सर आइज़क न्यूटन की जीवनी | Biography of Sir Isaac Newton in Hindi

सर आइज़क न्यूटन की जीवनी

सर आइज़क न्यूटन जीवनी – Biography of Sir Isaac Newton in Hindi

भौतिकी के जन्मदाता कहलाने वाले सर आइजक न्यूटन का जन्म 25 दिसम्बर, सन् 1642 ई० को बूल्सथोर्प (लिंकनशायर) में हुआ था। बचपन में वह इतने कमजोर थे कि बचने की भी उम्मीद न के बराबर थी, मगर उन्हें विश्व में अपना एक नया कीर्तिमान बनाना था, इसी कारण वे बच गए। बारह वर्ष की आयु में उन्होंने विद्यालय जाना आरम्भ किया। यद्यपि वे इतने मेधावी छात्र नहीं थे, किन्तु उनकी चित्रकला और यांत्रिक विद्या में विशेष रुचि थी। 

उनकी रुचि को देखकर उनके मामा ने उन्नीस वर्ष की आयु में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ट्रिनटी कालेज में प्रवेश दिला दिया। सन् 1665 ई० में वह स्तानक बन गए। 

उन्हीं दिनों वहां प्लेग का भयानक प्रकोप हुआ, जिसमें हजारों लंदन वासी काल का ग्रास बन गए। वहां के मेयर ने सभी शिक्षण संस्थाएं बन्द करा दीं। विद्यार्थी अपने-अपने घर लौट गए। 

आइजक न्यूटन भी अपने गांव बूल्सथोर्प आ गए। इसी गांव में उनकी मां का सुन्दर बगीचा था। आइजन एक दिन उस बगीचे में सेब के पेड़ के नीचे बैठे हुए थे, तभी अचानक सेब पेड़ से नीचे आ गिरा। आइजक का सिर बाल-बाल बचा। आइजक एक वैज्ञानिक थे, अतः उनके मन में प्रश्न उठने लगा।

‘सेब ऊपर क्यों नहीं चला गया? सेब नीचे ही क्यों गिए? यदि सेब और अन्य वस्तुएं नीचे गिरती हैं, तो चन्द्रमा क्यों नहीं गिरता?’ ।

अन्त में उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि सेब का पृथ्वी की ओर गिरने का अवश्य ही कोई विशिष्ट कारण है। निश्चित रूप से कोई शक्ति सेब को पृथ्वी की ओर खींचती है। उन्होंने सेब के पेड़ से नीचे गिरने के आधार पर ही गुरुत्व के नियम पर अनुसंधान किया। आगामी अट्ठारह महीनों तक उन्होंने अनुसंधान के लिए इतना कार्य किया, जितना प्रायः वैज्ञानिक अपने सम्पूर्ण जीवन में नहीं कर पाते। गणित की फलन नामक एक नवीन प्रणाली का आविष्कार किया। प्रकाश तथा रंग का विस्तार से अध्ययन किया। ज्वारभाटे के नियमों का पता लगाया। गति के कुछ नियम बनाए, जो आगे चलकर यांत्रिकी नामक एक नए विज्ञान के आधार बने। 

आइजक न्यूटन ट्रिनटी कॉलेज में प्रोफेसर आइजक बैरो के सम्पर्क में आए। बैरो आइजक न्यूटन की असाधारण प्रतिभा से बेहद प्रभावित थे। उन्हें कॉलेज का प्रोफेसर पद दिलाने के लिए बैरो ने सन् 1669 ई० में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इस तरह आइजक न्यूटन मात्र सत्ररह वर्ष की आयु में गणित के प्रोफेसर बना दिए गए।

न्यूटन ने प्रकाश की प्रकृति को समझने के लिए ऐसी खोजें की, जो प्रकाशिकी विज्ञान में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई। इस विज्ञान का संबंध प्रकाश दृष्टि से और चश्मों, दूरबीनों तथा सूक्ष्मदर्शियों के लिए लैंस बनाने से है। आइजक न्यूटन इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे थे कि सूर्य का प्रकाश जो देखने में सफेद लगता है, लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी और बैंगनी सात विभिन्न रंगों से मिलकर बनता है। ये इन्द्र धनुष के रंग हैं और यह रंगावली ‘स्पेक्ट्रम’ कहलाती है। 

न्यूटन ने ऐसी दूरबीन का आविष्कार किया, जिसमें प्रकाश लैंस में से गुजरने के स्थान पर दर्पण से परिवर्तित होता है। उनकी दूरबीन में 2.5 सेंटीमीटर का दर्पण लगा था। आज भी कैलीफोर्निया के माउण्ट पालोमर विश्वविद्यालय में एक परावर्ती दूरबीन है। यह उनके सिद्धान्त पर ही बनायी गई है। इसका दर्पण 500 सेंटीमीटर का है। 

न्यूटन के कार्यों से प्रभावित होकर उन्हें सन् 1672 ई० में रॉयल सोसाइटी लंदन का फैलो चुन लिया गया था। 

इसके बाद आइजक न्यूटन ने अपना ध्यान गुरुत्वाकर्षण और गति के अध्ययन की ओर लगाया। उन्होंने अपने आरम्भिक सिद्धान्तों के परखने, प्रमाणित करने और सुधारने में अनुमानतः बीस वर्ष गुजारे। 

सन् 1687 ई० में उनकी आयु 45 वर्ष हो गई थी, उस समय उन्होंने गुरुत्वाकर्षण का नियम व गति के नियम अपनी पुस्तक ‘प्रिसिपिया’ में प्रकाशित कराए। 

आइजक न्यूटन को सार्वजनिक सम्मान के रूप में ब्रिटिश सरकार की ओर से सन् 1696 ई० में टकसाल के वार्डन का पद दिया। चार साल बाद वे टकसाल के मास्टर बना दिए गए और जीवन-पर्यन्त इस पद पर बने रहे। सन् 1703 ई० में उनको महारानी मेरी ने कैम्ब्रिज के एक विशेष समारोह में ‘सर’ की पदवी से विभूषित किया। उन्हें अपनी इस उपाधि पर बहुत गर्व था। 

85 वर्ष की अवस्था में वे रॉयल सोसाइटी की एक मीटिंग की अध्यक्षता करने गए और लौटते ही बीमार पड़ गए। 20 मार्च, सन् 1727 ई० को लंदन में उन्होंने प्राण त्याग दिए। 

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