आर्कमिडीज का जीवन परिचय व इतिहास

आर्कमिडीज का जीवन परिचय व इतिहास

आर्कमिडीज का जीवन परिचय व इतिहास

आर्कमिडीज का जन्म 381 ई०पू० के लगभग हुआ था। 287 ईसा पूर्व साइराक्यूज (सिसली) का एक महायोद्धा राजा था। उस राजा का नाम हिरौन द्वितीय था। राजा हिरौन द्वितीय की यूनानी देवताओं में पूर्ण आस्था थी। वह अपने विजयोल्लास में किसी न किसी देवता को बहुमूल्य भेंट चढ़ाकर मनाया करता था। 

ऐसे ही राजा के शासन में आर्कमिडीज का जन्म हुआ। आर्कमिडीज ने पढ़ने योग्य होने पर यूक्लिड जैसे महान शिक्षक से शिक्षा प्राप्त की थी। आर्कमिडीज को भी अपने शिक्षक की भाति नए-नए प्रयोग करने का शौक था। अपने प्रयोगों के कारण, एक वैज्ञानिक के रूप में आर्कमिडीज पूरे राज्य | में प्रसिद्ध हो गए थे। 

एक बार राजा हिरौन द्वितीय ने अपने विजय में उपलक्ष्य में देवता को स्वर्ण मुकुट भेंट करने का निश्चय किया। अपनी इसी इच्छापूर्ति के लिए राजा ने अपने देश के कुशल सुनार को दरबार में बुलाकर कहा –

“हमारे देवता के लिए ऐसा स्वर्ण मुकुट तैयार करो, जो अद्वितीय हो।” 

“जैसी आज्ञा महाराज!” यूनानी स्वर्णकार ने नतमस्तक होकर कहा-“मुझे मुकुट के लिए राजकोष से स्वर्ण दिला दिया जाए।” 

राजा हिरौन ने सुनार को राजकोष से स्वर्ण दिला दिया। यूनानी सुनार ने अत्यन्त कुशलता के साथ निश्चित समय में स्वर्ण मुकुट तैयार कर दिया। जब राजा ने स्वर्ण मुकुट देखा, तो वह मंत्रमुग्ध हो उठा। 

मगर, अचानक उसका मन शंकाओं से भर उठा। राजा को ऐसा महसूस हुआ, जैसे उस सोने के मुकुट में चांदी की मिलावट की हुई है। उसने मन-ही-मन फैसला किया कि शंका को खत्म करने के लिए इसकी जांच होनी अनिवार्य है। मगर तभी उसके मन में प्रश्न उभरा कि आखिर मुकुट को क्षति पहुंचाए बिना इसकी जांच किस प्रकार होगी? 

सहसा राजा को अपने नगर के प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्कमिडीज का ध्यान आया। उसने तुरन्त दो सैनिक आर्कमिडीज के घर की ओर रवाना कर दिए। 

जिस समय राजा के सैनिक आर्कमिडीज के घर पहुंचे, उस समय आर्कमिडीज अपनी पत्नी यूरेका के साथ बैठे हुए विचार-विमर्श कर रहे थे। 

आर्कमिडीज ने सैनिकों से पूछा-“कहो, कैसे आना हुआ?” “महाराज ने आपको तुरन्त बुलाया है।” एक सैनिक ने जवाब दिया। “चलो!” आर्कमिडीज तत्क्षण सैनिकों के साथ चल दिए। 

दरबार में पहुंचकर, आर्कमिडीज ने राजा का अभिवादन किया और पूछा “कहिए महाराज! यह वैज्ञानिक आपकी क्या सेवा कर सकता है?” 

