फीड्रिक आगस्ट केकुले की जीवनी |Biography of Friedrich August Kekule von Stradonitz

फीड्रिक आगस्ट केकुले की जीवनी

फीड्रिक आगस्ट केकुले की जीवनी |Biography of Friedrich August Kekule von Stradonitz

महान् रसायन वैज्ञानिक फैडरिक ऑगस्ट केकुले वॉन स्ट्राडोनिट्ज का जन्म 7 सितम्बर, सन् 1829 ई० में डर्मेस्टेड (अब प० जर्मनी) में हुआ था। वह डॉक्टरेट की उपाधि लेने व पेरिस में अध्ययन के पश्चात् ही कार्बनिक रसायन के अनुसंधान में जुट गए थे। उनके विषय में जनश्रुतियों के आधार पर ऐसा कहा जाता है कि वह बैंजीन की संरचना की खोज में उलझे हुए थे। उनके मस्तिष्क में यह समस्या बुरी तरह बैठ गई थी।

अब वह यह पता लगाने की कोशिश में जुटे थे कि बैंजीन में कार्बन के परमाणु किस तरह परस्पर जुड़े रहते हैं। उनसे पूर्व वैज्ञानिक इस तथ्य को तो जानते थे कि बैंजीन के एक अणु में कार्बन के छह परमाणु होते हैं। किन्तु वे आपस में किस तरह जुड़े रहते हैं, इसका पता किसी को नहीं था। एक रात्रि को उन्हें एक सपना दिखाई दिया। सपने में उन्होंने एक सर्प देखा, जिसने अपनी पूँछ को मुँह में ले रखा था। इस सपने से उनके मन में विचार आया कि कदाचित् बैंजीन के अणु में परमाणुओं की व्यवस्था एक वृत्ताकार में ही हो। इसी सपने को आधार बनाकर उन्होंने बैंजीन के अणु में कार्बन के छह परमाणुओं की वृत्ताकार रूप में व्यवस्थित होने की संकल्पना सिद्ध की। 

दूसरी जनश्रुति के अनुसार वह अपनी प्रयोगशाला में कार्यरत थे। उनकी प्रयोगशाला में एक अंगीठी भी जल रही थी। दोपहर की बेला थी। वह अनुसंधान करते-करते थक गए थे तथा कुछ समय थकान मिटाने के लिए आराम से कुर्सी पर बैठ गए। वहाँ उनको झपकी आ गई। तब उनको एक सपना दिखाई दिया, सपने में उन्होंने देखा कि कार्बन के छह परमाणु, उनकी प्रयोगशाला की अंगीठी की लपटों में एक-दूसरे के साथ मिलकर नृत्य कर रहे हैं। नृत्य करते-करते अकस्मात् ही ये परमाणु एक वृत्ताकार संरचना में लीन हो गए। थोड़ी देर बाद जब उनकी निंद्रा टूटी तो उन्होंने सपने की बातों पर विचार किया तथा यह निष्कर्ष निकाला कि हो न हो बैंजीन में कार्बन के छह अणु एक वृत में व्यवस्थित हैं। तभी से उन्होंने इस पर अनुसंधानात्मक कार्य शुरू कर दिया। प्रयोगों के माध्यम से वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बैंजीन की संरचना बिल्कुल ऐसी ही है, जैसी कि सपने में दिखाई दी थी। इस तरह उन्होंने सपने के आधार पर बैंजीन की संरचना करके औद्योगिक समाज की एक बड़ी समस्या को हल कर दिया। 

सन् 1856 ई० में केकुले ने हाइडल बर्ग के विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में तथा सन् 1858 ई० में बेल्जियम के गेंट विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर बनकर कार्य किया। 

उन्होंने प्रयोगों के आधार पर बहुत से कार्बनिक पदार्थों की संरचना प्रस्तुत की। उन्होंने ऐसी बहुत-सी आकृतियों का निर्माण किया जिनसे यह जाना जा सकता है कि किसी अम्ल में परमाणु एक-दूसरे से किस तरह जुड़े रहते हैं। इस विधि के आधार पर उन्होंने बताया कि कार्बन के अणुओं की संयोजकता चार होती है। साथ ही यह भी बता दिया कि कार्बन के अणु एक-दूसरे के साथ तीन विधियों से बंध सकते हैं। वे विधियाँ इस प्रकार हैं खुली शृंखलाओं में, बंद श्रृंखलाओं में और वलयाकार संरचनाओं में। उनके इस आविष्कार ने दूसरे वैज्ञानिकों को नए पदार्थों के निर्माण की राह दिखाई जिस पर चलकर वैज्ञानिक 7,00,000 से भी अधिक कार्बन यौगिकों का निर्माण करने में सफल हो सके। उन्होंने मर्करी, फलमीनेट, असंतृप्त अम्लों तथा थायों अम्लों पर भी प्रयोग किए। उन्होंने कार्बन रसायन पर चार ग्रन्थ भी लिखे। काफी यश प्राप्ति के बाद उन्होंने अपने नाम के साथ वान स्ट्रॉडोनिज और जोड़ दिया। 13 जुलाई, सन् 1896 ई० को बॉन में इस महान रसायन शास्त्री ने संसार से विदा ले ली। तब उनकी आयु 67 वर्ष थी। 

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