पृथ्वीराज चौहान की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Prithviraj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान की जीवनी और इतिहास

पृथ्वीराज चौहान की जीवनी और इतिहास |Biography and History of Prithviraj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान को कुछ लोग ‘सम्राट’ कोटि में चाहे स्वीकार न करें-पर राजपूत कुल गौरव के एतबार से तथा मुहम्मद गौरी को तराइन प्रथम युद्ध में हराने के कारण, पृथ्वीराज चौहान का इतिहास में नाम किसी सम्राट से कम नहीं। यद्यपि उसके पास विशाल साम्राज्य न था; परन्तु अपने शौर्य, वीरता और शासन प्रबन्ध की कुशलता के गुणों के कारण वह सम्राट था।

सम्राट हर्षवर्धन के बाद राजपूत युग 

सम्राट हर्षवर्धन के बाद भारत में कोई ऐसा हिन्दू राजा न हुआ, जो सम्राट कहलाने का अधिकारी होता। इस तरह 648 ई० के बाद भारतवर्ष सम्राट विहीन देश बनकर रह गया था।

हर्षवर्धन की  मृत्यु के बाद भारत की राजनैतिक एकता छिन्न-भिन्न होती चली थी। भारत में छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना होती चली गयी थी। 

सन् 1200 ई० में आकर, लगभग 650 वर्षों बाद का युग इतिहास में राजपूत युग (648 से 1200 ई०) के नाम से जाना जाता है। 650 वर्षों के इतिहास में यदि किसी राजपूत वीर का सम्राट के रूप में वर्णन न किया जाए, तो यह राजपूती वीरता के साथ ऐतिहासिक अन्याय होगा। हर्षवर्धन के बाद ऐतिहासिक शून्यता न महसूस हो, इसलिए राजपूतों के इतिहास और वीर राजपूत योद्धा पृथ्वीराज चौहान का विवरण आना आवश्यक है।

राजपूत शब्द की व्याख्या 

राजपूत, संस्कृत के ‘राजपुत्र’ का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। प्राचीन काल में राजपूत शब्द का प्रयोग किसी विशेष जाति के लिए नहीं होता था, वरन् इसका प्रयोग राजकुमारों तथा राजवंश के लोगों के लिए होता था। 

चूंकि, प्राचीन समय में प्रायः क्षत्रिय ही राजवंश के होते थे, अतः राजपूत शब्द सामान्यतः क्षत्रिय राजकुमारों (राजपुत्रों) के लिए प्रयोग किया जाने लगा। आक्रमणकारियों ने जब भारत में प्रवेश किया तो उन्हें ‘राजपुत्र’ उच्चारण में असुविधा हुई तो उसे राजपूत कर दिया। 

राजपूत शब्द की उत्पत्ति के अन्य भी बहुत से कारण बताये जाते हैं। इन्हें चन्द्रवंशी और सूर्यवंशी भी बताया जाता है। किवदंती है कि इनकी उत्पत्ति अग्नि कुण्ड से हुई। इन्हें चारों दिशाओं में धर्म और व्यवस्था और संस्कृति की रक्षा के लिए भेज दिया गया। अपने कर्तव्यों का निर्वाह इन्होंने कुशलता के साथ किया। सम्राट हर्ष के निधन के बाद जो-जो प्रमुख राजवंश उभरकर सामने आये, उनका यहां संक्षेप में वर्णन किया जाना प्रासंगिक है।

गुर्जर-प्रतिहार वंश 

इस वंश का उदय राजस्थान के दक्षिण पूर्व के गुर्जर प्रदेश में हुआ। इस वंश के नाम से पहले गुर्जर शब्द जोड़ दिया गया। प्रतिहार एक पदाधिकारी होता था, जो सम्राट का अंग रक्षक होता था। इस वंश का उदय सर्वप्रथम राजस्थान के मन्दौर (जोधपुर) नामक स्थान पर हुआ।

गहड़वाल वंश 

इस वंश का उदय ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिर्जापुर की पहाड़ियों (गुहाओं) के प्रदेश में हुआ था। पहाड़ी प्रदेश में रहने के कारण ही ये लोग गहढ़वाले कहलाए। इस वंश के संस्थापक का नाम चन्द्रदेव था। जिसकी राजधानी वाराणासी थी। लगभग 1085 ई० में चन्द्रदेव ने कन्नौज पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और वहीं से शासन करने लगा। पूर्व में उसने बंगाल के सेना राजाओं की बढ़त को रोका। लगभग 1100 ई० में चन्द्रदेव का परलोकवास हो गया।

