाचार का परिणाम माना जाता है। कर सुधारों के लिए गठित राजा चेलैया समिति ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि किसी अर्थव्यवस्था में काला धन वह रकम है, जिसका लेन-देन कारोबारियों द्वारा जानबूझ कर खाता-बहियों से दूर रखा जाता है, जिससे सरकार को इस लेन-देन की जानकारी नहीं मिल पाती है। इससे सरकार को राजस्व का भारी-भरकम चूना लगता है। काले धन की यह व्याख्या 

कारोबार और कारोबारियों को ध्यान में रखकर दी गई है, जबकि काले धन और इसमें लिप्त लोगों का दायरा अब बहुत व्यापक हो चुका है। राजनीतिक पार्टियां, नेता, नौकरशाह, तस्कर, अपराधी. उद्योगपति तथा बिचौलिए आदि आज काले धन के गोरखधंधे में लिप्त हैं। व्यापार में कर चोरी के जरिए ही अब काला धन नहीं बनाया जा रहा है। अब इसका फलक और विस्तृत हुआ है। करप्शन मनी, कमीशन मनी भी ब्लैक मनी से जुड़ गई है। यही कारण है कि काले धन के बढ़ते प्रवाह को अब भूमिगत या समानान्तर अर्थ प्रणाली (Parallel Economy) के रूप में अभिहित किया जाने लगा है। 

देश में काले धन के अनेक स्रोत हैं। जहां कंपनियां कॉरपोरेट टैक्स की चोरी कर काला धन अर्जित करती हैं, वहीं कानूनी रूप से दिए जाने वाले निजी आयकर की चोरी, उत्पादन शुल्क की चोरी, सीमा शुल्क की चोरी तथा अवैध कारोबार के जरिए भी व्यापक स्तर पर काले धन की कमाई की जाती है। आजकल जहां फिल्म उद्योग काले धन का एक बड़ा गढ़ बन चुका है, वहीं राजनीतिक भ्रष्टाचार भी काले धन को बढ़ाने में केन्द्रीय भूमिका निभा रहा है। ठेके उपलब्ध करवाने, कारोबार में छूट देने, लाइसेंस देने, गोपनीय सूचनाएं देने तथा ऐसे कानून बनाने, जिनमें बच निकलने के रास्ते हों, के नाम पर असरदार नेता जमकर काला धन कमाते हैं। इसमें नौकरशाहों की संलिप्तता भी रहती है। तस्करी, ड्रग्स, आतंकवाद एवं फिरौतियों के माध्यम से भी काला धन बनाया जाता है। इतना ही नहीं, सरकार द्वारा खरीदी जाने वाली अनेक वस्तुओं एवं रक्षा सामग्री, देशी तथा विदेशी कंपनियों को दिए जाने वाले ठेकों की आड़ में भी अकूत काला धन अर्जित किया जाता है। इस प्रकार ‘करप्शन मनी’ और ‘कमीशन मनी’ बड़े पैमाने पर काले धन के भंडार को समृद्ध कर रही है। काले धन को विदेश भेजने में हवाला कारोबार की भूमिका भी बढ़ी है। ‘हवाला डील’ के जरिए करेंसी का अदला-बदली की जाती है। हवाला कारोबारी भेजे गए काले धन के ले वहां विदेशी मुद्रा में भुगतान करते हैं। यह धन ‘टैक्स हेवन’ देशों के बैंकों में जमा कर दिया जाता है। ये वे देश हैं, जहां आयकर संबंधी प्रावधान नहीं हैं तथा जमाकर्ता से आय के स्रोत का विवरण नहीं मांगा जाता है। विश्व में ऐसे 40 देशों की अब तक पहचान की जा चकी है। कर चोरों की पहली पसंद स्विस बैंक हैं। ये वे बैंक हैं जिनमें गोपनीयता के प्रावधान लगभग 200 वर्ष पुराने हैं तथा इनमें भ्रष्ट तरीकों से कमाया गया दुनिया भर का पैसा जमा होता है। स्विस नेशनल बैंक की एक रिपोर्ट से यह पता चलता है कि स्विट्जरलैण्ड के केन्द्रीय बैंक में भारतीयों का जमा काला धन 40% से भी अधिक बढ़ गया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा कराए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि स्विस बैंकों में जमा काले धन के मामले में भारत अमेरिका और कनाडा से भी आगे है। 

काले धन के दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। काले धन की समस्या जहां समानान्तर, छिपी एवं अनिधिकारिक अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करती है, वहीं आर्थिक असमानता को बढ़ाती है। काला धन देश की अर्थव्यवस्था तथा राष्ट्र की सामुदायिक विकास योजनाओं पर घातक प्रभाव डालकर गतिरोध पैदा करता है। काले धन के कारण उत्पादन दर, स्फीति दर, बेरोजगारी एवं निर्धनता आदि की सही दरों को मापने में भी बाधा पहुंचती है, क्योंकि यह धन इनकी पैमाइश में विकृतियां पैदा करता है। फलतः इन समस्याओं को नियंत्रित करने संबंधी सरकारी नीतियां भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती हैं। इससे जहां सामाजिक असमानता बढ़ती है, वहीं ईमानदार नागरिकों में निराशा और हताशा बढ़ती है। अधिकांशतः काले धन का उपयोग अवैध कार्यों एवं आतंकवाद को प्रोत्साहन देने के लिए किया जाता है। इसके कारण जहां सामाजिक विकृतियां एवं कुरीतियां पनपती हैं, – वहीं अपराध एवं अराजकता में भी इजाफा होता है। चुनावों में इस धन का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। सारतः यह कह सकते हैं कि यह धन जहां देश की अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह चाटकर उसे खोखला बनाता है, वहीं सामाजिक समस्याओं को बढ़ाता है। 

