पुष्यमित्र शुंग की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Pushyamitra Shunga

पुष्यमित्र शुंग की जीवनी और इतिहास

पुष्यमित्र शुंग की जीवनी और इतिहास

पुष्यमित्र शुंग : एक परिचय 

पुष्यमित्र शुंग, भारत के शुंग साम्राज्य का प्रथम राजा था। मौर्य साम्राज्य के अतिम शासक वृहद्रथ की हत्या करके 184 ई०पू० में पुष्यमित्र ने मौर्य राज्य पर अधिकार कर लिया था। 

पुष्यमित्र शुंग ने समग्र भारत पर अधिकार कर लिया था, इसकी प्रमाणिकता पंजाब के जालन्धर में मिले एक शिलालेख से होती है। 

पुष्यमित्र ने मौर्य वंश को मिटाकर जिस नये राजवंश की स्थापना की उसे इतिहास में शुंग राजवंश के नाम से जाना गया। 

शुंग ब्राह्मण था। हरिवंश ग्रंथ में उनको सेनानी और कश्यप गोत्रीय कहा गया है। मालविकाग्निमित्र ने पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र को बेम्बुक कुल का माना है। बोद्धायण स्रोत में बेम्बुक कुल वालों को कश्यप गोत्र का और कान्यकुब्ज माना गया है। उससे यह सिद्ध होता है कि पुष्यमित्र शुंग कान्य कुब्ज और कश्यप गोत्र का था। 

बुन्देलखण्ड में कान्यकुब्ज के अधिकतर लोग पुष्यमित्र शुंग के समय से अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं; जबकि उस स्थान पर उनके पूर्वजों को जमींदारी सौंपी गयी थी। इन जातियों में तिवारी, शुक्ल और मिश्र प्रमुख हैं।

पुष्यमित्र शुंग का उत्थान 

कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध मत अपनाकर, उसके प्रचार-प्रसार में पूरी तरह काम किया था। माना जाता है कि उसने यज्ञों पर रोक लगा दी थी। राजा का आचरण और राजा का धर्म लोग अपनाने को विवश हो गये थे, क्योंकि लोगों को राजदण्ड का भय था। ब्राह्मण लोगों के पास पुरोहितगीरी का काम रह न गया था-तब उन्होंने मजबूरी में सैनिक वृत्ति अपना ली थी। 

पुष्यमित्र शुंग के पूर्वज भी उन्हीं ब्राह्मणों में से एक थे जिन्होंने अशोक के समय से सैनिक वृत्ति अपनायी थी। पुष्यमित्र शुंग मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ का उच्च सैनिक अधिकारी था। वह तरक्की करते-करते सेनापति पद पर आरूढ़ हो गया था। उसने काफी समय से ‘सेनानी’ की उपाधि धारण कर रखी थी। उस समय परवर्ती मौर्यों के निर्बल शासन से मौर्यों का सरकारी प्रशासन शिथिल था। देश को आन्तरिक और बाह्य संकटों का खतरा था। यवन आक्रमण का खतरा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। 

वृहद्रथ राजधर्म पर ध्यान न देकर विलासिता में डूबा रहता था। ऐसी परिस्थितियों में एक दिन वृहद्रथ सैनिक निरीक्षण कर रहा था। सेना पूरी तरह से अपने सेनापति के प्रति वफादार होती गयी थी। पुष्य मित्र ने सैन्य निरीक्षण करते राजा वृहद्रथ से खस्ताहाल राजकोष की चर्चा करते हुए बौद्ध मठों पर मुक्त हाथों से धनदान दिये जाने की आलोचना कर दी।

दोनों में कहासुनी इस हद तक बढ़ गयी कि वृहद्रथ ने म्यान से तलवार खींच ली-उसकी तलवार का वार सेनापति पुष्यमित्र पर होता, इसलिए पहले ही पलटवार करते हुए पुष्यमित्र ने राजा की हत्या की दी। 

सेना में वैदिक सिपाहियों की बहुलता थी! क्योंकि बौद्ध मतानुयायी सैनिक वृत्ति अपनाने के बजाय विहारों में रहना ही पसन्द करते थे।

वृहद्रथ की हत्या करते ही पुष्यमित्र ने खुद को राजा घोषित कर दिया। सेना ने उसका पूरा साथ दिया, किसी अन्य ओर से विरोध का स्वर न उभर सका। सेना का पक्ष पुष्यमित्र के लिए मजबूत होने से प्रजा ने भी उसे राजा के रूप में स्वीकार कर लिया। 

पुष्यमित्र 184 ई०पू० राजा बनने का प्रमाण सामने आता है। उसे वर्ण से ब्राह्मण लिखा गया है। उसकी उत्पत्ति शुंग काल में विदिशा (पूर्वी मालवा में बेसनगर) में जाना था। 

