राजा उदयन की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Udayan

राजा उदयन की जीवनी और इतिहास

राजा उदयन की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Udayan

 उदयन षोडस महाजनपदों में से एक वत्स जनपद का राजा था। उसकी राजधानी कौशाम्बी थी। वह महात्मा बुद्ध का समकालीन था। उदयन जिस समय वत्स पर राज्य कर रहा था, उसी समय अवन्ति देश पर राजा प्रद्योत का शासन था। राजा प्रद्योत अत्यन्त महत्वाकांक्षी राजा था। उसने अनेक राजाओं को जीतकर अपने आधीन कर लिया था। 

राजा प्रद्योत ने उदयन वत्स राज्य को जीतने के कई प्रयास किये; पर वत्स राज उदयन के साहस, शौर्य और रणकुशलता के कारण अवन्ति राज को सफलता न मिल सकी। तब उदयन की श्रेष्ठ रणकुशलता को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर राजा प्रद्योत छल के द्वारा उदयन पर काबू पाने की युक्तियां सोचने लगा, उसने अपने गुप्तचरों से इस बात का पता लगाया कि राजा उदयन वन के हाथी को अकेला ही पकड़ने का अत्यन्त शौकीन है। यह शौक उसे इसलिए है क्योंकि उसके पास ‘घोषवती’ नामक एक वीणा है। उस वीणा के तारों को झंकृत कर वह ऐसा स्वर निकालता है, जिसे सुनते ही हर प्रकार का हाथी सम्मोहित होकर स्वयं ही उदयन की ओर खिंचा चला आता है। उसके सामने आकर वह मस्तक झुकाकर उसे प्रणाम कर खुद को उसकी सेवा के लिए समर्पित कर देता है। 

इस तरह घोषवती वीणा द्वारा पकड़ा गया हाथी आजीवन उदयन के वश में रहता है। राजा उदयन अपने साथ हाथी पकड़ने के समय किसी अन्य को इसलिए नहीं ले जाता, ताकि उसके अलावा किसी अन्य को इस बात की जानकारी न हो पाए कि हाथी पकड़ने के लिए वह घोषवती वीणा से कौन-सा राग निकालता 

 गुप्तचरों द्वारा उपरोक्त जानकारियां जुटाने के बाद अवन्ति राज प्रद्योन ने युक्ति रचकर एक अत्यन्त सुंदर, स्वरूप और युवा दिखने वाला बनावटी हाथी बनवाया। उस हाथी को उसने अवन्ति और वत्स सीमा के भू-भाग वाले जंगल में रखवा दिया। अपने गुप्तचरों द्वारा उसने वत्स में जगह-जगह इस बात की चर्चा भी फैला दी कि सीमा के वन में एक युवा हाथी आया हुआ है। 

जैसा कि अवन्ति राज की योजना थी, उसी अनुसार खबर फैलते हुए वत्सराज उदयन के कानों में यह समाचार पड़ा। 

मुग्ध होने की हद तक, वन के हाथी को पकड़ने का शौकीन उदयन अपनी अंगरक्षक सैनिक टुकड़ी तथा घोषवती वीणा लेकर अपने और अवन्ति राज्य की सीमा की ओर चल पड़ा।

उसने समाचार को सही पाया-अवन्ति और वत्स राज्य की सीमा के बीच स्थित वन में उसने चर्चित हाथी की उपस्थिति की जानकारी पा ली। इस जानकारी के बाद वह अपने साथ की सैनिक टुकड़ी को वहीं छोड़कर, वीणा लेकर अकेला ही आगे बढ़ गया।

 उसे उस स्थान तक पहुंचते देर न लगी, जहां चर्चित हाथी मौजूद था। उसने वीणा बजानी आरम्भ की।

वीणा के तारों की झंकार सुनते ही हाथी अपने स्थान पर झूमने लगा। 

वास्तव में वह बनावटी हाथी था। उसका शारीरिक ढांचा लकड़ी का था। हाथी के पेट वाले स्थान में लड़की का द्वार लगा हुआ था। उस द्वार से प्रविष्ट होकर कई एक की संख्या में अवन्ति राज के सैनिक छुपे हुए थे। वे सैनिक ही हाथी के ढांचे को विभिन्न रूप में हिलाकर इस बात का भ्रम उदयन को देने लगे कि वह हाथी वीणा की धुन को सुन, मस्त होने लगा है। 

