समुद्रगुप्त की जीवनी और इतिहास | Biography and History of Samudragupta

समुद्रगुप्त की जीवनी और इतिहास

समुद्रगुप्त की जीवनी और इतिहास | Biography and History of Samudragupta

समुद्रगुप्त : एक परिचय 

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त मगध के सिंहासन पर बैठा। उसका शासनकाल 328-378 ई० माना जाता है। भारतीय इतिहास में समुद्रगुप्त का शासनकाल ‘दिग्विजय’ नाम विजय अभियान के लिए प्रसिद्ध है। समुद्रगुप्त ने मथुरा और पद्मावती के ‘मांग’ राजाओं को पराजित कर, उनके राज्यों को अपने अधिकार में ले लिया था।

उसने वाकाटक राज्य पर विजय प्राप्त कर उसका दक्षिणी भाग, जिसमें, चेदि, महाराष्ट्र राज्य थे, वाकाटक राजा रुद्रसेन के अधिकार में छोड़ दिया था। पश्चिम में अर्जुनायन, मालव गण और पश्चिम उत्तर में यौधेय, मद्रगणों को अपने अधीन कर लिया था।

उन विजयों के बाद उसने सप्तसिंधु को पार कर वालिहक राज्य पर भी अपना शासन स्थापित किया। इस प्रकार समस्त भारतवर्ष पर एकाधिकार कर उसने ‘दिग्विजय’ की। समुद्रगुप्त की यह विजय गाथा, इतिहासकारों में प्रयोग प्रशस्ति’ के नाम से जानी जाती है। 

इन विजयों के बाद समुद्रगुप्त का राज्य उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्य पर्वत, पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी और पश्चिम में चंबल और यमुना नदियों तक हो गया था।

पश्चिम-उत्तर के मालव, यौध्य, मद्रगणों आदि दक्षिण के राज्यों को उसने अपने साम्राज्य में न मिलाकर उन्हें अपने आधीन शासक बनाया था। उसने पश्चिम और उत्तर के विदेशी शक और देवपुत्र शाहानुशाही कुषाण राजाओं और दक्षिण के सिंहल द्वीप वासियों से भी विविध उपहार लिये; जो उसकी अधीनता के प्रतीक थे। उसके द्वारा भारत की दिग्विजय का विवरण इलाहाबाद के किले के प्रसिद्ध शिला-स्तम्भ पर विस्तारपूर्वक अकित है। 

समुद्रगुप्त द्वारा पराजित राजाओं के नाम इलाहाबाद स्तम्भ में जिस रूप में मिलते हैं, वे हैं-अच्युत, नागदत्त, चन्दुवर्मन, बलधर्मा, गणपति नाग, रुद्रदेव, नागसेन, नंदी, तथा मातिल। इन विजयों के बाद उसने अश्वमेध यज्ञ किया और ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की।

युवावस्था और साम्राज्य विस्तार

गुप्तवंश के तृतीय राजा चन्द्रगुप्त की अनेक रानियों से कई पुत्र थे-उसकी रानियों में लिच्छवी कुमारी श्रीकुमार देवी भी शामिल थी। अवश्य ही उससे चन्द्रगुप्त ने बाद में विवाह किया था। उससे समुद्रगुप्त का जन्म हुआ। लिच्छवी कुमारी लिच्छवी राज्य की एकलौती सन्तान थी; लिच्छवी जैसा गणराज्य, उसके साथ मजबूती से निकट रहे, इसलिए चन्द्रगुप्त ने लिच्छवी राज्य के दौहित राजकुमार को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 

इस सम्बन्ध में उस समय का विवरण सामने आता है जब चन्द्रगुप्त ने समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। प्राप्त विवरण के अनुसार-चन्द्रगुप्त ने उसे ही (समुद्रगुप्त) को अपना उत्तराधिकारी चुना और इस निर्माण को उसने राजसभा बुलाकर, सब सभ्यों के सम्मुख उद्घोषित किया। यह करते हुए प्रसन्नता के कारण उसके सारे शरीर में रोमांच हो आया और आंखों में आंसू आ गए थे। उसने सबके सम्मुख समुद्रगुप्त को गले लगाया और कहा-तुम सचमुच आर्य हो और अब राज्य का पालन करो। इस निर्णय से राजसभा में एकत्र हुए सब सभ्यों को परम प्रसन्नता हुई। 