“आर्कमिडीज! हमने देवता के लिए यह स्वर्ण मुकुट बनवाया है।” इतना कहकर राजा ने आर्कमिडीज को वह मुकुट दिखाया। 

आर्कमिडीज ने भी उस मुकुट की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा “अति सुन्दर! लगता है, सुनार ने इसमें अपनी सारी कारीगरी उड़ेल दी है।” 

“हम तुम्हारे विचारों से सहमत हैं, आर्कमिडीज!” राजा बोला-“किन्तु हमें एक शंका ने घेर लिया है।” 

“कैसी शंका, महाराज?” आर्कमिडीज ने पूछा। 

“हमें ऐसा लगता है, जैसे सुनार ने सोने में चांदी की मिलावट कर दी है।” राजा ने कहा-“तुम्हें हमारे इस संदेह को दूर करना होगा आर्कमिडीज! पर ध्यान रहे, स्वर्ण मुकुट को तुम्हारी जांच से किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे।” 

“ठीक है, महाराज! किन्तु इस कार्य में मुझे कुछ समय की मोहलत चाहिए। मैं आपकी इस शंका का समाधान कर दूंगा।” 

“समय की कोई पाबन्दी नहीं है, तुम इस मुकुट की जांच करो। हम उस समय की प्रतीक्षा करेंगे।” 

राजा का अभिवादन कर, मन में चिन्ता का अंकुर लिए आर्कमिडीज अपने घर लौट आए। 

अपने पति को चिन्तित देखकर यूरेका ने पूछा-“क्या कहा महाराज ने?” “मुझे उनकी एक महत्त्वपूर्ण शंका का समाधान करना है।” “कैसी शंका?” 

यूरेका के पूछने पर आर्कमिडीज उसे अपनी चिन्ता का कारण बताते हुए कहा “स्वर्ण मुकुट को बिना तोड़े मिलावट का पता लगाना होगा। वरना तुम्हारे पति का मान-सम्मान सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा।” 

 दिन-पर-दिन बीतते गए, मगर आर्कमिडीज समस्या का समाधान न खोज सका। 

एक दिन की बात है, आर्कमिडीज साइराक्यूज (सिसली) के सार्वजनिक स्नानघर में गया। वह स्नान करने के उद्देश्य से जैसे ही पानी से लबालब भरे टब में घुसे, वैसे ही टब का पानी उसके किनारे को ऊपर से निकालने लगा। यह देखकर आर्कमिडीज के मन में एक विचित्र विचार आया। वह खुशी के मारे उछल पड़े। वह तेजी से टब से बाहर निकले और एक तौलिया लपेटकर अपने घर की ओर दौड़ पड़े। 

घर पहुंचते ही उन्होंने खुशी से चहकते हुए अपनी पत्नी को पुकारा–“यूरेका! यूरेका! मैंने समाधान पा लिया है, मैंने समाधान पा लिया है।” 

तत्पश्चात् उन्होंने अपने घर पर पानी से भरे बर्तनों में प्रयोग शुरू कर दिया। उन प्रयोगों से वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विभिन्न पदार्थ पानी की एक-सी मात्रा विस्थापित नहीं करते, क्योंकि सबका भार एक समान नहीं होता। 

सोना, चांदी से भारी होता है, इसी कारण एक किलोग्राम सोने का ठोस घन आकार में एक किलोग्राम चांदी के ठोस घन से छोटा होता है। उन्हें पता चल गया कि सोने का घन उतने ही भार की चांदी के घन की अपेक्षा कम पानी विस्थापित करता 

इस सिद्धान्त के आधार पर ही उन्होंने सोने के मुकुट की शुद्धता का पता लगाने का निश्चय किया। अगले ही दिन वह बड़े उल्लास के साथ राजा हिरौन द्वितीय के सामने उपस्थित हुए।

उन्हें देखते ही राजा ने पूछा-“क्या हमारी समस्या का समाधान मिल गया, आकमिडीज?

