एडवर्ड जेनर की जीवनी | Biography of Edward Jenner in Hindi

एडवर्ड जेनर की जीवनी

एडवर्ड जेनर की जीवनी | Biography of Edward Jenner in Hindi

विश्व के महान् शल्य चिकित्सक एडवर्ड ऐंथोनी जेनर का जन्म इंग्लैंड में 17 मई, सन् 1749 ई० में बर्कले के गलोस्टर शायर कस्बे में हुआ था। बचपन से ही प्राकृतिक इतिहास के अध्ययन में उनकी काफी रुचि थी। बड़ी लगन के साथ उन्होंने चिकित्सा अध्ययन में प्रवेश किया। उन दिनों आयार्विज्ञान में शिक्षा ग्रहण करने से पूर्व किसी योग्य चिकित्सक की देखरेख में शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती थी। शिक्षा की समाप्ति पर किसी मेडिकल कॉलेज या विश्वविद्यालय में दो वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती थी। सन् 1762 के करीब जेनर ने ब्रिस्टल के पास साडबरी ग्राम में शिक्षा ग्रहण की तथा इसके पश्चात् लंदन के एक शल्य चिकित्सक जान हण्टर की देख-रेख में सन् 1770 ई० तक अध्ययन किया।

सन् 1766 ई० में जेनर के प्रशिक्षण के दौरान एक ग्वालिन जान हण्टर के कक्ष में कुछ परामर्श करने के लिए पहुंची, तभी चेचक महामारी के विषय में चर्चा शुरू हो गई। ग्वालिन ने कहा कि मुझे अब चेचक रोग नहीं हो सकता है, क्योंकि मुझे गौशीतला हो चुकी है। गौशीतला गायों के थनों को प्रभावित करती है तथा जो भी गाय का दुग्धपान करता है उसे ‘गौशीलता’ का रोग हो जाता है। इस रोग में हाथों में छोटे-छोटे घाव व फुसियाँ हो जाती हैं। लेकिन रोगी को अन्य कोई विशेष परेशानी नहीं होती हैं|

लंदन के सेंट जार्ज हास्पिटल में शल्य चिकित्सक जान हण्टर की देखरेख में अपना प्रशिक्षण पूरा करने के पश्चात् एडवर्ड जेनर सन् 1773 ई० में अपने देश बर्फले वापस लौट आए। उन्होंने अपनी जन्मभूमि पर खुद का चिकित्सालय खोल लिया। कई वर्षों तक ग्रामीण लोगों की सेवा करने के पश्चात् उन्हें एक दिन ग्वालिन की कही बात का अकस्मात स्मरण हुआ। इस कथन की सार्थकता को गहराई से जानने के लिए उन्होंने गांव के बडे-बूढों से बातचीत की, तथा बड़े बूढ़ों ने भी ग्वालिन की बात को दोहराया।

अब जेनर की इस विषय को जानने की रुचि और अधिक बढ़ गई। सन् 1769 ई० में उन्होंने इस विषय पर परीक्षण करने का संकल्प बना डाला। उसने अपने गाँव की एक ग्वालिन, जो ‘गौशीतला’ रोग से पीड़ित थी, उसकी उँगली के घाव से कुछ द्रव लिया तथा उसे आठ वर्षीय जेम्स फिट्स को इंजेक्शन के रूप में लगा दिया। 

जेम्स फिप्स गौशीलता के हल्के से प्रकोप से प्रभावित हो गया। सात सप्ताह के उपरान्त जेनर ने चेचक से पीड़ित व्यक्ति के घाव से मवाद लेकर उसका इंजेक्शन जेम्स फिप्स को लगा दिया। जेम्स फिप्स चेचक महामारी के रोग से पीड़ित नहीं हुआ। जेनर को यकीन हो गया कि जेम्स फिप्स गौशीतला के कारण चेचक से प्रतिरक्षित हो गया। इस प्रकार उन्होंने ग्वालिन के कथन की पुष्टि कर ली।

एडवर्ड जेनर ने जब इस सच को लोगों से बताया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। गांव के लोगों ने जेनर के विषय में अनेक बातें शुरू कर दीं। कुछ लोगों ने कहा कि गौशीलता तथा चेचक दो अलग-अलग रोग हैं। इसलिए गौशीलता के द्रव के टीके से चेचक महामारी से नहीं बचा जा सकता है। कुछ लोगों ने उनका विरोध करते हुए कहा कि पशुओं से प्राप्त द्रव को मानव रक्त में मिलाना एक घृणात्मक कार्य ही नहीं बल्कि प्राकृतिक कार्यों में हस्तक्षेप करना है। जेनर ने भी पीछे न हटने का मन बना लिया था। उन्होंने अपने विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा कि जब मनुष्य वर्षों से पशुओं के माँस का भक्षण करता आ रहा है, गाय के दूध का सेवन करता आ रहा है, तब तो मनुष्य ने कभी घृणा नहीं की, मगर एक महामारी के उपचार के लिए गौशीतला के द्रव से उसे घृणा होने लगी। यह सब कुछ बकवास है। 

इस प्रकार लोगों की बातों की कोई परवाह किये बिना, जेनर गौशीतला रोग का द्रव एकत्रित करने में व्यस्त रहने लगे। दूसरे कामों से उन्होंने मुँह फेर लिया। समय बीतने के साथ-साथ उनके यश का डंका बजने लगा और लोगों ने चेचक महामारी के प्रकोप से बचने के लिए टीके लगवाना भी शुरू कर दिया। 

इस तरह एडवर्ड जेनर ने चेचक महामारी के टीके का आविष्कार किया, तथा उनके टीके विश्व भर में लगाये जाने लगे। अनेक राष्ट्रों की ओर से उनको इस आविष्कार के लिये सम्मानित किया गया। ऐसा माना जाता है कि स्विट्जरलैण्ड तथा हालैण्ड के धर्माधिकारियों ने अपने धार्मिक उपदेशों में जनता से चेचक के टीके लगवाने के लिये आग्रह किया। सोवियत संघ में सबसे पहले जिस बच्चे को चेचक का टीका लगवाया गया, उसको सार्वजनिक व्यय पर शिक्षा देने का प्रस्ताव पारित किया गया, उसका नाम ‘बैक्सीनोफ’ रखा गया। सन् 1802 ई० में तथा सन् 1806 में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने एक बड़ी धनराशि देकर एडवर्ड जेनर को सम्मानित किया। 

जेनर की मेहनत का ही फल है कि विश्व में चेचक महामारी का उन्मूलन हो गया। इस महान् जन कल्याणकारी की मृत्यु सन् 1823 ई० के जनवरी माह में 26 तारीख को उनकी जन्मभूमि इंग्लैण्ड के बर्फले नामक स्थान पर हुई। 

वर्तमान काल में चेचक जैसा भयानक रोग, जिसके कारण हर वर्ष दुनिया में लाखों लोग मर जाते थे या कुरूप हो जाते थे, समाप्त हो गया है। इस रोग का अन्त करने का श्रेय महान वैज्ञानिक एडवर्ड जेनर को जाता है जिन्होंने इस रोग के उन्मूलन के टीके की खोज की थी। 

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