उपरोक्त विवरण से यह तथ्य सामने आता है कि चन्द्रगुप्त ने अपने जीवित रहते ही लिच्छवि दौहित समुद्रगुप्त को सिंहासनसीन कर दिया था। सम्भवतः समुद्रगुप्त को सिंहासनसीन करने के कुछ समय बाद ही उसका निधन हो गया था-ऐसा इसलिए समझ में आता है क्योंकि समुद्रगुप्त के सिंहासनसीन होने के कुछ समय बाद ही अन्य राजकुमारों द्वारा सत्ता के लिए संघर्ष का विवरण सामने आता है। चन्द्रगुप्त के अनेक राजकुमार थे; निश्चित रूप से उनमें कई समुद्रगुप्त से ज्येष्ठ थे-समुद्रगुप्त का कनिष्क होकर राजा बनना उन्हें स्वीकार न हुआ होगा। पिता के जीवित रहते वे विवाह न कर सकते थे। यदि ऐसा करना होता तो वे उसी समय विद्रोह कर देते जब समुद्रगुप्त को राजसत्ता सौंपी जा रही थी। 

समुद्रगुप्त को गृह कलह का सामना करना पड़ा था। इसका प्रमाण इस रूप में भी सामने आता है कि समुद्रगुप्त के काल के कुछ सिक्के ऐसे हैं, जिनमें स्वर्ण की मात्रा कम है और उस पर समुद्रगुप्त के स्थान पर ‘वाच’ शब्द अंकित है। इस सिक्के के आधार पर माना जाता है कि चन्द्रगुप्त का ‘वाच’ नामक राजकुमार अवश्य ही समुद्रगुप्त से ज्येष्ठ था। उसने विद्रोह करके खुद को किसी प्रान्त का राजा घोषित कर दिया था तथा अपने नाम का सिक्का चला दिया था। पर समुद्रगुप्त वीर और प्रतापी था-उसने राजकुमार वाच सहित विद्रोही सभी भाइयों का विद्रोह शीघ्र दबा दिया था और पाटलिपुत्र के सिंहासन पर दृढ़ता के साथ अपना अधिकार जमा लिया था।

समुद्रगुप्त की दिग्विजय

 Biography and History of Samudragupta

गृह कलह को शान्त करके समुद्रगुप्त ने राज्य विस्तार के लिए संघर्ष आरम्भ किया। इस विजय यात्रा का वर्णन, प्रयाग में, अशोक मौर्य के प्राचीन स्तम्भ पर बड़े सुंदर ढंग से उत्कीर्ण है। समुद्रगुप्त की विजयों की विस्तृत प्रशस्ति उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रची गयी थी। जिसे समुद्रगुप्त ने अशोक महान् के उस स्तम्भ पर खुदवायी जो वर्तमान में प्रयाग (इलाहाबाद) के किले में खड़ा है |

इस लेख में समुद्रगुप्त की विजयों की तिथि नहीं दी गयी है, परन्तु यह तो तय है कि यह लेख उसकी मृत्यु के उपरान्त नहीं, उसके जीवनकाल में ही अंकित किया गया। उसने 360 ई० के लगभग दिग्विजय कर ली थीं-उसी के बाद वह अभिलेख लिखा गया। इस अभिलेख में समुद्रगुप्त के अश्वमेध का उल्लेख नहीं है-यह बात भी साबित करती है कि यह अभिलेख समुद्रगुप्त के जीवित रहते लिखा गया, अन्यथा उसके ‘अश्वमेध’ का भी वर्णन उसमें होता।

