चार्ल्स डार्विन की जीवनी | Biography of Charles Darwin in Hindi

Biography of Charles Darwin in Hindi

चार्ल्स डार्विन की जीवनी | Biography of Charles Darwin in Hindi

प्राकृतिक वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी, सन् 1809 ई० में शूजबरी (शोपशायर) में हुआ था। जब वह आठ वर्ष के थे, तब उनकी बड़ी बहन उनकी देख-भाल किया करती थी। डार्विन को बचपन से ही कीड़े-मकोड़े और तरह-तरह के खनिज एकत्रित करने का बहुत शौक था। बड़े होने पर उन को रसायन आयुर्विज्ञान का अध्ययन करने के लिए एडिनबरा विश्वविद्यालय भेजा गया। वह एक नेक व संवेदनशील स्वभाव के व्यक्ति थे, जिस कारण वह शल्य चिकित्सा को देखकर डर जाया करते थे। 

उन दिनों रोगी को मूर्च्छित करके शल्य चिकित्सा करने की कोई व्यवस्था नहीं थी, जिस कारण शल्य चिकित्सा बड़ी निर्दयता के साथ की जाती थी। इस निर्दयापूर्ण शल्य चिकित्सा के कारण वह आयुर्विज्ञान के अध्ययनों में सफल नहीं हो सके। जिस कारणवश सन् 1828 ई० में उन्हें एडिनबरा विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा और आध्यात्म शास्त्र का अध्ययन करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ पर उन्होंने आध्यात्म शास्त्र की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया तथा भ्रूण एकत्रित करने में जुट गए। 

इसके बाद भी उनको उपाधि प्राप्त हो गई। विश्वविद्यालय में कार्यरत वनस्पति शास्त्र तथा भूगर्भ शास्त्र के कई प्राध्यापकों से उनकी इसी बीच मित्रता हो गई। 

Biography of Charles Darwin in Hindi

सन् 1831 ई० में इंग्लैंड के बीगल नामक जलयान को विश्व की वैज्ञानिक यात्रा पर जाना था और इसमें एक प्राकृतिक वैज्ञानिक की आवश्यकता थी। यह यात्रा कैप्टन फिज रॉय की देख-रेख को पूरी होनी थी। इस कार्य के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के उनके (प्राध्यापको) दोनों मित्रों ने चार्ल्स डार्विन का नाम सुझाया तथा उनको स्वीकृति भी मिल गई। 

सन् 1831 ई० के दिसम्बर माह का वह आँधी भरा दिन था। बीगल जलयान पोर्ट्समाउथ बन्दरगाह से 5 वर्ष के लिए वैज्ञानिक यात्रा पर रवाना हुआ। जलयान की एक छोटी सी कोठरी में चार्ल्स डार्विन गुड़ीमुड़ी हुए पड़े थे। उनको अभी से वमन (उल्टी) होने लगी थी। इस जलयान पर जो लोग मौजूद थे, उनको दक्षिणी अमेरिका, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड की तट रेखाओं तथा द्वीपों का अन्वेषण करना था तथा साथ ही सही मानचित्र तैयार करने थे। चार्ल्स डार्विन अवैतनिक सहायक के रूप में उनके साथ थे, तथा उनका कार्य यह था कि यह जहाँ जाएं वहाँ के पौधों और जन्तुओं का अध्ययन करें। 

इस जलयान में व्यक्ति अधिक थे और स्थान कम था। इन यात्रियों का सफर काफी कष्टप्रद था। यात्रियों को भोजन अच्छा नहीं मिलता था, जिस कारण वे हमेशा वमन (उल्टी) करते रहते थे। उनको खुशी तब मिलती थी, जब जलयान तट पर लगता था तथा वह जलयान से उतरकर पौधों, कीड़ो, चट्टानों तथा छोटे जंतुओं के नमूने एकत्रित करने के लिए थल पर जाते थे। वह उन नमूनों को बक्सों में बंद करते थे और दूसरे जलयानों के द्वारा इंग्लैड भेज दिया करते थे। 

जलयान पर स्थिति खराब होने के कारण चार्ल्स डार्विन का स्वास्थ्य हमेशा के लिए बिगड़ गया। फिर भी उनको अपनी इस कष्टमय यात्रा पर कभी क्षोभ नहीं हुआ। उन्होंने इस संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, “यह मेरे जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है जिसने मेरा व्यवसाय निश्चित कर दिया।” 

दरअसल में चार्ल्स डार्विन का यह व्यवसाय अत्यधिक महत्त्वपूर्ण निकला। उन्होंने जीवों की उत्पत्ति और उनके विकास के सिद्धान्तों ने 19वीं शताब्दी की सबसे बड़ी सनसनी उत्पन्न की एवं जीव विज्ञान का रूप ही बदल डाला।