चौहान वंश 

चौहान वंश के लोग ‘चाहमान’ व्यक्ति के वंशज कहे जाते हैं। इसी से ये चौहान कहलाए। इस वंश का उदय सांभर प्रदेश में हुआ था, जो जोधपुर और जयपुर की सीमाओं पर स्थित है। इस वंश के प्रारम्भिक शासक प्रतिहारों के सामन्त के रूप में शासन कर रहे थे।

पाल वंश 

इस वंश का उदय बंगाल में आठवीं शताब्दी के प्रथम चरण में हुआ। चूंकि इस वंश के सभी राजाओं के नाम के साथ पाल शब्द जुड़ा हुआ था, अतः इन सबको पाल नाम से ही पुकारा गया। 

सम्राट हर्ष के निधन के उपरान्त बंगाल में जब भयंकर अराजकता फैली, तो उसे दूर करने के लिए जनता ने गोपाल नामक व्यक्ति को 725 ई० में अपना राजा चुना। गोपाल बड़ा ही सफल राजा सिद्ध हुआ। उसने बंगाल की अराजकता दूर करके वहां शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित की और बिहार पर भी अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उसने 45 वर्षों तक शासन किया।

सेन वंश 

सन् 815 ई० में कमजोर पाल राज्यों के कारण इस वंश के विनाश के बाद बंगाल में सेन वंश का उदय हुआ। इस वंश के राजाओं के नाम के साथ ‘पाल’ की तरह ‘सेन’ शब्द जुड़ा हुआ था, अतः इस वंश का नाम सेन वंश पड़ा। 

इस वंश का संस्थापक सामन्त सेन नामक व्यक्ति था। जो पहले कवि के रूप में जाना जाता था। उसने पाल वंश के लोगों की कमजोरी का लाभ उठा, लोगों को एकत्र कर ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य उड़ीसा में सुवर्ण रेखा नामक नदी के तट पर अपने राज्य की स्थापना की। इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक विजय सेन था, जिसने 1150 ई० तक शासन किया। वह वीर विजेता था। उसने पाल वंश के मदन पाल को पराजित कर उन्हें उत्तरी भारत से भगाकर पूर्वी बंगाल पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। आसाम और कलिंग तक उसने अपना अधिकार जमा लिया था। विजय सेन के बाद उसका पुत्र बल्लाल सेन शासक हुआ। वह भी वीर, साहसी, उच्च कोटि का विद्वान और लेखक था। 

इस वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक लक्ष्मण सेन था। उसके शासनकाल के अंतिम भाग में आन्तरिक उपद्रव के कारण दक्षिण तथा पूर्वी बंगाल के छोटे-छोटे राज्य स्वतंत्र हो गए। फिर तुर्कों के आक्रमण ने सेन वंश को जड़ से हिला डाला। लगभग 1260 ई० तक लक्ष्मण सेन के वंशज बंगाल में शासन करते रहे। अन्त में तुर्कों के बढ़ते प्रभाव के कारण इस वंश का पूरी तरह खात्मा हो गया।

राजपूतों की पराजय पर प्रकाश डालते हुए इतिहासकार डॉ० ईश्वरीप्रताप ने कहा है-

“हिन्दुओं की राजनीतिक व्यवस्था प्राचीन आदर्शों से गिर चुकी थी और पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष तथा झगड़ों से इनकी शक्ति क्षीण हो गयी थी। गर्व व विद्वेष के कारण वे एक नेता की आज्ञा का पालन नहीं कर पाते थे और शत्रु के विरुद्ध उन्हें जो सुविधाएं उपलब्ध होती थीं, उनका लाभ नहीं उठा पाते थे।” 

पृथ्वीराज चौहान वंश का परिचय 

पृथ्वीराज चौहान के बालसखा और वीर रस के प्रसिद्ध कवि चन्द्रबरदाई ने ‘पृथ्वीराज रासो’ ग्रंथ की रचना की। चन्द्रबरदाई पृथ्वीराज के दरबारी कवि थे। चन्द्रबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान के वंश परिचय को ‘पृथ्वीराज-रासो’ में दिया है। उसके अनुसार-आबू पर्वत पर तपस्वी ऋषि-मुनियों के आश्रम में जब राक्षसों ने अत्यधिक उपद्रव प्रारम्भ किया, तब ऋषि-मुनियों ने एक महायज्ञ किया। इस यज्ञ के उपरान्त अग्नि कुण्ड से चार वीर उत्पन्न हुए। इनका परिचय रहा–चौहान, परिहास, परमार और सोलंकी।