राजा उदयन इस बात को देखकर कि हाथी मस्त हो चुका है, वह उसकी ओर बढ़ने लगा। 

फिर ज्योंही उदयन हाथी के निकट आया, हाथी के पेट में छुपे अवन्तिराज के सारे सैनिक तेजी से निकल आये। उदयन ने अवन्तिराज के सैनिकों से जमकर संघर्ष किया; पर अन्ततः उस पर जाल फेंककर कस लिया गया; उसे यूं पकड़ा गया जैसे वह वन का कोई हिंसक जीव हो।

 अवन्ति राज का मंत्री मौगन्धरायण अत्यन्त बुद्धिमान और दूरदर्शी था। उसने उदयन को अचेतावस्था में अवन्ति राजधानी उजायनी के राजमहल में भिजावाकर कैद कर दिया। ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह था कि वत्स की सेना, जनता अथवा राजघराने के लोगों को पता न लग सके कि राजा उदयन कहां गया? 

ऐसा करने के बाद उसने पूरी सैनिक तैयारी के साथ राजा प्रद्योत को वत्स पर आक्रमण करने की योजना दी थी। उसे पूरी आशा थी कि राजा विहीन, वत्स की सेना आधे-अधूरे उत्साह से लड़ेगी तब वत्स पर अधिकार पाना आसान हो जाएगा। 

दूसरी ओर राजा उदयन के राजमहल के एक हिस्से में बंदी बनाकर रखे जाने की सूचना राजा प्रद्योत की पुत्री राजकुमारी वासवदत्ता ने सुनी तो उसने कौतुक में भरकर, उसे देखने और उससे मुलाकात की युक्ति अपनायी।

 उदयन से गुप्त भेंट करते ही, प्रथम दृष्टि में ही वासवदत्ता उस पर मोहित हो गयी। उसने उदयन की वीणा की प्रशंसा सुन रखी थी। वीणा अभी उदयन के पास ही थी। राजकुमारी ने उसने सामने प्रस्ताव रखा कि वह उसे स्वतंत्र कराकर, उसके साथ वत्स चलना चाहती है। इसके लिए भद्रवती नामक हथिनी का वह इस्तेमाल करने का विचार रखती है। भद्रवती वशीभूत होकर सिर्फ उसका ही आदेश माने, इसके लिए वह उसके सामने घोषवती वीणा का प्रयोग करना चाहती है। 

उसकी इच्छा और उसका प्रस्ताव मानकर उदयन ने उसे वीणा के राग की जानकारी देकर वीणा उसे दे दी। 

वासवदत्ता ने भद्रवती हथिनी पर वीणा के राग का प्रयोग किया। हथिनी सचमुच ही पूरी तरह से उसके वशीभूत होकर अपना सिर उसके कदमों पर झुका बैठी थी।

अवन्ति राज प्रद्योत अभी वत्स पर चढ़ाई करने की तैयारी कर ही रहा था कि वत्स राज का मंत्री यौगन्धरायण ने वत्स के सैनिकों को लेकर अवन्ति राज्य पर चढ़ाई कर दी।

अवन्ति राज्य ने आधी-अधूरी तैयारी के साथ सेना उतार दी। दोनों ओर के सैनिक पूरी वीरता से युद्धरत हो गये। 

इस बीच, पूरे राज्य का ध्यान, जब युद्ध की ओर लग चुका था, तब वासवदत्ता, उदयन को लेकर भद्रवती हाथिनी पर सवार होकर, रातों-रात अवन्ति से वत्स राज पहुंच गयी। 

राजा प्रद्योत को जब वासवदत्ता द्वारा उदयन को स्वतन्त्र कराकर, उसके साथ वत्स राज्य में पहुंच जाने का समाचार मिला, तो उसने तुरन्त युद्ध रोक देने का आदेश दिया।

उदयन भी अपने राज्य में पहुंचने के बाद अपने मंत्री यौगन्धरायण और सेना का साथ देने युद्ध भूमि में पहुंच गया। उसके युद्ध भूमि पर पहुंचते ही अवन्ती राज की ओर से आया हुआ संधि प्रस्ताव मिला। उसने तुरन्त संधि स्वीकार कर सेना पीछे हटा ली। 

