खारवेल की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Samrat Kharavela

खारवेल की जीवनी और इतिहास

 खारवेल की जीवनी और इतिहास

सम्राट खारवेल को कलिंगराज खारवेल कहा गया है। कलिंग देश का नाम सम्राट अशोक के समय खूब प्रचलित हुआ था। कलिंग युद्ध के बाद ही अशोक युद्ध में भीषण हिंसा देखकर बौद्ध मत का अनुयायी बन गया था। निःसंदेह कलिंग के वीरों ने युद्ध में बेमिसाल वीरता का परिचय दिया था।

अशोक के बाद कलिंग की स्थितियों का कुछ पता नहीं चला-सिर्फ यहीं पर बात आकार रुक जाती है कि युद्ध में हार के बाद कलिंग ने मगध की अधीनता स्वीकार ली थी। 

इतिहास में एक बार फिर कलिंग सिरमौर बन गया जबकि कलिंग का सम्राट खारवेल सामने आया। 

भुवनेश्वर (पुरी जिला) के समीप उदयगिरी में हाथी गुम्फा का प्रख्यात अभिलेख चेत-कुल के तृतीय नरेश खारवेल की कीर्ति का वर्णन करता है। इसमें सम्राट खारवेल (नृपति) के 13वें शासन वर्ष तक के कार्यों का उल्लेख है। अभिलेख में क्रमवार तिथियों पर प्रकाश नहीं पड़ता।

कुछ विद्वानों के अनुसार अभिलेख के सोलहवीं पंक्ति में मौर्य संवत के 165वें वर्ष पर हवाला है।

अधिकांश विद्वानों के मत इस बात पर आकर रुकते हैं कि अशोक के बाद मगध पर मौर्य वंश के कमजोर शासकों में से किसी शासक के समय कलिंगराज खारवेल शक्तिशाली हुआ था।

खारवेल के बारे में विवरण

अभिलेख के अनुसार लेख, गणित, व्यवहार (कानून) और अर्थशास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर खारवेल 24 वर्ष की आयु में सिंहासन पर बैठा। अपने शासन का प्रथम वर्ष उसने सार्वजनिक निर्माण में बिताया। द्वितीय वर्ष में शातकर्णी की शक्ति का तिरस्कार कर मुषिक नगर पर आक्रमण किया। चौथे वर्ष में रथिको और भोजको का आत्मसमर्पण कराया और पांचवें वर्ष में उसने एक प्रणाली का उद्घाटन कराया।

खारवेल की जीवनी

अपने शासन के आठवें वर्ष और बारहवें वर्ष में उसने मगध पर दो बार आक्रमण किया। मगध की प्रजा अत्यन्त भयभीत हो गयी और बहसतिमित्र ने, जिसे राजगृह का राजा कहा गया है, संधि की प्रार्थना की (बाहसतिमित्र के सम्बन्ध में कुछ ज्ञात नहीं कि मौर्य कालीन कौन राजा था)। तेरहवें वर्ष में खारवेल ने पाण्डयों पर विजय की।

खारवेल जैन मतावलम्बी था। दरिद्रों को प्रभूत दान देता था। उसने जैन भिक्षुओं के निवास के लिए दरी-गृह बनवाए और मगध से वह जैन तीर्थंकर की प्रसिद्ध मूर्ति को वापस ले गया था; जिसे कभी नन्दराज कलिंग से उठा ले गया था।

हाथी गुम्फा लेख का महत्त्व 

हाथी गुम्फा लेख उदयगिरी नामक पहाड़ी की एक गुफा में शिलालेख रूप में है; जो ‘हाथी गुम्फा लेख’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसे कलिंग राज खारवेल ने उत्कीर्ण करवाया था। यह लेख प्राकृत भाषा में है और प्राचीन भारतीय इतिहास में इसका बहुत अधिक महत्त्व है।

अभिलेख के अनुसार जो विवरण सामने आते हैं उनके अनुसार कलिंग के राजाओं के बारे में इसमें विवरण सामने आते हैं; अन्यथा इतिहास में इस बात का भी जिक्र नहीं है कि सम्राट अशोक ने कलिंग से जो युद्ध छेड़ा था, वह किस राजा के विरुद्ध था; अथवा अशोक के कलिंग युद्ध के समय वहां के राजा का नाम क्या था। 

हाथी गम्फा लेख से यह बात सामने आती है कि कलिंग के स्वतंत्र राज्य के राजा प्राचीन ऐल वंश के चेति या चेदि क्षत्रिय थे। चेदि वंश में महामेधवाहन नामक एक प्रतापी राजा हुआ, जिसने मौर्यों की निर्बलता से लाभ उठाकर कलिंग में अपना स्वतंत्र शासन स्थापित किया। 

महामेधवाहन की तीसरी पीढ़ी में कलिंग का प्रतापी राजा खारवेल हुआ। खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था। उसके समय में कलिंग की बहुसंख्यक जनता वर्धमान महावीर के धर्म को अपना चुकी थी।

हाथी गुम्फा के शिलालेख (प्रशस्ति) के अनुसार खारवेल ने जीवन के पन्द्रह वर्ष विद्या अध्ययन में व्यतीत किए। इस काल में उसने धर्म, अर्थशास्त्र, शासन, मुद्रा पद्धति, कानून, शस्त्र-संचालन आदि की शिक्षा प्राप्त की। पन्द्रह वर्ष की आयु में वह युवराज के पद पर नियुक्त हुआ और नौ वर्ष तक इस पद पर रहने के बाद चौबीस वर्ष की आयु में वह कलिंग सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। राजा बनते ही उसने ‘कलिंगाधिपति’ और ‘कलिंग चक्रवर्ती’ की उपाधियां धारण कीं।

विजय यात्रा

अपने शासन के आठवें वर्ष में खारवेल ने उत्तर दिशा की ओर विजय यात्रा आरम्भ की। उत्तरापथ में आगे बढ़ती हुई, उसकी सेना ने गोरथ गिरी के दर्ग पर आक्रमण किया। इसे जीतकर राजगृह पहुंच गयी।

हाथी गुम्फा अभिलेख के अनुसार उस समय यवन भी भारत पर आक्रमण कर रहे थे, पर खारवेल की विजयों के समाचार से भयभीत होकर यवनों ने मध्यप्रदेश पर आक्रमण का विचार छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान किया। 

मध्य प्रदेश पर आक्रमण का विचार छोड़ने वाले यवनराजा का नाम दिमित्त (डोमेट्रियस) था। अपने शासन के ग्यारहवें वर्ष में खारवेल ने दक्षिण दिशा को आक्रांत किया और विजय यात्रा करता हुआ तमिल देश पहुंच गया। वहां उसने मिथुण्ड (पितुन्द्र) को जीता और वहां के राजा को भेंट प्रदान करने के लिए विवश किया। 

हाथी गुम्फा के शिलालेख में खारवेल द्वारा परास्त किये गए तमिल देश संघात (राज्य-संघ) का उल्लेख है। बारहवें वर्ष में उत्तरापथ पर पुनः आक्रमण पर महावीर स्वामी की मूर्ति पाटलिपुत्र से वापस ले जाकर, भुवनेश्वर में एक विशाल मंदिर का निर्माण कराकर स्थापित किया।

भारतीय इतिहास के इस युग की प्रायः सभी घटनाएं अनिश्चित और अस्पष्ट हैं। हाथी गुम्फा शिलालेख से राजा खारवेल का जो विवरण मिलता है, उसके अनुसार उस समय कलिंग में राजा खारवेल एक विजेता और चक्रवर्ती राजा के रूप में उभरा है।

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