 ऋषि-मुनियों की आज्ञा से चारों वीरों ने आबू पर्वत की चारों दिशाओं की रक्षा की। चौहान उत्तर दिशा की रक्षा के लिए आगे बढ़े थे। उनके आदि पुत्र अजय पाल ने एक भव्य नगर की स्थापना की, जिसका नाम अजमेर रखा गया। जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है कि सम्राट विक्रमादित्य के बाद भारतवर्ष के राजाओं की एकता छिन्न-भिन्न हो गयी थी। छोटे-छोटे राजा भी अपने आपको सम्राट समझने लगे थे। 

तत्कालीन दरबारी कवियों ने उनकी झूठी प्रशंसा करके उनके मिथ्याभियान को और भी बढ़ा दिया था। यही वह दिन थे जबकि भारत की पवित्र भूमि पर अरबों और तुर्कों का आक्रमण शुरू हुआ। उस समय देश की भूमि पर कोई ऐसी प्रबल शक्ति नहीं थी, जो मुस्लिमों के आक्रमण से देश की रक्षा कर सकती। उनकी शक्ति छिन्न-भिन्न होकर छोटे-छोटे भागों में बंट गयी थी। सम्पूर्ण भारतवर्ष के सब भागों को मिलाकर एक महान शक्ति बनाने वाला कोई न था। 

ऐसे निराशामय समय में भी राजपूताना के वीरों का तेज निस्तेज नहीं हुआ था। विदेशी आक्रमणकारियों के क्षेत्र की रक्षा करने के लिए वे अपना सर्वस्व त्याग करने को तत्पर थे।

 चौहान वंशी अजयपाल ने जहां अजमेर बसाया था, उसके बारे में कहा जाता है कि वहां एक पुराना टूटा-फूटा किला था, जहां पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य का राज्य था। महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य का वध हुआ तथा उनका पुत्र अश्वत्थामा वनवासी हुआ। परिणामस्वरूप राजा विहीन किला खण्डहर में बदला। 

अजयपाल के समय में उस खण्डहर के कुछ अवशेष शेष थे, जो उस स्थान पर किला होने का प्रमाण प्रस्तुत करते थे। अजयपाल ने उसकी मरम्मत करा कर वहीं अपने नाम से ‘अजमेर’ शहर बसाया। 

अजयपाल के बाद एक बार फिर चौहान वंश के राजाओं का अस्तित्व काफी वर्षों के लिए लुप्त हो गया। तत्पश्चात् प्रतापी राजा बीसलदेव का प्रभुत्व सामने आया। उनके राज्याभिषेक उत्सव में राजस्थान के बहुत से राजा शामिल हुए। बीसल देव की कीर्ति चारों ओर फैली। उनका राज्य चारों ओर से सुरक्षित था। प्रजा सुख-शान्ति से निवास करती थी। वे न्यायप्रिय राजा के नाम से ख्याति प्राप्त थे। पर, उनमें एक दुर्गुण ने इस रूप में जन्म लिया कि उन्होंने एक और विवाह किया। यह छोटी रानी उनके लिए अत्यन्त प्रिय बन गयी। वह उसके रूप में मोह में चौबीसों घण्टे डूबे रहने लगे। 

राज-काज पर ध्यान न देने की वजह से जनता में असन्तोष उत्पन्न होने लगा। मुस्लिम आक्रमणकारियों का खतरा राज्य पर मंडरा रहा था। इन स्थितियों में खुद को असुरक्षित महसूस कर जनता ने प्रधानमंत्री से अपनी असुरक्षा की भावना का जिक्र किया। 

प्रधानमंत्री ने बीसलदेव के गुरु के गुरु कृपाल को बुलाया। कृपाल ने राजा को जाकर उनके कर्त्तव्य की बात याद दिलायी। तब बीसलदेव ने अन्तःपुर को छोड़ा। उन्होंने संदेशवाहकों को चारों ओर भेजकर अपने मित्र राजाओं को बुलाया। उनका निमंत्रण पाकर भण्डोवर का राजा रामगुरु तोमर, पावागढ़ के राजा, मेवाड़ राणा महेश, गोहिल राजा, यादव राजा, बघेला राजा, मोरी राजा, गुर्जर राजा, अन्तर्वेद का राजा, चंदेल का राजा एकत्र हुए। परन्तु अभिमानवश गुजरात का राजा भीमदेव सोलंकी नहीं आया। तब बीसलदेव ने एकत्र हुए राजाओं के साथ गुजरात के राजा पर चढ़ाई कर दी।

