जॉर्ज साइमन ओम की जीवनी | Biography of George Simon Ohm in Hindi

जॉर्ज साइमन ओम की जीवनी

जॉर्ज साइमन ओम की जीवनी | Biography of George Simon Ohm in Hindi

ओम नियम को प्रतिपादित करने वाले वैज्ञानिक जॉर्ज साइमन ओम का जन्म सन् 1787 ई० को दक्षिण जर्मनी में हुआ था। उनका बचपन से ही वैज्ञानिक बनने का सपना था। वह एक गरीब परिवार के थे। उनके पिता एक मैकेनिकल इंजीनियर थे। उनके पिता ने ही उन्हें विज्ञान विषय पढ़ाया और इसी कारण से उनकी रुचि विज्ञान में अधिक बढ़ गईं। परिवारिक स्थिति सही न होने के कारण उनको स्कूल में नौकरी करनी पड़ी।

ओम की सबसे अधिक रुचि विद्युत धारा और उसके प्रयोगों में थीं उन्होंने विद्युत धारा द्वारा गर्मी पैदा करने पर भी प्रयोग किये। उन्होंने विभिन्न मोटाई के तारों में विद्युत धारा प्रवाहित कराकर ऊष्मा सम्बन्धी प्रयोग किये। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि किसी तार के सिरों पर एक बोल्ट विभवान्तर लगाया जाये और उसमें एक एम्पीयर विद्युत प्रवाहित करें तो उस तार का प्रतिरोध एक ओम होगा। 

सन् 1827 ई० में वे विद्युत धारा वोल्टेज और प्रतिरोध में एक सम्बन्ध स्थापित कर सके। उन्होंने सिद्ध करके दिखाया कि विभवान्तर और प्रतिरोध एक-दूसरे के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। इसी के आधार पर वैज्ञानिक विद्युत धारा, विभवान्तर और प्रतिरोध सम्बन्धी गणनायें अनेक परिपथों में कर सके। आज ओम का नियम विद्युत धारा में भौतिक नियम बन गया है। 

ओम को अपने जीवन में बहुत से वैज्ञानिकों की आलोचना सहनी पड़ी। मगर जर्मनी के बाहर उनके इस नियम की प्रसिद्धि बहुत फैल गई थी। सन् 1842 ई० में उनके कार्यों के लिये उन्हें रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन की सदस्यता प्राप्त हुई। धीरे-धीरे जर्मनी के लोगों ने भी उनके द्वारा दिये गए नियम के महत्त्व को समझा। वे अपने जीवन में धन की प्राप्ति न कर सके। 

ओम का नियम विद्यार्थी छोटी कक्षाओं अर्थात् 9वीं में ही पढ़ते हैं। यह विद्युत धारा और प्रतिरोध सम्बन्धी मौलिक नियम है। जिसे ओम ने प्रतिपादित किया था। उनके नाम पर ही इसे ओम का नियम कहते हैं।

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