 डार्विन के समय में अधिकतर ईसाई लोगों का यह विश्वास था कि पृथ्वी तथा उस पर रहने वाले सब जीव कुछ सहन वर्ष पहले ही पैदा हुए हैं। वे मानते थे कि जो तब जैसा पैदा हुआ था आज तक उसी रूप में चला आ रहा है। सृष्टि के दिन से किसी में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। उनका यह दृष्टिकोण जातीय सृष्टि का सिद्धान्त कहलाता था। पर कुछ वैज्ञानिक ऐसे भी थे जो कि इससे सहमत नहीं थे। उन वैज्ञानिकों में भूविज्ञानी चार्ल्स लैल एवं जीव विज्ञानी लामार्क का नाम उल्लेखनीय है। इन दोनों का मत यह था कि पृथ्वी तथा उसके निवासी करोड़ों वर्ष पहले के हैं। आरम्भ में पौधों और जन्तुओं के कुछ सरल रूप थे। आज के जो पौधे एवं जंतु जीवित हैं, वे सभी उन आदिम सरल रूपों से आए हैं। विगत शताब्दियों में वे परिवर्तित एवं परिर्वद्धित होते रहे हैं। परिवर्तन और परिवर्द्धन का यह मंद प्रक्रम ही ‘विकास’ कहलाता है।

 चार्ल्स डार्विन का ध्यान इस विकास के सिद्धान्त की ओर केन्द्रित हुआ लेकिन वैज्ञानिक के रूप में वह किसी सिद्धान्त को उस समय तक स्वीकार नहीं कर सकते थे, जब तक कि उसके समर्थन के लिए पर्याप्त तथ्य न हों। उन आवश्यक तथ्यों को एकत्रित करने में उनके जीवन के 23 वर्ष व्यतीत हो गए। उन्होंने 5 वर्षीय जलयान यात्रा में जो सहस्रों पौधे एवं जन्तु एकत्रित किए थे, अब उन्होंने उन पर गम्भीरता से अध्ययन किया। उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि क्या इनके रूप एवं आकृतियों की अनन्त किस्में पृथ्वी पर सृष्टि के प्रथम दिवस से हैं? इतनी अधिक विभिन्न किस्में क्यों हैं? यह किस्में ठण्डी जलवायु में ही क्यों मिलती हैं? तथा वह गरम स्थलों पर ही क्यों पाई जाती हैं? इसके अतिरिक्त वे फॉसिल थे, जिन्हें खोदकर निकाला गया था-उन अनोखे पौधों एवं मछलियों तथा कीड़ों के कंकाल, जो शतब्दियों पहले जिए और मरे थे, उस तरह के जन्तु अब क्यों नहीं मिलते? इस प्रकार के अनेक प्रश्नों ने उनको उलझन में डाल दिया। जब तक वह इन प्रश्नों के उत्तर नहीं पा जाते; तब तक ‘विकास के सिद्धान्त’ को पूर्णतया स्वीकार नहीं कर सकते थे। इसके पश्चात् डार्विन ने अन्य वैज्ञानिकों के प्रयोगों का अध्ययन किया तथा पौधों एवं जन्तुओं के विषय में सब प्राप्त जानकारी एकत्रित की वे कहाँ रहते हैं? कैसे संतानोत्पत्ति करते हैं, विभिन्न जलवायु और जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के प्रति स्वयं को कैसे अनुकूल बनाते हैं? इन तथ्यों से अवगत होने के लिए, उन्होंने बहुत से प्रयोग किए। कबूतरों, मधुमक्खियों तथा छिपकलियों की प्रजनन क्रिया का अध्ययन किया। उन्होंने यह पाया कि विशेष प्रजनन से जंतु के लक्षणों में अंतर पड़ सकता है। उनको यकीन हो गया कि प्रकृति भी जीवधारियों के लक्षणों में बहुधा इसी प्रकार परिवर्तन करती है। 

सन् 1859 ई० तक उनको निश्चय हो गया कि उनके पास विकास के सिद्धान्त को प्रमाणित करने के लिए काफी तथ्य हैं। उन्होंने इन सभी तथ्यों को एक पुस्तक में संग्रहीत किया जिसका नाम है ‘प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों की उत्पत्ति’ ।

उक्त पुस्तक से स्पष्ट हुआ कि जातीय सृष्टि नामक कोई घटना नहीं हुई। आज के पौधे एवं जंतु जीवन की उन विभिन्न आकृतियों की देन हैं जो किसी वक्त धरती पर थीं; पर अब नहीं हैं। करोड़ों वर्षों में जीवों की नई अनन्त किस्में धीरे-धीरे विकसित हुई अथवा अस्तित्व में आई हैं और इनमें पक्षी, कीड़े, मछलियां, पशु और मानव सभी शामिल हैं।

अब तक तो उन्होंने कोई नई बात नहीं कही थी। तात्कालिक अनेक वैज्ञानिकों ने इस प्रकार के सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला था, लेकिन वह पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने अपने सिद्धान्तों के समर्थन में तथ्य सामने रखे जो ईसाई लोग जातीय सृष्टि के सिद्धान्त में विश्वास करते थे, उन्हें डार्विन की पुस्तक से काफी ठेस पहुंची। 

