एलिजाबेथ ब्लैकवेल की जीवनी | Biography of Elizabeth Blackwell in Hindi

Biography of Elizabeth Blackwell in Hindi

एलिजाबेथ ब्लैकवेल की जीवनी | Biography of Elizabeth Blackwell in Hindi

एलिजाबेथ ब्लैकवेल का जन्म 3 फरवरी, सन् 1821 ई० में ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में हुआ था। वह 11 साल की उम्र में ही अपने माँ-बाप के साथ अमेरिका चली गयी थीं। उनकी बचपन से ही डॉक्टर बनने की इच्छा थी लेकिन यह इच्छा 23 वर्ष की उम्र तक पूरी न हो पाई। इस उम्र में उन्हें डॉक्टर बनने का भूत सवार हो गया। उन्होंने अमेरिका और यूरोप के अनेक मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने के प्रयास किया, किन्तु उन्हें कहीं भी सफलता न मिली। उनके सभी प्रयत्न असफल हो गए पर उन्होंने हिम्मत न हारी। तीन साल तक ये व्यक्तिगत रूप से डॉक्टरी का अध्ययन करती रहीं। 

आज विश्व में अनेक मेडिकल कॉलेज हैं जहां से प्रत्येक वर्ष हजारों लड़के-लड़कियाँ मेडिकल की डिग्री प्राप्त करते हैं। विश्व में शायद ही कोई मेडीकल कॉलेज ऐसा होगा जहां पर लड़कियाँ अध्ययन न करती हों। सभी अस्पतालों में और प्राइवेट संस्थानों में महिला डॉक्टर काम करती हैं। एक समय ऐसा भी था जब महिलओं को डॉक्टरी साइंस पढ़ने की अनुमति नहीं थी और न ही उन्हें मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिलता था। ऐसे टेढ़े समय में महिलाओं के मन की बात मन में ही रह जाती थी। ऐसे समय में एलिजाबेथ ब्लैकवेल ने सर्वप्रथम अमेरिका में मेडिकल की डिग्री प्राप्त की।

ऐसा कहा जाता है कि जहाँ आदमी को किसी चीज की चाह होती है उसकी राह भी निकल आती है। ‘जहाँ चाह वहां राह’ कहावत ऐलिजाबेथ ब्लैकवेल के साथ भी सत्य साबित हुई। सन् 1847 ई० में उन्हें बड़ी मुश्किल से 26 वर्ष की आयु में जेनेवा मेडिकल कॉलेज न्यूयार्क में दाखिला मिल गया। यहाँ वे कठिन परिश्रम करती रहीं और सन् 1949 ई० में उन्हें एम० बी० बी० एस० की डिग्री से सम्मानित किया गया। इस उपाधि को लेने वाली वे विश्व की पहली महिला घोषित हुईं। उस दिन के पश्चात् उनका नाम अनेक विश्वकोषों में प्रकाशित हुआ। इसके बाद आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ने वाली महिलाओं की लाइन लग गयी।

 डॉक्टरी की डिग्री प्राप्त करने के बाद एलिजाबेथ आगे अध्ययन करने के लिए लंदन और पेरिस गयीं। कई वर्षों के अथक प्रयास के बाद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करके एक अस्पताल खोला। उस अस्पताल में काम करने वाली सभी महिलएँ थीं। डॉक्टरी में उन्होंने काफी नाम कमाया। उनके अस्पताल में रोगियों की भीड़ लगी रहती थी। जिनमें अधिकांश रोगी महिलाएँ होती थीं। 

वे ऐसी महिला थीं जो जीवन-भर दूसरी महिलाओं को मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलाने के लिए लड़ाई करती रहीं। सन् 1868 ई० में उनके प्रयासों के फलस्वरूप न्यूयार्क में पहला महिला मेडिकल कॉलेज खोला गया। उसमें केवल महिलाएँ डॉक्टरी के लिए दाखिला ले सकती थीं। उनके प्रयासों के फलस्वरूप लंदन में भी महिला मेडिकल कॉलेज खोला गया। इस महिला ने दूसरी महिलाओं के लिए डॉक्टरी के अध्ययन के दरवाजे खोल दिए। 

सन् 1910 ई० को हेस्टिंग्स नामक स्थान में उनकी मृत्यु हो गई। 

आज सारे विश्व में इन प्रयासों का यह परिणाम है कि महिलएँ आजादी के साथ देश-विदेश में डॉक्टरी का अध्ययन कर सकती हैं। देश में कोई भी ऐसा मेडिकल कॉलेज नहीं होगा जहाँ लड़कियाँ डॉक्टरी का अध्ययन न करती हों। इसके अतिरिक्त देश-विदेश में ऐसे बहुत से मेडिकल कॉलेज हैं जहाँ केवल महिलाएँ ही अध्ययन करती

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