 दोनों ओर से जमकर युद्ध हुआ। अन्त में गुजरात के राजा भीमसेन ने संधि कर ली। बीसलदेव ने अपनी विजय के स्मरणार्थ वहां एक नगर बसाया-जो बिसनगर के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। संधि के बाद बीसलदेव ने वहां की एक राजपरिवार की कन्या से विवाह किया और अपने राज्य वापस आ गया। राजा बीसलदेव को स्त्री सुख का ऐसा चस्का लगा कि उसने एक और कश्मीर की सामान्य घराने की सुन्दर कन्या से विवाह रचाया। 

राजसी परिवार की निवास की स्त्रियों ने ईर्ष्या करते हुए, षड्यंत्र रचकर कश्मीरी स्त्री को गुप्त रीति से मरवा डाला। इससे राजा बीसलदेव को इतना मानसिक आघात पहुंचा कि वह आबू पहाड़ियों की ओर चला गया और उन्माद रोग से ग्रस्त होकर मृत्य को प्राप्त हो गया। 

बीसलदेव के बाद उसका पुत्र सारंगदेव गद्दी पर बैठा। सारंग देव अधिक दिन राज्य न कर मृत्यु को प्राप्त हुआ। तब उसका पुत्र आना चौहान गद्दी पर बैठा। आना चौहान के बाद उसका पुत्र जयसिंह, फिर जयसिंह का पुत्र आनन्ददेव, फिर आनन्ददेव का पुत्र सोमेश्वर गद्दी पर बैठा। 

सोमेश्वर ने अजमेर राज्य की मान-प्रतिष्ठ बढ़ायी। वह बड़ा पराक्रमी और वीर था। उसने छोटे-छोटे राजाओं की एकता अपने ध्वजा के नीचे एकत्रित की। 

उसी समय दिल्ली के राजा अनंगपाल और कन्नौज के राजा विजयपाल में युद्ध छिड़ गया। उस समय सोमेश्वर एक बड़ी सेना लेकर दिल्ली के राजा की सहायता के लिए आ गया। दिल्ली राजा की युद्ध में जीत हुई। इस जीत से प्रसन्न होकर अनंगपाल ने, सोमेश्वर की वीरता से प्रभावित होकर अपनी पुत्री कमला देवी का विवाह सामेश्वर से कर दिया। इसी कमला देवी के गर्भ से पृथ्वीराज चौहान का जन्म विक्रम संवत् 1115 ई० में हुआ।

पृथ्वीराज चौहान का बचपन 

पृथ्वीराज बचपन से ही युद्ध के खेल खेला करते थे। पृथ्वीराज चौहान के बाल सखाओं के, चन्द्रबरदाई ने 36 नाम गिनाए हैं जिनमें एक खुद वह थे। अन्य थे-निठुर राय, जैतसिंह, कविचन्द्र, दाहिम्म राय, हरिसिंह, मज्जूना राय, सारंगदेव, कान्ह राय, कैयास, साखुली राय। 

चन्द्रबरदाई को छोड़कर ये सभी या तो राजपुत्र थे या सामन्त पुत्र। जिनसे इस बात का प्रमाण प्रस्तुत होता है कि राजा सोमेश्वर का अपने राज्य के आसपास के राजाओं और सामन्तों पर इतना प्रभाव था कि उनके राजकुमार पृथ्वीराज के साथ खेलने आया करते थे। 

पृथ्वीराज को बचपन से ही तलवार चलाने, घुड़सवारी करने, भाला फेंकने में प्रवीणता प्राप्त हो गयी थी। 

पृथ्वीराज यदा-कदा अपनी ननिहाल दिल्ली भी जाया करते थे। दिल्ली पति के कोई पुत्र सन्तान न थी, इसलिए अनंगपाल पृथ्वीराज पर अपना सारा स्नेह न्योछावर करते रहते थे।

युवराज पृथ्वीराज 

पृथ्वीराज चौहान को 10 साल की उम्र में युवराज बना दिया गया। युवराज होने के बाद उन्हें राज-काज सिखाया जाने लगा। अपनी योग्यता और कुशाग्र बुद्धि बल के कारण पृथ्वीराज की ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी।

