राजा प्रसेनजित की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Prasenjit

राजा प्रसेनजित की जीवनी और इतिहास

राजा प्रसेनजित की जीवनी और इतिहास |Biography and History of King Prasenjit

सम्राट प्रसेनजित 

कोशल महाजनपद के राजा प्रसेनजित अथवा पसेनदि महात्मा बुद्ध के समकालीन थे। पुराणों के अनुसार कोशल के राजा प्राचीन ऐक्ष्वाकव वंश के थे। उत्तर भारत के मध्य में कोशल राज्य का उदय छठी शताब्दी ई०पू० में एक महत्त्वपूर्ण राजनैतिक घटना थी। 

पाली साहित्य से विदित होता है कि शाक्यों ने कोशल का अधिपत्य स्वीकार कर किया था और इसी कारण प्रसेनजित को ‘पसेनदि’ की उपाधि प्राप्त हुई। पसेनदि का अर्थ होता है-पांच राजाओं के दल का प्रधान, इसके अतिरिक्त राजा बिम्बसार के साथ उसकी भगिनी (बहन) के विवाह ने भी उसे शक्ति और सुरक्षा प्रदान की थी। यह भी विवरण मिलता है कि जब बिम्बसार के पुत्र अजात शत्रु ने अपने अपने पिता को कारागार में डालकर भूखो मार डाला, तो उसकी विधवा कोशल देवी ने विषाद से मृत्यु को वरण किया। 

ऐसा होने के बाद प्रसेनजित ने काशी नगरी की आय (जो दहेज में दी गयी थी) मगध को देना बन्द कर दिया। आय न देने के फलस्वरूप मगध ने कोशल पर आक्रमण कर दिया, कोशल और मगध लम्बे समय तक युद्ध में रत रहे। विजय लक्ष्मी कभी कोशल का पलड़ा भारी कर देती, कभी मगध का।

अंत में मगध और कोशल के बीच संधि हुई, इस संधि में प्रसेनजित को अपनी पुत्री का विवाह अजातशत्रु से करना पड़ा तथा विवाह में अपनी कन्या को काशी की आय भी देनी पड़ी।

प्रसेनजित का चरित्र और व्यक्तित्व 

प्रसेनजित की शिक्षा-दीक्षा तक्षशिला के विख्यात विद्यापीठ में हुई थी। वह उदारचेता राजा था। उसने ब्राह्मणों को भूमि दान दी तथा बौद्ध आश्रमों लिए आवास की व्यवस्था की। उनके लिए विहार बनवाये। महात्मा बुद्ध के साथ उसका घना सम्बन्ध था, संकटों में वह उनकी सलाह लेता रहता था। 

वह इस बात पर आश्चर्य करता था कि तथागत (महात्मा बुद्ध) किस प्रकार अपने विशाल संघ में शांति से रहते हैं तथा वह अपनी सारी राजशक्ति के होते हुए भी दस्यु अंगुलिमाल के अत्याचारों से तथा अपने कुल और मंत्रियों के षड्यंत्र से सर्वदा व्यथित रहता है।

इस विवरण से स्पष्ट होता है कि प्रसिद्ध डाकू अंगुलिमाल कोशल राज्य के घने वनों में विचरता था, कोशलराज की सेनाएं अंगुलिमाल का कुछ न बिगाड़ पा रहीं थीं। कोशल राज्य की जनता, अंगुलिमाल के अत्याचारों से आंतकित और भयभीत रहा करती थी। 

चूंकि कोशलराज प्रसेनजित का महात्मा बुद्ध के पास आना-जाना था। वह उनसे परामर्श करता था; इसलिए उसने महात्मा बुद्ध से अंगुलिमाल से होने वाले कष्ट का जिक्र किया था।

उसे अंगुलिमाल के कष्ट से छुटकारा दिलाने के लिए महात्मा बुद्ध उस वन में गये, जहां अंगुलिमाल का आतंक छाया हुआ था। महात्मा बुद्ध के सामने पड़ते ही अंगुलिमाल का मन बदला। वह हत्या जैसे कुकर्मों को त्यागकर बुद्ध के उपदेशों पर चलने लगा। इस प्रकार बुद्ध ने प्रसेनजित को तथा कोशल की जनता को अंगुलिमाल के अत्याचारों से छुटकारा दिलाया।

कोशल राज्य की राजधानी श्रावस्ती थी। बौद्ध ग्रंथों में इसे सावट्वी लिखा गया है। सावट्वी के अतिरिक्त अन्य भी अनेक नगर कोशल में विद्यमान थे। इनमें अयोध्या, साकेत, संतव्य और उकट्ठ के नाल उल्लेखनीय हैं।

 महाराजा प्रसेनजित के प्रधानमंत्री का नाम दीर्घ चारायण था। सम्भवतः यह वहीं दीर्घ चारायण है, जिसका उल्लेख कौटिल्य अर्थशास्त्र में नीतिशास्त्र के अन्यतम् आचार्य के रूप में आया है। 

