निकोलस कोपरनिकस जीवनी |Biography of Nicolaus Copernicus in Hindi

निकोलस कोपरनिकस जीवनी |

निकोलस कोपरनिकस जीवनी – Biography of Nicolaus Copernicus in Hindi

सन् 1473 ई० को पौलेण्ड में निकोलस कोपरनिकस नामक महान वैज्ञानिक का जन्म हुआ। इन्होंने खगोल विज्ञान को नए आयाम दिए। उस समय तक अधिकांश लोगों का मानना था कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है। पृथ्वी ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड का केन्द्र है। इन्हीं बातों को पढ़-सुनकर बालक निकोलस युवा हुआ। पांच विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने सन् 1499 में रोम के विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान के शिक्षक का पद संभाला। 

निकोलस कोपरनिकस एक प्रतिभावान युवक थे। एक दिन उन्होंने खगोल विज्ञान की कक्षा में प्रसिद्ध यूनानी खगोल वैज्ञानिक टोलमी का सिद्धान्त विद्यार्थियों को पढ़ाना आरम्भ किया 

“सम्पूर्ण ब्रह्मांड पृथ्वी के चारों ओर घूमता है।” 

निकोलस ने एकान्त में टोलमी के इस सिद्धान्त पर गहनता से विचार किया। वह जितना सोचते, उतने ही भ्रमित होते जाते। अन्त में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कहीं गड़बड़ी अश्वय है। टोलमी के सिद्धान्त में भी गलती हो सकती है। 

निकोलस कोपरनिकस जीवनी |

वास्तविकता को जानने के लिए उन्होंने इस विषय से सम्बन्धित पुराने ग्रन्थों का अध्ययन किया। तभी उन्हें पता चला कि उनसे पहले भी कुछ विद्वानों ने टोलमी के सिद्धान्त की सच्चाई पर संदेह व्यक्त किया है। उन विद्वानों का मानना था कि विश्व का केन्द्र पृथ्वी नहीं, बल्कि सूर्य है, किन्तु वे कोई ठोस प्रमाण पेश न कर सके। इसका परिणाम यह हुआ कि ईसाई धर्म गुरुओं और उनके समय के अधिकांश विद्वानों ने टोलमी के सिद्धान्त को सच मानकर अंगीकार कर लिया। 

निकोलस कोपरनिकस ने अपने भ्रमित मन को सही दिशा देने के लिए अध्यापकीय पद त्याग दिया और खगोल विज्ञान में गहरा अध्ययन करने के लिए वह पादरी बन गए। उन्होंने सोचा था कि पादरी बनने से उन्हें पढ़ने व मनन करने का काफी समय मिलेगा। मगर हुआ इसके विपरीत, पादरी बनने से उनका काम और बढ़ गया। उन्हें पौलेण्ड में फ्राउएन बर्ग के एक पहाड़ी गिरजाघर का पूर्ण दायित्व सौंपा गया। वह धर्मोपदेशक के रूप में वे गिरजाघर के सभी धार्मिक कृत्यों को कराते थे। एक चिकित्सक के रूप में वह वहां के लोगों की चिकित्सा भी करते थे। 

एक अविष्कारक के रूप में निकोलस ने गांव वालों की सुविधा के लिए तीन किलोमीटर दूर बहने वाली नदी पर बांध बनवाया और यंत्र लगवाया। उन्होंने पौलेण्ड की सरकार के लिए सिक्कों की नई प्रणाली भी तैयार की और धार्मिक दिवसों का सम्पूर्ण ज्ञान कराने के लिए एक कैलेंडर भी तैयार किया। इतना व्यस्त रहने के बावजूद भी इस खगोल वैज्ञानिक ने अपने मन को सन्तुष्ट करने के लिए समय निकाल लिया। 