चन्द्रबरदाई के अनुसार-अजमेर की खुशहाली, सुख-सम्पन्नता और वैभव के किस्से काबुल गन्धार में पहुंच रहे थे। वहां के सुल्तान अजमेर पर चढ़ाई करके धन-सम्पदा लूटने की तैयारी करने लगे थे। उन्होंने रोशन अली नामक व्यक्ति को जासूस बनाकर, घोड़े के व्यापारी के पर में अजमेर भेजा। 

रोशन अली, जासूसी करते पकड़ा गया। पृथ्वीराज चौहान ने उसकी एक उंगली काटकर उसे अजमेर से निकाल बाहर किया। 

रोशन अली ने वापिस जाकर अपनी विपदा सुनाई तो वहां के कुछ सैनिक सरदार, घोड़ों के व्यापारी बनकर अजमेर आये। उन्होंने व्यापारी वेश में, महल पर हमला कर दिया। पृथ्वीराज चौहान ने अपने तलवार का ऐसा जौहर दिखाया कि अकेले कईयों की गर्दनें उड़ा दीं।

व्यापार के बहाने आये हमलावारों में दो-चार ही मुश्किल से अपनी जान बचाकर अजमेर से बाहर निकल पाने में सफल हो गए। पृथ्वीराज की वीरता की न केवल अजमेर में, बल्कि दिल्ली तक धूम मच गयी थी। 

कुछ दिनों बाद अपने नाना के बुलावे पर जब पृथ्वीराज दिल्ली गये तो अनंगपाल ने उनकी बहादुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा उन्हें शीघ्र दिल्ली का उत्तराधिकारी बनाने का मन बना लिया।

मण्डोवर से युद्ध 

मण्डोवर से युद्ध 

मण्डोवर राज्य का राजा नाहर राय था। एक बार वह दिल्ली में अनंगपाल का मेहमान था। तब पृथ्वीराज अपने नाना के यहां दिल्ली आये हुए थे। पृथ्वीराज की सुंदरता, बल और शारीरिक सौष्ठव देखकर नाहर राय ने वचन दिया था कि वह पृथ्वीराज के सोलह वर्ष की उम्र होने पर अपनी कन्या का विवाह उनसे करेगा। उस समय पृथ्वीराज की उम्र आठ वर्ष थी। 

पृथ्वीराज सोलह वर्ष के हुए तो भी उन्हें राजा नाहर राय का वचन याद था। वह अपनी कन्या का विवाह कहीं और करने की बात चला रहा था। पृथ्वीराज ने नाहर राय के पास दूत के हाथों पत्र भेजकर उसके वचन की याद दिलायी। लेकिन नाहर राय अपनी बात से मुकर गया। उसे अपना अपमान मानकर अजमेर पति सोमेश्वर ने पृथ्वीराज को इस बात की आज्ञा दे दी कि वह मण्डोवर पर चढ़ाई कर दे।

 पृथ्वीराज, राज्य की सेना लेकर मण्डोवर पर आक्रमण के लिए चल पड़े। 

उधर, नाहर राय भी युद्ध के लिए तत्पर थे-मीना के सरदार पर्वतराय को पृथ्वीराज के मुकाबले में भेजा। पृथ्वीराज ने मीना सरदार के मुकाबले खुद उतरना सम्मान के विरुद्ध मानकर अपने सखा कान्ह को अपनी सेना की छोटी टुकड़ी देकर मुकाबले के लिए आगे बढ़ाया। 

कान्ह के सामने पर्वतराय अधिक देर टिक न सका, तब नाहर राय खुद अपने सैनिकों के साथ कान्ह की टुकड़ी पर टूट पड़ा। इस बात को देखते ही कि नाहरराय खुद युद्ध भूमि में उतर आया है, पृथ्वीराज भी तेजी से उस पर झपट पड़े। दोनों में देर तक युद्ध के दांव-पेंच चलते रहे। पृथ्वीराज ने नाहर के घोड़े को मार गिराया। घोड़े के साथ नाहर राय भी भूमि पर गिरकर छटपटाने लगा। 

नाहर राय की हार हो गयी थी। वह किसी तरह भागकर वहां से बच निकला और गिरनार के पर्वतों में जा छुपा। पृथ्वीराज ने उसके राज्य को घेरे रखा। तब नाहर राय ने सरदारों से सलाह-मशवरा करके पृथ्वीराज के पास संदेश भिजवाया कि वह अपनी पुत्री का विवाह उससे करने को तैयार है। 

उसने अपनी कन्या जम्मावती का विवाह पृथ्वीराज से कर दिया तथा आजीवन अजमेर से मैत्री सम्बन्ध के लिए वचनबद्ध हुआ।