 अभिलेख में समुद्रगुप्त के भौगोलिक क्रम से विजयों का अंकन है। उसने पहले आर्यावर्त के अपने पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण किया, उसने नौ नृपतियों को कठोर नीति का पालन करते हुए उन्हें बलपूर्वक नष्ट कर राज्य छीन लिय। उनके नाम इस प्रकार हैं 

(1) रुद्रदेव (रुद्रसेन प्रथम) 

(2) मतिल

(3) नागरत्त (सम्भवतः कोई नागराजा)

(4) चन्द्रवर्मन

(5) गणपति नाग 

(6) नागसेन

(7) नन्दिन-नाग कुलीन 

(8) अच्युत

(9) बलवर्मन 

आर्यवर्त में अपनी शक्ति को भली-भाति स्थापित कर समुद्रगुप्त ने दक्षिण विजय के लिए प्रस्थान किया। इस विजय यात्रा में उसने बारह राजाओं को जीतकर अपने आधीन किया। प्रशस्ति में उल्लेख के अनुसार दक्षिण के जीत लिये जाने वाले राजा इस प्रकार थे- 

1 कौशल का महेन्द्र-कौशल से अभिप्राय दक्षिण कौशल से है-जिसमें आधुनिक मध्यप्रदेश के विलासपुर, रायपुर और सम्बल प्रदेश सम्मिलित थे, इसकी राजधानी श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर) थी।

2 महाकान्तार का व्याघ्रराज-महाकोशल के दक्षिण-पूर्व में महाकान्तार (जंगली प्रदेश) था। इस स्थान पर वर्तमान में गोंडवाना के सघन वन है।

3 कौशल का मंत्रराज-महाकान्तार के बाद समुद्रगुप्त ने कौशल प्रदेश जीता। यह राज्य दक्षिण मध्य प्रदेश के सोनपुर प्रदेश के आसपास था।

4 पिष्टपुर का महेन्द्रगिरी-गोदावरी जिले में स्थित वर्तमान पीठापुरम प्राचीन समय में पिष्टपुर कहलाता था।

5 गिरीकोटूर का स्वामी दत्त-कोटूर का राज्य गंजाम जिले में था।

6 ऐरण्डपल्ल का दमन-ऐरण्डपल्ल का राज्य कलिंग के दक्षिण में था। 

7 काञ्ची का विष्णुगोया-आंध्र प्रदेश का काञ्जीवरम् था।

8 अवयुक्त का नीलराज-हाथी गुम्फा अभिलेख से ज्ञात होता है कि इस नीलराज प्रदेश अथवा जाति की राजधानी गोदावरी के विकटपिधुंडी थी।

9 वेंगी का हस्तिवर्मन-एलोट में पेड्ड वेगी।

10 पालक्य का उग्रसेन-नेलोर जिला।

11 देवराष्ट्र का कुबेट-विजयपट्टम जिले में येल्य में स्थित।

12 कुस्थलपुर का धनञ्जय-उत्तर अरकाट का कुट्टलूर। 

इतिहासकार फ्लीट और स्मिथ के अनुसार उपरोक्त कोराल, एरण्डपल्ल, पालक्क और देवराष्ट्र की एकता क्रमशः केरल (मालाबार का तट), खानदेश में एरण्डोल, पालघाट अथवा पालक्कादु और महाराष्ट्र के सुदूर दक्षिण के छोर तक समुद्रगुप्त का राज्य पहुंच गया था। इन विजयों के बाद वह, अपनी राजधानी महाराष्ट्र और खानदेश होकर लौटा। 

जब समुद्रगुप्त विजय यात्रा के लिए दक्षिण गया हुआ था तब उत्तरी भारत, आर्यवर्त के अधीनस्थ राजाओं ने फिर विद्रोह का झण्डा खड़ा कर, उन पर दोबारा अपना अधिकार कर लिया। तब इस बार पलटकर जब समुद्रगुप्त वापस उनकी ओर आया तो उसने अपनी अधीनता स्वीकार कराकर उन्हें छोड़ नहीं दिया, बल्कि उनका पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया। इस तरह के, जड़ से उखाड़ दिये गए राजाओं के नाम हैं-रुद्रदेव, मतिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मा, गणपति नाग, नागसेन, अच्चयुतनन्दी और बल वर्मा। 

