ग्रेगर जॉन मेंडल की जीवनी | Biography of Gregor Mendel in Hindi

Biography of Gregor Mendel in Hindi

ग्रेगर जॉन मेंडल की जीवनी | Biography of Gregor Mendel in Hindi

अनुवांशिकता के जन्मदाता  ग्रेगर जॉन मेंडल जन्म 22 जुलाई, सन् 1822 ई० में मोराबिया देश के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। मोराबिया  ग्रेअब चैकोस्लावाकिया में स्थित है। बाल्यावस्था से जोहान, परिवार के खेतों में पौधों की देखरेख में मदद किया करते थे। इस कार्य को करने में उनको विशेष आनन्द की प्राप्ति होती थी। बचपन में वह अपने कृषक पिता से तरह-तरह से सवाल पूछा करते थे कि फूलों के अलग-अलग रंग व रूप कहाँ से आते हैं उनके पिता के पास ऐसे सवालों के जवाब नहीं थे। पिता उनकों उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे। 

उनका परिवार निर्धनता के अभिशाप से घिरा था। लेकिन फिर भी उनके पिता ने खर्चे में कतर-ब्योंत करके बेटे को जैसे-तैसे चार वर्ष कॉलेज मे शिक्षा ग्रहण करायी। जब वह 21 वर्ष के थे, तब एक मठ में प्रविष्ट हुए। सेंट ग्रेगरी के सम्मान में उन्होंने ग्रेगोर नाम धारण किया। 

उन्होंने अच्छे व्यवसाय का चयन किया। मठ में उनका मन लग गया। उनके साथी भिक्षु प्रेमी व बुद्धिमान लोग थे। वे धर्म से साहित्य तक तथा कला से विज्ञान तक तभी विषयों की विवेचना में बड़ी दिलचस्पी लिया करते थे। उनका एक छोटा-सा हरा-भरा बगीचा था, क्योंकि उनकी पौधों में विशेष रुचि थी। इसलिये उनको उसका अध्यक्ष बना दिया गया। उन्होंने इस कार्य के साथ-साथ अपना धार्मिक अध्ययन भी जारी रखा तथा सन् 1847 ई० में पादरी बन गए।

 मठ ने उनकी रुचि विज्ञान में होने के कारण दो वर्ष के लिए वेनिस विश्वविद्यालय में भौतिकी पढ़ने के लिए भेज दिया। जब वह अपना अध्ययन पूरा करके वहाँ से लौटे तो, आल्तब्रून नगर, (जहाँ उनका मठ था) के विद्यालय में भौतिकी की देखभाल किया करते थे। इन सब कार्यों से उनके भिक्षु कर्तव्यों में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं होती थी। 

यहाँ से उन्होंने प्रश्न पूछने आरंभ कर दिये, जिन्हें वह अपने पिता के खेत पर पूछा करते थे। कुछ मटरें चिकनी तथा कुछ झुरींदार क्यों होती हैं? वह ऐसा क्या करें, जिससे कि केवल चिकनी मटर ही उगें? कभी-कभी वह लाल फूलों के ही बीज बोते थे, तो कुछ नए पौधों में गुलाबी फूल क्यों आते हैं? 

अंत में उनकी उत्सुकता की विजय हुयी। उन्होंने कुछ ऐसे प्रयोग करने का निश्चय किया, जो वास्तव में विज्ञान से संबंधित थे। वह केवल कल्पना का सहारा नहीं लिया करते थे, बल्कि प्रत्येक बात को ध्यान से देखा करते थे और साथ में नोट करते जाते थे, क्योंकि मटर आसानी से उग आती थी। इसलिए उन्होंने मटर से प्रयोग किए। मटर की छोटी जिंदगी से वह बहुत-सी पीढ़ियों का अध्ययन कर सकते थे। 

उन्होंने 1856 ई० तक के बीच मटर के 10,000 पौधे बोए और उनका प्रेक्षण किया। उन्होंने जिस तरह की समस्या हल करने का प्रयास किया उसका एक उदारहण यह है, मटर के एक ऊँचे और एक छोटे पौधे की संतान ऊँची होगी था छोटी? ऊँचे पौधे और छोटे पौधे से संतान प्राप्त करने के लिए मेण्डेल ने ऊँचे पौधे के फूल में से सुनहरी धूलि ली। उन्होंने इसे छोटे पौधे की स्त्री के सिर पर डाला। इससे जो बीज बने उन्हें बोया गया। सब पौधे ‘पिता’ पौधे की भाँति ऊँचे थे। उन्होंने ऊँचेपन को प्रभावी लक्षण कहा। जब इन ऊँची संतानों के बच्चे हुए, उनके बीज उगाए गए, तब उन्होंने पाया कि दूसरी पीढ़ी अथवा पौधा छोटा था। इस छोटे पौधों को दादी की छोटाई अनुवांशिकता में मिली थी। उन्होंने छोटेपन को अप्रभावी लक्षण कहा। 