मेवात विजय 

मेवात राज्य, अजमेर का करदाता राज्य था। वहां के राज मुद्गल राय ने अपनी शक्ति बढ़ाकर कर देना बंद कर दिया तथा कहलवा दिया कि पिता-पुत्र में शक्ति है तो उसके राज्य में आकर ‘कर’ वसूल करें। 

इस बात ने अजमेर पति सोमेश्वर को बड़ा क्रुद्ध किया। उन्होंने मेवात पर तुरन्त चढ़ाई का निर्णय ले लिया। सवाल पिता-पुत्र दोनों के सम्मान का था। पृथ्वीराज ने अपने पिता से पहले मेवात पहुंचकर चढ़ाई कर दी। मुद्गल राय को युद्ध भूमि में उतरने का मौका दिये बगैर उसे पकड़कर अपना कैदी बना लिया। इस तरह अधीन राज्य के रूप में मेवात से कर वसूल कर ही पृथ्वीराज ने मुद्गल राय को छोड़ा। राजा सोमेश्वर ने अपने पुत्र की वीरता का एक और प्रमाण सामने पाया तो उसे हर्ष से गले लगा लिया।

मुहम्मद गोरी से प्रथम युद्ध (1191 ई०) 

मुहम्मद गोरी से प्रथम युद्ध

मुहम्मद गोरी का परिचय-गजनी का शासक मुहम्मद गोरी, अफगानिस्तान के एक छोटे से राज्य ‘गोर’ में जन्मा था। ‘गोर’ स्थान गजनी और हिरात के मध्य स्थित है। गोर के निवासी ‘गोर वंश’ कहलाते थे। जिस समय मुहम्मद गोरी का जन्म हुआ उस समय ‘गोर’ गजनी के अधीन था।

महमूद गजनवी ने ‘गोर’ को जीतकर उसे अपने राज्य का हिस्सा बना लिया था। महमूद गजनवी के निधन के बाद गजनी के शासक कमजोर और गोर वंश के लोग शक्तिशाली होते गए। गोर वंश वालों ने गजनी पर अधिकार कर उस पर अपनी हुकूमत कायम कर ली। सन् 1163 ई० में गयासुद्दीन गोर गजनी का शासक बना। वह मुहम्मद गोरी का बड़ा भाई था। उसने गजनी पर अपनी पूरी सत्ता स्थापित कर अपने छोटे भाई मुहम्मद गोरी को वहां का शासक नियुक्त कर दिया। 

मुहम्मद गोरी अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी और साहसी था। इसके साथ ही वह अपने बड़े भाई के प्रति सदैव कृतज्ञ और आज्ञापालक रहा। 

गजनी की सुख-समृद्धि के लिए उसने महमूद गजनवी के आक्रमणों के इतिहास को देखा और उसी की तरह भारत को लूटकर गजनी का खजाना भरने की लालसा की। 

उसने भारत पर 1175 ई० से 1205 ई० तक अनेक आक्रमण किए। सिन्ध और पंजाब पर अधिपत्य स्थापित करता हुआ, वह एक विशाल सेना के साथ सरहिन्द पर आ डटा।

पृथ्वीराज चौहान की स्थिति 

जिस समय मुहम्मद गोरी अपनी विशाल सेना के साथ सरहिन्द से आगे बढ़ रहा था उस समय दिल्ली और अजमेर का संयुक्त राजा पृथ्वीराज चौहान था। उसने अपने कुशल राज्य नेतृत्व से कन्नौज के राजा जयचन्द को छोड़कर प्रायः सभी राजदूत राजाओं से घनिष्ठ मैत्री सम्बन्ध स्थापित कर लिये। अनेक छोटे-छोटे राजा और सामन्त उसकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे। उसे गुजरात विजय भी प्राप्त हो चुकी थी। मुहम्मद गोरी के आगे बढ़ते कदमों को रोक देने 

और उसे जबरदस्त टक्कर देकर भारत भूमि से खदेड़ बाहर करने का वह पूरा संकल्प ले चुका था।

 मुहम्मद गोरी की सेना में तातार, अरब के सैनिकों के साथ मीर कमा, मीर जमा, मीर खां जैसे योद्धा थे। 