तिब्बती अनुश्रुति के अनुसार कोशलराज में प्रसेनजित के मंत्रिपरिषद् का उल्लेख है, जिसके सदस्यों की संख्या 500 थी। उस युग में अन्य महाजन पदों के समान कोशल भी साम्राज्य विस्तार के लिए प्रयत्नशील था। साम्राज्य विस्तार के विषय को लेकर ही मगध के साथ उसका संघर्ष हुआ था। उस समय मगध सर्वशक्तिशाली राज्य था। उसके साथ लम्बे समय तक टकराना और फिर बराबरी पर संधि करना अपने आप में प्रसेनजित के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात थी।

शाक्यों द्वारा राज्य बचाव

 प्रसेनजित् की शक्ति इतनी बढ़ गयी थी कि उसने शाक्यों के पास संदेश भेजा कि वे शाक्य राजकुमारी का उसके साथ ब्याह कर दें, अन्यथा युद्ध के लिए तैयार हो जाएं। शाक्य लोग शाक्य राजकुमारी का प्रसेनजित् से विवाह करना अपना अपमान समझते थे, पर उनके लिए इंकार करना अत्यंत जोखिम का काम था। 

इंकार करने पर प्रसेनजित उन पर आक्रमण कर देता, प्रसेनजित के आक्रमण को झेल पाना शाक्यों के लिए असम्भव बात थी। 

शाक्य सरदारों ने काफी सोच-विचार के बाद निष्कर्ष निकाला कि युद्ध में उतरना सर्वनाश को निमंत्रण देना है साथ ही ऐसी युक्ति भी ढूंढी गयी, जिसमें बगैर अपमानित हुए प्रसेनजित को प्रसन्न भी किया जा सके। 

महानाम नामक एक शाक्य सरदार ने सुझाव दिया 

“राजन्! आप अपनी दासी पुत्री को प्रसेनजित से विवाह के लिए भेज दें, इसके लिए व्यवस्था ऐसी करें कि किसी को कानो-कान खबर न हो कि आपने अपनी पुत्री के बजाय दासी पुत्री को प्रसेनजित के पास भेजा है। ऐसा होने के बाद प्रसेनजित भी प्रसन्न हो जाएगा तथा हम अपमान से भी बच जायेंगे।” 

शाक्य राजा ने महानाम नामक सरदार का सुझाव मान लिया। प्रसेनजित की सेवा में जिस दासी पुत्री को विवाह हेतु भेजा, उसका नाम वासव खत्तिया था। वासव खत्तिया से प्रसेनजित् को पुत्र की प्राप्ति हुई। उस पुत्र का नाम विरुद्धक रखा गया। यौवनावस्था को प्राप्त करने पर विरुद्धक ने पिता के विरुद्ध षड्यंत्र करके, राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। कोशलपति बनने के बाद एक दिन वह अपने शयन कक्ष में जा रहा था कि दासियों वाले कक्ष से उभरते कराह भरे और जर्जरित स्वर को सुनकर वह ठिठक गया। 

वह कक्ष उसकी धाय मां का था। उसे वह ‘धाय मां’ ही सम्बोधन देता था, वह उसकी मां वासव खत्तिया के विवाह के अवसर पर उसके साथ शाक्य राज्य से कोशल राज्य आयी थी। अपना पूरा जीवन उसकी मां की सेवा में गुजार दिया था। उसे भी उसी ने पाला-पोसा था। वह अपनी मां से कम धाय मां से कहीं अधिक निकट था।

 धाय मां बूढ़ी हो गयी थी। वह बीमार भी रहने लगी थी। उसका शरीर जर्जरित हो रहा था। विरुद्धक अपने शयन कक्ष में जाने से पहले अक्सर अपनी धाय मां का हाल-चाल पूछने उसके कक्ष में पहुंच जाता था। 

उसने ठिठकते ही धाय मां का शिकायती स्वर सुना। वह अपनी सेवा में लगी एक अन्य दासी से कह रही थी|

 “जब से मैं बीमार पड़ी हूं-राजरानी ने मुझ पर ध्यान देना पूरी तरह बन्द कर दिया है। वह समझती है कि मैं अब उसके किसी काम की नहीं रही; पर 

यह राजरानी की भूल है, एक राज मेरे सीने में ऐसा दफन है, जिसे मैं उगल दूं, तो राजरानी के जीवन और शाक्य राज्य में भूचाल उत्पन्न हो जाए…।”

“ऐसा कोई भी राज़ नहीं हो सकता जो राजरानी के जीवन और शाक्य राज्य में भूचाल ला दे।” धाय मां की सेवा में लगी स्त्री का स्वर उभरा था।

“तुम ऐसा कहती हो तो सुनो… । पर यह बात अपने तक ही रख…। मेरा क्या है न जाने कब प्राण शरीर छोड़ जाए, पर मृत्यु से पहले तुम्हें इस भेद को बता जाती हूं कि राजरानी वासव खत्तिया शाक्य राजा की पुत्री नहीं… । बल्कि एक दासी की पुत्री है।” । “नहीं…।” सेविका ने हैरत से दोहराया था। 