इनमें से नागसेन और अच्युत के साथ पहले ही समुद्रगुप्त के युद्ध हो चुके थे। उन्हें परास्त करके समुद्रगुप्त ने धूमधाम से पाटलिपुत्र (पुष्पपुर) में प्रवेश किया। उपरोक्त राजाओं का समूल नाश करके समुद्रगुप्त ने उनके राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया था। 

उपरोक्त उन्मूलित राजाओं के विवरण रूप में ये बातें सामने आती हैं-रुद्रसेन, वाकाटकवंशी प्रसिद्ध राजा रुद्रसेन प्रथम था। मलित-की एक मुद्रा, सुलन्द शहर में मिलती है; सम्भवतः वह उसी क्षेत्र का राजा था। नागदत्त और गणपतिनाग के नामों से यह बात सामने आती है कि वे मारशिव नागों के वंश के थे और उनके छोटे-छोटे राज्य आर्यवर्त में ही विद्यमान थे। गणपतिनाग के कुछ सिक्के बेसनगर में उपलब्ध हुए हैं। चन्द्रवर्मा-पुष्करण का राजा था। दक्षिणी राजपूताना में सिसुनिया की एक चट्टान पर उसका एक शिलालेख मिला है। बलवर्मा सम्भवतः कोटकुलज नृपति था। जिसे पूर्व में भी समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। आटविक राजाओं के प्रति समुद्रगुप्त ने प्राचीन मौर्य-नीति का प्रयोग किया। कौटिल्य अर्थशास्त्र में परामर्श दिया गया है कि आटविक राजाओं को अपना सहयोगी और सहायक बनने का उद्योग करना चाहिए। आटविक सेनाएं बहुत उपयोगी होती थीं। समुद्रगुप्त ने इन राजाओं को अपना परिचारक’ बना लिया था। 

उपरोक्त विजयों के बाद समुद्रगुप्त का ऐसा प्रभाव स्थापित हो गया था कि उसे आगे और युद्धों की आवश्यकता न रह गयी थी। अन्य सीमा प्रान्तों के राजाओं और नृपतियों ने, मौधेय, मालव आदि गणराज्यों ने स्वयंसेवा से उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। ये कर देकर, आज्ञाओं का पालन कर, प्रणाम कर, राजदरबार में उपस्थित होकर, सम्राट चन्द्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते थे। इस तरह से करद (अधीन) बनकर रहने वाले राजाओं के नाम इस प्रकार हैं- 

1.समतट या दक्षिण-पूर्वी बंगाल

2.कामरूप या असम

 3.नेपाल 

4.डवाक या असम का नौगांव प्रदेश।

5.कर्तृपुट या कुमायूं और गढ़वाल के पार्वत्य प्रदेश। 

समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करने वाले अन्य गणराज्य इस प्रकार हैं मालव, आर्जुनाथन, मौधेय, मद्रक, आमीर, प्रार्जुन, सनकानिक, काक और खरपरिक। मालव, आर्जुनायन, मौधेय, मद्रक और आमीर प्रसिद्ध गणराज्य थे। कुणाल साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करके इन्होंने अपनी स्वतंत्रता को पुनः स्थापित किया था। इन्होंने अपनी शक्ति बढ़ा ली थी। इन्हें समुद्रगुप्त ने अपने अधीन कर लिया था। इन गणराज्यों ने सम्राट की आधीनता स्वीकार कर अपनी पृथक् सत्ता बनाए रखी थी। 

प्रार्जुन, काक, सनकानिक और खरपरिक छोटे-छोटे 2100 राज्य थे, जो विदिशा के समीपवर्ती प्रदेश में स्थित थे। अनेक विद्वानों के मत से इनकी स्थिति उत्तर-पश्चिम के गन्धार जैसे राज्यों के क्षेत्र में थी। समुद्रगुप्त ने उत्तरी भारत से मारशिव, वाकाटक और गुप्तवंशों के शकों और कुशाणों के शासन का अन्त कर दिया था। 