निकोलस कोपरनिकस के समय में दूरदर्शक यन्त्र नहीं था, जिस कारण निकोलस को खगोलीय पिण्डों की गति का निरीक्षण अपनी आंखों से करना पड़ा था। उन्होंने अपना अध्ययन कक्ष फ्राउएन बर्ग के गिरजाघर के गुम्बद में बनाया और उसकी छत में पतली झिर्रियां बनवायीं। वह इस कक्ष में अंधेरा करके बैठते थे और तारों की झिर्रियों के ऊपर से गुजरते हुए तथा तारों का आकाश में स्थिति के विषय में देखा करते थे और उनकी गति से सम्बन्धित मानचित्र बनाते थे। 

उन्होंने जो कुछ भी अपनी आंखों से देखा, उस सब का सही लेखा-जोखा अपने पास रखा। 

तत्पश्चात् उन्होंने अपने प्रेक्षणों की व्याख्या के लिए गणित के सूत्र तैयार किए। उसने धीरे-धीरे वे सब तथ्य एकत्रित किए, जिनके माध्यम से एक दिन खगोल विज्ञान का ‘कोपरनिकी सिद्धान्त’ प्रकाश में आ गया। इस खगोल वैज्ञानिक को सत्य की परख करने के लिए चालीस वर्ष का अमूल्य समय लगाना पड़ा। तभी वह टोलमी के सिद्धान्त को गलत सिद्ध कर सके। 

निकोलस कोपरनिकस के सिद्धान्त की सबसे महत्त्वपूर्ण बातों में से एक यह है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक वर्ष में एक चक्कर पूरा करती है और साथ ही अपनी धुरी पर तेजी से घूमती है। जब पृथ्वी का हमारी ओर का हिस्सा सूर्य के पास होता है, तो वहां दिन होता है और हम सूर्य के प्रकाश से दूर हट जाते हैं, तो रात हो जाती है। 

पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई अपना एक चक्कर चौबीस घण्टे में पूरा करती है, यह एक रात और दिन की नाप है। मगर चन्द्रमा के विषय में निकोलस कोपरनिकस को टोलमी की इस बात से सहमत होना पड़ा कि चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, जबकि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। 

शताब्दियों से स्वीकार की जा रही गलतियों को निकोलस कोपरनिकस के सिद्धान्तों ने सुधारा और आधुनिक खगोल वैज्ञानिकों के लिए सुविधापूर्ण मंच तैयार किया। 

निकोलस कोपरनिकस ने अपने प्रयोगों व खोजों से सम्बन्धित एक ग्रन्थ तैयार किया था, जो कई वर्षों तक उनकी मेज की दराज में ही पड़ा रहा। निकोलस को यह संदेह बना रहता था कि लोग उनकी बात का यकीन नहीं करेंगे, उल्टा उन्हें पागल और दीवाना समझेंगे। इसका अहम कारण यह था कि ईसाई धर्म में टोलमी का सिद्धान्त औपचारिक ढंग से स्वीकृत था, जबकि निकोलस धर्म उपदेशक के रूप में धार्मिक मत का विरोध करने से डरते थे। 

जब निकोलस कोपरनिकस को अनुभव हुआ कि उनकी जीवन लीला का कभी भी अंत हो सकता है, तो उन्होंने सन् 1543 ई० में अपने द्वारा रचित ग्रन्थ के प्रकाशन का मन बनाया। उन्होंने उस पुस्तक का नाम ‘आकाशीय गोल की परिक्रमाएं’ रखा। पुस्तक को छपने के लिए भेजा गया, वह छपी भी, किन्तु जब छपी हुई प्रति उनके पास पहुंची, तब तक उनकी अवस्था बेहद शोचनीय हो चुकी थी। निकोलस कोपरनिकस सत्तर वर्ष के हो चुके थे और उनका शरीर पक्षाघात का शिकार हो गया था, उनकी आंखों की रोशनी भी समाप्त हो चुकी थी। ऐसी अवस्था में अपने जीवन-भर की कड़ी मेहनत व जमा पूंजी को देख पाना उनके लिए असम्भव था। 

इसी अवस्था में सन् 1544 ई० में उनकी मृत्यु हो गई। विश्व को भी उनके विचारों व सिद्धान्तों को अपनाने में पूरे डेढ़ सौ वर्ष का समय लगा। मगर आज वह महान् वैज्ञानिक खगोल विज्ञान के दिग्गजों में गिना जाता है। 

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