पृथ्वीराज की सेना में कौमास, चामुख, चण्ड-पुण्डीर, चन्द्र सेन, जुफा सिंह, गहलौत, तुंवर, माण्डलीक खीची और कनक गुज्जर राज्यों की सेना थी। इस तरह से पृथ्वीराज चौहान के बारे में कहा जा सकता है, 650 वर्षों के बाद, कोई राजा भारत की धरती पर हुआ था, जो भारत के अन्य दर्जनों राजाओं को अपने ध्वज के नीचे एकत्र कर विदेशी आक्रमणकारी का दमन करने के उद्देश्य से रणभूमि में आ डटा था। कन्नौज के राजा जयचन्द्र को छोड़कर भारत के सभी राजाओं की सेना को पृथ्वीराज ने जोड़ लिया था। 

तराइन के मैदान में दोनों सेनाओं का जमाव 

सन् 1191 ई० में मुहम्मद गोरी ने विशाल सेना के साथ तराइन के मैदान में आकार पड़ाव डाल दिया था। विदेशी आक्रमण को भारत भूमि में पदाक्रांत करते देख, गोरी की सेना को विश्राम का अवसर दिये बगैर पृथ्वीराज ने उस पर हमला बोल दिया था। 

राजपूतों की तलवारों का जौहर देखने का गोरी की सेना को पहली बार अवसर मिला था। उसके तुर्क, तातार और अरब योद्धाओं को तराइन की युद्ध भूमि में आकर पता चला था कि राजपूतों की तलवार का पानी कैसा होता है।

 भीषण संग्राम में सुबह से शाम गुजर गयी-युद्ध का निर्णय होता नजर न आ रहा था। दोनों ओर की सेना के हजारों नरमुण्ड युद्ध भूमि में गिरे पड़े घोड़ों की टापों के नीचे कुचले जा रहे थे। पृथ्वीराज चौहान ने अपना घोड़ा दौड़ाते हुए, द्रुतगति से तलवार चलाते हुए दुश्मनों में कोहराम मचा रखा था, युद्ध का कोई निर्णय सामने न आ रहा कि अचानक मुहम्मद गोरी अपने घोड़े पर से नदारत नजर आया। तुर्क और तातारों के हौसले यकायक पस्त हो गए। नेतृत्व विहीन सेना के कदम यकायक पीछे हटे और उनमें भगदड़ मच गयी।

ढली हुई संध्या ने अपनी कालिमा की चादर वसुधा पर तान दी थी। पृथ्वीराज चौहान की सेना विजय उल्लास में भरी अपने-अपने खेमों की ओर लौट पड़ी थी। 

मुहम्मद गोरी किस परिणाम को पहुंचा था, इस बात का गोर सेना को पता न था, पृथ्वीराज की सेना को भी उसका कुछ अता-पता न था। 

पर, रात के वीराने और सन्नाटे में, गोरी के कुछ वफादार गुलाम, अपने आका की तलाश करते हुए युद्ध भूमि में गिरी लाशों के बीच आ गए थे। उन गुलामों में मुहम्मद गोरी के खास वफादार गुलाम और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक का खास महत्त्व था। अवश्य ही, उसने गोरी को घोड़े से गिरते देखा था-वह ठीक उस स्थान पर पहुंचा था जहां उसने गोरी को गिरते देखा था। उसका आना सार्थक रहा था-उसके कानों में गोरी की कराह की आवाज पड़ी थी। वह शीघ्रता से उधर बढ़ गया था। उसने जख्मी पड़े गोरी को सहारा दिया था। 

उसी समय उसके और साथी वहां पर आ गए थे। इसके बाद वे युद्ध भूमि से गोरी को उठा वहां से खामोशी से निकल गए थे। 

उस स्थल पर, इतिहास ने करवट बदलकर एक नया अध्याय खोल दिया था। काश! पृथ्वीराज चौहान, उसके रणबांकुरों ने इस बात पर ध्यान दिया होता कि मुहम्मद गोरी का घोड़े से गिरने के बाद क्या अंजाम हुआ तो इतिहास करवट न बदलता।

तराइन के मैदान में गोरी से दूसरा युद्ध 

तराइन के मैदान में गोरी से दूसरा युद्ध 

अपने गुलामों की वफादारी के वजह से युद्ध भूमि से, रात के अंधेरे में बचाकर निकाल ले जाने वाला मुहम्मद गोरी बुरी तरह जख्मों से चूर था। गोरी ने इस बात को खुद अमीर-उमराओं के बीच स्वीकार किया कि उसके गुलाम उसे युद्ध भूमि से उठाकर न ले गये होते तो वह एड़ियां एगड़-रगड़ कर वहीं मर गया होता।