परवर्ती मौर्यों शासकों के समय में शुंग कुल के लोग, सैन्यवृत्ति में अपनी पकड़ इतनी अच्छी मजबूत किये हुए थे कि पुष्यमित्र के सत्ता सम्भालने से पूर्व उसके पुत्र अग्निमित्र ने विदिशा का शासन सम्भाल रखा था। पुष्यमित्र के राजा बन जाने के बाद भी अग्निमित्र विदिशा के शासन पद पर कायम रहा।

पुष्यमित्र की विजयें 

पुष्यमित्र शुंग की जीवनी और इतिहास

पुष्यमित्र ने सत्ता हाथ में आते ही पूरी तरह देश में शांति और व्यवस्था को सम्भाल लिया था। उसने वैदिक धर्म के उन आदेशों को फिर से लागू कर दिया, जो अशोक के शासन काल में उपेक्षित हो गये थे। इसी कारण से उसका काल वैदिक प्रतिक्रिया अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल कहलाता है। उसके राजा बन जाने से मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला। निर्बल मौर्य राजाओं के शासनकाल में कई एक प्रदेश साम्राज्य की अधीनता से स्वतंत्र हो गये थे। उन्हें पुष्यमित्र ने पुनः अपने अधीन किया।

विदर्भ की विजय 

विदर्भ राज्य खुद को स्वतंत्र घोषित कर चुका था; पुष्यमित्र ने राजा बनते ही अपने पुत्र विदिशा के शासक अग्निमित्र को आदेश दिया कि वह विदर्भ पर आक्रमण कर उसे पुनः मगध साम्राज्य के अधीन ले आये। अग्निमित्र विदर्भ विजय करने में सफल रहा था। कालिदास के प्रसिद्ध नाटक ‘मालविकाग्निमित्र’ में, यज्ञसेन की चचेरी बहन मालविका और अग्निमित्र की स्नेह कथा के साथ-साथ विदर्भ विजय का वृत्तान्त भी उल्लेखित है। 

यवनों से युद्ध 

पुष्यमित्र के सत्तासीन होने से पूर्व भारत यवनों के आक्रमणों का शिकार होने लगा था। पंतजलि जो पुष्यमित्र के समकालीन थे उन्होंने यह यमिक (चित्तौर के समीप नगरी) और साकेत (अयोध्या) में घेरे का उल्लेख किया है।

 गार्गी संहिता से भी यह बात सामने आती है कि दुष्ट अक्रांत यवनों ने मथुरा, पंचाल देश (गंगा का दुआब) और साकेत को जीत लिया था। पुष्यमित्र ने यवनों को परास्त कर मगध साम्राज्य की शक्तियों को कायम रखने में असाधारण सफलता प्राप्त की थी।

अश्वमेध यज्ञ-अयोध्या में पुष्यमित्र का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है जिसमें उसे ‘द्विरश्वमेध्या जी’ यानि दो बार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला कहा गया है। उससे साबित होता है। कि वह दिग्विजयी राजा हो चुका था। वह चक्रवर्ती सम्राट बन चुका था। दूर-दूर तक उसका विरोध करने वाला राजा न रह गया था। सभी राजा उसकी अधीनता में आ चुके थे। अश्वमेध यज्ञ भारत के राजाओं की वैदिक परम्परा थी।

 हरिवंश पुराण के अनुसार राजा जनमेजय के बाद राजा पुष्यमित्र ने ही यज्ञ किये थे। अहिंसा प्रधान बौद्ध और जैन धर्म के उदय और उत्कर्ष के बाद यज्ञ की यह परिपाटी भारत में विलुप्त हो गयी थी-पुष्यमित्र ने उसे पुनरजीवित किया था। सम्भवतः पतंजलि मुनि उसके यज्ञों के पुरोहित थे। पतंजलि ने महाभाष्य में लिखा है- ‘इह पुष्यमित्रं याजमायः’ (हम यहां पुष्यमित्र का यज्ञ करा रहे हैं।) अश्वमेध यज्ञ के लिए घोड़ा छोड़ने का भी विवरण शिलालेख में मिलता है। और यह विवरण भी कि सिन्धु के तट पर इस घोड़े को यवनों ने पकड़ लिया है और वसुमित्र ने यवनों को परास्त करके उनसे छुड़वाया था। 

पुष्यमित्र ने इस दूसरी बड़ी विजय के बाद दूसरी बार अश्वमेध यज्ञ कराया था, इसका वर्णन नहीं मिलता।

वैदिक धर्म का पुनरुत्थान

पुष्यमित्र ने सत्तारूढ़ होते ही प्राचीन वैदिक धर्म का पुनरुत्थान कर दिया था। ‘द्विव्यावदान’ के अनुसार पुष्यमित्र बौद्धों से द्वेष करता था। बौद्ध धर्मानुयायी वैदिक धर्म विरोधी और वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार में बाधक थे-उसने अनेक बौद्ध स्तूपों को ध्वस्त करा दिया था।

अनेक बौद्ध श्रमणों की हत्या करायी थी। दिव्यावदान में तो यहां तक लिखा है कि पुष्यमित्र ने साकल (स्यालकोट) में जाकर घोषणा कर दी थी कि जो कोई किसी श्रमण का सिर लाकर देगा उसे सौ दीनार पारितोषिक दूंगा। 