“जी महाराज!” आर्कमिडीज ने कहा-“आप तीन पानी से भरे समान बर्तन मंगाएं।” 

राजा के आदेश से तीन समान बर्तन पानी से भरे हुए आ गए। तब आर्कमिडीज ने स्वर्ण मुकुट के बराबर सोना व चांदी लाने के लिए कहा। 

सोना व चांदी आ जाने पर आर्कमिडीज ने पहले बर्तन में मुकुट के भार के बराबर सोना रखा। दूसरे बर्तन में मुकुट के भार के बराबर चांदी रखी और तीसरे बर्तन में मुकुट को रखा। उन्होंने देखा कि मुकुट ने सोने से अधिक और चांदी से कम पानी विस्थापित किया है। इससे वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वह सुन्दर मुकुट न तो शुद्ध सोने का है और न ही शुद्ध चांदी का है। वह तो दोनों का मिश्रण है। पर, अपना निष्कर्ष राजा को बताने से पूर्व उन्होंने सुनार को बुलवा लिया। सुनार के आने के बाद उन्होंने कहा-“महाराज! इस स्वर्ण मुकुट में चांदी की मिलावट है।” 

इतना सुनते ही सुनार थर-थर कांपने लगा। राजा ने बेईमान सुनार को मृत्युदण्ड दिया। इस तरह प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्कमिडीज ने राजा हिरौन द्वितीय की समस्या का समाधान कर दिया था। मगर यहीं उनके कार्य का अन्त नहीं था। उन्होंने प्रकृति के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भेद का पता लगा लिया था कि ठोस पदार्थों को उनके द्वारा विस्थापित पानी की मात्रा ने नापा जा सकता है। 

यह सिद्धान्त आज भी ‘विशिष्ट घनत्व’ के नाम से प्रसिद्ध है। आज तेईस से भी अधिक शताब्दियां बीत चुकी हैं, तब भी आधुनिक वैज्ञानिक अपने कितने ही गणितों में इस सिद्धान्त का उपयोग करते हैं। हमारी आधुनिक पनडुब्बियां इसी नियम के आधार पर बनतीं हैं और कार्य करती हैं। 

सिसली का वैज्ञानिक आर्कमिडीज उन गिने-चुने वैज्ञानिकों में से एक है, जिन्होंने अपने सिद्धान्तों को सिद्ध करने के लिए वास्तविक प्रयोग किए, उस प्राचीन समय में असंख्य दार्शनिक तथा गणितज्ञ सिद्धान्त बनाकर ही संतोष कर लिया करते थे। वे उनकी वास्तविकता की जांच करने के फेर में नहीं पड़ते थे, पर आर्कमिडीज इन सबसे अलग थे। वे अपने विचारों की सत्यता का प्रमाण चाहते थे।

महान् वैज्ञानिक आर्कमिडीज के प्रयोगों से कुछ महत्त्वपूर्ण आविष्कार हुए। एक महान् आविष्कार का आधारी सिद्धान्त तो आज भी प्रयोग में लिया जाता है। वह था, आर्कमिडीज का पेंच। यह खोखले बेलन में बंद एक तरह का विशाल कार्फ स्क्रू था। जब उस बेलन का सिरा पानी में रखा जाता था और पेंच को घुमाया जाता था, तब पानी ऊपर चढ़ जाता था। इस यंत्र के आधुनिक रूप को दलदल में से पानी निकालने, अनाज के ढेरों को बड़े भण्डारों में पहुंचाने तथा बड़े कारखानों की भट्टियों में कोयला ले जाने के काम में लाए जा रहे हैं।

एक अन्य मशीन भी आर्कमिडीज ने अविष्कृत की थी, जिसके द्वारा बहुत भारी भार, बहुत कम श्रम से उठाया जा सकता था। इसका प्रदर्शन करने के लिए आर्कमिडीज ने एक मजबूत जंजीर के एक सिरे को अपनी मशीन की घिरनियों में से निकाला और राजा हिरौन द्वितीय को पकड़ा दिया। इस जंजीर का दूसरा सिरा माल से लदे हुए जहाज से बंधा था। उन्होंने राजा हिरौन से कहा 