 बहरहाल, गोरी गजनी पहुंचा दिया गया था। हकीमों द्वारा उसे जल्द ठीक कर दिया गया था। पर तराइन के युद्ध में हार के अपमान से गोरी इस तरह भरा हुआ था कि उसने ताजो-तख्त की ओर निगाह उठाकर न देखा था। वह इतनी शर्मिन्दगी महसूस कर रहा था कि पत्नी की ओर चेहरा उठाकर भी न देखा था। 

उसने संकल्प ले लिया था कि जब तक हार का बदला न ले लेगा, ताजो-तख्त न धारण करेगा, पत्नी का मुंह न देखेगा, अच्छे वस्त्र न धारण करेगा।

पूरे एक साल तक सिर्फ योद्धा के रूप में उसने जीवन जिया। सेना में योग्य सेनानियों को भर्ती किया। एक साल के अंदर उसने विशाल सेना तैयार कर ली थी। सेना सजाकर उसने फिर भारत के द्वार पर आक्रमणकारी के रूप में दस्तक दी। तराइन के मैदान में फिर आ डटा। 

इस बार भी कन्नौज के राजा जयचन्द को छोड़कर शेष राजपूत राजा पृथ्वीराज के साथ आ जुटे। यदि मुहम्मद गोरी पहले से बड़ी सेना लेकर वापस आया था, तो पृथ्वीराज चौहान की सैनिक शक्ति भी काफी बढ़ी हुई थी। इतिहासकारों ने लिखा है कि राजपूती सेना इतनी विशाल हो गयी थी कि उनका उचित रूप से संचालन न हो पा रहा था। तुर्क अश्वारोही बड़ी तेजी से धावा बोलते थे और बाण वर्षा कर राजपूती सेना को छिन्न-भिन्न कर देते थे।

युद्ध का परिणाम

असंगठित राजपूत सेना का परिणाम नकारात्मक रूप में सामने आया। पृथ्वीराज चौहान की सेना हार गयी। इस हार की मुख्य वजह यह थी कि राजपूत राजा अपनी ध्वजा के नीचे युद्ध कर रहे थे-सरदार की ध्वजा गिरते ही उसके पक्ष के सैनिकों का मनोबल टूट जाता था। यदि सारे राजा सिर्फ एक पृथ्वीराज की ध्वजा के नीचे युद्ध भूमि में उतरते तो हार के बजाय अवश्य ही विजयश्री मिली होती। 

मुहम्मद गोरी के अश्वारोही तीरन्दाजों के तीरों से घायल होकर पृथ्वीराज भी घोड़े से नीचे गिरा था। उसके गिरते ही गोरी सैनिकों ने उसे घेरे में ले लिया था। 

राजपूती सेना छिन्न-भिन्न होकर मैदान छोड़ गयी थी। इतिहासकारों ने लिखा है-पृथ्वीराज कैद कर लिया गया था और उसकी हत्या युद्ध भूमि में ही कर दी गयी। पर चन्द्रबरदाई के अनुसार पृथ्वीराज चौहान को कैद कर गजनी ले जाया गया था। चन्दबरदाई के विवरण में अतिशयोक्ति नजर आती है।

युद्ध निर्णय के बाद 

पृथ्वीराज के पराजय और वीरगति पाने के बाद झांसी और अजमेर पर मुहम्मद गोरी ने बड़ी सरलता से अपना अधिकार कर लिया था। अजमेर राजाओं के बनाए हुए मंदिरों को ध्वस्त कर उन्हें लूटा था। मुहम्मद गोरी ने स्वामिभक्त गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने वहां पर एक मस्जिद बनवाई, जिसे ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ कहते हैं।

इस विजय के बाद मुहम्मद गोरी विजय का संगठन कार्य ऐबक को सौंपकर स्वयं गजनी लौट गया था। उसने अपना संकल्प पूरा कर लिया था। वह विजेता बनकर गजनी वापिस जा रहा था। जहां विजेता के रूप में उसे ताजो-तख्त का सुख प्राप्त करना था तथा पत्नी का मुंह देखना और अच्छे वस्त्र पहनना था। 

कुतुबुद्दीन ऐबक एक योग्य सेनापति और योद्धा था, उसने दिल्ली के खाली पड़े ताजो-तख्त पर कब्जा कर लिया। वहां के मदिरों को नष्ट कर, वहां पर एक मस्जिद का निर्माण करवाना आरम्भ किया-जिसे ‘कुव्वत-उल-इस्लाम’ अर्थात् इस्लाम की शक्ति नाम दिया।

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