जार्ज स्टीफेन्सन की जीवनी |Biography of George Stephenson in Hindi

जार्ज स्टीफेन्सन की जीवनी

जार्ज स्टीफेन्सन की जीवनी |Biography of George Stephenson in Hindi

भाप के इंजन के आविष्कारक जॉर्ज स्टीफेन्सन का जन्म 1781 ई० को इंग्लैंड में हुआ था। उनके पिता एक फायरमैन थे। उन्होंने अपने पिता की मदद के लिए कोयला ढोने वाले भाप के इंजन का आविष्कार किया। इंजन से 30 टन कोयले को आठ मील की दूरी तक ले जाया जा सकता था। अट्ठारह साल की उम्र में ये नाइट स्कूल में पढ़ने के लिए जाते थे, किन्तु उन्हें लोकोमोटिव बनाने का शौक शुरू से ही था। 

स्टीफेन्सन से तकरीबन 22 वर्ष पहले विथिक नामक इंजीनियर ने एक इंजन का निर्माण किया था, मगर उसकी गुणवत्ता बहुत ही खराब थी। उसमें अनेक यात्रिक दोष विद्यमान थे। स्टीफेन्सन ने ही उन यांत्रिक दोषों को सर्वप्रथम ठीक किया। 

27 सितम्बर, सन् 1825 ई०, को इंग्लैंड के इस आविष्कारक स्टीफेन्स ने प्रथम भाप चालित गाड़ी को दस मील लम्बी लोहे की पटरियों पर डार्लिंगटन व स्टापटन के बीच दौड़ाया था। वह दुनिया की सर्वप्रथम रेलगाड़ी थी। उसी मौके पर दुनिया की सर्वप्रथम सेवा उसी रेलगाड़ी से आरम्भ हुई थी। यद्यापि यह पटरी माल ढोने के लिए बनाई गई थी, मगर उसके उद्घाटन के अवसर पर 450 लोगों ने इस रेलागाड़ी में यात्रा की। उसमें 38 खुले हुए डिब्बे थे व गाड़ी की गति 12-16 मील प्रतिघंटा के बीच में थी। 

स्टीफेन्सन सारी उम्र रेलगाड़ी के विकास में लगे रहे। सन् 1829 ई० में रेलगाड़ी के ब्रेक के परीक्षण किये गए तथा स्टीफेन्सन का बनाया गया रॉकेट इंजन उस ट्रायल में सफल हुआ। उसे लिवरपूल मानचेस्टर रेलवे में प्रयोग किया जाना था। उसके अगले साल स्टीफेन्सन द्वारा निर्मित सात इंजन सवारियों की कोचों को चालीस मील लम्बी पटरी पर तीस मील प्रतिघंटा के वेग से खींचने में सक्षम थे। इस प्रकार स्टीफेन्सन का नाम सारी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया। 

दुनिया भर में लोहे की पटरियों पर आज रेलगड़ियाँ दौड़ लगाती हैं। वे सवारियों और माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं। आज अत्यंत तेज गति से चलने वाले रेल इंजन बन चुके हैं। 

स्टीफेन्सन को जीवन में जो भी पुरस्कार या सम्मान दिया गया है उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया। उन्हें नाइट-हुड का सम्मान व सैफ सीट हाउस ऑफ कॉमन्स में मिली थी। उन्होंने इसको स्वीकार करने के लिए मना कर दिया। सन् 1845 ई० में उन्होंने लोकोमोटिव के कार्यकलापों से इस्तीफा दे दिया। सन् 1848 ई० को इस महान व्यक्ति का निधन हो गया। 

वर्तमान समय में उनके द्वारा विकसित इंजनों में आधुनिक तकनीकी ने चार चाँद लगा दिये हैं। दुनिया में अब स्टीम तो न के बराबर रह गये हैं, किन्तु डीजल इंजनों और इलेक्ट्रिक इंजनों की बाढ़ आ गई है। यह सब स्टीफेन्सन का ही कमाल है। 

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