उनके ‘प्राकृतिक वरण’ अथवा ‘योग्यतम की उत्तर जीविता’ सिद्धान्त ने तो और जबरदस्त धक्का दिया। इसके तर्क में उन्होंने कहा कि जीवधारी इतनी अधिक संतानें उत्पन्न करते हैं कि प्रकृति उन सबको पूर्णायु तक नहीं पाल सकती। उदाहरणतः दो हाथियों की सब संतानें जीवित रहती हैं तथा आगे संतानें उत्पन्न होती रहती हैं, तो सिर्फ 750 वर्षों में उनसे एक करोड़ नब्बे हाथी हो जाएंगे। एक जीवाणु सिर्फ एक दिन में दस लाख जीवाणु उत्पन्न कर सकता है। ये दस लाख अगले दिन अरबों जीवाणु पैदा कर सकते हैं। यदि वे सब जीवित रहें, तो हम सब शीघ्र ही जीवाणुओं से दब जाएँगे। 

डार्विन ने आगे बताया कि हमारी धरती पर अधिक दाना-पानी नहीं है कि जितने जीव पैदा होते हैं, उन सबको जीवित रख सकें, प्रकृति जीवों की संख्याएं सीमित रखती है। वह योग्यतम व्यक्तियों को बचा लेती है और शेष को अकाल, तूफान, दुर्घटना तथा प्राकृतिक शत्रुओं द्वारा नष्ट कर डालती है। सिर्फ अधिक सशक्त, अधिक अनुकूल शील ही जीचित रहते हैं, इसलिए शब्द बना-‘योग्यतम की उत्तर जीचिता’। 

उन्होंने आगे कहा कि जो उत्तम जीवित बचे रहते हैं वे इसलिए जीवित रहते हैं क्योंकि उनमें कुछ उत्तम गुण विद्यमान होते हैं। यह भी हो सकता है कि उनकी दृष्टि दूसरों से उच्छी हो, उनकी टाँगें अधिक सशक्त हों अथवा उनके दौत अधिक तेज हों। ये विशेष लक्षण उनकी संतानों में चले जाते हैं तथा इस तरह जाति में धीरे-धीरे मटार गति से परिवर्तन आरम्भ हो जाता है। उदाहरणतः करोड़ों वर्षों में अश्चों की उँगलियाँ सुम बन गईं। कुछ मछलियों ने जल से बाहर श्वास लेना सीख लिया है और छिपकलियों बन गई। वे छछंदरे जोशताब्दियों से जमीन के अंदर बिलों में रहती आई हैं, इसी कारण से वे अपनी आँखें खो बैठे हैं। क्योंकि वहीं उन्हें अधोरे में उनकी जरूरत नहीं थी। मानव की टाँगें धीरे-धीरे लम्बी और हष्टा छोटे हो गए। 

चार्ल्स डार्विन के इन तौ को सुनने के पश्चात कुछ लोगों ने तो डार्विन को एक महान् प्रतिभा कहा। उन लोगों ने उनकों ‘जीव शास्त्र के आइजक न्यूटन’ की उपाधि दी। दूसरों ने डार्विन को घोर पापी बताया, क्योंकि वह बाइबिल की शिक्षा का विरोध कर रहे थे। 

उन्होंने इन तकों तथा विवादों से अलग रहकर, बुद्धिमता का परिचय दिया। वह उस समय घर में बैठकर दूसरी पुस्तक की रचना में लगे रहे जिसका नाम था ‘मनुष्य की उत्पति।’ इस पुस्तक ने पुनः 12 वर्ष के उपरान्त विश्व को झकझोर कर रख दिया।

इस पुस्तक में उन्होंने लिखा कि मानव और बन्दर एक ही पुरखा से पैदा हुआ है। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि मानव के पुरखा वनमानुष थे। उन्होंने कहा कि मानव तथा मानव के समान दीखने वाले वनमानुष टूर के संबंधी हैं। वे दोनों किसी ऐसे पुरातन पुरखा की संतान हैं जो करोड़ों वर्ष पूर्व जीचित थे। 

अमेरिका तथा यूरोप के महाद्वीपों में फिर विवादों का बचण्डर शुरू हो गया। बहुत-सी जगह उनकी पुस्तक पर प्रतिबंध लग गया। विवाद वर्षों तक चलता रहा। सन् 1925 ई० तक अमेरिका में डार्विनवाद का अध्ययन कराने वालों की कड़ीआलोचना कीजाती थी तथा चे दंडित होते थे। 

आधुनिक वैज्ञानिक विकास के अस्तित्व के विषय में वाद-विवाद नहीं किया करते थे। उनके द्वारा व्याख्यायित के विषय में आज भी मतभेद है। सब वैज्ञानिक उनके ‘प्राकृतिवरण’ के सिद्धान्त को नहीं स्वीकारते। आज के जीव विज्ञानी उसमें निरंतर परिवर्तन और शोधान में जुटे हैं। इस महान् विकासवादी वैज्ञानिक का निधन 73 वर्ष की उम्र में 19 अप्रैल को सन् 1882 ई० में डॉन, केंट में हुआ था। उनकी समाधि न्यूटन की समाधि से कुछ दूरी पर बनी हुई है।

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