दिव्यावदान बौद्ध ग्रंथ है और लगता है पुष्यमित्र के बौद्ध विरोधी और वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक होने के कारण दिव्यावदान में बौद्धों और श्रमणों के संहारक रूप में पुष्यमित्र को साबित करते हुए अत्युक्ति से काम लिया गया है। परन्तु इसमें संदेह नहीं कि पुष्यमित्र के समय में यज्ञप्रधान वैदिक धर्म का पुनरुत्थान आरम्भ हो गया था, अश्वमेध यज्ञ इसके प्रमाण हैं।

शुंग साम्राज्य की सीमा 

विदर्भ को जीतकर और यवनों को परास्त कर पुष्यमित्र शुंग ने मगध साम्राज्य के गौरव को बढ़ा दिया था। उसके साम्राज्य की सीमा पश्चिम में सिन्ध नदी तक हो गयी थी। दिव्यावदान के अनुसार साकल (स्यालकोट) पुष्यमित्र के साम्राज्य के अन्तर्गत था। अयोध्या से प्राप्त पुष्यमित्र से सम्बन्धित शिलालेख इस बात के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। मध्य प्रदेश में उसका शासन फैला हुआ था। विदर्भ विजय ने उसकी साम्राज्य की सीमा नर्मदा नदी तक पहुंचा दी थी। इस प्रकार सम्राट पुष्यमित्र का साम्राज्य हिमालय से नर्मदा तक और सिन्ध से पश्चिमी समुन्द्र तक फैला हुआ था। पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र ने 36 वर्ष तक राज्य किया। 148 ई०पू० में उसके निधन के उपरान्त उसका पुत्र अग्निमित्र जो विदिशा का शासक था, पिता की राजगद्दी पर बैठा। 

क्या पुष्यमित्र बौद्ध विरोधी था? 

दिव्यावदान के अनुसार पुष्यमित्र बौद्ध विरोधी था। साकल (स्यालकोट) में उसने प्रत्येक बौद्ध भिक्षु के मस्तक के लिए सोने के सौ दीनार देने की घोषणा की थी। उसने बौद्ध विहार जला दिये और भिक्षुओं का वध किया।

पर पुष्यमित्र के लिए उपरोक्त कथन, भ्रामक और मिथ्या तथ्यों से परिपूर्ण है। वास्तविकता यह है कि उसकी रगों में राष्ट्रवादिता कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह सेनानी था…उसे अपने सैन्य धर्म का सही प्रकार से पता था।

जिस समय उसने वृहद्रथ की हत्या की उस समय ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो चुकी थीं कि यदि वह वृहद्रथ की हत्या कर, सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथ में न ले लेता तो पूरा भारत यवनों के कब्जे में चला गया होता। बौद्ध शासकों की अहिंसा नीति के चलते ग्रीक ने सिन्धु नदी पार कर अपना विस्तार करना आरम्भ कर दिया था।

 ग्रीक शासक मिनिंद, जिसे बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है, ने भारत वर्ष पर आक्रमण कर पूरे भारत पर अपनी सत्ता स्थापित करने की कूटनीति रची थी। उसने बौद्ध धर्म गुरुओं से सम्पर्क साधकर उनके सामने प्रस्ताव रखा था कि यदि उन्होंने भारत विजय में उनका साथ दिया तो वह स्वयं ही तथा उसकी पूरी सेना बौद्ध मत स्वीकर कर लेगी।

कुछ बौद्ध गुरुओं को मिलिंदर अपनी ओर मिलाने में पूरी तरह सफल रहा था। उन्होंने अपने बौद्ध मठों के द्वार ग्रीक सैनिकों के लिए खोल दिये थे। ग्रीक सैनिक मठों में आकर बौद्धों के बीच रहने लगे थे और अपने हथियारों के लिए मठों को शस्त्रागार बना डाला था।

 मिलिंद का यह षड्यंत्र राज्य के सीमांत क्षेत्रों पर सफल रहा था। जिसकी जानकारी प्रधान सेनापति होने के कारण पुष्यमित्र को हुई थी। उसने राजा वृहद्रथ से बौद्ध मठों की तलाशी अभियान चलाने की आज्ञा मांगी थी। आज्ञा न मिलने पर राजा और सेनापति में विवाद बढ़ा था-पुष्यमित्र ने वृहद्रथ की हत्याकर सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। उसने यवनों को हराया। सीमान्त बौद्ध मठों से चुन-चुनकर ग्रीक सैनिकों को पकड़-पकड़कर उनका सिर कलम किया। उनको शरण देने वाले बौद्ध गुरुओं को भी मृत्युदण्ड दिया। दिव्यावदान भी साकल में बौद्ध भिक्षुओं के मस्तक पर इनाम की घोषणा की जानकारी देता है, अन्य स्थानों के बारे में नहीं, जो साबित करता है कि साकल के उन बौद्ध भिक्षुओं को ही वह दण्ड देता था, जो ग्रीक सैनिकों को संरक्षण देने के दोषी थे।

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