“काले धन पर अंकुश के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून-‘काला धन (अघोषित विदेशी आय एवं आस्ति) और करारोपण अधिनियम, 2015’ (The Black Money (undisclosed Foreign Income and Assets) and Imposition of Tax Act, 2015) ? अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।” 

ऐसा नहीं है कि सरकार काले धन की समस्या पर हाथ-पर-हाथ धरे बैठी रही हो। समय-समय पर इस दिशा में प्रयास होते रहे हैं। सरकार द्वारा अब तक इस समस्या को ध्यान में रखकर कई समितियों एवं आयोगों का गठन किया जा चुका है। वर्ष 1936 में अय्यर समिति, वर्ष 1957 में महावीर वापी समिति, वर्ष 1985 में राजा चलेया समिति, वर्ष 1990 में शंकर आचार्य समिति, वर्ष 1993 में वाहरा समिति तथा वर्ष 2014 में जस्टिस मुद्गल समिति का गठन किया गया। काले धन पर अंकुश के लिए सरकार की तरफ से ताजा पहल विशेष जांच दल (SIT) के गठन के रूप में की गई है, जिसका अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एम.बी. शाह को बनाया गया। यह विशेष जांच दल न केवल भारत में काला धन जमा करने वालों के विरुद्ध जांच और कार्यवाही करेगा, बल्कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले भारतीयों के विरुद्ध भी जांच और कार्यवाही करेगा। तय प्रावधानों के अनुसार विशेष जांच दल सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्यक्ष नियंत्रण में काम करेगा और अपनी सभी रिपोर्ट इसी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा। 

काले धन पर अंकुश के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून-‘काला धन (अघोषित विदेशी आय एवं आस्ति) और करारोपण अधिनियम, 2015’ (The Black Money (Undisclosed For eign Income and Assets) and Imposition of Tax Act, 2015) को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 26 मई, 2015 को अधिनियम का रूप लेने वाले इस कानून में काले धन पर अंकुश के लिए सख्त प्रावधान है। इस अधिनियम के प्रावधान उन सभी पर लागू होंगे, जिनके पास अघोषित विदेशी आय और संपत्तियां हैं। इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत विदेशों में अवैध धन या सम्पत्ति रखने पर 10 वर्ष की सख्त सजा एवं जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। काले धन के स्रोतों एवं सफेदपोश अपराधों को रोकने के लिए हमारे यहां पहले से भी कुछ कानून मौजूद हैं। जैसे-औद्योगिक (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986, आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 1993, आयात एवं निर्यात (नियंत्रण) अधिनियम, 1947. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, विदेशी मुद्रा (विनियमन) अधिनियम, 1974 एवं कंपनी एक्ट आदि। इसी क्रम में काले धन एवं भ्रष्टाचार-घोटालों को उजागर करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला ‘व्हिसिल ब्लोअर प्रोटेक्शन कानून’ से भी भ्रष्टाचार से लड़ने में सहायता मिलेगी। भारत संयुक्त राष्ट्र के उस संकल्प पर भी हस्ताक्षर कर चुका है, जो कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2005 में भ्रष्टाचार, काले धन एवं विदेशों में जमा गैरकानूनी धन के विरुद्ध पारित हुआ था। 

वर्तमान केन्द्र सरकार ने कालेधन के खात्मे हेतु कुछ सख्त कदम उठाए हैं। मुद्रा का विमुद्रीकरण, बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम, 1988 में संशोधन, स्विस बैंक के साथ समझौता आदि कदम वर्तमान सरकार द्वारा उठाये गये हैं जो सरकार की गंभीरता को व्यक्त करते हैं। इन कदमों के आलोक में हम कह सकते हैं कि केन्द्र सरकार इस दिशा में गम्भीर है। 

काला धन एक विकट समस्या है और इस समस्या से उबरने के लिए गंभीर एवं पारदर्शी प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहली जरूरत तो यह है कि काले धन के वास्तविक मूल स्रोतों की पहचान कर उनका सफाया किया जाए। काले धन को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कर विदेशों में जमा काले धन की वापसी के उपाय सुनिश्चित किए जाएं। इसके लिए जिस दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता है, उसका परिचय हमारे देश के राजनेताओं द्वारा दिया जाए। काले धन के प्रवाह को रोकने के लिए जहां पांच सौ एवं हजार रुपये के नोटों के प्रचलन को बंद किया जाना कारगर सिद्ध हो सकता है, वहीं राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले चंद की रकम की भी पनी निगरानी जरूरी है। इसके अलावा विशेष सरकारी प्रोत्साहन योजनाएं, बांडस एवं स्वैच्छिक घोषणा योजनाएं आदि चलाकर भी काले धन की निकासी करवाई जा सकती है। लेन-देन की कैशलेस व्यवस्था को प्रोत्साहन देना भी मददगार साबित हो सकता है। वह भी आवश्यक है कि हमारे देश में नेताओं, नौकरशाहों एवं सफेदपोशों द्वारा काला धन बनाने का जो खेल बढ़-चढ़ कर खेला जा रहा है, उसे रोका जाए। यह तभी संभव है जब हम देश से भ्रष्टाचार का सफाया पूरे तौर पर कर दें। यानी हमें काले धन के विरुद्ध लड़ाई जारी रखने के साथ साथ भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ाई जारी रखनी होगी।              

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