उपरोक्त राजाओं और राज्यों के अलावा भी अन्य राज्य ऐसे थे-जो स्वतंत्र रहकर भी आत्मनिवेदन, कन्योपाथन, दान, गरुड़ध्वज से अंकित आज्ञापत्रों के ग्रहण आदि उपयोगों से सम्राट समुद्रगुप्त को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करते थे।

आत्मनिवेदन का अभिप्राय है, अपनी सेवाओं को सम्राट के लिए अर्पित करना। कन्योपाथन का अर्थ है, कन्या विवाह में देना। 

सम्भवतः सिंहल, शक और कुषाण राजाओं ने भी सम्राट समुद्रगुप्त को अपनी कन्याएं विवाह में प्रदान की थीं। दान का अभिप्राय भेंट उपहार से है। 

सम्राट चन्द्रगुप्त से ये राजा आज्ञापत्र भी ग्रहण करते थे। ये सब अनेक उपायों से समुद्रगुप्त को प्रसन्न रखकर उसके कोप से बचे रहना चाहते थे। 

इस प्रकार पश्चिम में गान्धार से लगाकर पूर्व में असम तक और दक्षिण में सिंहल (लंका) द्वीप से शुरू कर उत्तर में हिमालय से कीर्तिपुर जनपद तक सर्पत्र समुद्रगुप्त का साम्राज्य फैला हुआ था। आर्यवर्त्त के प्रदेश उसके सीधे शासन में थे, दक्षिण के राजा उसके अनुग्रह से अपनी सत्ता कायम किए हुए थे। सीमा प्रदेशों के जनपद और गणराज्य उसे नियमित रूप से कर देते थे और सुदूरस्थ राजा भेंट-उपहार से अपनी सेवाएं समर्पण कर उसके साथ मैत्री सम्बन्ध स्थापित किए हुए थे। 

प्रयाग की प्रशस्ति में गुप्त-सम्राट की विस्तृत शक्ति को इन शब्दों में वर्णन किया गया-पृथ्वी भर में कोई उसका प्रतिरथ (विरुद्ध खड़ा हो सकने वाला) नहीं था। सारी धरती को उसने एक प्रकार से अपने बाहुबल से बांध-सा रखा था।

दूसरे राष्ट्रों से सम्बन्ध 

निःसंदेह समुद्रगुप्त ने अपने आपको विशाल साम्राज्य का स्वामी बना लिया था, बावजूद इसके उसकी सीमाओं से बाहर अनेक राज्यों का होना स्वाभाविक था, वह उनसे मैत्री सम्बन्ध स्थापित करके रखता था। 

स्मिथ महोदय ने एक चीनी प्रमाण से इस बात को सिद्ध किया है कि सिंहल के समुद्रगुप्त के समकालीन राजा मेधवर्ण ने बोध गया में दो बौद्ध भिक्षु भेजे थे। बोध गया में आने वाले सिंहल द्वीप के इन साधुओं को अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ा था। जब वे वापस सिंहल द्वीप गये तब उन्होंने अपने राजा से बोध गया में उचित विश्राम गृह न होने की बात कहकर निवेदन किया कि वहां विश्राम गृह बनवाए जाएं। 

मेधवर्ग में बहुमूल्य भेंटों के साथ समुद्रगुप्त के पास अपने दूत भेजे और उससे सिंहली तीर्थयात्रियों के लिए विहार निर्माण की अनुमति मांगी। अनुमति मिल जाने पर उसने बोध गया में एक विहार बनवाया, जो महाबोधि संघाराम से विख्यात हुआ।