“महाराज आप जंजीर खींचिए।” 

जैसे ही राजा ने जंजीर खींची, वह विस्मय से भर उठा। उस जंजीर से भारी जहाज पानी से ऊपर उठ गया था। 

कहा जाता है कि जब रोम के सैनिकों ने यूनानी नगर सिसली को घेर लिया था, तब यूनानियों ने अपने प्रिय वैज्ञानिक आर्कमिडीज की बनाई हुई एक मशीन का प्रयोग किया था। उन्होंने विशाल कांटे सागर में लटका दिए थे। जब रोम के सैनिकों के जलयान इन कांटों में फंस जाते थे, तब उन्हें खींच लिया जाता था। इससे शत्रु के जलयान पानी से ऊपर उठ जाते थे और हवा में झूलने लगते थे। तब यूनानी उन्हें समुद्री चट्टानों पर गिरा देते थे, जिससे वे चकनाचूर हो जाते थे। 

यूनानी वैज्ञानिक आर्कमिडीज ने गणित में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनके समय में कोई भी वृत्त का क्षेत्रफल सही रूप से नहीं निकाल पाया था। आर्कमिडीज ने वृत्त का सही क्षेत्रफल निकाला। 

उन्होंने वृत्त का क्षेत्रफल निकालने का जो नियम बनाया, उससे वृत्त का क्षेत्रफल इतना सही निकलता है कि आज भी आश्चर्य होता है। 

उन्होंने आकृतियों में शंकु, सर्पिल, परवलय, तल, गोले और बेलन आदि से सम्बन्धित पुस्तकें लिखीं। 

आर्कमिडीज द्वारा रचित पुस्तकों में ‘ऑन द स्फीयर एण्ड सिलिजिर’, ‘मेजरमेण्ट ऑफ द सर्किल’, ‘ऑन फ्लोटिंग बॉडीज’ तथा ‘ऑन बैलेन्सेज एण्ड लीवर्स’ उल्लेखनीय हैं। वे अपने इस कार्य को विशेष महत्त्व देते थे। एक दिन उन्होंने अपने मित्रों से कहा था 

“मेरी कब्र के पत्थर पर एक बेलन के भीतर एक गोले की आकृति बनवा देना।” जिस सिसली नगर की रक्षा प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्कमिडीज ने अपने यंत्रों द्वारा बड़ी वीरता के साथ की थी, अन्ततः 212 ईसा पूर्व में रोम के सैनिकों ने जीत लिया। उस समय विजयी रोमन सेनापति मार्सेल्स ने अपने सैनिकों को आदेश दिया था कि महान् वैज्ञानिक आर्कमिडीज को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचायी जाए। 

मगर आर्कमिडीज के भाग्य में कुछ और ही लिखा था। अपने देश की पराजय का उन्हें बहुत दुःख था। एक दिन वे अपनी अध्ययन वाटिका में बैठे जमीन पर कुछ ज्यामितीय आकृतियां बना रहे थे, तभी बाहर से एक सशस्त्र रोमन सैनिक वाटिका में घुस आया। वह शराब के नशे में धुत था। इधर आर्कमिडीज गणित की समस्या में ऐसे उलझे थे कि उन्हें सैनिकों के आगमन का पता ही नहीं चला। वह अपने काम में लगे रहे। जब सैनिक ने उन्हें पुकारा, तो उन्होंने सैनिक को अपना सेवक समझकर डांट दिया 

“मेरे वृत्तों से दूर रहो।” 

इस पर क्रोधित होकर सैनिक ने अपना भाला उस महान् वैज्ञानिक आर्कमिडीज की कमर में भौंक दिया। आर्कमिडीज इस घातक वार को सहन नहीं कर पाए और मृत्यु को प्राप्त हो गए। 

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