इसी प्रकार मेण्डेल ने पीले बीजों की मटर को हरे बीजों के साथ संकरित किया। तब वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि उनसे उत्पन्न पहली पीढ़ी के सब पौधों के बीज पीले थे। उसमें अगली पीढ़ी अर्थात् पौधों में तीन पीले और एक हरा था। यहाँ पीला प्रभावी और हरा अप्रभावी लक्षण था। उन्होंने इन प्रयोगों को असंख्य बार दोहराया मगर फल वही निकला। 8 वर्ष तक बड़ी सतर्कता के साथ कार्य करने के पश्चात्, जब उनको पूर्ण विश्वास हो गया, तब उन्होंने कहा कि पौधों की आनुवांशिकता कुछ अमोघ अपरिवर्तनशील नियमों के अनुसार कार्य करती है। निश्चय ही वह मनुष्यों पर इस प्रकार के प्रयोग नहीं कर सकते थे। इसलिये वे इस स्थिति में नहीं थे कि इन नियमों को मानव की आनुवंशिकता पर लागू करें। 

स्वाभाविक ही था कि मेण्डेल अपने नए सिद्धान्तों के विषय में उत्तेजित हों। अब उन्होंने निश्चित किया कि समय आ गया है जब उन्हें संसार को बताना चाहिए, कि उन्होंने किस बात पता लगा लिया है। सन् 1865 ई० में उन्होंने एक लेख लिखा और उसे नगर की वैज्ञानिक सभा के सामने पढ़ा; पर उन्हें यह महसूस हुआ कि कोई भी उनकी बात को समझ नहीं पा रहा है। श्रोताओं ने नम्रातापूर्वक तालियाँ बजाईं और जो कुछ वहाँ सुना उसे तत्काल ही भूल गए। कदाचित् वे उनको अच्छी तरह समझा नहीं सके थे। 

उन्होंने घर लौटकर उस लेख को पुनः लिखा। कुछ सप्ताह पश्चात् उन्होंने उसे दूसरी सभा में पढ़ा, लेकिन यहाँ पर भी किसी श्रोता ने कोई रुचि नहीं ली। शायद उन्होंने समझा हो कि मटर के पौधों से भी क्या कोई महत्त्वपूर्ण बात सिद्ध हो सकती है। उनका यह भाषण एक छोटी सी वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ। वह शीघ्र ही पुस्तकालय की अल्मारियों में अनछुए तथा अप्रशंसित और धूलि से ढक गया। 

यह सब देखकर वह निरुत्साहित हो उठे। कुछ दिन पश्चात् उन्होंने अपने साथी भिक्षुओं से कहा, “मेरा समय अवश्य एक दिन आएगा।” 

सन् 1869 ई० में उनको मठ का ऐबट चुन लिया गया। अब वह मठ के कार्यों में अधिक व्यस्त रहने लगे। अनुसंधान करने के लिए उन्होंने सदा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। मेण्डेल के निधन के पश्चात् लोगों ने उनको एक दयालु, परिश्रमी व छोटे भिक्षु के रूप में याद किया, जिसने अपना बहुत सा समय अपने बगीचे में मटर से उलझने में नष्ट कर दिया था। इस तरह उनके जीवन का कार्य मेण्डेल का अनुवंशिकता का नियम अज्ञात रह गया। 

उनके निधन के 16 वर्ष पश्चात्, विश्व को पता लगा कि वह कितने बड़े वैज्ञानिक थे। सन् 1900 ई० में तीन यूरोपीय वैज्ञानिकों को उस भूले हुए लेख का पता चला था, जिसे उन्होंने 30 वर्ष पूर्व प्रकाशित किया था। उन्होंने उसकी महत्ता को जान लिया तथा उनका समाचार वैज्ञानिक दुनिया में फैला दिया। शीघ्र ही इस निष्कर्ष पर पहुँचे गए कि उनके नियम केवल पौधों के लिए ही नहीं, जंतुओं व मानवों के लिए भी सही हैं। बाद के प्रयोगों से पता चला कि उनके नियमों के कुछ अपवाद भी हैं। अब हम उनके नियम नहीं कहते, बल्कि उनके सिद्धान्त कहते हैं। 

उनके सिद्धान्त कृषकों के लिए बहुत सहायक सिद्ध हुए हैं। उन्होंने कृषकों को बताया है कि गेहूँ, मक्का तथा दूसरी फसलों की अच्छी किस्में कैसे तैयार की जा सकती हैं। इन्हीं सिद्धान्तों पर चलकर, पशु उत्पादक अधिक मजबूत, स्वस्थ गायों और भेड़ों को पैदा करने में सफल हुए हैं। आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिक उनके सिद्धान्तों के आधार पर यह पता लगाने का प्रयास कर रहे थे कि क्या लोगों का कुछ रोगों की 

ओर आनुवंशिक रुझान होता है और यदि ऐसा होता है, तो क्या ऐसी आनुवंशिकता का नियंत्रित किया जा सकता है? इस सिद्धान्त के लिए हम मेण्डेल के चिर ऋणी रहेंगे।

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