अवन्तीराज प्रद्योन ने उदयन को अपने दमाद के रूप में प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया। वासवदत्ता से विवाह करके उदयन, कामिनी के प्रेमजाल में पूरी तरह घिरता चला गया। 

उदयन का राज्य विस्तार 

राजा उदयन के अवन्ती राजकुमारी वासवदत्ता के प्रेम में लीन हो जाने से, राज्य संचालन से मोह भंग हो गया था। वत्स के कुशल और नीति-निपुण मंत्री यौगन्धरायण ने अपनी नीति निपुणता का परिचय देते हुए, पड़ोसी राज्य मगध के राजा दर्शक के पास उसकी बहन पद्मावती से अपने राजा उदयन का विवाह प्रस्ताव भेजकर-वैवहिक सम्बन्ध स्थापित कर दिया। 

इसका प्रभाव यह हुआ कि वासवदत्ता को छोड़कर नयी रानी पद्मावती के प्रेमपाश में उदयन बंध गया; साथ ही कलिंग जैसे मजबूत राज्य को वत्स का सहयोग मिलने लगा। 

वत्स राज्य के मंत्री यौगन्धरायण की बुद्धिमत्ता नीति-निपुणता, उदयन के वासवदत्ता और पद्मावती के प्रेम में लीन होने का मनोरंजक और छद्मग्राही, वर्णन महाकवि भास के प्रसिद्ध नाटक ‘स्वप्न वासवदत्ता’ में मिलता है। ऐसा ही वर्णन ‘बृहत्कथा मञ्जरी’ तथा ‘कथासरित्सागर’ में भी मिलता है |

मगधराज दर्शक तथा अवन्ति राज प्रद्योत से वैवाहिक और मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के बाद वत्स राज्य की स्थिति काफी दृढ़ हो गयी थी। वत्स के कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शी मंत्री की युक्ति भी कार्य करने लगी थी। दो सुन्दरियों के बीच प्रेम बंट जाने के बाद राजा उदयन को पत्नियों से होने वाली संतानों के लिए राज्य विस्तार की सोच भी बन गयी थी। वह राज-काज में पूरा समय देने लगा था। यौगन्धरायण की प्रेरणा से वह राज्य विस्तार की नीति पर चल पड़ा था। 

वत्स के राज्य विस्तार के लिए प्रस्थान से पूर्व उदयन ने अपने राज्य में शान्ति तथा सुशासन के लिए व्यवस्था की। _ ‘कक्षा सरित्सागर’ के अनुसार उदयन ने विदेह और चेदि राज्य को भी शीघ्र ही अपने अधीन कर लिया था।

कथासरित्सागर में वर्णित है कि उदयन ने विजय अभियान आरम्भ करने से पूर्व गोपाल को विदेह देश का शासक नियुक्त किया गया था तथा पद्मावती के भाई सिंहवर्मा को चेदि का शासन सौंपा था। पद्यावती के भाई सिंहवर्मा का जिक्र आने से इस बात को माना जा सकता है कि अवश्य ही गोपाल, वासवदत्ता का भाई था, उस समय उसका नाम विदेह के शासक के रूप में काफी प्रसिद्ध था, इस कारण कथासरित्सागर में विशेष परिचय देने की आवश्यकता नहीं समझी गयी। पूरी तैयारी के साथ उदयन ने अन्य राज्यों पर आक्रमण की तैयारी की।

काशी पर आक्रमण-जो राजा उदयन के मित्र थे, उनका सहयोग प्राप्त कर सर्वप्रथम उसने काशी पर आक्रमण किया। उस समय काशी का राजा ब्रह्मदत्त था। ब्रह्मदत्त को ही महाकवि भास ने आरुणि और तिब्बति साहित्य में आरनेमि लिखा है।

काशी पर सहजता से विजय प्राप्त कर उदयन ने ब्रह्मदत्त से अपनी अधीनता स्वीकार करा ली।