अश्वमेध यज्ञ 

समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर अश्वमेध यज्ञ किया। यह यज्ञ काफी समय पूर्व से बंद हो चुका था। शिलालेखों में उसे ‘चिरोतन अश्वमेधाहर्ता’ (देर से न हुए अश्वमेध को फिर से प्रारम्भ करने वाला) तथा ‘अनेकाश्वमेघयात्री’ (अनेक अश्वमेध करने वाला) कहा गया है इस अवसर पर उसने कृपण, दीन, अनाथ और आतुर लोगों को भरपूर सहायता देकर, उनके उद्धार का भी प्रयत्न किया था। प्रयाग की प्रशस्ति में इसका बहुत स्पष्ट संकेत है। समुद्रगुप्त के कुछ सिक्कों में यज्ञीय अश्व का चित्र भी दिया गया है। ये सिक्के अश्वमेध यज्ञ के उपलक्ष्य में ही जारी किये गए थे। इन सिक्कों में जहां एक ओर यज्ञीय अश्व का चित्र है, वहीं दूसरी ओर अश्वमेध की भावना को सुन्दर शब्दों में प्रकट किया गया है- ‘राजाधिराज पृथ्वी को जीतकर अब स्वर्ग की जय कर रहा है। उसकी शक्ति और तेज अप्रतिम है।’ समुद्रगुप्त का व्यक्तिगत गुण 

समुद्रगुप्त न केवल एक महान् विजेता ही था, बल्कि उसकी प्रतिभा सर्वोन्मुखी थी। वह युद्ध कौशल और राजनीति में तो अद्वितीय था ही, शास्त्रों में भी वह पारंगत था। वह संस्कृत का विद्वान और विद्वानों का आश्रयदाता था।

अभिलेख में उसे ‘कविराज’ कहा गया है; जो प्रमाणित करता है कि काव्य के क्षेत्र में वह पारंगत था। वह संगीत की कला में परम निपुण था। इस बात को सिद्ध करने के लिए उसकी मुद्रा में, भम्रपीठ पर बैठी, वीणा बजाती उसकी आकर्षक आकृति है। 

प्रयाग स्तम्भ लेख में अंकित है-अपनी तीव्र और कुशाग्र बुद्धि द्वारा देवराज ने गुरु (बृहस्पति) को और गायन से तुम्बरू और नारद तक को लज्जित कर दिया था। 

उसके व्यक्तित्व में धर्म का असाधारण महत्त्व था। वह वैष्णव मत का अनुयायी था। उसके आज्ञापत्र गरुड़ आकृति से चिह्नित थे। गरुड़ पक्षी विष्णु का वाहन है, जो सिद्ध करता है कि समुद्रगुप्त शिव का उपासक था। उसने वैष्णव धर्म को प्राश्रय और प्रसार प्रदान किया था।

सकिविग्रहिक महादण्डायक हरिषेण के शब्दों में समुद्रगुप्त का व्यक्तित्व और चरित्र इस प्रकार था-

“उसका मन विद्वानों के सत्संग-सुख का व्यसनी था। उसके जीवन में सरस्वती और लक्ष्मी का अविरोध था। वह वैदिक धर्म का अनुयायी था। उसका काव्य ऐसा था कि कवियों के बुद्धि के विभव का भी उससे विकास होता था। अपनी भुजाओं का पराक्रम ही उसका सबसे उत्तम साथी था। परशु, बाण, शत्रु, शक्ति अस्त्रों के सैंकड़ों घावों से उसका सारा शरीर सुशोभित था। उसकी नीति थी कि साधु का उदय और असाधु का प्रलय हो। उसका हृदय इतना कोमल था कि भक्ति और झुक जाने मात्र से वश में आ जाता था।” 

जिस समय चीनी यात्री ह्वानसांग बोध गया की यात्रा के लिए आया था, उस समय वहां एक हजार से ऊपर भिक्षु निवास करते थे। 

सम्राट समुद्रगुप्त की अनेक रानियां थीं। पटरानी का पद दन्तदेवी को प्राप्त था। इसी से चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का जन्म हुआ था। 

निधन-पचास वर्ष के लगभग शासन करके 378 ई० में सम्राट समुद्रगुप्त का निधन हुआ। वह एक वीर योद्धा, संगीत और कविता का प्रेमी महान् सम्राट था। 

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