अल्फेड बर्नहार्ड नोबेल की जीवनी |Biography of Alfred Bernhard Nobel in Hindi

Biography of Alfred Bernhard Nobel in Hindi

अल्फेड बर्नहार्ड नोबेल की जीवनी |Biography of Alfred Bernhard Nobel in Hindi

डायनामाइट के आविष्कारक एवं नोबेल पुरस्कारों के संस्थापक अल्फ्रेड बर्नहार्ड नोबेल का जन्म 21अक्टूबर, सन् 1833 ई० में स्टॉकहोम (स्वीडन) में हुआ था। उनके पिता इमानुएल नोबेल एक निर्धन परिवार से संबंध रखते थे। वे सेना में इंजीनियर थे। उन्होंने इंजीनियरों के मूल सिद्धान्तों की शिक्षा पिता से ग्रहण की। उनके दो बड़े भाई थे राबर्ट व लुडविग। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। जब वह 9 वर्ष के थे, तब अपने परिवार के साथ स्टॉकहोम से पीटसबर्ग (लोनिनग्राद) चले गए। उनकी बचपन से ही रसायन शास्त्र में रुचि थी। वह 16 वर्ष की किशोरावस्था में फ्रेंच, जर्मन, रूसी, स्वीडिश भाषाएं भली भाँति बोल लेते थे। 

सन् 1850 ई० में अल्फ्रेड ने रूस छोड़ दिया और पेरिस में रहकर एक वर्ष तक रसायन शास्त्र का अध्ययन किया। इसके पश्चात् चार वर्ष तक जॉन इरिक्शन की देखरेख में संयुक्त राज्य अमेरिका में अध्ययन करते रहे। यहाँ से पीट्सबर्ग लौटने पर उन्होंने अपने पिता की फैक्टरी में कार्य करना शुरू कर दिया। 

सन् 1859 ई० में दुर्भाग्यवश उस फैक्टरी का दिवाला निकल गया, जिससे पिता व पुत्र को बड़ा झटका लगा। वे दोनों स्वीडन वापस लौट आए। यहाँ आकर उन्होंने विस्फोटकों पर प्रयोग शुरू कर किया। अपने पिता के साथ ही स्टॉकहोम के निकट होलेन बर्ग नामक स्थान पर अनुसंधानों के लिए अपना वर्कशाप बनाया। उसमें दोनों ने नाइट्रोग्लिसरिन नामक विस्फोटक पदार्थ तैयार करना शुरू कर दिया। दुर्भाग्य ने अभी तक उनका दामन नहीं छोड़ा था। सन् 1864 ई० में नाइट्रोग्लिसरिन के विस्फोटक के कारण सारा वर्कशाप नष्ट हो गया और इसी दुर्घटना में उनके अनुज और अन्य चार व्यक्ति हताहत हो गए। इस विस्फोट से स्वीडन सरकार कुपति हो उठी और उसने फिर उनको पुनः वर्कशाप स्थापित करने की आज्ञा नहीं दी। इसके पश्चात् उनको एक पागल वैज्ञानिक करार दे दिया गया। 

इस दुर्घटना के एक मास उपरान्त ही उनके पिता पक्षाघात के शिकार हो गए। पिता की इस बीमारी के कारण वह अकेले पड़ गए। तब उन्होंने नार्वे और जर्मनी में अपनी फैक्टरियां स्थापित करने की योजना बनायी, किन्तु नाइट्रोग्लिसरिन के घातक एवं विस्फोटक गुणों में किसी तरह का परिर्वतन नहीं ला सके। फलतः जर्मनी में स्थापित फैक्टरी में भी वैसी ही विस्फोटक घटना घट गई। उसने साथ-साथ पनामा का एक जलयान भी विस्फोटक का शिकार हो गया। ऐसे ही कई विस्फोटक सैंट फ्रांसिस्को, न्यूयार्क और आस्ट्रोलिया में हुए। अंत में फ्रांस और बेल्जियम में नाइट्रोग्लिसरिन तैयार करने पर पाबन्दी लगा दी गई। स्वीडन में इस पदार्थ के वितरण पर रोक लगा दी गई और ब्रिटेन में भी इस पदार्थ के प्रयोग पर रोक लगा दी गई। 

इस प्रकार की विघ्न-बाधाओं के कारण उनको बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ गया। सन् 1866 ई० में उनका निर्मित द्रव नाइट्रोग्लिसरिन एक डिब्बे में से रिस गया। यह डिब्बा कीसलगुर नामक मिट्टी में बंद था। उन्होंने देखा कि उसकी सलगुर मिट्टी में नाइट्रोग्लिसरिन द्रव के अवशोषित हो जाने पर इसका प्रयोग करना अधिक सुरक्षित हो गया है। इस स्थिति में यह विस्फोटक झटके लगने पर भी नहीं फटता था। इस तरह उनको उस खतरनाक द्रव को ले जाने का सुरक्षित ढंग अनजाने में ही मिल गया। नाइट्रोग्लिसरिन द्रव के कीसलगुर मिट्टी में अवशोषित होने पर इस विस्फोटक की विस्फोटक शक्ति सिर्फ 25 प्रतिशत कम होती थी। उन्होंने इस सुरक्षित विस्फोटक को डायनामाइट की संज्ञा दी। 

तत्पश्चात् उनकी अनेक फैक्टरियां खुलती चली गईं। नाइट्रोग्लिसरिन द्रव के निर्माण और विक्रय से उनका सितारा ऊँचा उठता चला गया। सन् 1887 ई० में उन्होंने बैलस्टिाइट नामक विस्फोटक पदार्थ की खोज की। यह धुआं रहित नाइट्रोग्लिसरिन का पाउडर मात्र था। अनेक राष्ट्रों ने इसका प्रयोग बारूद के रूप में किया था। 

उन्होंने अपने जीवन काल में विस्फोटकों पर 100 से भी अधिक पेटेंट प्राप्त कर लिए थे। जिसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण विश्व में उनके नाम का डंका बजने लगा। उन्होंने इन विस्फोटकों के माध्यम से अथाह धन कमाया। 

63 वर्ष की आयु में 10 दिसम्बर, सन् 1896 ई० में सेनरेमा में इस महान आविष्कारक की मृत्यु हो गई। उस समय उनके पास 90 लाख डॉलर की धनराशि थी, जिसका ब्याज हर वर्ष नोबेल पुरस्कार के रूप में दिया जाता था। ये नोबेल पुरस्कार स्टॉकहोम में उनकी पुण्यतिथि पर विशेष समारोह में दिए जाते हैं। 

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