पूर्व दिशा की ओर विजय-मगध के साथ वैवाहिक मैत्री सम्बन्ध तो उदयन के पहले ही स्थापित थे। अतः उसने मगध पार के छोटे-छोटे राजाओं को जीतते हुए, वंग देश को विजय किया और समुन्द्र के तट पर ‘उदयन जयस्तम्भ’ की स्थापना हुई। उसके बाद कलिंग पर आक्रमण किया। कलिंग राज्य ने बगैर युद्ध के ही उदयन की अधीनता स्वीकार कर ली। इस प्रकार सम्पूर्ण प्राच्य भारत में वत्सराज उदयन को अपना अधिपति मान लिया। दक्षिण विजय अभियान-पूर्व दिशा के सभी राज्यों को जीतने के बाद उदयन ने दक्षिण पर आक्रमण किया। उसने महेन्द्र पर्वत-माला के प्रदेशों में निवास करने वाले पाण्डुर लोगों पर विजय प्राप्त की। फिर उसने कावेटी नदी को पार किया और चोल साम्राज्य से अधीनता स्वीकार करा ली। उसके बाद आगे बढ़कर उसने ‘मुरल’ राज्य पर आक्रमण कर उसे जीता। ‘मुरल’ राज्य का वर्णन कथासरित्सागर में आया है। जो सम्भवतः ‘केरल’ के बजाय ‘मुरल’ हो गया है। उस समय उस ओर मुरल नामक कोई राज्य न था; केरल राज्य अवश्य था, अतः मुरल ही केरल था।

उत्तर विजय अभियान-चोल और केरल राज्यों को जीतकर उदयन ने दक्षिण भारत के पश्चिमी तट से होते हुए, उत्तर की ओर प्रस्थान किया। वह गोदावरी होता हुआ रेवा नदी पार कर उज्जयिनी पहुंचा। उज्जयिनी के जनता ने उसका भरपूर स्वागत किया। उज्जयिनी उसकी ससुराल थी। वासवदत्ता का बचपना उज्जयिनी में ही खेल-कूद कर बीता था। वासवदत्त को उज्जयिनी बहुत प्रिय थी। स्वागत-सत्कार के अवसर पर उदयन ने वासवदत्ता को भी वहीं बुला लिया था। उज्जयिनी के लोगों ने वासवदत्ता का पलक-पांवड़े बिछाकर स्वागत-सत्कार किया।

उदयन सपत्नी काफी दिनों तक उज्जयिनी में रुका। सेना को विश्राम दिया। फिर उसने पश्चिम विजय अभियान की योजना बनाकर प्रसेनजित् की सेना का भी सहयोग किया।

पश्चिम विजय आभियान-पश्चिम दिशा में उदयन ने लाट देश पर आक्रमण किया। लाट देश मही और ताप्ती और नदियों के मध्यवर्ती प्रदेश था। यह दक्षिणी गुजरात में स्थित था। लाट देश को जीतकर उदयन ने सिन्धु तुरुस्कों पर भी विजय प्राप्त की। पश्चिमी भारत के विजय अभियान में उसका पारसीक राजा से युद्ध हुआ। ‘कथासरित्सागर’ के अनुसार उदयन ने पारसिक के राजा को भी हराया और उसका वध किया। पश्चिम विजय के ही संदर्भ में हूणों पर भी विजय का उल्लेख मिलता है।

पश्चिम भारत में विजय प्राप्त कर उदयन ने मगधराज की राजधानी में प्रवेश किया। वहां का राजा पद्मावती का भाई था। उसने उदयन का भरपूर स्वागत किया। उदयन ने वहां के स्वागत-सत्कार का आनन्द उठाने के लिए अपनी पत्नी पद्मावती को भी वहां, कुछ इसी प्रकार बुला लिया था; जैसे उज्जयिनी में वासवदत्ता को बुलाया था। वहां कई दिन आमोद-प्रमोद में बिताने के बाद उदयन वत्स लौट आया।

इस विजय यात्रा से उदयन भारत का सबसे शक्तिशाली राजा बन गया था।

उदयन की विजय यात्रा में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि उसने कलिंग देश को हराने के बाद वहां की राजकुमारी कलिंग सेना से भी विवाह किया था।

उदयन के साथ सम्बन्ध रखने वाली विविध घटनाओं को लेकर स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिज्ञानौगन्धरायण, प्रियदर्शिका, रत्नावली आदि विविध नाटकों का रचा जाना इस बात को सिद्ध करता है कि पुरातन समय में राजा उदयन की बहुत ही अधिक प्रसिद्धि थी। बौद्ध, जैन और संस्कृत के अनेक ग्रंथों में उदयन-सम्बन्धी कथाएं उपलब्ध होती हैं। 

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