उसके कथन ने सचमुच भूचाल ला दिया था। विरुद्धक ने सुना तो झट तलवार खींचते हुए कक्ष में अंदर दाखिल हो गया। उसका चेहरा आक्रोश से तमतमा रहा था-उसने ऊंची आवाज में कहा- “एक बार फिर कहो धाय मा…वही बात जो अभी-अभी आपने कही है…। क्या यह सच है कि मैं एक शाक्य कुल की राजकन्या में जन्मा पुत्र न होकर शाक्य कुल की दासी कन्या से जन्मा हूं…? क्या यह सच है धाय मा…क्या यह सच है…” _

“हा…हां…यही सच है…यही सच है…।” विरुद्धक को तलवार खींचे, अपने सिर पर सवार, खूनी मुद्रा में देख, धाय मां ने हड़बड़ाहट में आतंकित स्वर और उखड़ती सांसों के साथ कहा। 

शब्द पूरे करने के साथ उसने एक तेज हिचकी ली थी…और फिर विरुद्धक के देखते-ही-देखते उसने प्राण त्याग दिये। 

विरुद्धक को धाय मां के अंतिम वाक्यों की पुष्टि उसकी मां से भी हो गयी थी। मां को उसने कुछ न कहा था, क्योंकि उसमें उसका कोई दोष नजर न आया था। इसके अलावा वह उसकी जन्मदात्री थी। 

उसने सिंहासनाच्युत बूढ़े पिता के पास जाकर उनसे शाक्यों के छल की बात बतायी थी। 

बूढ़े और असहाय हो रहे प्रसेनजित के मुंह से वाक्य निकला था-“पुत्र विरुद्धक! शाक्यों के छल का बदला लो…” 

पिता से अनुमति पाकर विरुद्धक ने अपने मंत्री अम्बरीश से परामर्श कर शाक्यों पर आक्रमण की तैयारी आरम्भ कर दी थी। उसने दूतों द्वारा शाक्य राज्य में संदेश भी भिजवा दिया था कि वे अपने छल के लिए उसका आक्रमण झेलने के लिए खुद को तैयार कर लें। 

विरुद्धक द्वारा शाक्यों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी का समाचार महात्मा बुद्ध को मिला, तो वे दुःखी हुए। इस दुःख का एक कारण तो यह था कि वे स्वयं शाक्य थे, दूसरा कारण यह कि युद्ध से जो विनाश होता, वह उनके अहिंसा के सिद्धान्त के विरुद्ध था। वे उस युद्ध को रोकने के लिए कुछ कर तो न सकते थे, सिवा इसके कि विरुद्धक को सद्बुद्धि आ जाए। उन्होंने कपिलवस्तु की ओर प्रस्थान किया और मार्ग में एक छायाशून्य ‘शकोतक वृक्ष’ को देख, उसके नीचे आसन जमा लिया। _

विरुद्धक अपनी विशाल सेना लेकर उसी मार्ग से गुजरा-उसने महात्मा बुद्ध को उस दशा में देखा, तो उसे इस बात का ज्ञान हुआ कि महात्मा बुद्ध दुःखी हैं। उसे बुद्ध पर असीम श्रद्धा थी। वह उन्हें दुःखी नहीं देख सकता था। उसने शाक्यों पर आक्रमण करने का विचार त्यागकर सेना को कोशल लौटने का आदेश दे दिया। 

विरुद्धक का मन महात्मा बुद्ध को ध्यानवस्था में देखते ही शान्त हो गया था; पर उसका मंत्री अम्बरीश अशान्त था। वह कट्टर साम्राज्यवादी था। कुछ समय बाद ही उसने शाक्यों पर आक्रमण करने के लिए विरुद्धक को पुनः तैयार कर लिया। 

विरुद्धक को उकसाकर अम्बरीश ने शाक्यों से भीषण युद्ध छेड़ दिया। उसने छल से कपिलवस्तु के द्वार खुलवाकर शाक्यों का बुरी तरह संहार करना आरम्भ कर दिया। 77ए000 शाक्य विरुद्धक की सेना के हाथों मारे गए। कुछ अपनी जान बचाकर भागने में सफल हुए। भागे हुए शाक्यों ने सुदूर पार्वत्यदेशों में जाकर नवीन राज्यों की स्थापना की। 

इस प्रकार प्रसेनजित के पुत्र विरुद्धक ने शाक्यों के महिमामय गणराज्य का अंत कर दिया था। 

बौद्ध साहित्य में लिखा है कि महात्मा बुद्ध ने शाक्यों के विनाश का समाचार पाकर, भविष्यवाणी की थी कि सात दिन में विरुद्धक और अम्बरीश का विनाश हो जाएगा और ऐसा ही हुआ। 

श्री हर्षकृत रत्नावली से ज्ञात होता है कि उदयन के सेनापति रुमण्वान् ने कोशल राज को परास्त कर राजा और सेना और सेनापति का संहार कर डाला था। 

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